है न कमाल की बात! भारत के सबसे बड़े थार मरुस्थल में एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी है। हमारा देश लाजवाब है, बेमिसाल है, यहाँ कुछ भी असंभव नहीं। मैं पिछले लगभग छह दशक से राजस्थान जा रहा था—कह सकते हैं 1967 से लेकर 2017 तक। उसके बाद नहीं जा पाया, क्योंकि कई दायित्व सौंपे गए थे मुझे। इसी दौर में पहले मैं ‘दिनमान’ के लिए बहुत कुछ कवर किया करता था—राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों से जुड़ी गतिविधियाँ। खादी ग्रामोद्योग जैसे प्रायोजित दौरे भी हो जाते थे। ‘दिनमान’ के बाद ‘संडे मेल’ की संपादकीय और डालमिया सेवा ट्रस्ट से जुड़े सामाजिक सरोकार भी मुझे बराबर राजस्थान ले जाते रहे। कह सकते हैं कि मैंने राजस्थान के सभी शहर और काफ़ी तादाद में गाँव, धोरे और ढानियाँ देखी हैं और वहाँ का जनजीवन भी नज़दीक से। सामाजिक सरोकारों में डालमिया सेवा ट्रस्ट के तत्वावधान में चिकित्सा शिविर आयोजित होते थे। ट्रस्ट के प्रमुख समाजसेवी-उद्यमी संजय डालमिया के प्रतिनिधि के तौर पर मैं राजस्थान के तमाम नगरों और गाँवों में शिविरों का निरीक्षण करने के लिए जाया करता था। इस दौरान मैंने पोखरण के वे दोनों स्थल भी देखे जहाँ परमाणु परीक्षण किए गए थे, और वहाँ से थोड़ी दूर पर स्थित रामदेवरा मंदिर भी। वहाँ से मैं सीधे जैसलमेर निकल जाया करता था।
चिकित्सा शिविरों संबंधी एक प्रेस रिलीज़ तैयार की जाती थी, जिसे शिविर से जुड़ी टीम विभिन्न समाचार-पत्रों में दे आया करती थी। आम तौर पर जोधपुर में मेरा ठिकाना रहता था और यहीं से मैं शिविरों के निरीक्षण के लिए जाया करता था। एक दिन न जाने मुझे क्या सूझी कि मैं अपनी टीम के एक सदस्य के साथ ‘दैनिक भास्कर’ के स्थानीय संपादक से मिलने के लिए चला गया। मुझे देख वह संपादक कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और बोला कि “मैं ओम गौड़ हूँ और पाली से ‘दिनमान’ के लिए खबरें भेजा करता था।” शिविर की प्रेस रिलीज़ देखकर उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि आपके शिविरों से जुड़ी न केवल खबरें ही छपेंगी, बल्कि हम अपने ऑफिस में एक शिविर भी लगाएँगे। उन्होंने अपनी विशेष संवाददाता श्रीमती संगीता शर्मा से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि यदि किसी कारण मैं ऑफिस में न हुआ, तो आप इन्हें खबर दे सकते हैं। क्या संयोग है कि ओम जी के पास बैठे-बैठे संगीता जी के पति मुकेशदत्त शर्मा से भी भेंट हो गयी, जो अपनी विज्ञापन एजेंसी चलाते हैं। आज यही पति-पत्नी मिलकर सांयकालीन ‘परिक्रमा’ अख़बार निकालते हैं। बेशक मेरे लिए यह एक उपलब्धि थी।
राजस्थान देश के सुंदर और संपन्न राज्यों में से एक है। यहाँ का इतिहास शौर्य के पन्नों से पटा हुआ है, कला-संस्कृति-साहित्य यहाँ का बेमिसाल है, यहाँ के रजवाड़ों की ख्याति सर्वव्यापी है और यहाँ की लोक-संस्कृति के तो क्या कहने! मोटे तौर पर राजस्थान को तीन भागों में बाँटा जाता है—मारवाड़, मेवाड़ और शेखावाटी। इन तीनों क्षेत्रों की पेंटिंग्स लाजवाब हैं। राजस्थान धार्मिक एवं आध्यात्मिक राज्य के रूप में भी प्रसिद्ध है, जहाँ किसी न किसी त्योहार पर मेले लगते रहते हैं, जैसे हनुमान जी के जन्मदिन पर सालासर में मेला, तो कृष्ण जी से जुड़ी तिथियों पर खाटू श्याम जी और नाथद्वारा में मेले, तो पोखरण के समीप रामदेवरा का मेला। आज हम इन मेलों से हट कर एक अलग प्रसंग पर चर्चा करेंगे, जिसने देश में ही नहीं, पूरे एशिया महाद्वीप में कीर्तिमान स्थापित किया है। वह है एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत (अंडरग्राउंड) भादरिया लाइब्रेरी, जो पोखरण और जैसलमेर के बीच में स्थित भादरिया गाँव में ‘भादरिया राय माता मंदिर’ के परिसर में स्थित है।
जोधपुर से जैसलमेर की तरफ जाते हुए रास्ते में दो प्रमुख पड़ाव पड़ते हैं। एक है पोखरण, जहाँ दो बार परमाणु परीक्षण हुए थे—पहला 1974 में, जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं, और दूसरा मई 1998 में, अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में। इन परमाणु परीक्षणों से देश और विदेश में भारत की साख और धाक काफ़ी बढ़ गयी थी। दूसरा पड़ाव भी पोखरण में है—बाबा रामदेवरा मंदिर के रूप में। लोक देवता बाबा रामदेव की आस्था में हर साल यहाँ मेला भरता है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। लोग अपने घरों को खुला छोड़कर, बिना ताला लगाए, पैदल चलते हुए तो कुछ रेंगते हुए भी यहाँ पहुँचते हैं बाबा रामदेव के दर्शन करने के लिए। रामदेवरा का मंदिर पोखरण से 12 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। बाबा रामदेव को भगवान कृष्ण (द्वारकाधीश) का अवतार माना जाता है। उन्होंने छुआछूत का विरोध किया, समाज में समानता, भाईचारा और मानव सेवा का संदेश दिया। बाबा रामदेव के इस धार्मिक और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल को मुसलमान ‘रामसा पीर’ का स्थल मानते हैं। मैंने भी इस मंदिर के दर्शन किए हैं महंत प्रेमनाथ जी के सौजन्य से।
