आज 31 अक्तूबर, 42 साल पहले के इसी दिन दोपहर के 11 बजे के बाद ही मैं कलकत्ता के पुराने डलहौजी (नया नाम बी.बी.डी. बाग) के इलाके में GPO में कोई पार्सल पोस्ट करने के लिए गया हुआ था। पार्सल खिड़की के सामने लंबी लाइन थी। अचानक ही हो-हल्ला शुरू हुआ कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई है। खिड़की के परली तरफ बैठे बुकिंग क्लर्क भी अपने आसन से गायब हो गए।

जब मैं GPO के बाहर आया, तो लोग रास्ते ब्लॉक कर रहे थे। उस समय पश्चिम बंगाल का सचिवालय (जिसे राइटर्स बिल्डिंग कहा जाता है) भी GPO के आसपास ही था। तथा रिजर्व बैंक, रेलवे का DRM, कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज, टी बोर्ड, BSNL का मुख्यालय, हाईकोर्ट और राजभवन भी उसी पेरीफेरी के भीतर थे। लेकिन माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया था कि इतना VIP इलाका होने के बाद भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट पूरी तरह से ठप्प होने की वजह से, मैं GPO से फोर्ट विलियम के हमारे घर (हुगली नदी के किनारे) तक पैदल ही पहुंच गया था।

घर में आकर देखा कि टीवी के सामने अड़ोस-पड़ोस के लोगों की भीड़ दिल्ली का नजारा देख रही थी।

उसी समय नागपुर के गवर्नमेंट प्रेस के मैनेजर और बंगाली-मराठी के नाट्य निर्देशक देवाशिष रॉय हमारे घर पर पहुंच गए थे। मैंने पूछा, “देवाशिष, आप कैसे पहुंचे?”

तो उन्होंने कहा कि मेरे रिश्तेदार कलकत्ता में ही रहते हैं और मैं नागपुर जाने के लिए हावड़ा स्टेशन जा रहा था। मैडम इंदिरा गांधी जी की हत्या की खबर मुझे नहीं मालूम थी। इसलिए मैं तो टैक्सी पकड़कर हावड़ा स्टेशन के लिए निकल रहा था। अचानक रास्ते में यह अफरा-तफरी मच जाने से टैक्सी वाला बोला कि “साहब, गाड़ी आगे ले जाने से और भी खतरा है।” तभी रेड रोड से देखा कि फोर्ट विलियम आ गया है, तो मैंने टैक्सी वाले को तुम्हारे घर की तरफ मोड़ने के लिए कहा और वह टैक्सी छोड़कर अभी-अभी उतरा हूँ। अब शायद एक-दो दिन ठहरना पड़ेगा।

मैंने कहा, “कोई बात नहीं है, आप माहौल शांत होने के बाद ही नागपुर के लिए निकलिए।”

मैंने कहा कि भवानीपुर में काफी सिख धर्म के लोग रहते हैं, तो मैं उधर क्या स्थिति है, देखकर आ रहा हूँ। देवाशिष ने कहा कि “मैं भी तुम्हारे साथ आना चाहता हूँ।”

तो हम दोनों पैदल ही विक्टोरिया मेमोरियल की तरफ से होते हुए जैसे ही भवानीपुर में घुसे, तो रास्ते में जगह-जगह पर पीली टैक्सियाँ जल रही थीं। वह सब देखते हुए हम दोनों आदिगंगा की पुलिया पार करते हुए अलीपुर जेल की तरफ से नेशनल लाइब्रेरी में चले गए। वहां के क्वार्टर में मराठी भाषा के प्रमुख श्री. बा. जोशी जी रहते थे। उनके घर में पहुंचते ही उन्होंने मुझे देखते ही हैरान होकर पूछा कि “आप इतना बवाल हो रहा है, तो भी घर से बाहर निकलकर इधर कैसे आना हुआ?”

मैंने उनके सवाल का जवाब देने के पहले कहा कि “यह नागपुर गवर्नमेंट प्रेस के मैनेजर देवाशिष रॉय हैं। इनका नागपुर जाना बीच में ही रह गया है, तो हम लोग भवानीपुर की सिखों की बस्ती में जाकर आ रहे हैं।”

तो वह बोले, “आप तो खुद भी दाढ़ी वाले होते हुए इस तरह घूमने से किसी को भी यह समझ सकते हैं कि आप भी सिख धर्म के हैं, और आपके साथ भी कुछ भी हो सकता है।”

मैंने कहा, “मुझे तो कहीं भी ऐसा रोकने का अनुभव नहीं हुआ है, लेकिन मैं टेस्ट करना चाहता हूँ कि सचमुच दाढ़ी वाले को आज कितना खतरा है?”

