नरेंद्र मोदी जी के सत्तारूढ राजनीतिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के तीन साल पहले ही उन्हे खुद को पता चल गया था. जैसे दवाओं की भाषा में एक्सपायरी डेट होती है बिल्कुल अपने सत्ता में रहने की भी एक्सपायरी डेट आ चुकी है . 2023 के शितकालिन संसदीय सत्र के दौरान के पहले ही उन्हे खुद को इस बात का अंदेशा हो गया था . जिसका अंदेशा उन्हें खुद को भी होने की वजह से ही, उन्होंने 146 संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को उस सत्र की शुरुआत होने के पहले दिन से ही, उन्हें अनुशासन भंग करने का कारण देते हूऐ, संसद से निष्कासित कर दिया. और 19 संवेदनशील विधेयक बगैर कोई चर्चा नहीं करते हूऐ, पारित करने की करतूत करने की आवश्यकता उनके प्रजासत्ताक पद्धती से चुनाव जीतने की मियाद खत्म हो जाने का एहसास होने की वजह से ही, उन्होंने चुनाव आयोग के चयन प्रक्रिया में एकतरफ़ा बदलाव करने का निर्णय लिया है . और चुनाव आयोग को मनमानी करने के लिए विशेष सुरक्षा के लिए भी व्यवस्था करने की आवश्यकता महसूस हुईं. क्योंकि उस चुनाव आयोग के तरफ से सिर्फ भाजपा के मतदाताओं को ही मतदाताओं की सूची में रखते हुए, विरोधी मतदाताओं को मतदान करने से वंचित करने के लिए ही , विशेष पुनर्निरीक्षण (एस आई आर) की आड़ मे हटाने की कारगुजारी कराते हुए, 13 करोड से अधिक संख्या में मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने का रेकॉर्ड काम करवा लिया है. 13 करोड आबादी के दुनिया कई देश भी नहीं है. लेकिन 140 करोड आबादी के 97 करोड बालिग मतदाताओं के भारत में 13 करोड मतदाताओं को मतदान से वंचित करने का काम, भारत के चुनाव आयोग ने किया है. जब कि चुनाव आयोग का मुख्य उद्देश्य इस देश का एक भी मतदाता अपने मतदान के अधिकार से वंचित नहीं रहना चाहिए यही रहते हूऐ. भारतीय चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार किसी आयोग ने अपने ही उद्देश्य से हटकर किसी विशेष दल के लिए अपने संविधानिक कर्तव्य को ताक पर रख कर, आईएएस अधिकारियों की ड्यूटी की शुरुआत मे ली जाने वाली संविधान की शपथ जिसमें “मै भारतीय संविधान का पालन करते हुऎ, मेरे पद का कार्यभार निभाने की कोशिश करुंगा.” इस शपथ का उल्लंघन करने का गुनाह वर्तमान चुनाव आयोग के सदस्यो ने किया है. जिसे 2023 के शितकालिन संसदीय सत्र में विशेष सुरक्षा देने का उद्देश्य ही भाजपा की सत्ता की एक्सपायरी डेट बढाने का संगिन जुर्म करने का कार्यभार चुनाव आयोग को सौपने के पिछे का प्रमुख कारण था.
जिसकी वजह से ही भाजपा ने 10 अक्तूबर को दिल्ली के तरफ आने वाले हर एक प्रवासी पर निगरानी रखने का काम किया है. जिसमें रेल्वे, हवाईजहाज, बसो से लेकर मोटर कारो से लेकर दुपहिया वाहन और कुछ पैदल यात्रीयो को भी रोकने के लिए एक लाख से अधिक सुरक्षा कर्मीयों के साथ आर एस एस के गुंडे स्वयंसेवक मुंह पर मास्क बांधकर तथाकथित सुरक्षा के जेकेट्स पहनकर, हाथो में डंडे लेकर दिल्ली के सडकों पर आने जाने वालों को रोकने का काम कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद भी वह दिल्ली में इकठ्ठे हूऐ लाखों लोगों को रोकने मे कामयाब नहीं हो सके यही आज के धरना प्रदर्शन की सबसे बड़ी कामयाबी है.