पोखरण से जब जैसलमेर की तरफ़ बढ़ते हैं, तो रास्ते में भादरिया गाँव पड़ता है। मुख्य सड़क पर दाईं ओर साहित्य की कुछ दुकानों को देखकर लगता है कि यह कोई महत्वपूर्ण स्थान है। मैं गाड़ी रुकवाता हूँ। साहित्य बेचने वाला दुकानदार बताता है कि यह बाबा हरबंससिंह ‘निर्मल’ का डेरा है, जिन्हें ‘भादरिया महाराज’ के नाम से जाना जाता है। थोड़ा सा आगे बढ़ने पर पता चलता है कि यहाँ बहुत बड़ी गौशाला है। यह सीमावर्ती इलाका है। अक्सर गायें भटक कर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर की तरफ चली जाती हैं। ऐसी गायों को पकड़कर यहाँ की गौशाला में लाया जाता है और उनकी पूरी देखभाल और सेवा की जाती है। 2009 में मैं यहाँ गया था। तब इस गौशाला में दस हज़ार से अधिक गायें थीं, जिनकी देखभाल का बहुत बेहतरीन प्रबंध था। दूसरी बार 2017 में यहाँ आने पर सभी कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। सामान्य-सा दिखने वाला शक्तिपीठ भादरिया राय मंदिर अब भव्य भवन बन गया था और श्रद्धालुओं की संख्या भी सत्तर हज़ार से एक लाख के बीच बताई गयी थी। यह भी पता चला कि गोवंश का आंकड़ा दस हज़ार से बढ़कर 44 हज़ार पार कर गया है। जैसलमेर की तरफ जाने वाले लोग इस मंदिर में माथा टेकना नहीं भूलते। इसे आप तीसरा और महत्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं। यह भी बताया गया कि स्वयं बाबा जी पूरी गौशाला के कई चक्कर लगाते हैं, ताकि उनकी देखभाल और सेवा में किसी तरह की कोताही न बरती जाए। इन गायों के दूध का पूरा सदुपयोग होता है।
बाबा का आदेश है कि जो भी व्यक्ति यहाँ आए, उसे लस्सी पिए बिना न जाने दिया जाए। उन्हें लोग ‘लस्सी वाला बाबा’ भी कहते हैं। इस बाबत एक प्रसंग सुनने को भी मिला। एक बार भादरिया महाराज से भेंट करने के लिए कुछ लोग आए। बाबा से मिलने के बाद यह कहकर कि वह बहुत व्यस्त हैं, बिना लस्सी पिए ही वहाँ से निकल गए। थोड़ी दूर जाने पर उनकी कार यकायक बंद हो गयी। बहुत कोशिश करने पर भी जब कार स्टार्ट नहीं हुई, तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया। वह उल्टे पाँव दौड़ते-हाँफते भादरिया महाराज के पास गए और उनके चरणों पर गिर पड़े। बाबा ने उन्हें उठाते हुए कहा कि यह लस्सी यहाँ का ‘प्रसाद’ है, आपने उसका अपमान किया, तो इसका खामियाजा तो आपको भुगतना ही था। अब बाबा ने उन्हें एक की जगह दो गिलास लस्सी पीने के लिए कहा। लस्सी जब खत्म हुई, तो भादरिया महाराज ने आदेश दिया कि जाइए, आपकी कार भी स्टार्ट हो जाएगी और जिस काम के लिए आप हड़बड़ी मचा रहे थे, वह भी हो जाएगा। और बाबा की वाणी सच साबित हुई! यह भी पता चला कि बाबा बहुत पढ़े-लिखे हैं और काफ़ी देर तक समाधि में रहते हैं। मंदिर के पास एक गुफा में उन्होंने नौ साल तक तपस्या की थी।
सारे परिसर को देखते हुए अचानक मेरी नज़र वहाँ भूमिगत में रखी कुछ पुस्तकों पर पड़ी, जिन्हें अलमारियों में करीने से सजाया जा रहा था। उन किताबों के रखरखाव पर एक व्यक्ति नज़र रख रहा था। निवेदन करने पर वह व्यक्ति हमें भूमिगत लाइब्रेरी दिखाने के लिए ले गया, जो पूरी तरह से वातानुकूलित है। यह ज़मीन की सतह से सोलह फीट नीचे भूमिगत में निर्मित ग्रंथालय है—देश में अपने किस्म का अनोखा, अद्वितीय और असाधारण भूमिगत पुस्तकालय। इसे रेतीले धोरों में ज्ञान का अकूत ख़ज़ाना भी माना जाता है। रेगिस्तान की चिलचिलाती गर्मी में भी यहाँ यह स्थान प्राकृतिक रूप से नियंत्रित और ठंडा रहता है। बेशक भादरिया महाराज ने 21 अप्रैल, 1981 को इस भूमिगत लाइब्रेरी की नींव रखी थी और 1996 में वह काफ़ी हद तक तैयार भी हो गयी थी, लेकिन यह कार्य इतना दुर्गम, विशाल, विस्तृत, चुनौतीपूर्ण और महत्वाकांक्षी है, जो निरंतर चलते रहने वाला है। बेशक राजस्थान के किलों, महलों और अभेद्य दुर्गों के लिए प्रसिद्ध धोरों की धरती में यह भूमिगत लाइब्रेरी एक अजूबे से कम नहीं है। 2009 में मैंने लाइब्रेरी का एक चक्कर लगाया। कुछ पुस्तकों पर नज़र भी डाली। मेरे साथ चल रहे व्यक्ति ने बताया कि रेगिस्तान की तेज़ गर्मी और रेतीली आंधियों से पुस्तकों को सुरक्षित रखने के लिए इस भूमिगत लाइब्रेरी के तापमान को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखा गया है। बाबा जी इसे ऐसा स्वरूप देना चाहते हैं जो भारत में तो उत्कृष्ट हो ही, विश्व स्तर पर भी लाजवाब हो। 