हमारे मित्र सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरीजी की ‘बागी हिंदुस्तान’ और ‘लहू बोलता भी हैं: जंगे-आज़ादी-ए-हिंद के मुस्लिम किरदार’ इन शीर्षकों के तहत लिखी गई दोनों पुस्तकों का विमोचन आज ही के दिन लेकिन अगले महीने की 28 नवंबर को दिल्ली के गालिब हॉल में होने जा रहा है। इसलिए शाहनवाज भाई को हार्दिक अभिनंदन।

लंबे समय से भारतीय इतिहासकार इस बात को लेकर चिंतित रहे हैं कि किस तरह स्कूल और कॉलेज की पाठ्यपुस्तकों में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने के उद्देश्य से इतिहास को विकृत किया गया है।

“क्या भारतीय मुसलमानों को विदेशी माना जाना चाहिए, क्या वे राष्ट्रीय संघर्ष के गद्दार हैं?”

ये सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये और अन्य पूर्वाग्रह भारतीय मुसलमानों के खिलाफ द्वेष और घृणा पैदा करते हैं। एक भारतीय बुजुर्ग ‘दिग्गज’ (doyen) ने बार-बार घोषणा की है कि “इतिहास पूरे सच का चित्रण है और सच के अलावा कुछ नहीं है” फिर भी उनकी पुस्तक आधे सच से भरी हुई है – – – और वास्तविक सच से बहुत दूर है। “इतिहासकार का काम – – – हजारों अन्य फाइलों में से – – इधर-उधर से फाइलें पकड़ने जैसा नहीं है, बल्कि सबसे अधिक हानिकारक को कम हानिकारक से अलग करना है। हर पकड़ने वाले की अपनी विधि और पसंद होती है।”

भारतीय इतिहास लेखन की कहानी भी किसी भी पद्धति और दृष्टिकोण से अछूती नहीं रही है।

सिपाही विद्रोह के बाद के दौर में ब्रिटिश शासकों की यह सोची-समझी नीति थी कि इतिहास लेखन की ऐसी नीति शुरू की जाए जिससे विभिन्न समुदायों और समूहों के बीच अधिक कटुता और कलह पैदा हो – – ब्रिटिश शासन को कायम रखने के लिए – – रोमनों के मॉडल पर (स्ट्रेची का सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को पत्र, 1874)। तदनुसार, आवश्यक बौद्धिक क्षमता वाले कुछ ब्रिटिश पूर्व सैनिकों को इतिहास लेखन के इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इलियट, डॉसन और ब्रिग्स ने जेम्स मिल द्वारा खींचे गए खाके पर इतिहास लेखन में एक नया कदम उठाया। प्रजा – यानी हिंदुओं – पर मुस्लिम अत्याचारों का चित्रण और राजपूतों तथा मराठों का प्रतिरोध उनके पसंदीदा विषय बन गए।