1974 – 75 का जनआंदोलन के मेरे अपने अनुभव
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मैने खुद जयप्रकाश नारायण के आवाहन पर 1974 – 75 के दौरान संसद पर तत्कालिन सरकारने लोगों का विश्वास खो दिया है. इसलिए ट्रकों मे भरकर देशभर के मतदाताओं के हस्ताक्षर के बंडल संसद के अध्यक्ष को सौपने के लिए निकाले गए मार्चों मे हिस्सा लिया है. (उम्र 21 सालों की) अमरावती से दिल्ली तक की ट्रेन यात्राओं को सुचारू रूप से चलते हुए देखा है. और आराम से दिल्ली के स्टेशन पर उतर कर रामलीला मैदान में इकठ्ठे हूऐ, तथा रामलीला मैदान के अगल- बगल के रस्ते में के खोमचे वालों से नाश्ता, खाना खाते हुए, किसी भी तरह के पुलिस की कार्रवाई तो दूर की बात है. उल्टा पुलिस वाले सिर्फ जुलूस के रास्तें पर दोनों तरफ से शांति से खड़े रहते थे.

जयप्रकाशजी ने उसके पहले ही पुलिस – प्रशासन को लेकर एक अपिल की थी की, सरकारी कर्मचारियों ने सरकार में बैठे राजनेताओं के तरफ से दिए गये संविधान के खिलाफ किसी भी आदेश को नहीं मानते हूऐ, हमारे देश के संविधान के अनुसार ही अपनी-अपनी ड्यूटी को निभाना है.” जिसको लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उन्हें देशद्रोही बोलते हूऐ, उनकी आलोचना की थी. और मेरे पिताजी भी आजादी के पहले से ही काँग्रेस के कमिटेड सदस्यों मे से एक होने की वजह से, जब मैं आपातकाल के बाद जेल से रिहा होने के बाद घर पर गया था, तो मुझे उन्होंने कहां था कि “तुम एक देशद्रोही का साथ दे रहे हों.” तो मैने उन्हें कहा था कि “8 अगस्त 1942 के दिन महात्मा गाँधी जी ने मुंबई के गोआलिआ टॅंक की सभा से अंग्रेजों भारत छोड़ो का ऐलान किया था, तो आपने भी उनके आवाहन के अनुसार खांन्देश मे सानेगुरुजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन मे भाग लिया था. तो अंग्रेजों ने भी आप सभी काँग्रेस के लोगों को भी देशद्रोही बोलते हूऐ, जेलो मे बंद कर दिया था. तो इतिहास के क्रम में जो भी जनता के खिलाफ काम करने वाले सत्ताधारीयों के खिलाफ सत्याग्रह करते हैं. उनको सभी सत्ताधारी यही बोलते हैं. क्या आप लोगों ने आजादी का आंदोलन में वर्तमान सत्ताधारीयों को मनमानी करने देने के लिए भाग लिया था. या उसके खिलाफ भाग लिया था ? और सबसे अहं बात भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के बाद तो महात्मा गाँधी से लेकर आपकी पूरी पार्टी की कार्यकारिणी के सदस्यों अंगेजो ने गिरफ्तार कर लिया था. और यही जयप्रकाश नारायण डॉ. राममनोहर लोहिया तथा उनके सहयोगी सानेगुरुजी तथा एस. एम. जोशी, नानासाहेब गोरे, अरुणा आसफअली उषा, मेहता तथा खांन्देश मे आपके नेता उत्तमराव पाटील, कमलताई पाटील के नेतृत्व में भूमिगत रूप से भारत छोड़ो आंदोलन मे आपने भी तो भाग लिया था. तो वही जयप्रकाश नारायण आजादी के बाद आपके प्रिय नेता जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनने का आग्रह करने के बावजूद भी उन्होंने आचार्य विनोबा भावे के सर्वोदय के भूदान आंदोलन मे 20 सालों से लगातार भाग लिया. और उनके गृहराज्य बिहार से लाखों एकड जमीन भूदान मे दिलवाने से लेकर, बिहार दान तक करवाने मे कामयाब रहे हैं. उसके बाद अस्सि के दशक की शुरुआत मे सबसे पहले बुंदेलखंड क्षेत्र की दस्युओं की समस्या का समाधान करने के लिए उनके नेतृत्व में शेकडो दस्यूओ ने अपने हथियार सौंपते हूऐ आत्मसमर्पण करने का ऐतिहासिक काम तत्कालीन काँग्रेस के मुख्यमंत्री के सामने कराने से लेकर 1971 के बंगलादेश के निर्माण के लिए विश्वजनमत बनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने एक विशेष विमान देते हूऐ, उन्हें पूरी दुनिया में भेजनेकी व्यवस्था की थी.
