भारत और पाकिस्तान के बीच अभी तक चार प्रमुख युद्ध हुए हैं। 1947-48 में जम्मू-कश्मीर के विलय और कबाइली घुसपैठ के कारण हुआ; दूसरा 1965 में पाकिस्तान के ‘ऑपरेशन ज़िब्राल्टर’ और कश्मीर पर कब्ज़े के प्रयास से शुरू हुआ और जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के साथ यह समाप्त हुआ। 1971 का तीसरा युद्ध पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) के संकट और मुक्ति संग्राम के कारण लड़ा गया था, जिसमें पाकिस्तान की हार हुई और उसने अपने 93 हज़ार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया। बांग्लादेश का एक नए राष्ट्र के रूप में अभ्युदय हुआ। इस युद्ध में जीत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया कि भारत को कमज़ोर समझने की कोई भूल न करे। मुक्तिवाहिनी भारतीय सैनिकों की मदद से ही बांग्लादेश के निर्माण में कामयाब हुई। आज बांग्लादेश के हुक्मरानों के रवैये को आप क्या कहेंगे! आज का मेरा आलेख 1971 के युद्ध और शिमला समझौते पर आधारित है। 1999 का चौथा युद्ध करगिल और द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा घुसपैठ के कारण हुआ। भारत ने अपनी चौकियों को वापस छीना और यह भारत की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ।
इन सभी युद्धों से किसी न किसी रूप से मेरा सरोकार रहा है—कुछ से युद्ध के दौरान, तो कुछ से युद्ध के बाद। 1947-48 के युद्ध के समय तो हम लोग रावलपिंडी से निकलकर अपने पुनर्वास की व्यवस्था में जुटे थे; लेकिन बाद में मैंने भारत के कश्मीर के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग दो तिहाई हिस्से (कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख) को देखा, जबकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गिलगित और बालतिस्तान के मुज़फ़्फ़राबाद को भी पूरी तरह से देखा है। अपने कश्मीर का मैंने वह क्षेत्र देखा जहाँ तक पाकिस्तानी कबाइली घुस आए थे, जिन्हें भारतीय सैनिकों ने पीछे खदेड़ दिया था। 1990 में पाकिस्तान के अपने दौरे के दौरान मैंने पाक अधिकृत कश्मीर का प्रमुख नगर मुज़फ़्फ़राबाद देखा, जहाँ कोई भी कश्मीरी भाषी नहीं था, सभी लोग पंजाबी बोलते हैं। वहाँ के लोग अलबत्ता यह कह रहे थे कि अगर महाराजा कर्णसिंह फिर से सदर-ए-रियासत बन जाएँ, तो वे अपने छोड़े हुए देश में वापसी कर सकते हैं। भारत लौटने पर जब मैंने डॉ. कर्णसिंह से वहाँ के लोगों की भावनाओं का उल्लेख किया, तो वह हँस पड़े। बोले, “सदर-ए-रियासत का पद तो मैं कब का त्याग चुका हूँ।” बहरहाल, आजकल कश्मीर अधिकृत क्षेत्र में पाकिस्तान सरकार की नीतियों के प्रति लोगों के विरोध के स्वर बहुत मुखर हो रहे हैं। उनके विद्रोही तेवरों को कुचलने की सरकार की तरफ से तमाम कोशिशें हो रही हैं। बहुत से लोगों के मारे जाने की भी खबरें हैं।
दूसरा और तीसरा युद्ध मैंने देखा, कवर किया और दोनों देशों के बीच अमन होने के बाद भी पाकिस्तान गया। वहाँ मैंने झाड़ियों से ढकी इचोगिल नहर भी देखी, जिसे 1965 में पारकर भारतीय सेना लाहौर में प्रवेश कर गयी थी। लाहौर का बाटा का वह शोरूम भी देखा, जहाँ तक हिंदुस्तानी फौज पहुँच गयी थी। वहाँ से मुश्किल से आठ किलोमीटर दूर ही मेन लाहौर रह गया था। इससे पहले कि हिंदुस्तानी फौज लाहौर में प्रवेश करती, युद्धविराम का ऐलान हो गया था। मैंने ताशकंद का वह स्थान भी देखा है, जहाँ सोवियत संघ के प्रधानमंत्री अलैक्सी कोसीगिन की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौता हुआ था। शास्त्री जी की याद में वहाँ हिंदी पढ़ाने के लिए एक स्कूल था और उनकी अर्द्ध-प्रतिमा भी। सबसे पहले मैं द्रास और करगिल 1969 में गया था, जहाँ करगिल में पाकिस्तानी सैनिकों को सीमा की गश्त लगाते हुए देखा और चांगला चुशूल में चीनी सैनिकों को भी। 1999 की जंग खत्म होने के बाद भी गया था।