562 काँच की अलमारियों में करीने से सजाकर किताबें रखी हुई हैं। यहाँ चार गैलरियाँ हैं—दो 225-225 फीट और दो 365-365 फीट लंबी। इनके अतिरिक्त 16 हज़ार रैक हैं। यह लाइब्रेरी इतनी बड़ी है कि इसमें एक साथ पाँच हज़ार से ज़्यादा लोग बैठ सकते हैं। किताबें ख़राब न हों, इसके लिए पाँच से छह महीने में विशेष प्रकार के लेप और पाउडर से इन्हें साफ़ किया जाता है। अलमारियों की भी सफ़ाई होती है। लाइब्रेरी दो भागों में बंटी है: एक अध्ययन के लिए और दूसरा संग्रह के लिए। यहाँ पर पाठक सभी सुविधाओं के साथ एक साथ बैठकर बड़े मनोयोग से पढ़ सकते हैं और इसकी गतिविधियों के बारे में विशेष फ़िल्म से सुन और देख भी सकते हैं। लाइब्रेरी के इस परिसर में 18 कमरे हैं, जहाँ पाठकों और शोधकर्ताओं के रहने और भोजन की भी बहुत अच्छी व्यवस्था है। शोधकर्ता अपना कार्य पूरा होने तक बेखटके यहाँ निवास कर सकते हैं।
मुझे बताया गया कि बाबा जी ने यूरोप के पुराने महलों और मठों में भी बहुत सी लाइब्रेरियां देखी हैं, लेकिन वहाँ उन्हें कहीं भी भूमिगत लाइब्रेरी देखने को नहीं मिली। बाद में उन्हें पता चला कि वेटिकन सिटी में एक भूमिगत लाइब्रेरी है, जिसे देखने के लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। बाबा जी ने उस लाइब्रेरी को देखने का मन बना लिया, लेकिन उससे पहले उन्होंने स्वतः ही एक ऐसी भूमिगत लाइब्रेरी की कल्पना की, जो एशिया महाद्वीप में अपने किस्म की एक अनोखी और अनूठी लाइब्रेरी हो, जिसका कोई सानी न हो। मुझे बताया गया कि विश्व का कोई ऐसा विषय नहीं है, जिस पर यहाँ ग्रंथ उपलब्ध न हों। विश्व के मुख्य धर्म, दर्शन, नीति, इतिहास, राजनीति, अध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान, अर्थशास्त्र, जीव-जगत, चिकित्सा विज्ञान, शब्दकोश, विज्ञान, खगोलशास्त्र से लेकर ज्योतिष, कानून, वेदों की संपूर्ण शृंखला, आयुर्वेद, पुराण, उपनिषद, सभी प्रमुख धर्मों के ग्रंथ, भारत का संविधान के अतिरिक्त महात्मा गांधी तथा देश के राष्ट्रپतियों और प्रधानमंत्रियों के भाषण भी शामिल हैं। जर्मन लेखक फ़्रेडरिक मैक्समूलर की रचनाएँ, एन्साइक्लोपीडिया की पुस्तकें, स्मृतियाँ और हज़ारों साल पुरानी पाण्डुलिपियाँ भी मौजूद हैं। यहाँ केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में ही नहीं, अपितु संस्कृत, फ़ारसी, उर्दू, तमिल आदि भाषाओं के दुर्लभ ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। इस भूमिगत लाइब्रेरी में काफ़ी पुस्तकें भादरिया बाबा को भेंट में भी प्राप्त हुई थीं, लेकिन अधिसंख्य खरीदी गई हैं। इन पुस्तकों की कीमत इस समय करीब 20 करोड़ आंकी जाती है।
वहाँ के लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि भादरिया महाराज ने यूरोप के कई देशों की यात्राएँ कीं। जर्मनी के फ़्रैंकफ़र्ट बुक फेयर की यात्रा कर विभिन्न विषयों पर कुछ नायाब पुस्तकों का चयन कर खरीदा। उन्होंने ईसाइयों की पावन भूमि वेटिकन सिटी, जिसे ‘होली सिटी’ कहा जाता है, में वेटिकन अपोस्टोलिक जाकर भी भादरिया महाराज ने वेटिकन संग्रहालय के कोर्टाइल डेला के नीचे दोमंजिला एक भूमिगत बंकर में जाकर विशाल दस्तावेज़ देखे। इनमें पोप और राजाओं के बीच पत्र-व्यवहार, मध्यकालीन दस्तावेज़ और सदियों पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड शामिल हैं। आम जनता या पर्यटकों के लिए यहाँ सीधा प्रवेश वर्जित है, केवल विद्वानों और योग्य शोधकर्ताओं को ही विशेष अनुमति से प्रवेश मिलता है। अपनी विद्वता के कारण ही भादरिया महाराज को यहाँ जाने की अनुमति मिली थी। इस अनुभव का उपयोग उन्होंने भादरिया भूमिगत लाइब्रेरी के सुधार में किया था। वेटिकन एक धार्मिक नगर है और भादरिया महाराज भी धार्मिक थे, इस नाते उनकी पोप से भी विशेष भेंट कराई गई थी। वेटिकन का क्षेत्रफल 109 एकड़ है और आबादी लगभग 882। इस लिहाज़ से यह दुनिया का सबसे छोटा संप्रभु राज्य है। होली सी द्वारा शासित वेटिकन सिटी स्टेट एक धार्मिक या यों कहें एक पुरोहित राजशाही राज्य है, जो रोम के बिशप और कैथोलिक चर्च के प्रमुख हैं। यहाँ की आबादी में पादरी, नन और स्विस गार्ड्स हैं। महिलाओं की संख्या महज पाँच प्रतिशत है। कैथोलिक ईसाइयों की प्रमुख चर्च यहीं है और पोप का भी यहीं निवास स्थान है।
एक बार मैंने भादरिया महाराज से पूछा कि आपको इस मरुस्थल में भूमिगत लाइब्रेरी बनाने का ख़्याल कैसे और क्योंकर आया? तो उन्होंने बताया, “यह मेरी सोच या कल्पना नहीं थी।” इस महान संत एवं प्रख्यात आध्यात्मिक साधक भादरिया महाराज ने कहा कि यह माँ भादरिया राय का आदेश था कि क्यों न इस रेगिस्तानी इलाके में कोई ऐसा पुस्तकालय बनाया जाए, जहाँ ज्ञान-पिपासु और शोधकर्ता दूर-दूर से आएं और उनकी ज़रूरत का सारा साहित्य एक स्थान पर ही उपलब्ध हो। ज्ञान की खोज वाले बौद्धिक क्यों जगह-जगह भटकें? यहाँ अखिल भारतीय सेवाओं के लिए तैयारी करने वाले जिज्ञासु भी आकर लाभ उठा सकते हैं, उन्हें अतिरिक्त कोचिंग की आवश्यकता नहीं होगी। मुझे बताया गया कि इस ग्रंथालय में नौ से दस लाख पुस्तकें, दुर्लभ सामग्री और ग्रंथ मौजूद हैं। यह संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है।
