हरकला हजब्बा की जिंदगी में एक सवाल ऐसा आया जिसका जवाब वह नहीं दे पाए। उसके बाद गांव के बच्चों की पढ़ाई उनकी जिंदगी का सबसे जरूरी काम बन गई।

मंगलुरु में संतरे बेचने वाले हरकला हजब्बा को अपने फलों का दाम मालूम था। लेकिन एक विदेशी ग्राहक ने अंग्रेजी में कीमत पूछी तो वह जवाब नहीं दे पाए।

हजब्बा कभी स्कूल नहीं गए थे। उस बातचीत का जिक्र उन्होंने बाद में अपनी जिंदगी के एक अहम मोड़ के तौर पर किया। रोजी कमाने के लिए मेहनत कर रहे इस आदमी को अपनी छूटी हुई पढ़ाई की कमी फिर महसूस हुई थी।

बात वहीं खत्म हो सकती थी। अगला ग्राहक आता, संतरे बिकते और दिन गुजर जाता।

लेकिन हजब्बा के मन में गांव के बच्चे आ गए। वह चाहते थे कि जिन मुश्किलों से उन्हें गुजरना पड़ा, अगली पीढ़ी उनके सामने बेबस न रहे।

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के हरकला-न्यूपडपु गांव में बच्चों की पढ़ाई के लिए कुछ करना अब उनका अपना काम बन गया था। सरकारी पद्म पुरस्कार परिचय में भी उनकी इसी इच्छा का उल्लेख है—खुद अशिक्षित रहने की कठिनाइयां झेलने वाले हजब्बा दूसरों के लिए शिक्षा का रास्ता खोलना चाहते थे।

मगर स्कूल खुलवाने के लिए पैसे कहां से आते?

संतरे बेचने से होने वाली कमाई सीमित थी। उसी में घर चलाना था। हजब्बा ने उसमें से थोड़ा पैसा अलग रखना शुरू किया। इस बचत से वह मदद मांगने के लिए सफर करते—कभी किसी अधिकारी के पास, कभी कारोबारी के पास, कभी जनप्रतिनिधि के पास।

स्कूल के लिए सहयोग जुटाना लंबा काम था। सबको उनकी बात पर भरोसा भी नहीं था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उनके परिचित एक फल कारोबारी ने स्वीकार किया था कि शुरुआत में वह भी हजब्बा के स्कूल बनवाने के विचार पर हंसे थे।

हजब्बा लोगों से मिलते रहे।

वर्ष 2000 तक स्थानीय मस्जिद से जुड़े एक भवन में 28 बच्चों की कक्षाएं शुरू हो गईं। आगे जमीन और इमारत के लिए भी उन्होंने लोगों को सहयोग देने के लिए तैयार किया। किसी ने पैसे दिए, किसी ने स्कूल की जरूरत का सामान जुटाने में मदद की। उसी रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2021 में स्कूल में पहली से दसवीं तक 177 बच्चे पढ़ रहे थे।

संतरा विक्रेता की पहल के साथ अब कई हाथ जुड़ चुके थे। स्थानीय लोगों और सरकार के सहयोग से शुरुआती व्यवस्था जिला पंचायत के विद्यालय में बदली।

हजब्बा का स्कूल से रिश्ता भवन तैयार होने पर खत्म नहीं हुआ। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक शिक्षक ने उन्हें कक्षाएं खोलने और साफ-सफाई करने तक के काम में लगे रहने वाले व्यक्ति के रूप में याद किया।

फिर वह दिन आया जब गांव के स्कूल के लिए दौड़ने वाला यह आदमी राष्ट्रपति भवन पहुंचा।

8 नवंबर 2021 को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हजब्बा को वर्ष 2020 का पद्मश्री प्रदान किया। वह सम्मान लेने नंगे पैर मंच पर पहुंचे थे।

उस दिन भी उनके पास गांव की पढ़ाई से जुड़ी एक मांग थी। वह चाहते थे कि वहां प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज खुले, ताकि बच्चे ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई कर सकें।

सम्मान मिलने तक स्कूल का रास्ता बन चुका था। हजब्बा की नजर उसके आगे की पढ़ाई पर थी।

कभी एक ग्राहक का सवाल उन्हें अपनी अधूरी शिक्षा की याद दिला गया था। वर्षों बाद, राष्ट्रपति भवन में सम्मान पाकर भी वह गांव के बच्चों की अगली कक्षा के बारे में सोच रहे थे।

प्रकाशित रिपोर्टों और सरकारी दस्तावेज पर आधारित जीवन-कथा। स्कूल की छात्र संख्या नवंबर 2021 की है।

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