यह भारतीय इतिहासलेखन की शुरुआत थी जिसकी देखरेख एलिफेंटन, चार्ल्स स्टुअर्ट, टॉड, विंसेंट स्मिथ, रॉबर्ट्स आदि जैसे कई ब्रिटिश और भारतीय दिग्गजों ने अच्छी तरह से की थी, और एक लंबे अंतराल के बाद डॉ. जदुनाथ सरकार द्वारा, जिन्होंने 1921 में भारतीय इतिहास के सबसे संवेदनशील चरण – – द फॉल ऑफ मुगल एंपायर – – पर चार खंड लिखकर नाइटहुड की उपाधि प्राप्त की थी। यह अद्वितीय भव्य पराक्रम ऐसे समय में किया गया था जब भारत ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रेरणादायक चरण को देखा था। डॉ. सरकार की महानता उनकी कार्यप्रणाली में निहित है। लेकिन तथ्यों का उनका संकलन और कुछ उद्देश्यपूर्ण अनुमानों को आगे बढ़ाने के लिए उनकी स्थापना ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के उद्देश्य को लोगों में और अधिक फूट डालने के लिए सेवा दी। इन सब में उनके पास प्रतिभा का स्पर्श था। इस साम्राज्यवादी-प्रेरित इतिहासलेखन ने 30 और 40 के दशक के भारतीय बुद्धिजीवियों की पीढ़ी पर गहरा और अमिट प्रभाव छोड़ा – जिसके योग्य और सबसे सक्षम प्रतिनिधि हमारे प्रख्यात इतिहासकार डॉ.आर. सी. मजूमदार हैं। उनका एक आकर्षक चुंबकीय व्यक्तित्व है जो युवा विद्वानों को आकर्षित करता है जो उनके सहायक के रूप में काम करते हैं; उनके पास ‘मैग्नम ओपस’ (महाग्रंथ) का निर्माण करने की क्षमता है जिसे भारतीय विद्या भवन द्वारा उदारतापूर्वक संरक्षण प्राप्त है। इस प्रकार वे सांप्रदायिक पूर्वाग्रह में विशिष्टता के साथ रूढ़िवादी इतिहास विद्यालय के मुख्य कुलपति बन गए हैं। आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ के 1969 के दिवाली अंक में उन्होंने “सत्य और सत्य के अलावा कुछ नहीं” की अपनी प्रस्तुति के आलोक में अपने दर्शन को विस्तार से बताया – – कि सांप्रदायिक की जटिल समस्या को हल करने के लिए सभी मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

घातक दर्शन और घृणा की संस्कृति की चुनौती का सामना करने के लिए – – जो हजारों नाथूराम गोडसे पैदा करती है और करती रही है – – स्वाभाविक रूप से इतिहासकार की एक नई पीढ़ी अपनी कम बौद्धिक शक्ति और अकादमिक विशिष्टता के साथ सामने आई है। ऐतिहासिक शोध के क्षेत्र में, सत्य की उनकी अथक खोज के सामने, डॉ. जदुनाथ सरकार और डॉ. मजूमदार जैसे प्रख्यात ब्रिटिश और भारतीय इतिहासकारों के कई पुराने सिद्धांत खंडित और लगभग ध्वस्त हो चुके हैं। इस ध्वंस के काम में सामाजिक नृविज्ञान ने भी बहुत बड़ा काम किया है। काफी हद तक, इन सामाजिक वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम के कारण, माहौल में बदलाव पहले से ही स्पष्ट है। महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा परिकल्पित राष्ट्रवादी परंपरा को सरदार भगत सिंह, अशफाकुल्ला, मातंगिनी, लखन प्रधान और भारत के कोने-कोने से आए अनगिनत शहीदों के रक्त द्वारा एक विशिष्ट आकार दिया गया था।

विचारों के इन दो स्कूलों के बीच इस बुनियादी संघर्ष में, मैं गांधीजी, टैगोर और हमारी भूमि के अन्य शहीदों का पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता।

इसी आग्रह के साथ सैय्यद शाहनवाज कादरी ने इस पुस्तक में 1765 की शुरुआत से ही भारत को ब्रिटिश गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए हमारे लोगों की कहानी को केंद्र में लाने का प्रयास किया है, जिसमें स्पष्ट कारणों से भारतीय मुसलमानों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया है।

सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी साहब ने बंगाल के मुर्शिदाबाद के नवाब सिराजउद्दौला की 23 जून 1757 की प्लासी की लड़ाई से लेकर, मैसूर के नवाब टिपू सुल्तान की श्रीरंगपट्टनम के मैदान में हुई 1799 की लड़ाई तक, तथा हिंदुस्तान के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में लड़ी गई 1857 की आजादी की दूसरी सबसे बड़ी लड़ाई, और महात्मा गांधी द्वारा घोषित भारत छोड़ो 1942 आंदोलन के बाद हुए आंदोलनों के बारे में बहुत ही सटीक जानकारी दी है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संघर्ष में 1192 शहीद मुस्लिम पुरुषों के साथ 41 मुस्लिम महिलाओं की शहादत का विस्तृत विवरण देकर, एक बहुत बड़ा काम किया है। क्योंकि 1857 के बाद अंग्रेजों ने यह तय करते हुए ‘बांटो और राज करो’ नीति के तहत दोनों समुदायों के कट्टर सांप्रदायिक तत्वों की पहचान कर, उनके माध्यम से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द काम करना शुरू कर दिया। और इसके लिए दोनों धर्मों के अलग-अलग संगठन बनाने के लिए पर्दे के पीछे से काम शुरू कर दिया। जिसके फलस्वरूप 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हिंदुओं का ‘भारत महामंडल’ बना जिसके अध्यक्ष दरभंगा के महाराजा थे, जिसमें अंग्रेजों की बहुत बड़ी भूमिका थी। जो बाद में 1906 में ‘हिंदू महासभा’ के रूप में परिवर्तित हुआ। वैसे ही ढाका के नवाब सलीमुल्लाह खान द्वारा मुसलमानों की ‘ऑल इंडिया कॉन्फेडरेशन’ के नाम से शुरू की गई तंजीम। जो दिसंबर 1906 को ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ के नाम से जानी जाती है। और उसके बाद नागपुर में 1925 के दशहरे के दिन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की गई। इन सभी गतिविधियों का मिला-जुला परिणाम देश के बंटवारे में हुआ।

सौ वर्ष से अधिक समय से आरएसएस मुसलमानों के खिलाफ गलतफहमियां फैलाने का काम बारह महीने चौबीसों घंटे करते आ रहा है। और उसमें सबसे प्रमुख बात मुसलमानों को राष्ट्रद्रोही कहना है। और उन्हें आजादी की लड़ाई की जगह देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहराने के आरोप लगाए जा रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह किताब आरएसएस द्वारा किए जा रहे प्रचार का करारा जवाब दे रही है। हालांकि आजादी के आंदोलन से आरएसएस का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। उल्टा आरएसएस अंग्रेजों की पुलिस और सेना में भर्ती कराने के काम में लगी रही। और विडंबना यह है कि, वह आज स्वघोषित देशभक्त बनकर, देशप्रेम और देशद्रोह के सर्टिफिकेट बांटने का काम कर रही है। सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी ने इस किताब का लेखन इतने विस्तृत रूप से करने के लिए, मैं उन्हें विशेष रूप से धन्यवाद दे रहा हूँ। हालांकि इस विषय पर हमारे कलकत्ता के मित्र प्रोफेसर शांतिमय रॉय ने अंग्रेजी में 160 पन्नों की ‘Freedom Movement and Indian Muslims’ शीर्षक से नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा 1979 में लिखकर प्रकाशित की है। मैं प्रोफेसर शांतिमय रॉय की किताब को सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी की ‘लहू बोलता भी हैं’ की प्रस्तावना के तौर पर ही देख रहा हूँ।

भारत में अंग्रेजों के राज की शुरुआत बंगाल के नवाब सिराजउद्दौला को प्लासी की लड़ाई में हराने के बाद 23 जून 1757 से कायम होने की शुरुआत हुई। जो कि बाद में दख्खन के नवाब टिपू सुल्तान के साथ श्रीरंगपट्टनम के मैदान में 4 मई 1799 को हुई लड़ाई में, अठारहवीं शताब्दी के अंत में, भारत के दो प्रमुख शासकों से सत्ता छिनने के बाद, पुणे के पास 1818 में भीमा कोरेगांव की लड़ाई में पेशवाओं के साथ हुई लड़ाई को जीतने के बाद, चालीस साल के भीतर तत्कालीन दिल्ली के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में (1857) जिसमें अहमद अब्दुल्लाह, बेगम हजरत महल, शहजादा फिरोजशाह, वल्लभगढ़ के राजा बख्त खान, इलाहाबाद के मौलवी लियाकत अली, रानी लक्ष्मीबाई, पेशवा बाजीराव, नाना फडणवीस, तात्या टोपे, वीर कुंवर सिंह, राजा देवीबख्श सिंह, और मौलवी फजले हक खैराबादी और उनके साथी मौलवियों ने सिर पर कफन बांधकर जिस दिलेरी और हिम्मत से आजादी की लड़ाई लड़ी उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना: हिंदू-मुसलमानी एकता के दूत