यही स्थिति 1971 के युद्ध की थी। युद्ध भी कवर किया। पाकिस्तानी जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाज़ी को आत्मसमर्पण कराने वाले जनरल जगजीतसिंह अरोड़ा से भी कई बार मिला और अमृतसर में जन्मे पंजाबी पारसी फील्ड मार्शल सैम मानेकशा से भी। और मैं मिला सांसद पीलू मोदी से कई बार, जो भारत और पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के चश्मदीद गवाह थे। पीलू मोदी से इस विषय पर मेरी लंबी मुलाकातें हुईं। वह कहते थे कि जितना वक़्त मैंने और ज़ुल्फी (पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फिकर अली भुट्टो को वह ऐसा ही संबोधित करते थे) ने एक साथ गुज़ारा, उतना उसने इंदिरा गांधी से समझौता वार्ता में भी नहीं गुज़ारा होगा।
शिमला समझौते के ऐलान के बाद पीलू मोदी जब दिल्ली लौटे, तो उनसे मिलने के लिए पत्रकारों की लाइन लग गयी। वह यह कहकर कि मुझे कुछ विश्राम करना है या और कोई बहाना बनाकर पत्रकारों को टरका दिया करते थे। हमारे संपादक रघुवीर सहाय ने भी किसी सहयोगी को पीलू मोदी से मिलने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी, शायद उन्होंने स्वयं भी प्रयास किया था। जब मेरे सहयोगी अपने प्रयासों में असफल रहे, तो एक दिन सुबह ऑफिस में घुसते ही संपादक जी मेरे टेबल पर आकर बोले कि आप मेरे कक्ष में तुरंत आ जाएँ। अब संपादक का आदेश मैं कैसे टाल सकता था! उनके पीछे-पीछे ही उनके कक्ष में पहुँच गया। मुझे बैठने का इशारा करते हुए बोले कि आपने ‘दिनमान’ के लिए बहुत सी एक्सक्लूसिव स्टोरीज़ की हैं जो बहुत चर्चित रही हैं। मेरी सलाह है कि आप पीलू मोदी से मिलकर शिमला समझौते, उसकी पृष्ठभूमि और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो से उनकी दोस्ती आदि पर एक बढ़िया सी और विस्तृत कवर स्टोरी बनाएँ। मैंने मुस्कुराते हुए उनसे पूछ लिया कि क्या यह काम इतना आसान है? अभी कल ही तो वह शिमला से लौटे हैं, सुस्ता रहे होंगे। मुझसे भला वह क्योंकर मिलेंगे? लेकिन रघुवीर जी ने पूरे विश्वास से इस बात पर ज़ोर देकर कहा कि ‘वह आपसे ही मिलेंगे सबसे पहले, किसी दूसरे पत्रकार से नहीं’। न जाने मेरे संपादक को मुझ पर इतना भरोसा क्यों था!
संपादक के कक्ष से जब मैं बाहर निकला, तो मेरी सहयोगी बनाम मित्र श्रीमती शुक्ला रुद्र ने पूछा, “क्या हुआ? सहाय जी बड़ी हड़बड़ी में आपको बुलाकर ले गए थे।” मैंने उन्हें सारी बात बता दी। वह मुस्कुराईं और बोलीं, “मुझे भी आप पर भरोसा है। चलिए, पीलू मोदी के यहाँ जल्दी से फोन लगाइये और काम पर जुट जाइये।” मेरे पास उनका फोन नंबर कहाँ है, डायरेक्टरी से देखना पड़ेगा। उन दिनों फोन नंबर तलाशने के लिए फोन डायरेक्टरी हुआ करती थी। अब वह ज़ोर से हँसीं और बोलीं, “आप जल्दी से निकालिए अपनी डायरी और फोन मिलाइए। आप मुझसे कुछ छुपा नहीं सकते।” क्योंकि मैं पीलू मोदी को थोड़ा-बहुत पहले से जानता था, इसकी जानकारी श्रीमती शुक्ला रुद्र को थी। उन दिनों मोबाइल फोन तो होते नहीं थे; टेलीफोन एक्सचेंज की सहायता लेनी पड़ती थी। कई जगह जीरो सुविधा होती थी, यानी जीरो घुमाने से डायल टोन मिल जाती थी। ‘दिनमान’ में भी ऐसा एक फोन था, जिससे मैंने पीलू मोदी का फोन मिलाया। फोन उनके निजी सचिव कनु ने उठाया और पीलू मोदी को बज़र देकर पूछा कि दीप जी का फोन है! उधर से स्वीकृति मिलने पर कनु ने कहा कि लीजिए, साहब से बात कीजिए। लैंडलाइन में ऐसी ही व्यवस्था होती थी। मुख्य फोन अमूमन निजी सचिव के पास रहा करता था, जो भीतर घंटी देकर आगंतुक के बारे में साहब से पूछा करता था। उधर से आवाज़ आयी, “बोलो दीप, क्या बात है!” मैंने कहा कि मुझे मिलना है आपसे, आज