अभि- अभि भागलपुर के मित्र डॉ. मनोज मिता की फेसबुक पर एक पोस्ट देखने के बाद, वह कल बनारस में सर्वोदय के बुजुर्ग नेता अमरनाथभाई के साथ मुलाकात करते हूऐ, उन्होंने जो विडियो शेयर किया है. उसे देख कर मै विचलित होकर यह लेख लिखने की कोशिश कर रहा हूँ.

अमरनाथभाई सर्वोदयी नेता

अमरनाथभाई सर्वोदय आंदोलन के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं. तथा जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान तत्कालीन सरकारने जयप्रकाशजी के आंदोलन को विदेशी सहायता मिल रही है. और उसके एजेंटों के नाम भी मिडिया मे उछालने की बेहुदा कोशिश की गई थी. जिसमें अमरनाथभाई का भी नाम देख – कर उसी समय मैनै श्रीमती इंदिरा गांधी के इस आरोप का प्रतिवाद भी किया था. अमरनाथभाई सर्वोदय मे बहुत ही सुंदर और स्वस्थ शरीर के धनी रहे हैं. और उसे मेंटेन करने के लिए, नियमित व्यायाम तथा खानपान का कड़ाई से पालन करते थे. लेकिन पिछले साल भागलपुर की यात्रा मे सुबह सेविंग करते हूऐ, अचानक गिरने की वजह से रिढ की हड्डी मे गंभीर रूप से घायल होने की वजह से उनकी खुद की उठने- बैठने से लेकर सभी प्रकार के शारीरिक हलचल करने की क्षमता पर असर होने की वजह से, अब उन्हें बेडरिडन स्थिति में अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बनारस मे रहते हूऐ, निर्भर रहना पड रहा है. यह उनके जैसे स्वाभिमानी – स्वावलंबी व्यक्ति के लिए, बहुत ही पिडादायक स्थिति है. और वह पिडा उनके सुंदर मुखमंडल पर अभी इस वीडियो मे देखकर ही मै पुनः उम्रदराज की समस्या पर लिखने की कोशिश कर रहा हूँ. क्योंकि मेरे अगल-बगल मे इस तरह के और भी लोग हैं. जो सत्तर वर्ष पार करने के बाद ही मानसिक रूप से अपना आत्मविश्वास खोते हूऐ, अपने आप को उम्रदराज समझने लगे हैं. किसी को मनोचिकित्सक की सहायता लेनी पड रही है. तो किसी को वृध्दावस्था मे किसी रिहॅबिलिटेशन सेंटर में रहना पड रहा है.

नक्सलाइट आंदोलन के संस्थापकों मे से एक कानू सन्याल

कुछ दिन पहले ही ‘फर्स्ट नक्सल’ शिर्षक की कानू सान्याल भारत के नक्सल आंदोलन के प्रणेताओ मे से एक नेता की बायोग्राफी पर मैने काऊंटर करंट में विस्तार से समिक्षा लिखी थी . कि कानू सन्याल जैसे जान हथेली पर लेकर भारत में सशस्त्र मार्ग से रेजिम चेंज करने के लिए, कम-से-कम पचास साल से अधिक समय तक कोशिश करने वाले आदमी को जब उम्रदराज होने के बाद अपने अकेले पन की वजह से अपने सिलिगुड़ी के पास हाथीघिसा /सेफ्तुल्लाज्योत गांव स्थित घर के कमरे में सीलिंग फैन को दोर बांधकर लटक कर फांसी लगाकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा है . और उन्होंने अपने बायोग्राफी लिखने वाले लेखक बापादित्य पाल को अपने जीवन में आए हुए बुढापे के बारे में, तथा उसके कारण स्वास्थ्य की समस्या और मानसिक रूप से अवसाद की समस्या से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को रोकने की नौबत आने के बाद, आया हुआ खालीपन का शिकार हो गए थे. इसलिए हताश हो कर आत्महत्या कर ली थी. लेकिन उनकी पार्टी का स्टेटमेंट है, कि “क्रांतिकारी कभी आत्महत्या नही करते है.” इसलिए पार्टि ने उनके आत्महत्या को सिर्फ वह भी भगतसिंग के जैसे ही शहिद हूऐ है. क्योंकि कानू सन्याल का आत्महत्या का दिन भी 23 मार्च 2010 था.
दुनिया को बदलने का आंदोलन करने वाले लोग भी बगैर आंदोलन की वजह से कैसे निराश हो जाते हैं. इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण कानू सन्याल ही है . इसलिए महात्मा गाँधी एकमात्र आंदोलनकारी थे, जिन्होंने आंदोलन के बीच के समय में रचनात्मक कार्यों को जोड़ने की शानदार शुरुआत की थी. काश हमारे कम्युनिस्ट विचारधारा के साथियों ने भी महात्मा गाँधी जी के रचनात्मक कार्य को अपनी क्रांतिकारी प्रक्रियाओं मे ही समावेश करने की सद-बुद्धी हुई होती . और यही बात आत्महत्या करने के पहले कानू सन्याल ने अपनी मनोव्यथा मे शेयर भी किया है.