मुझे यह भी बताया गया कि 20 मई, 1998 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पोखरण परमाणु परीक्षण स्थल का दौरा करने आए थे, तब उनके साथ उनके वैज्ञानिक सलाहकार एपीजे अब्दुल कलाम भी थे। अटल जी जब परमाणु परीक्षण का दौरा कर रहे थे, तो वहाँ के एक स्थानीय नेता ने उन्हें रामदेवरा मंदिर के दर्शन करने की सलाह दी। वाजपेयी जी जब मंदिर की ओर जाने लगे, तो कलाम साहब ने उनके प्रेस सचिव अशोक टंडन को भादरिया लाइब्रेरी देखने जाने की सूचना दे, वे लाइब्रेरी पहुँच गए। लाइब्रेरी का रखरखाव करने वाले एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि कलाम साहब ने बड़े मनोयोग से एशिया की सबसे बड़ी यह लाइब्रेरी देखी। उन्होंने विज्ञान से जुड़ी पुस्तकों में बहुत रुचि ली। उन्होंने दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ भी देखीं और प्राचीन ग्रंथों को भी। कलाम साहब ने भादरिया महाराज से भेंट कर ज्ञान की इस ‘नायाब’ दौलत के लिए बधाई दी और वहाँ पर रखी उनकी पुस्तकों के लिए आभार व्यक्त किया। बताया जाता है कि कलाम साहब ने भादरिया महाराज को अपने कुछ सुझाव भी दिए।
भादरिया महाराज की पृष्ठभूमि के बारे में जब मैंने दरयाफ़्त किया, तो लाइब्रेरी में काम करने वाले एक सज्जन ने बताया कि भादरिया बाबा का जन्म 1930 में पंजाब के फ़िरोज़पुर में हुआ था। वह संन्यासी हैं। एक बार वह यहाँ शक्तिपीठ भादरिया राय मंदिर में दर्शन करने के लिए आए थे। देर हो जाने पर रात को वह मंदिर में ही टिक गए। विश्वास किया जाता है कि रात को भादरिया माँ ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि “तुम यहाँ रहकर मानवता की सेवा करो।” तभी से वह यहीं पर हैं और हरबंससिंह निर्मल से ‘भादरिया महाराज’ बन गए हैं। उन्हीं की सरपरस्ती में यहाँ सारा सामाजिक और धार्मिक कामकाज होता है। उन्होंने मानवता की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण लोगों को नशे से मुक्त कराने में भरसक प्रयास किए। उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
मैं डालमिया सेवा ट्रस्ट के सौजन्य से 1997 से हर माह राजस्थान जाया करता था। ट्रस्ट की ओर से चिकित्सा शिविर लगते थे। मैं समाजसेवी-उद्यमी संजय डालमिया के प्रतिनिधि के तौर पर शिविर स्थलों का निरीक्षण करने के लिए जाता था। ऐसे ही जोधपुर से जैसलमेर जाते हुए भादरिया के मंदिर में दर्शन करने और भूमिगत लाइब्रेरी को देखने के लिए रुक गया। एक बार फ़रवरी 2010 को जब मैं जोधपुर में था, तो मुझे ख़बर लगी कि भादरिया महाराज अस्वस्थ हैं और उन्हें किसी अस्पताल में दाखिल कराया गया है। मन में उनसे मिलने की उत्कट इच्छा हुई। अभी उनसे मिलने का मैं मन बना ही रहा था कि सूचना मिली कि उन्हें वापस भादरिया ले जाया गया है—संभवतः उनका देवलोकगमन हो गया था। 15 फ़रवरी, 2010 को उन्होंने समाधि ले ली। दूसरी बार मैं उनके दर्शनों से वंचित रह गया।
भादरिया महाराज अपने पीछे भूमिगत पुस्तकालय के रूप में जो विरासत छोड़ गए हैं, उसका लाभ केवल राजस्थान के विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता और ज्ञान-पिपासु ही नहीं उठाते, बल्कि देश के अन्य भागों से आने वाले विद्वान भी इस अद्वितीय और अद्भुत लाइब्रेरी का लाभ उठाते हैं। यह भूमिगत ग्रंथागार दो भागों में विभाजित है: एक अध्ययन के लिए और दूसरा पुस्तकों के संग्रह के लिए। अध्ययन हॉल इतना बड़ा है कि उसमें एक साथ पाँच हज़ार शोधकर्ता और विद्वान बैठकर अध्ययन कर सकते हैं। 562 काँच की अलमारियों में रखी इन पुस्तकों और ग्रंथों में निस्संदेह आपकी रुचि वाले विषय की पुस्तक ज़रूर होगी। एक बार इस नायाब भूमिगत वातानुकूलित पुस्तकालय को देखना तो बनता है! आजकल लाइब्रेरी की देखभाल और संरक्षण का कार्य जगदंबा सेवा समिति कर रही है।