ही। “ठीक है, शाम को आ जाओ।” मैंने पूछा, “चाय पर या…” पीलू मोदी ने कहा कि “आज चाय पर, फिर कभी जब पूरी तरह से थकान उतर जाएगी तो…” मैं करीब पाँच बजे उनके लोदी एस्टेट आवास पर पहुँच गया। देखा, एक बड़े से सोफे में धँसे बैठे थे। बैठे-बैठे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया। वह इतने मोटे थे कि उनके लिए सोफे से उठना आसान नहीं था। बोले, “आज कोई नयी बात करनी है क्या!” मैंने कहा कि “जी, शिमला समझौता और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो से आपकी दोस्ती की बाबत।” वह बोले, “तुम्हें मालूम है कि इस विषय पर मैंने किसी पत्रकार से बात नहीं की है, तुम्हारे संपादक से भी नहीं।” मैंने पीलू मोदी से कहा कि “मैं कोई नहीं हूँ, यह आप बखूबी जानते हैं।”
खैर, वह मुझसे बातचीत करने के लिए राज़ी हो गए और बोले, “कहाँ से शुरू करोगे?” मैंने कहा कि दून स्कूल से लेकर बंबई (वर्तमान मुंबई) और बर्कले तक आपकी और ज़ुल्फिकर अली भुट्टो की दोस्ती के पार्श्व में, जो आज तक पुख्ता है, उस बाबत। उस बारे में भी आपके अदन जाते हुए आठ साल बाद सुबह तीन बजे भुट्टो से कराची एयरपोर्ट के वीवीआईपी लाउंज में आप दोनों की मुलाक़ात से लेकर ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के बारे में आपके इंटरव्यू तक। मैंने वह इंटरव्यू भी पढ़ रखा है और भुट्टो के जवाब से भी मैं परिचित हूँ। लेकिन आज सिर्फ शिमला समझौते पर ही बात करूँगा। शिमला पहुँचने के लिए आपको किन-किन दुश्वारियों से होकर गुज़रना पड़ा?
पीलू मोदी हँसे और बोले, “तुम्हें अदन और कराची में भुट्टो से मिलने की खबर कहाँ से मिली!” मैंने कहा कि आपसे। आपने ही तो एक बार बताया था कि अदन में बैंक ऑफ़ इंडिया की बिल्डिंग की डिज़ाइन का मुझे ज़िम्मा सौंपा गया है, जिसके सिलसिले में मुझे कई बार अदन जाना पड़ेगा वाया कराची। अदन का उन दिनों बहुत महत्त्व था। वहाँ के सभी मुकद्दमों की सुनवाई बंबई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.सी. छागला किया करते थे। इसीलिए जस्टिस छागला ने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऑफर ठुकरा दिया था। पीलू मोदी ने कहा कि अभी हम अतीत की ज़्यादा बातचीत नहीं करेंगे। बस इतना जान लो कि मैं देहरादून के दून स्कूल में पाँच साल गुज़ारने के बाद जब मुंबई लौटा, तो मुझे सभी कुछ बहुत नीरस और असहज लग रहा था और मैं एकाकीपन महसूस कर परेशान हो रहा था। कुछ समय के बाद हम लोग दिल्ली गए। मेरे माता-पिता अपने सपनों का एक घर बनाना चाहते थे। इसके लिए एक आर्किटेक्ट (वास्तुकार) को बुलाया गया। उसने कुछ डिज़ाइन दिखाए जो मेरी माँ को नहीं रुचे। लेकिन मुझे इसका फ़ायदा यह हो गया कि मेरी रुचि आर्किटेक्ट बनने के प्रति हो गयी। लिहाज़ा मैंने मुंबई में जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में एडमिशन ले लिया। यहीं मेरी मुलाक़ात एक बार फिर ज़ुल्फिकार से हो गयी। अब हम लोगों के दिन की शुरुआत सुबह 7:30 बजे बैडमिंटन और स्क्वैश से होती। उसके बाद हम लोग करीब एक बजे तक तैराकी करते। घर आकर लंच करते। ज़ुल्फी भी अमूमन मेरे साथ होता। उसके बाद फिर निकल जाते, सिनेमा देखते और शाम को पूल के किनारे वक़्त गुज़ारते और डिनर हम लोग साथ-साथ ही करते। उसके बाद टहलने के लिए निकल जाते और आधी रात के करीब अपने-अपने घर जाते। हम दोनों के घर आसपास ही थे।