तो जोशी जी को बहुत ही अचरज हुआ और वे कहने लगे, “आपके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, आप इस तरह का साहस क्यों कर रहे हों?”

मैंने कहा कि “मैं साहस कर रहा हूँ, ऐसा मेरा मानना नहीं है। और मुझे भी दाढ़ी है इसलिए मैंने छुपकर घर में बैठे रहना है, यह मेरे जीवन के उसूलों के खिलाफ है। अगर कोई दाढ़ी या टोपी पर से या उसकी वेशभूषा से ही टारगेट होते हैं, यही मेरे लिए बहुत ही आपत्तिजनक बात है।”

साथियों, उस समय मेरी उम्र 29 साल की थी और मैंने होश संभाला तभी से—जब महात्मा गांधी जी की हत्या के बाद हमारे अपने ही देश में और किसी गांधी की हत्या पहली बार होने की घटना घटी थी—श्रीमती इंदिरा गांधी जी की राजनीति का विरोध करने का ही काम किया था। लेकिन हमारा राजनीतिक विरोध था, कोई निजी दुश्मनी तो नहीं थी और भारत में सर्वोच्च पद पर बैठे हुए किसी राष्ट्रप्रमुख की यह पहली हत्या थी।

अमेरिका में इसके पहले चार राष्ट्रपतियों की हत्या हुई है:

  1. अब्राहम लिंकन (1865)

  2. जेम्स ए. गारफील्ड (1881)

  3. विलियम मैकिनले (1901)

  4. जॉन एफ. केनेडी (1963)

महात्मा गांधी जी के बाद इंदिरा गांधी जी की हत्या, यह मेरे लिए बहुत ही हिला देने का दिन था।

हलांकि, मैंने खुद भी आपातकालीन परिस्थिति में—जब इंदिरा गांधी, जयप्रकाश नारायण को विदेशी मदद से कांग्रेस की सरकार को हटाने की कोशिश करने और पुलिस तथा सेना को भड़काने का काम करने जैसे आरोप करते हुए—उन्हें देशद्रोही बोलने के दिन, अपनी डायरी में मराठी में इस महिला को खत्म करना चाहिए, ऐसा मजमून लिखा था।

और आपातकाल में मुझे गिरफ्तार करने के पहले मैं जिस जगह पर रह रहा था—बडनेरा रोड के अमरावती जिला सर्वोदय मंडल के कार्यालय में—तलाशी अभियान के दौरान मेरी डायरी भी जब्त कर ली गई थी। अमरावती के CID के एक अफसर (जो अमरावती के प्रोफेसर बी.टी. देशमुख के छोटे भाई थे) ने राजापेठ पुलिस स्टेशन में इंट्रोगेशन के दौरान साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था कि “मुझे मालूम है कि तुमने जयप्रकाश जी को इंदिरा गांधी के देशद्रोही बोलने की प्रतिक्रिया में उस दिन सोने के पहले अपनी डायरी में लिखा है कि ‘इस महिला को खत्म करना चाहिए’। इसलिए अब हमारी तरफ से तुम्हारी हर तरह की गतिविधियों पर नजर रखने की शुरुआत हुई है। हमें मालूम है कि बहुत लोग तैश में हिंदी सिनेमा की नकल में इस तरह के डायलॉग्स बोलते हैं। लेकिन सुरेश, खुदाना-खाश्ता इंदिरा गांधी जी की हत्या किसी ने भी की, तो तुम्हें भी हमें उनकी हत्या की साजिश में गिरफ्तार करना पड़ सकता है, यह तुम अच्छी तरह से ध्यान में रखना। तब तक तुम्हारी डायरी हमारे पास ही रहेगी।”

इस तरह से, इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद मेरी आपातकालीन परिस्थिति में लिखी गई डायरी की मुझे याद आ रही है। और उसके बाद से आज पचास साल से ज्यादा समय हो गया है, लेकिन अभी तक मैंने दोबारा डायरी नहीं लिखी है।

23 जून 1980 के दिन संजय गांधी की मृत्यु होने के दिन, मेरी माँ हमारे जवाहरनगर (भंडारा) के घर में थी, तो उसने मुझसे कहा कि “तुम्हें बहुत खुशी हो रही होगी।”

मैंने माँ को पूछा कि “मुझे संजय गांधी की मृत्यु से खुशी कैसे हो सकती है?”