यह भूमिगत पुस्तकालय देख मुझे अनायास अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले परिसर से गार्डनर मेन स्टैक्स के रूप में एक विशाल भूमिगत लाइब्रेरी की याद हो आयी। यह डो मेमोरियल लाइब्रेरी और मोफिट लाइब्रेरी के पास ज़मीन के नीचे स्थित है। यह चारमंजिला भूमिगत परिसर कांक्रीट और स्टील से बना है। इसमें लाखों किताबें और शोध सामग्री सुरक्षित रखी गई है। यहाँ छात्रों के पढ़ने के लिए शांत कमरे और डेस्क बने हैं। प्राकृतिक रोशनी के लिए इसमें बड़े-बड़े रोशनदान भी लगाए गए हैं। 1979 में मैं वहाँ गया था, तो पहली बार मुझे बर्कले में अहसास हुआ था कि बेसमेंट का इस्तेमाल किस तरह रचनात्मक ढंग से किया जा सकता है। अब जब भादरिया लाइब्रेरी देखी, तो लोगों की एक जैसी सोच पर यकीन हो गया। इस लाइब्रेरी की योजना बनाते समय भादरिया महाराज ने कुछ यूरोपीय देशों का दौरा अलबत्ता किया था, लेकिन बर्कले की भूमिगत लाइब्रेरी देखी थी कि नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। वैसे, पोलैंड की राजधानी वारसा के कांद्राटोविज़ा मेट्रो स्टेशन के भीतर एक लाइब्रेरी है, जहाँ से पाठक सेल्फ-सर्विस से किताबें ले और लौटा सकते हैं। यहाँ एक हरा-भरा गार्डन भी है, जो ताज़ा वातावरण प्रदान करता है। यह केवल एक पुस्तकालय नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र है। इसकी जानकारी प्रो. मारिया क्रिस्टोफ़ बैर्स्की ने 1977 में मुझे दी थी, जब मैं पोलैंड की यात्रा पर था। उन्होंने यह भी बताया कि राजधानी वारसा में एक राष्ट्रीय पुस्तकालय भी है। वह देश का सबसे बड़ा और प्रमुख सांस्कृतिक व अनुसंधान संस्थान है, जहाँ दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ, शुरुआती मुद्रित पुस्तकें, नक्शे, संगीत और लाखों किताबें शामिल हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त प्रो. बैर्स्की ने दो बरस तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी था। वह संस्कृत के विद्वान हैं। प्रो. बैर्स्की धाराप्रवाह हिंदी बोलते हैं, जिसे सुनकर यह अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि वह भारतीय हैं कि विदेशी! पद्मश्री से सम्मानित प्रो. बैर्स्की 1993 से 1996 तक भारत में पोलैंड के राजदूत भी रह चुके हैं।
भादरिया महाराज मुझसे पंजाबी में बात करते थे। एक बार उन्होंने मुझे बताया था कि माता ने चाहा तो लाइब्रेरी का और विस्तार करेंगे, स्थान का कोई अभाव नहीं है। वास्तव में उनके ज़ेहन में नालंदा और तक्षशिला के समकक्ष एक विश्वविद्यालय बनाने की चाह थी। उनकी यह योजना फ़िलवक्त तो खटाई में पड़ती ही नज़र आ रही है। मैंने उनसे पूछा था कि क्या आप नालंदा और तक्षशिला के समक्ष कोई विश्वविद्यालय स्थापित करने बाबत सोच रहे हैं? उन्होंने बताया था कि पहले एक कॉलेज की योजना है और उसके बाद विश्वविद्यालय बनाने की इच्छा है। मुझसे उलटे उन्होंने सवाल करते हुए पूछा कि आप तो रावलपिंडी में रहते थे, वहाँ से पंजा साहिब तो जाते ही होंगे, वहीं पास ही तो है तक्षशिला। मैंने भादरिया महाराज को बताया कि मैं दो-तीन बार तक्षशिला देख चुका हूँ, लेकिन केवल वही स्थान जहाँ खुदाई से प्राप्त कुछ पुरानी वस्तुएँ मिली थीं। तब मेरी उम्र 10-12 बरस थी, उसके महत्व की कोई जानकारी नहीं थी। तक्षशिला के महत्व के बारे में तो मुझे पत्रकारिता में मेरे गुरु श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने बताया था कि तक्षशिला को समझने के लिए वहाँ कई दिनों तक रहना पड़ता है, क्योंकि वह बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ था। आज भी विदेशी शोधकर्ता महीनों वहाँ रहकर तक्षशिला के महत्व का गहराई से अध्ययन करते हैं। इस पर भादरिया महाराज ने कहा था कि ठीक हमारी सोच भी तक्षशिला के समक्ष विश्वविद्यालय निर्माण की है। ऐसा हो जाने से केवल भारत के ही नहीं, दूरदराज के जिज्ञासु इसका लाभ उठाने के लिए आएंगे। “देखिए हमारे मन की मुराद कब पूरी होती है।” बेशक इस लाइब्रेरी में उपलब्ध किताबें और ग्रंथ ज्ञान-पिपासुओं को संतुष्टि प्रदान कर सकेंगे। भादरिया लाइब्रेरी में मैंने भी अपनी पुस्तकें भेजी हैं।
क्योंकि मुझे स्कूल के दिनों से पाठ्यक्रम के अतिरिक्त किताबें पढ़ने का शौक़ था, लिहाज़ा मैंने अपने घर में एक छोटी सी लाइब्रेरी बना रखी थी। यह शौक़ मुझमें हमारे माधवराव सप्रे स्कूल के हिंदी टीचर पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने लाइब्रेरी से किताबें ला-लाकर देने से पैदा किया था, इसलिए मैंने अपनी मनपसंद कुछ किताबें ख़रीद कर लाइब्रेरी बना ली थी। इस लाइब्रेरी में मुंशी प्रेमचंद की ‘वरदान’, ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘निर्मला’, ‘कर्मभूमि’ जैसी किताबें थीं, तो अज्ञेय की ‘शेखर: एक जीवनी’ के दोनों भाग, ‘नदी के द्वीप’, ‘अरे यायावर रहेगा याद?’, यशपाल की ‘झूठा सच’, ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ?’, धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की ‘देवदास’, ‘बिराज बहु’, ‘परिणीता’, बंकिम चंद्र चटर्जी की ‘आनंदमठ’ आदि शामिल थीं। राजनीति शास्त्र की कुछ कोर्स की पुस्तकें भी थीं। हाँ, मैं भार्गव की छोटी डिक्शनरी भी रखा करता था। यह बात 1953-54 की है।