हमारी दोस्ती की कहानी बहुत लंबी है, जो मैं तुम्हें बाद में विस्तार से बताऊँगा। मैंने तुम्हें कुछ झलकियाँ दिखा दी हैं। 1971 के युद्ध के बाद अब जब भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य करने की दिशा में बातचीत करने पर सहमति बनी, तो मैंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि मैं दिल्ली में अपने घर भुट्टो और अपने कुछ पुराने साथियों के साथ एक पार्टी करना चाहता हूँ, कृपया इसकी अनुमति प्रदान करें। क्योंकि इंदिरा गांधी का विदेश जाने का कार्यक्रम था, इसलिए मैंने दो हफ्ते पहले ही अपना अनुरोध दर्ज करा दिया। इस पत्र की एक प्रति मैंने विदेशमंत्री सरदार स्वर्ण सिंह को भी भेज दी। जब पंद्रह दिनों तक कहीं से कोई जवाब नहीं आया, तो मैंने सरदार स्वर्णसिंह को फोन किया। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच शांति वार्ता शिमला में होने वाली है, वहाँ ऐसे मिलन की कोई गुंजाइश नहीं। खैर, क्या मैं अपने दोस्त से मिलने के लिए शिमला आ सकता हूँ? स्वर्णसिंह का उत्तर था कि इस आशय का अनुरोध पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो की ओर से आना चाहिए। मैंने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है।
अभी मैं ऊहापोह की स्थिति में था कि मेरे मित्र गौतम खन्ना ने फोन करके बताया कि राय बहादुर मोहन सिंह ओबेराय अगले दिन सुबह शिमला जा रहे हैं, क्या वीना और मैं भी उनके साथ चल सकते हैं! मैंने बिना हिचक के अपनी सहमति दे दी और हम लोग अगले दिन दोपहर 3:30 बजे शिमला पहुँच गए। जब सरदार स्वर्णसिंह से मेरा संपर्क नहीं हो पाया, तो मैंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के सैन्य सचिव को अपने शिमला पहुँचने की खबर दे दी। मेरा संदेश मिलते ही भुट्टो ने अपने एक सुरक्षा अधिकारी के साथ मुझे लेने के लिए कार भेज दी। मैं और वीना उनसे मिलने के लिए हिमाचल भवन पहुँच गए। वहाँ हम करीब ढाई घंटे रहे और अपने पुराने दिनों को याद किया और एक-दूसरे के परिवार की भी कुशलक्षेम पूछी और जानी। यह बात 28 जून, 1972 की है। क्योंकि शिखर वार्ता का कोई अता-पता नहीं था, इसलिए अगले दिन हम लोग सुबह 11 बजे से 3:30 बजे तक एक साथ रहे पुरानी मधुर यादों में खोये हुए।
इस बीच शिमला में एकत्र देश-विदेश के करीब तीन सौ पत्रकारों में बेचैनी बढ़ रही थी। कुछ पत्रकारों ने मुझसे संभावित शिखर वार्ता के बारे में जब पूछा, तो मैंने उन्हें बताया कि मैं यहाँ शिमला में अपने पुराने दोस्त से मिलने के लिए आया हूँ। क्योंकि पत्रकारों ने भुट्टो और हमारी साढ़े छह घंटे की निजी मुलाक़ात देख ली थी, उन्हें शायद यह गलतफहमी हो गयी थी कि मैं दोनों नेताओं के बीच होने वाली शिखर वार्ता से परिचित हूँ। जब तीसरे दिन भी शिखर वार्ता होने के कोई आसार नहीं दीखे, तो स्वतंत्र पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते मैंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता की पहल का स्वागत किया। मैंने आशा व्यक्त की कि “इस शिखर वार्ता से दोनों देशों के बीच शांति और मैत्री के मज़बूत और स्थायी संबंध स्थापित होंगे। अब यही एकमात्र रास्ता है दक्षिण एशिया को बड़ी शक्ति की राजनीति से दूर रखने का।” क्योंकि भारत-पाकिस्तान के बीच गहरे संदेह और शंकाएँ हैं, मुझे नहीं लगता कि नौकरशाह इस पर पार पा सकते हैं। लिहाज़ा इस पर श्रीमती इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को एक बंद कमरे में अकेले में बैठकर सभी तरह के पुराने शक-शुबहों पर खुले मन से बात करनी चाहिए ताकि ये संशय हमेशा के लिए समाप्त हो जाएँ।
उस दिन राष्ट्रपति ने हमें डिनर पर आमंत्रित किया, जहाँ हम लोगों ने शुद्ध विश्राम और मस्ती के मूड में तीन घंटे बिताये। भुट्टो की बेटी बेनज़ीर भी उस डिनर में शामिल थी। चौथे दिन मैं बीमार हो गया और बिस्तर पर ही पड़ा रहा। मुझे पता चला कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत शुरू हो गयी है, जिसके चलते भुट्टो और उनका प्रतिनिधिमंडल सारे दिन मसरूफ रहा। एकबारगी मुझे ऐसा लगा कि शिखर वार्ता असफल हो गयी है और इस बातचीत में कुछ भी हासिल नहीं हुआ। परम्परानुसार आखिरी दिन राष्ट्रपति भुट्टो ने श्रीमती गांधी के सम्मान में विदाई रात्रि भोज दिया, जिसमें गैरसरकारी लोगों में मुझे और वीना को भी आमंत्रित किया गया।