गाँधीवादी समाजवादी भी बढती उम्र के शिकार

कुछ दिन पहले मै गोआ से वापसिके सफर के लिए मुंबई से नागपुर की गाड़ी को बारह घंटे का अंतराल होने के कारण, मुंबई में गांधीवादी बुजुर्ग मित्र को मिलकर लौट रहा हूँ. और बार-बार उनके 84 साल का उम्रदराज़ होना, और अकेले पन की वजह से उन्हें घेरकर रखी निराशा उनके मुहसे सुनकर आ रहा हूँ. और वह मुझे आज पुनाह याद आ रही है. और यह पोस्ट लिखने की वजह भी वही है.
कलकत्ता में मेरे एक प्रतिभाशाली और मूर्धन्य विद्वान प्रोफेसर मित्र , सत्तर की उम्र पार करने के बाद मुझे जब भी मिलते थे, तो “सुरेश क्या तुम मुझे मेरा जीवन समाप्त करने के लिए मदद कर सकते हो ?” यही पुछते रहते थे. और मै उन्हें कहता था कि “पहले मुझे आप अपना जीवन क्यों समाप्त करना चाहते हो ? यह समझा दिजिए . क्योंकि कभी नहीं ऐसे संकट वर्तमान देश – दुनिया में रहते हुए, आप जैसे प्रतिभाशाली और संवेदनशील अनुभवी लोगों से इन समस्याओं को सुलझाने के लिए, हमें मार्गदर्शन करने के लिए आप लोग चाहिए. तो हम इतनी आसानी से आप जैसे लोगों को खोने की गलती क्यों करेंगे ?” और सचमुच ही इस के बाद 2007 मे नंदीग्राम-सिंगुर के विस्थापन के खिलाफ हुआ आंदोलन के समय उन्होंने धरना- प्रदर्शन और अखबारो में लिखने का बेहतरीन योगदान बंगला और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखने के कारण उस आंदोलन को बहुत बल मिला. और बादमे वह उम्र के कारण नैसर्गिक रूप से इस दुनिया से अपने बैठक के कमरे में टी वी पर क्रिकेट की मॅच देखते हूऐ बेठे- बैठे ही 87 साल की उम्र में बगैर किसी तकलीफ के इस दुनिया से शांति से चले गए.
दुसरे बुजुर्ग मित्र पुणे के समाजवादी विचारधारा के पत्नी के निधन के बाद अपनी संपत्ति सार्वजनिक दान कर के, अपने अंतिम दिनों में हमारे अपने ही लोगों द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल में रहने चले गए थे. और जब मै पुणे जाता था तो उन्हें मिलने के लिए अवश्य जाता था. और वह फिर अपने अकेलेपन की तक्रार मुझे बताया करते थे. और सबसे बडा डर विस्मृती की बिमारी होने का बताया करते थे. और मै उन्हें कहता था कि आपसे दस साल बडे ज्योति बसु अब शताब्दी की तरफ जा रहे हैं. और उनकी स्मृति यथावत है. और आप अभी मेरे साथ के वार्तालाप में साहित्य, समाज, राजनीति, फिलासफी से लेकर कुछ काॅमन मित्रों को लेकर की गई बातचीत मे मुझे कहीं भी लगा नहीं की आप को विस्मृती की बिमारी हुई है. आप बिल्कुल दुरुस्त है. हां कुछ गैरजरूरी चिजों को भूल जाना ही अच्छा है. क्योंकि हमारा मस्तिष्क कोई डस्टबीन तो नहीं है ना ? की हरतरह का कचरा उसमे डाला जाये ?
वैसे ही बाबा आमटेजी अपने जीवन के आखिरी पडाव मे चल रहे थे. तो मै उनसे मिलने के लिए आनंदवन मे विशेष रूप से गया था. उनके साथ जब भी मुलाकात होती थी ,तो वह मुझे पुनाह-पुनाह कहते थे कि “सुरेश मै विस्मृती की बिमारी से पीड़ित हो रहा हूँ,” और आज से चालीस साल के भी पहले से मेरी कालेज की पढाई की बातों का जिक्र किये बगैर उनके साथ बात पूरी नहीं होती थी. क्योंकि मेरे काॅलेज के अंतिम साल मै सामाजिक काम करने के कारण काॅलेज से रेस्टिगेट होने की बात शायद 1971-72 बाबा आमटेजी को भी मालूम थी. और वह इस बात का जिक्र हर मुलाकात में अवश्य करते थे. तो मै उन्हें कहता था कि इतनी पुरानी बाते आपको याद है.और आपको स्मृतिभ्रंश की बिमारी होने की चिंता बेवजह है .