रायपुर छोड़ने के बाद वह लाइब्रेरी भी पीछे छूट गई थी, लेकिन लाइब्रेरी का शौक़ नहीं मरा था। लोकसभा सचिवालय में पब्लिकेशन काउंटर था, जहाँ सांसदों को रोज़ बहुत सा साहित्य वितरित किया जाता था। वहाँ पर मेरे एक मित्र थे—कैलाश डंडोना। उनके माध्यम से मैं उस काउंटर से अपने मतलब की किताबें ले आया करता था। इनमें मुख्यतया विभिन्न मंत्रालयों के शब्दकोश, ग्लासरी ऑफ़ पार्लियामेंट्री टर्म्स आदि होती थीं। कुछ विषयों और घटनाओं पर श्वेत-पत्र आदि भी रख लिया करता था। पब्लिकेशन काउंटर पर अक्सर सांसदों से भेंट हो जाया करती थी। लोकसभा सचिवालय से एकत्र यह सामग्री ‘दिनमान’ में मेरे बहुत काम आयी। उन दिनों गूगल, इंटरनेट आदि तो होते नहीं थे, पीटीआई और यूएनआई एजेंसियों के टेलीप्रिंटर ही थे। अपने संवादों को अपडेट करने के लिए कुछ मदद तो ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की लाइब्रेरी से मिल जाती थी, फिर भी अधिसंख्य संवादों के लिए साहित्य अकादेमी, अमेरिकन लाइब्रेरी, ब्रिटिश काउंसिल आदि का सहारा लेना पड़ता था। कभी-कभी हमारे संपादक अज्ञेय जी अपनी निजी लाइब्रेरी से कुछ किताबें ला दिया करते थे। उनका मानना था कि हर पत्रकार/लेखक की अपनी एक निजी लाइब्रेरी होनी चाहिए।
इसके चलते मैंने अपने घर में एक अच्छी-खासी निजी लाइब्रेरी बना ली थी। इसमें रायपुर से लाई किताबें थीं, लोकसभा सचिवालय से प्राप्त शब्दकोश, पुस्तकें आदि और स्वयं खरीदी गई पुस्तकें। ‘वर्ल्ड अलमनक’ जैसी संदर्भ पुस्तकें मुझे अमेरिकन लाइब्रेरी से मिल जाती थीं, कुछ सोवियत संघ के सूचना केंद्र से और कुछ ब्रितानी उच्चायोग से भी। मैंने अच्छी-खासी लाइब्रेरी बना ली थी। ‘संसदीय प्रणाली और व्यवहार’ जैसी दर्जनों पुस्तकें मुझे लोकसभा सचिवालय के तत्कालीन सेक्रेटरी जनरल सी.के. जैन ने भेंट की थीं। लोकसभा में वह मेरे सहयोगी-मित्र थे, हम लोग एक ही शाखा में काम करते थे। मेरे लिए वह चक्रेश थे। इनके अतिरिक्त मेरे पास ‘दिनमान’ और ‘संडे मेल’ के जिल्दबंद अंक और पत्रिकाएँ थीं। बढ़ती उम्र को ध्यान में रखते हुए मैं उन्हें किसी अच्छी जगह डोनेट करना चाहता था।
एक दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. पल्लव ने सलाह दी कि ‘रेख्ता फ़ाउंडेशन’ अपना हिंदी अनुभाग खोलने जा रहा है, आप अपनी लाइब्रेरी उन्हें डोनेट कर सकते हैं। सलाह अच्छी थी, उर्दू के क्षेत्र में उनका बड़ा नाम था। इस काम के लिए उन्होंने पीयूष दईया को यह ज़िम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि वह आपके घर से जिल्दबंद पत्र-पत्रिकाएँ ले जाएँगे और भी जो कुछ देना चाहें, उन्हें दे सकते हैं, क्योंकि रेख्ता फ़ाउंडेशन का हिंदी अनुभाग वही संभालने वाले हैं। पीयूष दईया आए और दो-तीन खेपों में यह कहकर सारा सामान ले गए कि रेख्ता फ़ाउंडेशन में आपके नाम का एक कक्ष बनेगा। इन पत्र-पत्रिकाओं के अलावा मैंने उन्हें अपने सभी प्रकाशित लेखन की फ़ाइलें सौंप दीं और सौ से अधिक टेप, जिनमें बहुत महत्वपूर्ण लोगों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किए हुए थे। टेप सुनने के लिए मैंने उन्हें टेप रिकॉर्डर भी दिया था। लेकिन कुछ दिनों के बाद पता चला कि रेख्ता फ़ाउंडेशन ने हिंदी अनुभाग का विचार छोड़ दिया है। वह सारा सामान उनके वैशाली स्थित घर में रखा है। मन बहुत मायूस हो गया। मैंने अशोक वाजपेयी जी से भी बात की, वह भी इस बाबत लाचार थे।
ख़ैर, पीयूष दईया ने बताया कि वह सारा सामान उनके घर पर सुरक्षित है। अब मैं बेबस था। उसी दौरान मैंने फ़ेसबुक पर अपने संस्मरण लिखने शुरू किए, जिन्हें बहुत सराहा गया। इस बीच अभिषेक कश्यप मेरे फ़ेसबुक मित्र बन गए थे। मेरे संस्मरण शायद उन्हें रुचे, उन्होंने लिखा कि वह मेरे संस्मरणों की फ़ाइल बना रहे हैं और उन्हें प्रकाशित करवाना चाहते हैं। मैंने उन्हें अपनी अनुमति दे दी। हम दोनों ने अपने-अपने फोन भी साझा कर लिए थे। उन्होंने बताया कि ‘इंडिया टेलिंग’ नाम से एक प्रकाशन शुरू किया है, इन संस्मरणों को वह स्वयं छापेंगे। उन्होंने न केवल मेरे संस्मरणों की पुस्तक ‘संस्मरणनामा’ छापी, बल्कि ‘त्रिलोक दीप का सफ़र’ नामक एक किताब भी प्रकाशित की, जिसमें बहुत से लोगों ने मेरे बारे में लिखा है। एक दिन दिल्ली के प्रेस क्लब में किसी प्रसंग में ‘दिनमान’ का ज़िक्र हुआ। मैंने उन्हें ‘दिनमान’ और ‘संडे मेल’ के जिल्दबंद अंकों की कहानी सुनाई, तो उन्होंने पीयूष दईया को वहीं से फोन करते हुए कहा कि वह सारा सामान धनबाद ले जाना चाहते हैं, वहाँ वह अपनी लाइब्रेरी में एक पृथक कक्ष में इस ‘नायाब’ सामग्री को रखेंगे। 2021 से यह सारी सामग्री धनबाद में अभिषेक कश्यप के पास है, वह किस हालत में है, मैं नहीं जानता। इसमें 1965 से 1989 तक ‘दिनमान’ हैं और 1989 से 1995 तक ‘संडे मेल’ और उससे जुड़ी पत्रिका।