और उसी के आसपास ही जब देश में भ्रष्टाचार, महंगाई बेरोजगारी की समस्याओं से लोग परेशान हो रहे थे . और हमारे जैसे ही गुजरात तथा बिहार के विद्यार्थियों ने उन्हें सरकार के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आग्रह किया. तो 1942 के हिरो जयप्रकाश नारायण साठ के दशक मे हमारे देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह को नहीं मानते हूऐ, सत्ता की राजनीति में नहीं शामिल होते हैं. और अपने जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ हमारे संविधान के अनुसार दिए हूए अधिकारों को लागू करने के लिए, चुनाव सुधार करने के लिए लोकतंत्र को बचाने के लिए नागरिकों का संघठन (सिटिजंस फाॅर डेमोक्रेसी) बनाते हूऐ अपनी पूरी जिंदगी खफा देते हैं. तो आप लोग उन्हें देशद्रोही और विदेश के एजेंट जैसी गालियाँ दे रहे हों ? तो फिर अगर जयप्रकाश नारायण देशद्रोही है. तो फिर इस देश में और कोई भी देशभक्त नहीं हो सकता है. “मेरे पिताजी और मेरे संबंध काफी मैंत्रिपूर्ण होने की वजह से हमारी बात – चीत बहुत ही अच्छि तरह से होती थी. और हमारी इस बातचीत को हमारे गाँव के काफी लोग बहुत ही उत्सुकता से सुनते थे. और मेरे हमउम्र के दोस्त मुझे अक्सर ही बोलते थे,” कि सुरेश तुम बहुत भाग्यशाली हो की क्षत्रिय मराठा जाति के होते हुए, भी आपके और आपके पिताजी के संबंध इतने अच्छे हैं.आप उनके साथ इतना खुलकर बोल सकते हो. हम लोग तो अपने पीता से आँख से आँख भी नहीं मिला सकते, बातचित तो बहुत दूर की बात है. ” साथियों यह बात शतप्रतिशत सही है मेरे पिताजी ने मेरे राजनीतिक – सामाजिक कार्यकर्ता के कामों से लेकर मेरे आंतरजातीय विवाह तक मेरे फैसलो का सम्मान किया है.
नरेंद्र मोदी की 25 सालों की सत्ता की राजनीति का आकलन

2002 के दंगों के बाद से ही मेरा गुजरात में लगातार आनाजाना चल रहा है और नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के कार्यशैली को देखकर मैने नरेंद्र मोदी को द मेल एडिशन आफ इंदिरा गांधी की उपमा देते हूऐ लिखा है और गुजरात के कइ जगहो पर भरीसभाओं मे बोला है जिसमें गुजरात की राजधानी गाँधीनगर से लेकर सोमनाथ, वेरावल, सुरत, वडोदरा, जामनगर, भावनगर से लेकर गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में भी मैनें कहा है.

