पश्चिम बंगाल के चाय बागानों से जुड़ा एक मजदूर अपनी मोटरसाइकिल पर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने लगा। उसके इस काम में परिवार भी जुड़ गया।

चाय बागान में एक सहकर्मी की तबीयत बिगड़ी तो करीमुल हक के सामने अस्पताल पहुंचाने का सवाल था। एम्बुलेंस आसानी से उपलब्ध नहीं थी। उनके पास मोटरसाइकिल थी।उन्होंने उसी से सहकर्मी को अस्पताल पहुंचाया। उस व्यक्ति की जान बच गई।

करीमुल के जीवन पर उपलब्ध सरकारी परिचय में इस घटना का उल्लेख है। उसमें अस्पताल तक करीब 50 किलोमीटर की यात्रा दर्ज है। मोटरसाइकिल पर मरीज ले जाने का यह अनुभव आगे उनकी सेवा की शुरुआत बना। इससे पहले उनके अपने घर में एक ऐसी मौत हो चुकी थी, जिसमें अस्पताल तक पहुंचने का साधन नहीं मिल पाया था। उनकी मां समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी थीं। करीमुल की जीवन-कथा में यह घटना बार-बार लौटती है। अब दूसरे परिवार के सामने वैसी जरूरत थी। इस बार करीमुल ने उपलब्ध साधन से मदद की।

चाय बागान की नौकरी के साथ एक और जिम्मेदारी

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी इलाके से जुड़े करीमुल चाय बागान में काम करते थे। उनके मुफ्त बाइक एम्बुलेंस के काम की चर्चा आसपास के गांवों में फैली। अस्पताल पहुंचने में मुश्किल झेल रहे लोगों को एक स्थानीय मददगार मिला।मरीज को डॉक्टर तक पहुंचाना इलाज की पहली शर्त है। परिवार के पास पैसा कम हो, रास्ता कठिन हो या वाहन न मिले तो अस्पताल की दूरी और बड़ी हो जाती है। करीमुल की कहानी इसी दूरी के बीच घटती है।उनके काम का केंद्र बीमार व्यक्ति को चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाना रहा। यह डॉक्टर के इलाज और अस्पताल में मिलने वाली सुविधाओं का विकल्प नहीं था। लेकिन अस्पताल की यात्रा शुरू ही न कर पा रहे परिवारों के लिए इसका महत्व था।

सम्मान मिला, काम की कहानी आगे बढ़ी

वर्ष 2017 में करीमुल को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। एक चाय बागान मजदूर की स्थानीय सेवा को राष्ट्रीय पहचान मिली।बाद में उनकी जिंदगी पर किताब भी आई। पत्रकार और सामाजिक उद्यमी बिस्वजीत झा ने उनकी जीवनी लिखी, जिसे पेंगुइन ने प्रकाशित किया। दिसंबर 2020 में इस किताब के बारे में जानकारी सार्वजनिक हुई थी।किताब और सम्मान के जरिए उन लोगों तक भी उनका काम पहुंचा जो जलपाईगुड़ी के इन गांवों को नहीं जानते थे। स्थानीय तौर पर उन्हें बाइक एम्बुलेंस दादा के नाम से पहचाना जाने लगा था।

बाइक के साथ परिवार भी जुड़ा

अगस्त 2026 में प्रकाशित उनके जीवन पर एक विवरण में परिवार की भागीदारी का भी उल्लेख मिलता है। पहले से रिकॉर्ड किए गए अपने अनुभवों में करीमुल ने बताया था कि उनके बेटे भी बाइक एम्बुलेंस चलाते हैं और मरीजों को पहुंचाने में मदद करते हैं।इससे कहानी का दायरा बदलता है। जिस सेवा की शुरुआत एक व्यक्ति की पहल से हुई, उसमें मदद करने वाले हाथ बढ़े।कितने मरीज पहुंचाए गए, इसके अलग-अलग समय के अलग आंकड़े हैं। उन सबको जोड़कर आज की कोई नई संख्या बताना ठीक नहीं होगा। उनके अनुभव का सबसे स्पष्ट हिस्सा वह काम है, जिसकी पुष्टि वर्षों के विवरण करते हैं—मुफ्त बाइक सेवा से लोगों को अस्पताल पहुंचाना।

करीमुल अपनी मां के लिए उस यात्रा का इंतजाम नहीं कर सके थे। बाद में एक बीमार सहकर्मी के लिए बाइक लेकर निकले। फिर दूसरे मरीजों के लिए भी निकले।उपलब्ध हालिया विवरण में उनके बेटे उसी काम में साथ खड़े दिखते हैं। एक परिवार के दुख से शुरू हुई मदद में अब उनका अपना परिवार जिम्मेदारी बांट रहा है।

*यह सरकारी परिचय, प्रकाशित जीवन-विवरणों और पहले दर्ज अनुभवों पर आधारित जीवन-कथा है। इसमें वर्णित घटनाएं आज की घटनाएं नहीं हैं।*

 

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