आचार्य विनोबा भावे का प्रायोपवेशन (इच्छामृत्यू.)

इन सभी लोगों के परिप्रेक्ष्य में मुझे आचार्य विनोबा भावे का इस दुनिया से विदा होने का सबसे बेहतरीन उदाहरण. आज से 44 सालों पहले का बहुत ही अनुकरणीय दिखाई दे रहा है. विनोबाजीं की 15 नवंबर 1982 के दिन इच्छामृत्यु हुई है. उस समय उनकी उम्र 87 साल की थी .और कुछ शारिरिक समस्या की शुरुआत हो गई थी. तो उन्होंने कहा कि “इस दुनिया में मेरे उद्देश्य और उनके सांसारिक कर्तव्य अब पुरी तरह से समाप्त हो चुके हैं.” इसलिए उन्होंने 8 नवंबर से ही अन्न और जल तथा सभी तरह की दवाईयों का पूरी तरह से त्याग कर दिया था. यह देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी भी दिल्ली से 10 नवंबर के दिन अपने सभी कामों को छोड़ कर पवनार मे पहुंचकर आचार्य विनोबा भावे को खाने के लिए आग्रह किया था. लेकिन विनोबाजीं अपने निर्णय पर अडिग रहे. उनके पास सेवाग्राम मेडिकल काॅलेज के डॉक्टरों की पूरी टीम चौबीसों घंटे एक हफ्ते तक मौजूद थी. लेकिन विनोबाजीं ने कहा की मुझे जीवंत रखने के लिए कोई भी कोशिश नहीं करना है. इस तरह से विनोबाजीने एक हफ्ते तक अन्न- जल तथा दवाई नहीं लेते हूऐ, 15 नवंबर 1982 के दिन उनका शांतिपूर्वक अपना जीवन समाप्त करने का नजारा मैनें अपने आंखों से देखा है.उसके लिए मै भी कलकत्ता से विशेष रूप से पवनार आया हुआ था. अंतिम समय में जिस तरह से कोई भी शास्त्रीय संगीत की बढ़िया चिज सुनते हूऐ, अपने मन – शरीर के भितर जो संवेदना महसूस करता है. बिल्कुल उसी तरह के उनके पैरपर वह अपने हाथ से ताल लेते हूऐ, दिखाई दे रहे थे.