जब तक ये फ़ाइलें मेरे पास थीं, तो कई साथियों और मित्रगणों ने उसका लाभ उठाया। ‘हिंदी जगत’ के संपादक डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण ने घर आकर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना द्वारा डॉ. कामिल बुल्के पर लिखे लेख की फ़ोटोकॉपी ली (तब वह जापान में रहते थे)। विष्णु नागर ने रघुवीर सहाय पर लिखी अपनी पुस्तक की काफ़ी कुछ सामग्री ‘दिनमान’ के पुराने अंकों से ली, वह कई दिनों तक हमारे घर आए। असगर वजाहत भी पुराने ‘दिनमान’ देखना चाहते थे, तब तक वह धनबाद पहुँच चुके थे। मैंने उन्हें अभिषेक कश्यप का फोन नंबर दे दिया। ऐसे ही और अनेक लोगों को अभिषेक कश्यप से संपर्क करने के लिए उनका फोन नंबर दे दिया करता था। मुझे नहीं पता कि अभिषेक कश्यप ने उन अंकों को रखने के लिए कोई विशेष कक्ष बनाया कि नहीं। वादा तो उन्होंने यह भी किया था कि इन पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरे आलेखों की वह पुस्तकें तैयार करेंगे, अभी तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक देखने को नहीं मिली। अफ़सोस कि बरसों से अभिषेक कश्यप ने मुझसे संपर्क भी नहीं साधा।
बरसों से मैं पुस्तकें एकत्र कर रहा था। हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी, पंजाबी और उर्दू की भी थीं। जिन दिनों श्री संजय द्विवेदी भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक थे, वह अक्सर किसी न किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मुझे आमंत्रित करते रहते थे। एक दिन मैंने उनसे अपनी निजी लाइब्रेरी डोनेट करने की जब चर्चा की, तो वह तुरंत तैयार हो गए। उन्होंने कुछ दिनों के बाद अपनी लाइब्रेरी से सुनीता सभरवाल को मेरी निजी लाइब्रेरी की पुस्तकें लेने के लिए मेरे यहाँ भेजा। सुनीता जी ‘संडे मेल’ में मेरी सहयोगी थीं, परिवार से भी परिचित हैं। उन्होंने स्वयं और अपने साथियों की मदद से मेरी लाइब्रेरी से आधी से अधिक अपने मतलब की पुस्तकें छाँट लीं। पंजाबी, अंग्रेज़ी और हिंदी की कुछ पुस्तकें हाल ही में गुरुद्वारा रकाबगंज परिसर में अस्तित्व में आयी लाइब्रेरी को डोनेट की हैं। यह लाइब्रेरी पंजाबी के साहित्यकार तथा पंजाबी अकादमी के पूर्व सचिव डॉ. रवेल सिंह के मार्गदर्शन में काम करती है। कुछ पुस्तकें मैंने साहित्यकार-प्रकाशक सुधेन्दु ओझा को भेंट कीं। अब बची पुस्तकें तथा हिंदी और अंग्रेज़ी के टाइपराइटर भोपाल स्थित माधवराव सप्रे संग्रहालय की अमानत हैं। इससे मेरा भावनात्मक लगाव है, क्योंकि माध्यमिक तक मेरी शिक्षा ‘माधवराव सप्रे स्कूल, रायपुर’ में हुई थी।
उन दिनों मुझे विदेश जाने के कई अवसर मिले। वहाँ भी प्रमुख लाइब्रेरियों में जाना मेरे शेड्यूल में रहता था। मैंने 1975 से 1987 तक अमेरिका, कनाडा, सोवियत रूस सहित अनेक यूरोपीय देशों की यात्राएँ कीं। 1975, 1980 और 1983 में मैंने पश्चिमी जर्मनी (उन दिनों दो जर्मनी थे—पूर्व और पश्चिम, दोनों का विलय 3 अक्टूबर, 1990 को हुआ) की यात्रा की। इस दौरान मुझे फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेला देखने का अवसर मिला। वहाँ विश्व की विभिन्न भाषाओं के अलावा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की सैकड़ों पुस्तकें देखने को मिलीं। इसके अलावा मैंने फ़्रैंकफ़र्ट सेंट्रल लाइब्रेरी भी देखी। वहाँ पर भी कुछ चुनिंदा शाखाओं में भारतीय संस्कृति, दर्शन, योग और हिंदी व संस्कृत साहित्य से जुड़ी बहुत पुस्तकें देखीं, और वहाँ पर उपस्थित व्यक्ति ने मुझसे हिंदी में ही बातचीत की। फ़्रैंकफ़र्ट में एक बार विश्व पुस्तक मेला देखा और दूसरी बार सेंट्रल लाइब्रेरी।
तत्कालीन सोवियत संघ की मैंने 1977 और 1987 में दो बार यात्रा की। सेंट पीटर्सबर्ग स्थित यह पुस्तकालय रूस के सबसे पुराने सार्वजनिक पुस्तकालयों में से है। इसे दुनिया के सबसे बड़े पुस्तकालयों में गिना जाता है। यहाँ पर साढ़े तीन करोड़ से अधिक किताबें, दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ, नक्शे और समाचार-पत्र हैं। यहाँ हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, तमिल और तेलुगु सहित कई भारतीय भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकें, पाण्डुलिपियाँ और साहित्य का समृद्ध संग्रह मौजूद है। सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी को भारतीय अध्ययन का पालना माना जाता है, जहाँ दशकों से भारतीय भाषाओं और संस्कृति पर अध्ययन-अध्यापन होता आ रहा है। यहाँ एक विशेष ‘इंडियन कॉर्नर’ है, जिसमें भारत सरकार द्वारा भेंट की गई भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, रामायण, महाभारत और विभिन्न भाषाओं की किताबें शामिल हैं। इस ऐतिहासिक और विशाल पुस्तकालय में प्राच्य पाण्डुलिपि विभाग में प्राचीन भारतीय और एशियाई भाषाओं के अमूल्य ग्रंथ तथा दस्तावेज़ संरक्षित हैं।