1857 की इस लड़ाई के बाद संपूर्ण भारत पर अंग्रेजों का राज कायम हो गया। उसके बाद के नब्बे सालों के भीतर और 1857 की लड़ाई के बाद लोगों को लगने लगा कि अब इस तरह की छुटपुट और बिखरी हुई कोशिशों की जगह संगठित होकर कोशिश करनी चाहिए। और इसलिए संपूर्ण भारत में जगह-जगह संगठन बनने की शुरुआत हुई। उदाहरण के लिए

(1) बंगाल में इंडियन एसोसिएशन

(2) बंबई में प्रेसिडेंसी एसोसिएशन

(3) मद्रास में महाजन सभा

(4) पूना में सार्वजनिक सभा।

इन सभी के अलावा सर हूम नाम के एक रिटायर्ड अंग्रेज अधिकारी ने ‘इंडियन नेशनल यूनियन’ की शुरुआत 1885 में की, जो बाद में ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ के नाम से जानी जाती है। 1885-1905 के दौरान कांग्रेस में मुसलमानों की हिस्सेदारी कम रही है। लेकिन बाद में देखा कि अलग-अलग संगठन की तरफ से की जा रही कोशिश की आड़ में अंग्रेजों को दोनों संप्रदाय के लोगों के सवाल सुलझाने की जगह उन्हें उलझाने में मददगार साबित हो रहा है। तब 1910 के नागपुर में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन में कांग्रेस के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने का फैसला लिया गया था। जिसका कांग्रेस ने स्वागत किया। और बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना, जो कि मुस्लिम लीग के सख्त खिलाफ थे, उन्हें मोहम्मद अली जौहर तथा सर वजीर हसन की बातचीत में तय किया गया कि आजादी की लड़ाई के लिए सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने मिलकर काम करने के लिए बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में, जिसके लिए जिन्ना बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने उन्हें हरी झंडी दिखाने के बाद पटना के कांग्रेस के अधिवेशन में दोनों धर्म के लोग आजादी की लड़ाई मिलजुलकर लड़ने का फैसला लिया गया था। और 1913 तक बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के सदस्य भी नहीं बने थे। वह कांग्रेस के सदस्य की हैसियत से पटना, कलकत्ता तथा लखनऊ के छठे अधिवेशन में सरोजिनी नायडू तथा बिशननारायण दार के साथ शामिल हुए थे। ज्यादातर इतिहासकारों ने बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना को मुस्लिम लीग को बनाने से लेकर पाकिस्तान के निर्माण में शामिल होने का वर्णन किया है। लेकिन सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी ने बहुत मेहनत से अन्य लेखकों की किताबों का अध्ययन करने के बाद पाया कि 1906 में बनाई गई मुस्लिम लीग के साथ 1914 तक बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना का कोई वास्ता नहीं था। उल्टा वह सैद्धांतिक रूप से मुस्लिम लीग बनाने के सख्त खिलाफ थे। और व्यक्तिगत जीवन में बैरिस्टर जिन्ना अपने घर में खान-पान से लेकर किसी भी प्रकार के धार्मिक कर्मकांडों से कोसों दूर थे। इसलिए सरोजिनी नायडू ने उनके भाषणों और लेखों को संकलित करते हुए उन्हें भारत के हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत के रूप में एक किताब भी प्रकाशित की है। उसमें उन्होंने लिखा है कि जिन्ना दोनों समुदायों को एक साथ लाने और राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत करने के लिए साक्षात प्रतीक (Embodied Symbol) के रूप में खड़े हैं। इस तरह से उनकी सराहना की है। और उनके सेक्युलर व्यक्तित्व की वजह से ही मुंबई के सर्वसामान्य नागरिकों ने एक-एक रुपया इकट्ठा करते हुए 65,000 रुपये जमा करते हुए, 1918 में मिलकर मुंबई में ‘पीपल्स जिन्ना मेमोरियल हॉल’ के नाम से एक हॉल का निर्माण भी किया था, जो ग्रांट रोड के कांग्रेस हाउस परिसर में मौजूद है। और बैरिस्टर जिन्ना ने मलबार हिल जैसी पॉश जगह पर अपनी पसंद से अपने पैसों से 1936 में एक शानदार कोठी का निर्माण भी किया था। लेकिन महात्मा गांधी के कांग्रेस में बढ़ते हुए प्रभाव से बैरिस्टर जिन्ना अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के मार्ग में आड़े आते हुए देखकर ही मुस्लिम सांप्रदायिकता के पैरोकारों में से एक बनकर पाकिस्तान के निर्माण करने तक चले गए।