तो उसने कहा कि “तुम जब देखो तब इंदिरा गांधी और संजय गांधी की आलोचना करते हो।” मेरी माँ और पिता कमिटेड कांग्रेस के समर्थकों में से होने के कारण मेरी माँ को भी लगा था कि मुझे संजय गांधी के विमान हादसे में मृत्यु की खबर से खुशी हो रही होगी।

तो मुझे उसको बताना पड़ा कि जैसे मैं तुम्हारा बेटा हूँ, वैसे ही संजय गांधी भी इंदिरा गांधी नाम की एक माँ का बेटा है। इसलिए एक माँ को अपने बेटे की मृत्यु से जो दुःख हो सकता है, वह समझने की संवेदनशीलता मुझमें है। इंदिरा गांधी जी की राजनीति से मुझे मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनके बेटे की मृत्यु से उन्हें जो वैयक्तिक दुःख हुआ है (जो किसी भी माँ को अपना बेटा खो जाने से होता है), वह उन्हें भी हो रहा है, इसलिए मुझे भला खुशी क्यों होगी? मुझे पूरा विश्वास नहीं है कि मैं मेरी इन बातों से मेरी माँ को समझाने में कामयाब हुआ।

वैसे ही, 31 अक्तूबर 1984 के दिन श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद मैं दुःखी हुआ था, यह मुझे अकेले को ही मालूम है। क्योंकि किसी से भी आपके मतभेदों की वजह से उस व्यक्ति की अचानक मृत्यु होने से भला किसी को खुशी कैसे हो सकती है?

महाराष्ट्र में भी 1974 के दौरान जनसंघर्ष समिति की स्थापना की गई थी, जिसमें हमारे साथ जनसंघ के कोटे से प्रमोद महाजन शामिल थे। पहली ही मुलाकात में मुझे उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का परिचय हो गया था। हालांकि हमारे और उसके सांप्रदायिकता के सवाल पर शुरू से ही मतभेद थे।

1980 में भाजपा की स्थापना के बाद उसे महाराष्ट्र का महासचिव बनाया गया था। और उसके बाद मुख्यतः बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद के दौरान वह लालकृष्ण आडवाणी जी का बहुत ही करीबी होने की भूमिका में चला गया था। 1986 में राज्यसभा तथा भारतीय युवा मोर्चा का अध्यक्ष और रथयात्राओं के दौरान 10,000 किलोमीटर की रथयात्रा का आयोजन कुशलतापूर्वक करने के बाद, वह पार्टी का विश्वसनीय संकटमोचक, रणनीतिकार और निधि इकट्ठा करने में काफी माहिर हो गया था। इसलिए मैं उसे जब भी मिलता था, तो मैं उसे भाजपा का ‘एस.के. पाटील’ ही बोलता था।

1996 से 2006 के दस सालों के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद ही उसे ‘लक्ष्मण’ की उपमा दी थी। लेकिन 3 मई 2006 के दिन उसकी मृत्यु होने पर मुझे काफी दुःख हुआ था, क्योंकि 1974 के दौरान जनसंघर्ष समिति की स्थापना में हमारी अच्छी-खासी दोस्ती हुई थी। वह जब भी कभी दिल्ली में मिला, हमेशा ही गर्मजोशी से मिला और आग्रहपूर्वक घर ले जाकर बढ़िया खाना खिलाता था और कुछ-कुछ बातें शेयर भी करता था।

उदाहरण के लिए, मेरी और उसकी आखिरी मुलाकात में, उसके लोधी गार्डन के घर में उसने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में वह कैसे कोशिश कर रहा है, यह ताजा घटनाओं को मुझसे शेयर किया था। इसलिए उसका इस तरह से अचानक चले जाने की याद से आज भी कसक होती है।

राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भी लोगों को कभी भी दुश्मन नहीं मानना है (परमतसहिष्णुता)—यही महात्मा गांधी जी के जीवन का प्रमुख सूत्र था।

इसीलिए दक्षिण अफ्रीका के जनरल स्मट्स को जेल से रिहा होने के बाद, उनको खुद जेल में बंद रहने के दौरान अपने खुद के हाथों से बनाई हुई चप्पलें भेंट करने से लेकर, सभी अंग्रेज वाइसराय तक, तथा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना जैसे राजनीतिक विरोधियों के साथ भी बहुत ही स्नेह के साथ संवाद का सिलसिला वह जीवन के आखिरी समय तक जारी रख सके थे। इस बात का मेरे मन पर गहरा असर हुआ है।

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