डिनर खत्म होते-होते श्रीमती गांधी और भुट्टो अचानक उठे और समाधान की दिशा में एक और प्रयास करने का निर्णय किया। लिहाज़ा माहौल में एक अलग तरह की ऊर्जा कौँध गयी। दोनों ओर के अधिकारियों के चेहरों पर उम्मीद की किरण तैर गयी। भुट्टो के लोग रिसेप्शन रूम तथा श्रीमती गांधी के बिलियर्ड रूम में जमा हो गए। इस बीच प्रेस तक भी यह खबर पहुँच गयी थी। वे लोग भी कभी रिसेप्शन रूम में जाते तो कभी बिलियर्ड रूम में। अचानक बिलियर्ड रूम का दरवाज़ा खुला। देखा, जगजीवन राम बिलियर्ड टेबल पर बैठे हैं, श्रीमती गांधी झुक कर उनसे कुछ कह रही हैं—शायद संधि के प्रारूप के बारे में। यशवंतराव चव्हाण और फ़हरुद्दीन अली अहमद जैसे वरिष्ठ मंत्रियों के साथ नौकरशाहों की टीम ने भी उस टेबल को घेर लिया। कैसा असाधारण दृश्य था वह! काश किसी फोटोग्राफर ने वह ऐतिहासिक फोटो ले ली होती। आखिरकार 10:45 बजे अंतिम प्रारूप तैयार हो गया।
अचानक पता चला कि हिमाचल भवन में इलेक्ट्रिक टाइपराइटर नहीं है। वह ओबेराय क्लार्कस होटल से मंगाया गया। इस बीच मेहमानों और पत्रकारों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। मैं अपने आप को रोक न सका और कहा कि यह संभवतया पहली संधि है, जिस पर ओबेराय क्लार्कस होटल की स्टेशनरी पर दस्तखत हुए। क्योंकि पाकिस्तान सरकार की सरकारी सील गलती से वहाँ के भारी सामान के साथ पैक होकर चली गयी थी, लिहाज़ा दोनों तरफ से बिना सरकारी मोहर के दस्तखत हुए। संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद खूब शोर-शराबा था। इस बीच कोई ऊँची आवाज़ में पूछ रहा था कि ऑल इंडिया रेडियो और फिल्म्स डिवीज़न कहाँ हैं, जबकि दुनिया भर के पत्रकार यहाँ जमा हैं। उन्हें बार-बार बुलाया गया। मुझे नहीं लगता कि ऑल इंडिया रेडियो और फिल्म्स डिवीज़न ने समय पर इसे कवर किया हो। उस दिन तो कमाल हो रहा था। लगता है सभी नौकरशाहों के हाथ-पाँव फूल गए थे। संधि पर विधिवत हस्ताक्षर करने के लिए टेबलों को जोड़ा जा रहा था, तो कहीं नौकरशाह उन पर टेबल क्लॉथ बिछा रहे थे। जब संधि पर हस्ताक्षर करने का समय आया, तो भुट्टो की सरकारी कलम सूखी पायी गयी और उन्होंने किसी से कलम उधार लेकर दस्तखत किए। उसके बाद भुट्टो श्रीमती गांधी को उनकी कार तक छोड़ने के लिए गए। लौटकर मुझसे और वीना से बोले, “चलो, संधि को सेलिब्रेट किया जाए।” हम सब उनके कक्ष में पहुँच गए।
ज़ुल्फिकार अली भुट्टो बेशक बहुत राहत महसूस कर रहे थे। उन्होंने मुझे संधि की प्रति देकर मेरी राय मांगी। उस समझौते को देखने वाला मैं तीसरा व्यक्ति था। पहले तो मैं सरसरी निगाह से उसे देख गया, फिर उससे उत्पन्न होने वाली संभावित पेचीदगियों को ध्यान में रखते हुए उसे गंभीरता से पढ़ा। मुझे संधि ठीक ही लगी। मैंने इतना भर कहा कि दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हो, इससे बढ़कर और क्या अच्छी बात हो सकती है! इधर मैं संधि पढ़ रहा था और बाहर तीन सौ के आसपास पत्रकार संधि की प्रति पाने को बेकरार हो रहे थे। 2 जुलाई, 1972 को भुट्टो और श्रीमती गांधी ने शिमला समझौते पर रात करीब 11 बजे दस्तखत किए थे। पत्रकारों को अगले दिन यानी 3 जुलाई को सुबह 9:30 बजे बुलाया गया। भुट्टो ने मुझसे इस शांति समझौते पर होने वाले ‘बवाल’ से निपटने पर भी चर्चा की। उन्हें धुर कट्टरपंथियों के विरोध का खतरा था और कुछ ऐसे आलोचकों का भी, जो 1965 के ताशकंद समझौते और शिमला समझौते को एक धरातल पर रखकर देखते हैं। हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि पाकिस्तान और भारत दोनों जगह इस शांति संधि का विरोध करने वालों की एक जमात ज़रूर पैदा हो जाएगी। भुट्टो के लिए अब विभाजित पाकिस्तान के लोगों में पुनः विश्वास की भावना पैदा करना आसान काम नहीं था। उसका एक भाग उससे अलग हो चुका था और 93 हज़ार सैनिक भारत में युद्धबंदी थे। उस मुल्क के लिए इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है! युद्धबंदियों के परिवारों का दबाव अलग से था। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारत से सम्मानजनक शांति समझौता बेशक पाकिस्तान के लिए एक उपलब्धि थी। लेकिन क्या इस समझौते का दोनों देशों में स्वागत हुआ? शायद नहीं।
शिमला समझौते की मुख्य बातें हैं: भारत और पाकिस्तान सरकार ने संकल्प लिया है कि दोनों देश उन संघर्षों और टकरावों को समाप्त करेंगे जिन्होंने अब तक उनके संबंधों को प्रभावित किया है और उपमहाद्वीप में मैत्रीपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने तथा स्थायी शांति की स्थापना के लिए काम करेंगे ताकि दोनों देश अब से अपने संसाधनों और ऊर्जा को अपने लोगों के कल्याण को आगे बढ़ाने के महत्वपूर्ण कार्य में लगा सकें। दोनों देशों की सरकारों के बीच सहमति के अनुसार अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से द्विपक्षीय वार्ताओं या किसी अन्य शांतिपूर्ण साधन से सुलझाने के लिए संकल्पित हैं, जिस पर वे आपस में सहमत हों। दोनों देशों के बीच किसी भी समस्या के अंतिम समाधान तक, कोई भी पक्ष एकतरफा तरीके से स्थिति को नहीं बदलेगा और दोनों देश शांति और सामंजस्यपूर्ण संबंधों को बनाए रखने के लिए हानिकारक किसी भी कार्य के आयोजन, सहायता या प्रोत्साहन को रोकेंगे।
दोनों देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का सम्मान तथा एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। पिछले 25 वर्षों से दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करने वाले मूल मुद्दों और संघर्ष के कारणों को शांतिपूर्ण साधनों से सुलझाया जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र के अधिकारपत्र के अनुसार दोनों देश एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल के प्रयोग या धमकी से बचेंगे और संप्रभु समानता का सम्मान करेंगे।
दोनों सरकारें अपनी शक्ति के भीतर सभी कदम उठाएंगी ताकि एक-दूसरे के खिलाफ शत्रुतापूर्ण प्रचार को रोका जा सके। दोनों देश ऐसी जानकारी के प्रसार को प्रोत्साहित करेंगे जो उनके बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के विकास को बढ़ावा दे। दोनों देशों के बीच संबंधों को धीरे-धीरे पुनर्स्थापित और सामान्य बनाने के लिए, यह सहमति हुई कि संचार, डाक, तार, समुद्री, स्थल, सीमा चौकियों सहित और हवाई लिंक, जिसमें उड़ानें भी शामिल हैं, को फिर से शुरू करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। एक-दूसरे देश के नागरिकों के लिए यात्रा सुविधाओं को बढ़ावा देने के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे
आर्थिक और अन्य सहमत क्षेत्रों में व्यापार और सहयोग को जहाँ तक संभव हो फिर से शुरू किया जाएगा। विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्रों में आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जाएगा। इस संबंध में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल समय-समय पर मिलकर आवश्यक विवरण तैयार करेंगे। स्थायी शांति की स्थापना की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सरकारें इस बात से सहमत हैं कि—