उल्टा कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने आजादी की लड़ाई के लिए मुस्लिम लीग के साथ मिलजुलकर काम करने का फैसला लिया गया 1915 को मुंबई में दोनों पार्टियों के अधिवेशन एक ही समय चल रहे थे, जिसमें महात्मा गांधी के साथ लॉर्ड सिन्हा, सुरेंद्रनाथ बैनर्जी, पंडित मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेझंट, सरोजिनी नायडू, बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना के आग्रह से शामिल हुए, और यह सिलसिला शुरू होने के दूसरे ही साल लखनऊ के लीग अधिवेशन के अध्यक्ष बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना थे, और कांग्रेस के अध्यक्ष अंबिकाचरण मजुमदार के बीच लखनऊ पैक्ट हुआ था।

1921 तक दोनों पार्टियों के अधिवेशन एक साथ करने का चल रहा था। लेकिन यहीं से पाकिस्तान के बनने की नींव अंग्रेजों ने बहुत ही षड्यंत्र के तहत डालकर, देश के बंटवारे तक की नौबत आ गई। लगा था कि बंटवारे के बाद शायद दोनों संप्रदाय के लोग शांति से रहेंगे। लेकिन 1925 के दशहरे के दिन स्थापित किया गया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले सौ वर्षों से लगातार हिंदू-मुस्लिमों का ध्रुवीकरण करने में लगा हुआ है। यहां तक कि उसके गीतों,बौद्धिक तथा खेलों में भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम बारह महीनों चौबीसों घंटे चलते रहता है। और आजकल तो सत्ताधारी बनने के बाद गोलवलकर के कहने के अनुसार “भारत में रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की सदाशयता के आधार पर रहने की आदत डालनी होगी, और इस देश में रहना है, तो बहुसंख्यक लोगों की मर्जी पर रहना होगा” जैसे फासिस्ट विचार कर रहे हैं। बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने के बाद वहां पर राम मंदिर का निर्माण उसका सबसे बड़ा प्रमाण है। तथा गोहत्या बंदी और सत्तारूढ़ पार्टी बनने के बाद एक झटके में कश्मीर के 370 को खत्म करना, और उसके राज्य के दर्जे को खत्म करना, और अब वक्फ बिल को लाने के लिए चल रहा प्रचार-प्रसार इसी बात का परिचायक है। और चुनाव आयोग की मदद से एसआईआर की आड़ में मुस्लिम मतदाताओं को मतदान से वंचित करने जैसी हरकतों से उनके कपड़ों से लेकर खानपान तक के फतवे, और त्योहारों में सत्तारूढ़ पार्टी के शामिल होने से लेकर संसद के सदन में ब्राह्मणों को शासन की ओर से लाकर पूजा-पाठ करने के उदाहरण, भारत के सेक्युलर होने के ऊपर सवालिया निशान बनाते जा रहे हैं। आज की तारीख में भारत अघोषित हिंदुराष्ट्र बन गया है। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे मित्र सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी साहब की ‘लहू बोलता भी हैं’ यह किताब कुछ गलतफहमियां दूर करने के लिए काम आएगी, ऐसी उम्मीद करता हूँ।

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