वैज्ञानिक शोध और बढती उम्र

विज्ञान के कारण अन्य चीजों के साथ मानव जीवन और मुख्यतः विभिन्न तरह की बीमारीयो पर काबू पाने के लिए काफी कुछ संशोधन हुआ है. और उसमें कामयाबी भी मिली है. उदाहरण के लिए दमा, डायबीटीस, टीबी, मलेरिया जैसे बिमिरीयोंपर इलाज और पेनिसिलिन जैसे दवाओं का शोध नही होने के कारण काफी बीमारीयो मे लोग मर जाते थे, आज वह उन बिमिरीयोंपर असरदार इलाज उपलब्ध होने की वजह से बचते हैं. और काफी समय तक जीते है. 21 वी शताब्दी की शुरुआत मे जापानी ‘हिबाकुशा’ (1945 के नागासाकी – हिरोशिमा के एटमबम के हमले से बचे हुए लोगों को जापानी भाषा में ‘हिबाकुशा’ बोला जाता है.) विश्व शांति का प्रचार-प्रसार करने के दौरान, मुझे उनके साथ भारत में कुछ जगहो पर कंपनी देने का मौका मिला था. तो मैंने देखा की 1945 की उस भिषण दुर्घटना के समय ‘हिबाकुशा’ की उम्र 8 – 10 साल की रही थी. जो भारत में आए, उस समय (2007-8) मतलब 80 प्लस थे . और बहुत उर्जा के साथ विश्व में शांति स्थापित करने के लिए अहिंसा का प्रचार-प्रसार करते हूऐ घुम रहे थे. भारत के बाद वह पाकिस्तान मे गए थे. आज भी उनकी याद उर्जा देती है.
दमा और डायबीटीस की आज उपलब्ध दवाओं का लाभ स्वामी विवेकानंद को या डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के समय मिला होता तो स्वामी विवेकानंद 39 उम्र ( जन्म 12 जनवरी 1863, मृत्यु – 4 जुलाई 1902 ) इस दुनिया से इतनी कम उम्र में नहीं गए होते. और वही बात डॉ. बाबा साहब की डायबीटीस की है. जिन्हें सिर्फ 65 साल की उम्र ( 14 अप्रैल 1891 जन्म – मृत्यु 6 दिसंबर 1956 ) में इस दुनिया से विदा होना पडा है. काश डायबेटिस की जो दवाइयां आज उपलब्ध है. वह 1956 मे भी होती. तो डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने भारत की जातिव्यवस्था समाप्त करने के लिए और भी कोशिश की होती.
लेकिन यह विज्ञान की देन है. या अभिशाप ? यह कुछ लोग जो अब तो उनके बढती हुई उम्र के कारण हताशा की वजह से उन्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा है. तो हमारे मुंबई के मित्र को मिलने के बाद मुझे भी इस विषय पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. और इसी कारण यह पोस्ट लिखने के लिए बाध्य हुआ हूँ. कुछ लोग इच्छामृत्यु की मुहीम चला रहे हैं. हमारे वरिष्ठ मित्र तथा समाजवादी नेता पूर्व शिक्षा मंत्री प्रोफेसर सदानंद वर्दे ने खुद विधायक रहने के दौरान महाराष्ट्र विधानसभा में उन्होंने इच्छामृत्यु का बिल पेश किया था. हालांकि काफी बहस के बाद बिल पास नही हो सका, यह अलग बात है. लेकिन मेरा इच्छामृत्यु की मुहिम को जबसे शुरू हुई है, तभी से समर्थन है. उसपर मराठी में एक लिमये नाम के सांगली के सज्जन की किताब भी उसी दौरान प्रकाशित हुई है . जैन धर्म मे बाकायदा इच्छामृत्यु का प्रावधान है.