भारतीय और पाकिस्तानी सेनाएँ अंतर्राष्ट्रीय सीमा के अपनी-अपनी ओर वापस ले ली जाएँगी। जम्मू और कश्मीर में 17 दिसंबर, 1971 को युद्धविराम के बाद की नियंत्रण रेखा का दोनों पक्षों द्वारा सम्मान किया जाएगा, बिना किसी पक्ष की मान्य स्थिति को प्रभावित किए। कोई भी पक्ष इसे एकतरफा तरीके से बदलने का प्रयास नहीं करेगा, चाहे आपसी मतभेद और कानूनी व्याख्याएँ कुछ भी हों। दोनों पक्ष आगे यह वचन देते हैं कि वे इस रेखा का उल्लंघन करते हुए बल के प्रयोग या धमकी से बचेंगे। यह वापसी इस समझौते के लागू होने के साथ शुरू होगी और इसकी 30 दिनों की अवधि के भीतर पूरी कर ली जाएगी। यह समझौता दोनों देशों द्वारा उनकी संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार अनुसमर्थन के अधीन होगा और उस तारीख़ से लागू होगा जब अनुसमर्थन के दस्तावेजों का आदान-प्रदान होगा।
शिमला समझौते के बारे में विस्तृत जानकारी देने के बाद पीलू मोदी ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में बताया कि 1946 में मैं अमेरिका की कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के बर्कले में आर्किटेक्ट की डिग्री के लिए भर्ती हो गया। यहाँ भी ज़ुल्फी मेरे साथ था—मेरा रूममेट। वह राजनीति शास्त्र की पढ़ाई कर रहा था। आप कह सकते हैं कि ज़ुल्फी का और मेरा बचपन और कुछ हद तक जवानी के दिन एक साथ गुज़रे। दोस्ती हम लोगों की पक्की थी, लेकिन विचार अलग-अलग। वह 30 बरस की उम्र में पाकिस्तान का मंत्री बन गया—पहले कॉमर्स और बाद में विदेश मंत्री, जनरल अयूब खान की सरकार में। पीलू मोदी की बर्कले में वास्तुकला की अपनी साथी लवीना कोलगन से पहले दोस्ती हुई और बाद में शादी। वह लवीना से वीना हो गयीं।
पीलू मोदी (14 नवंबर, 1926 – 29 जनवरी, 1983) ने भारत लौटकर चंडीगढ़ के कैपिटल प्रोजेक्ट में ल कॉर्बुज़िए (Charles-Édouard Jeanneret / Le Corbusier) के साथ काम किया। 1953 में पीलू मोदी ने चर्चगेट के स्टेडियम में ‘मोदी और कोलगन’ की स्थापना की। उन्हें पहला काम मरीन लाइन्स में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी के वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए फ्लैट डिज़ाइन करने के लिए मिला, लेकिन उसको शुरू करने के लिए छह महीने तक इंतज़ार करना पड़ा। उनमें एयर कंडीशनिंग का काम ब्लू स्टार को सौंपा गया। पीलू मोदी द्वारा डिज़ाइन की गयी इमारतों में टेलीकॉम कार्यालय, भारत बिजली, मुकंद आयरन एंड स्टील, सैंडोज़, वोल्टास, डाइनर्स क्लब और बिज़नेस सर्विस सेंटर के मुख्यालय शामिल हैं। क्योंकि पीलू मोदी बहुत ही जिज्ञासु, व्यावहारिक और नए-नए विचारों को आज़माने के लिए उत्सुक रहते थे, उन्होंने दिल्ली में स्थित भारत की पहली बहुमंज़िला प्रीकास्ट इमारत ‘ओबेराय भवन’ का डिज़ाइन तैयार किया। यह एक मजेदार परियोजना थी। बीमों को बैलगाड़ियों के बीच लटकाकर साइट पर पहुँचाया गया, जिन पर लालटेन की रोशनी पड़ रही थी।
पीलू मोदी बताते हैं कि उन्होंने 1960 में राजनीति में उतरने का मन बनाया और वह स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए, जिसका गठन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने किया था। उनके समर्थक उस समय कांग्रेस शासन के कट्टर विरोधी थे, जब सार्वजनिक चर्चा समाजवाद के इर्द-गिर्द घूमती थी। उन्होंने नेहरूवादी विचारधारा को नकार दिया। पारसी धर्म को मानने वाले पीलू मोदी भारत में उदारवादी व मुक्त आर्थिक नीतियों के समर्थक थे। वह देश की सरकार को समाजवादी राह पर चलकर पतन की ओर जाने वाला कदम मानते थे। “क्या राजनीति में आने में आपके पिता सर होमी मोदी (23 सितम्बर, 1881 – 9 मार्च, 1969) की भी कोई भूमिका थी?” वह इसलिए कि वह राजनीति में बहुत सक्रिय थे। वह चौदह वर्षों तक भारतीय विधानसभा के सदस्य रहे (1929-1943) तथा संविधान सभा के भी सदस्य (1948-1949) रहे और उत्तर प्रदेश के पहले राज्यपाल (1949-1952) थे तथा उनका राजनीतिक क्षेत्रों में बहुत सम्मान था। मैं