मुख्य रूप से 2014 के पहले चुनाव प्रचार के दौरान तो और भी कइ जनसभाओं मे बोला है मैंने नरेंद्र मोदी को अगर हमारे देश का प्रधानमंत्री बनने का मौका दिया तो यह हमारे देश के सेक्युलरिज्म तथा जनतंत्र की हत्या होगी . क्योंकि यह जिस गुजरात माॅडल की बात कर रहे हैं वह पुंजिपतियों का चारागाह बनाने की वजह से टाटा जैसे उद्योगपती ने ही नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनने सपना देखने के लिए उद्दीपित किया है. क्योंकि बंगाल के सिंगूर के किसानों के आंदोलन के कारण टाटा का नानो प्रोजेक्ट नहीं शुरु हो सका तब नरेंद्र मोदी ने उन्हें गुजरात में आमंत्रित किया था और नरेंद्र मोदी ने 2001 के 7 अक्तूबर के दिन गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही गौतम अदानी, अंबानी तथा टाटा जैसे उद्योगपतियों के लिए पर्यावरण संरक्षण के सभी नियमों को ताकपर रखते हुए बेतहाशा जमीन तथा संसाधनों को मुहैया कराने का काम किया है और इसिलिये 2013 के भाजपा के शिर्षस्थ नेतृत्व को नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 2014 के चुनाव के लिए जो भी कोई पार्टी के लिए सबसे अधिक धन मुहैय्या करेगा वही देश का प्रधानमंत्री बनेगा और यही पर भाजपा के लिए संपूर्ण देश मे रामजन्मभूमी के मुद्दे पर 25 साल से अधिक समय से लगातार रथयात्रा तथा कारसेवा के कार्यक्रमों का नेतृत्व करने वाले लालकृष्ण आडवाणी को अपनी दावेदारी पिछे लेनी पडी है यह ओपन सिक्रेट है. क्योंकि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनानाके लिए भारत का कार्पोरेट समाजने 2014 के चुनाव में अपनी थैलियां खोलकर भाजपा के लिए चुनाव प्रचार के लिए धन मुहैय्या कराने का काम किया. इस बहाने मुझे सौ साल पहले के जर्मनी के चुनावों की याद आ रही है. हिटलर ने जर्मनी के उद्योगपतियों को बुलाकर कहां था कि “आप लोग मेरी पार्टी को धन मुहैय्या करो मै जर्मनी में आपको जबरदस्त उद्दोग – धंधा करने के लिए मौका दुंगा. बिल्कुल नरेंद्र मोदी ने अदानी उद्योग के लिए कांडला पोर्ट देने से लेकर भारत की ऊर्जा, रेल्वे, हवाईसेवा, रक्षाक्षेत्र, शिक्षा के क्षेत्र से लेकर लोहखनिज से लेकर सभी प्रकार के खनिज, तेल और अब किसानों की जमीनो को हडपने से लेकर सरकार के मुनाफे मे चल रहे उद्दमो को सौपने का कारनामा 12 सालों से लगातार किए जा रहे हैं.
2023 के शितकालिन संसदीय सत्र में चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया में बदलाव
लेकिन इतना सब कुछ करने के बावजूद, हमारे देश के आम लोगों की समस्याओं का समाधान होना तो दूर की बात है. कुछ चंद रेवड़ीयों को बांटने के बावजूद, उन्हें मतों मे रुपांतरित करने मे कामयाब नहीं हो रहा है. यह देख-कर ही पूरी चुनाव प्रक्रिया को ही अपने मनमर्जी से चलाने के लिए, संविधान संशोधन करते हूऐ, उसे कौन से मतदाताओं से हमे मतदान होता है, और कौन से से नहीं होता है. इसकी पहचान कराने के लिए, चुनाव आयोग को कहते हूऐ, उन्हें छाटने के लिए, तथाकथित मतदाताओं के गहन पुर्निरिक्षण (एस आईआर) के बाद 13 करोड मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करना मतलब 13 प्रतिशत से अधिक संख्या में मतदाताओं को मतदान से वंचित करने के बाद किऐ गए विधानसभा चुनाव गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, ओरिसा, बंगाल आसाम जैसे राज्यों में एक झटके में सभी विरोधी पार्टियों को खत्म करते हूऐ, आनेवाले 2029 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ भाजपा को जित दिलाने की तैयारी कर ली है. तब हमारे देश के युवाओं को लग रहा है, कि यह तो पूरे जनतंत्र को ही हायजॅक करने का काम, वर्तमान चुनाव आयोग के द्वारा भाजपा ने कर लेने की करतूतों को देखकर ही कल 10 अक्तूबर से देश की राजधानी मे धरना प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. लेकिन पचास हजार से अधिक संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती, तथा उसमें उससे बडी संख्या में आर एस एस के गुंडे बगैर नेमप्लेट लगाऐ लेकिन हेलमेट, डंडा, जेकेट्स और मुंहपर मास्क बांधकर प्रदर्शनकारियों को लेकर पत्रकार तथा महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करने का नजारा देखने के बाद, आज अनायास ही जयप्रकाश नारायण की 124 वी जयंती के बहाने, आजसे पचास साल पहले उनके नेतृत्व में हम लोगों ने किऐ हूऐ, धरना- प्रदर्शनों की याद आने की एकमात्र वजह काँग्रेस के राज में हमने किया हुआ प्रतिरोध और आज हमारे अपने ही बच्चों के द्वारा किया जा रहा प्रतिरोध की राजनीति में जमीन आसमान का अन्तर दिखाई दे रहा है.