जैन धर्म में इच्छामृत्यु संथारा – या सल्लेखना या प्रायोपवेशन.

जैन धर्म मे जिस व्यक्ति को मृत्यु के निकट होने पर या कोई लाइलाज बीमारियां और वृद्धावस्था मे धीरे – धीरे अन्न – जल का त्याग करना इसके लिए आचार्य या गुरु की अनुमति लेकर. किसी अध्यात्मिक गुरु या मुनि आचार्य के मार्गदर्शन में, व्रत शुरू करने से पहले. साधक अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों और समाज के लोगों से अपनी तरफ से जाने अनजाने में किऐ गए अपराधो की क्षमा मांगता है. उसके बाद भोजन और पानी को बहुत ही धीरे – धीरे और क्रमबद्ध तरिके से कम किया जाता है. सबसे पहले ठोस आहार को छोड़ कर, दलिया या हल्के पदार्थो का सेवन किया जाता है. मेरे सार्वजनिक जीवन के परिचय की अकोला की मुल निवासी डाॅ. प्रमिला जैन जिनका अकोला मे नर्सिंग होम था. जिसमें मुझे आपातकालीन परिस्थिति में अंडरग्राउंड रहने के दौरान उन्होंने मुझे छुपाकर रखने के लिए मदद की थी. जो बाद में जैन साध्वी के रूप में दिक्षित हो गई थी. और उन्होंने अपने वृद्धावस्था में प्रायोपवेशन (इच्छामृत्यु) प्रक्रिया के दौरान मुझे याद करते हुए. विशेष रूप से आमंत्रित किया था. और मैं उन्हें मिलने के लिए जैनियों के मठ में गया था. तो उन्होंने मुझे उनका बॉडीवेट और बीपी चेक करने के लिए कहा था. तो 21 किलो बॉडीवेट और बीपी नॉर्मल था. और उन्होंने मुझे कहा की ” सुरेश फिलहाल सिर्फ मैने ठोस पदार्थों का सेवन बंद किया है, कलपरसो दिपावली है, इसलिए मैं सिर्फ तरल पदार्थ ही ले रही हूँ. और दिपावली के पावन पर्व के पश्चात ही मै तरल पदार्थ भी बंद करुंगी.” और सचमुच ही दिपावली के दो तीन दिन के पश्चात उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे.

जपानी उम्रदराज लोगों की जिवनशैली

मेरे एक पत्रकार मित्र किसी फेलोशिप पर जापान में जाकर आने के बाद, मैंने उनके अनुभव सुनने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया था. तब उन्होंने कहा “जापान के एक संपूर्ण गाँव को ही मैने सौ साल से भी अधिक उम्र के लोगों के गाँव के रूप में देखा है. और वह सभी मिलजुलकर गाँव की साफ – सफाई करने से लेकर अपना सामुदायिक भोजनालय तथा लाँड्री तथा अपने जरुरत के फल, साग-सब्जी, अन्न को उगाने से लेकर सभी काम करते हैं. और सबसे खास बात देखा हूँ कि सभी लोग खुश – मिजाज दिखाई दे रहे थे.” और इससे एकदम उल्टा हमारे भी देश में सीनियर सिटीजन की समस्याओं पर कुछ फिल्मों तथा नाटकों का मंचन किया जा रहा है. और 145 करोड की आबादी में एक चौथाई से अधिक जनसंख्या बुजुर्ग लोगों की है . और अब वह भी एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में बढती जा रही है. जीस देश में नवजात शिशुओं तथा युवाओं के लिए कोई नियोजन नही है, वहाँ पर उम्र दराज लोगों के लिए क्या उम्मीद करेंगे ? फिर भी मेरा भारत महान.

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