उनसे 1964 में मिला था, तब मैं लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के निजी सचिव के तौर पर काम कर रहा था। पीलू मोदी ने बताया कि उनके पिता की तो नहीं, मीनू मसानी ने अलबत्ता उन्हें परामर्श दिया था। वह भी स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से थे और राजकोट से चुनाव लड़ते और जीतते थे। पीलू मोदी ने अलबत्ता मुझसे एक सवाल पूछा कि “आप तो मेरे पिताजी से मिल चुके हैं, क्या उन्होंने मेरे राजनीति में आने के बारे में ज़िक्र किया था?” मैंने पीलू मोदी को बताया कि मन से वह चाहते थे कि आप राजनीति में आएँ।
1967 में पीलू मोदी गोधरा से लोकसभा के लिए निर्वाचित होकर एक उत्साही सांसद बने। उन्होंने एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने पर ज़ोर दिया। इसके फलस्वरूप 1972 का वास्तुकार अधिनियम बना, जिसके कारण उनके पेशे को मान्यता दी गयी और इसे नियमों और विनियमों के साथ सुरक्षित किया। इससे पहले वास्तुकारों और इंजीनियरों को एक ही समूह में रखा गया था। पीलू मोदी ने सार्वजनिक जीवन और डिज़ाइन करियर को समान उत्साह के साथ संतुलित किया। भवन योजनाओं को बनाने की उनकी शैली विशिष्ट थी। एक बार उन्होंने बताया कि वह सदा लीक से हटकर काम करते हैं, इसलिए सराहे जाते हैं। राजनीति में आने पर भी उन्होंने अपनी उदार और स्वतंत्र सोच को बरकरार रखा। पीलू मोदी ने जिस बेबाकी से मुझसे बातचीत की थी, मैंने ‘दिनमान’ में वैसी ही शैली में लिखा था। मेरे संपादक रघुवीर सहाय को भी पीलू मोदी से मेरी यह बातचीत अच्छी और प्रीतिकर लगी।
मैंने पीलू मोदी को जब ‘दिनमान’ की प्रति भेंट की, तो उसे देखकर बहुत खुश हुए और बोले, “मैं किसी से पढ़वाकर तुमसे संपर्क करूँगा।” एक दिन उन्होंने देर शाम मुझे मिलने के लिए बुलाया। तब हम दोनों ही थे। खूब बातचीत हुई—इंटरव्यू के बारे में भी और उनकी स्वतंत्र पार्टी तथा ज़ुल्फिकार अली भुट्टो से उनकी ‘यारी’ के बारे में खुलकर और बेसाख़्ता। इस पर मैंने पीलू मोदी को भुट्टो से उनकी दोस्ती को लेकर एक किताब लिखने की सलाह दी। दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि न तो दोनों देशों के बीच के विवाद और तनाव उसे प्रभावित कर सके और न ही दोनों की अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएँ ही। पीलू मोदी के यहाँ अब मेरा निर्बाध आना-जाना शुरू हो गया। उनकी एक पत्रिका निकलती थी—’मार्च ऑफ़ द नेशन’। वह उन्होंने नियमित तौर पर मुझे भेजनी शुरू कर दी।
मेरी तरह पीलू मोदी के कुछ और मित्रों और शुभचिंतकों ने उन्हें ज़ुल्फिकार अली भुट्टो से उनकी गहरी दोस्ती, जो हर क्षेत्र, समय और दौर में खरी उतरी थी, पर किताब लिखने की सलाह दी थी। उन्होंने इस पर गंभीरता से विचार कर एक दिन मुझे फोन करके जानकारी दी कि उन्होंने भुट्टो के साथ अपनी दोस्ती पर किताब लिखनी शुरू कर दी है। “काफ़ी कुछ लिख चुका हूँ। छपने पर तुम्हें फोन करके बुलाऊँगा।” काफ़ी दिनों के बाद उनके निजी सचिव कनु का फोन आया कि शाम को साहब आपका इंतज़ार करेंगे। मैं जब उनके लोदी एस्टेट निवास पर पहुँचा, तो मुझे बहुत प्यार से मिले और बोले कि “तुम्हारे इंटरव्यू ने मुझे बहुत मशहूर कर दिया। थैंक यू।” मैंने कहा कि उसमें थैंक यू वगैरह कुछ नहीं, आपने मुझे खुला वक़्त दिया, उसी का यह नतीजा है। इतने में अपने पास रखी एक पुस्तक मुझे भेंट करते हुए कहा कि “यह तुम जैसे शुभचिंतकों के इसरार का परिणाम है कि ‘ज़ुल्फी माई फ्रेंड’ लिखी गयी।” उन्होंने बड़े प्रेम से अपने दस्तख़तों के साथ 17 मई, 1973 को पहले संस्करण की वह पुस्तक मुझे गले लगाकर भेंट की, इस ताकीद के साथ कि “जब कभी भी मुझसे मिलने की तुम्हारी इच्छा हो, तो बेरोकटोक यहाँ आ सकते हो।” यह थे पीलू मोदी।