अमेरिका जाने के मुझे दो अवसर मिले—1979 और 1983 में। 1979 में मैं अमेरिकी सरकार का मेहमान था एक माह के लिए, जबकि 1983 की मेरी निजी यात्रा थी। राजधानी वाशिंगटन में स्थित ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस’ (कांग्रेस पुस्तकालय) को दुनिया के सबसे बड़े पुस्तकालयों में से एक माना जाता है। 24 अप्रैल, 1800 को स्थापित इस पुस्तकालय के कार्यों की देखभाल कांग्रेस का लाइब्रेरियन करता है, जिसके अधीन तीन हज़ार से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। एक अनुमान के अनुसार यहाँ पर 175 मिलियन वस्तुएँ हैं। यहाँ पर 470 से अधिक भाषाओं में शोध की सामग्री शामिल है। यह लाइब्रेरी तीन भवनों में विभाजित है। इसमें करोड़ों पुस्तकें, नक्शे, पाण्डुलिपियाँ, ऐतिहासिक तस्वीरें और फ़िल्में संग्रहित हैं। इस लाइब्रेरी में पुस्तकों का वर्गीकरण है, जैसे भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को वर्ग ‘पी’ (भाषा और साहित्य) के अंतर्गत सबक्लास ‘पीके’ में रखा गया है। ‘पीके’ 1931-2212 में हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी भाषाएँ और साहित्य आता है। हिंदी भाषा की पुस्तकें पीके 1931-1970 के बीच आती हैं, जबकि उर्दू 1971-1979.5 के अंतर्गत। यह वर्गीकरण प्रणाली बड़े अकादमिक और अनुसंधान पुस्तकालयों में दक्षिण एशियाई भाषा संग्रह को व्यवस्थित करने के लिए उपयोग में लाई जाती है। मैंने इस वर्गीकरण व्यवस्था का प्रदर्शन देखने के लिए पहले ‘दिनमान’ के पुराने अंक देखने की माँग की, जो कुछ समय में हाज़िर हो गए। ऐसे ही अज्ञेय की पुस्तकें भी देखने को मिल गईं। मुझे यह बताया गया कि वर्गीकरण व्यवस्था से पाठकों और कर्मचारियों के लिए पुस्तकों व दस्तावेज़ों को जल्दी और सटीक रूप से ढूँढा जा सकता है, इससे समय की बचत भी होती है और बिना किसी कठिनाई के ज़रूरत की जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है। दिल्ली स्थित अमेरिकन लाइब्रेरी में भी ऐसी ही वर्गीकरण की व्यवस्था है, उस लाइब्रेरी में हर भाषा के जानकार मिल जाएंगे। मुझे हिंदी और पंजाबी जानने और बोलने वाला व्यक्ति मिल गया, जिसने मेरी हर क्वेरी का निराकरण किया।
मुझे इस बात पर नाज़ है कि राजस्थान के धुर गाँवों-ढाणियों तक जाने के मुझे कई अवसर मिले हैं। 1968 में मुझे पहली बार खादी ग्रामोद्योग के सौजन्य से एक हफ्ते के लिए कार से राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ देखने का अवसर मिला, जबकि 1992 में ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ से मारवाड़ और मेवाड़ के अतिरिक्त सवाई माधोपुर और भरतपुर भी देखने को मिले (लालांकि ‘दिनमान’ में रहते हुए ये दोनों क्षेत्र पहले मैं देख चुका था)। लेकिन सही मायने में राजस्थान मंथन मैंने डालमिया सेवा ट्रस्ट से जुड़ने के बाद किया—1997 से 2017 तक। इसी दौर में मुझे कई बार भादरिया गाँव और शक्तिपीठ के दर्शन करने के अवसर मिले और भादरिया महाराज के भी।
राजस्थान के इस थार मरुस्थल की भीषण गर्मी में कदम-कदम पर जहाँ परेशानियाँ मुँह बाए खड़ी रहती हैं, यह भूमिगत वातानुकूलित पुस्तकालय सुकून प्रदान करता है। थार मरुस्थल भारत और पाकिस्तान के दो लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें करीब 62 प्रतिशत क्षेत्र राजस्थान में पड़ता है। इसकी जद में जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर आदि इलाके आते हैं, जबकि पाकिस्तान का सिंध और कुछ पश्चिमी पंजाब के हिस्से। बीच-बीच में नखलिस्तान देखने को मिल जाते हैं, जैसे भादरिया गाँव और वहाँ स्थित शक्तिपीठ भादरिया राय मंदिर, गौशाला और भूमिगत लाइब्रेरी। आजकल एक तरफ थार मरुस्थल से तेल और गैस की खोज हो रही है, तो कुछ लोग इस्राइल से शिक्षा प्राप्त कर अपनी बालू वाली ज़मीन को ज़रखेज़ बनाने के काम में जुटे हुए हैं। बावजूद इनके, भादरिया लाइब्रेरी के प्रति आकर्षण लगातार बढ़ता जा रहा है। सुना तो यह भी जाता है कि कुछ विदेशी बौद्धिक, विद्वान, जिज्ञासु और ज्ञान-पिपासु भी इस पुस्तकालय का लाभ उठा रहे हैं। कहा भी जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु के मार्ग में आने वाले अवरोध, व्यवधान और अड़चनें उसके लक्ष्य प्राप्ति के आड़े नहीं आ सकतीं। अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में शामिल होने वाले लोगों के लिए धोरों में मौजूद यह ज्ञान-भंडार किसी अमूल्य निधि से कम नहीं है।












