हमारे सत्तर के दशक के हीरो में से एक कॉम्रेड कुमार शिराळकर के स्मृतिदिन के अवसर पर वामपंथी आंदोलन पर मुक्त चिंतन।
महाराष्ट्र के सार्वजनिक जीवन में, महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के बाद, साठ, सत्तर और अस्सी के दशकों के आसपास राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में कई घटनाएँ घटने लगी थीं। शिवसेना जैसे प्रादेशिक और मराठी भावनात्मक मुद्दे पर एक राजनीतिक दल इसी काल में जन्म लिया। कुछ दिनों में ही विद्यार्थी और युवक-युवतियों के बीच दलित पैंथर, युक्रांद, तरुण शांति सेना, मागोवा, स्पार्क सोशलिस्ट फोरम जैसे समूह बन गए और विभिन्न शिक्षण संस्थानों में—जिनमें आईआईटी, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज से लेकर अन्य विषयों के कॉलेजों तक—अध्ययन मंडलों की गतिविधियाँ शुरू हो गईं। मैं स्वयं इन्हें देखता-देखता और करता-करता बड़ा हुआ हूँ।
मैं स्वयं अमरावती में 1969 में ग्यारहवीं मैट्रिक के बाद पढ़ने गया था। वहाँ राष्ट्र सेवा दल, तरुण शांति सेना और दलित पैंथर के संयुक्त तत्वावधान में अध्ययन मंडल शुरू किया था। जिसको मार्गदर्शन मुख्यतः यदुनाथ थत्ते, प्रोफेसर ग. प्र. प्रधान, मधु दंडवते, जॉर्ज फर्नांडिस, एस. एम. जोशी, एन. जी. गोरे, हमीद दलवाई, प्रोफेसर नरहर कुरुंदकर, प्रोफेसर एन. डी. पाटील, सुधीर बेडेकर, नामदेव ढसाळ, लतीफ खाटिक, शांताराम दिवेकर, डॉ. कुमार सप्तर्षी, डॉ. अरुण लिमये, हुसेन दलवाई, डॉ. रत्नाकर महाजन, सुभाष काणे और सबसे ज्यादा बार मुंबई आईआईटी में पढ़ने वाले प्रफुल्ल बिडवाई और जितेंद्र शाह देते थे, क्योंकि दोनों के घर-परिवार के लोग (माता-पिता) अमरावती शहर में ही रहते थे। इसलिए वे दोनों मुंबई आईआईटी से छुट्टियों में या अन्य समय भी आते समय अपने साथ मार्क्सवादी साहित्य लाते थे।
भारतीय सेना की नौकरी बीच में छोड़कर आए दिनानाथ मनोहर भी कभी-कभी अमरावती आते थे। स्थानीय स्तर पर प्रोफेसर डहाके पति-पत्नी ने तो अपना कैक्टस नाम का नया बना बंगला मालटेकड़ी की तलहटी में अध्ययन मंडल के लिए हमें दे दिया था। इसी तरह विदर्भ महाविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफेसर जोड़ा , नातू मैडम और उनके जीवनसाथी प्रोफेसर डी. वाय. देशपांडे के एकांत में स्थित विदर्भ महाविद्यालय परिसर के बंगले में भी। और सबसे हक़ का स्थान था बडनेरा रोड पर जिला सर्वोदय मंडल का कार्यालय। श्री. एकनाथ हिरुडकर की कृपा से अमरावती शहर में पाँच-छह आधार देने वाले लोग और स्थान थे। मानो पूरे अमरावती पर हमारा ही प्रभुत्व हो—ऐसे आविर्भाव में हम मित्रमंडली घूमते थे।
हम 1969 से 1979 तक लगातार दस साल विभिन्न गतिविधियाँ करते रहे। आपातकाल 1976 मे अमरावती मध्यवर्ती कारागार में जेल में भी रहा हूँ. आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि “उन गतिविधियों का नामो – निशान भी अमरावती में नहीं बचा है।”
यही कहानी कम-अधिक मात्रा में पूरे महाराष्ट्र की है। कहाँ युक्रांद, तरुण शांति सेना, मागोवा, दलित पैंथर? अस्सी के दशक में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, मजदूर वाहिनी। और सत्तर के दशक में विभिन्न आंदोलन करने वाले मोर्चों पर आज सन्नाटा है। इसका कारण है नए कैडर नही बनाने में हम सबकी ओर से हुई गलती। हम अपनी ही उमंग में घूमते रहे, और नए आए युवक-युवतियों को समझाने मे कम पड़ गए। ऐसा अब पीछे मुड़कर देखते हुए मुझे आज कुमार शिराळकर की याद में लगता है।
मेरी जन्मभूमि खानदेश में तत्कालीन अविभक्त धुले जिले के शहादा तालुका की श्रमिक संघटना। धुले जिले का स्थान होने के कारण मुझे एक भावनात्मक निकटता महसूस होती रही है। वास्तव में 1969 में मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में मुझे आगे की पढ़ाई के लिए अमरावती जाना पड़ा। और लगातार दस साल अमरावती में रहने के कारण अमरावती के साथ भी होमटाउन जैसा नाता जुड़ गया।
आज के मूल लेख का कारण है 2 अक्टूबर 2022 को कॉम्रेड कुमार शिराळकर का प्रोस्टेट कैंसर से निधन। कुमार शिराळकर मुंबई आईआईटी की शिक्षा के बाद डोंबिवली में प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स नाम के एक कारखाने में नौकरी करने लगे थे। और तब वे युक्रांद के प्रभाव में होने के कारण डोंबिवली में समाजवादी मंडली के व्याख्यान आयोजित करने में उन्होंने काफी आगे बढ़कर काम शुरू किया था।
1966-67 में बाबा आमटे के सोमनाथ प्रकल्प (चंद्रपुर जिला, महाराष्ट्र) के लिए मुल तालुका में महाराष्ट्र शासन ने हजारों एकड़ जंगल भूमि कुछ वर्षों के अनुबंध पर बाबा आमटे को दी थी। साने गुरुजी द्वारा शुरू किए गए साधना साप्ताहिक के संपादक श्री यदुनाथ थत्ते ने अंतरभारती की ओर से सोमनाथ में 1966-67 के मई महीने में एक सप्ताह से अधिक समय का श्रम-संस्कार शिविर आयोजित किया था। उसमें भारत के लगभग सभी राज्यों से हजार से अधिक संख्या में युवक-युवतियाँ आई थीं। क्योंकि मैं भी राष्ट्र सेवा दल की हमारी शिंदखेड़ा शाखा के कुछ अन्य सैनिकों के साथ हमारे पूर्णकालिक कार्यकर्ता श्री प्रभाकर पाटील के नेतृत्व में गया था। इसलिए मैंने सोमनाथ के पहले श्रम-संस्कार शिविर का अनुभव लिया है। उसमें युक्रांद के डॉ. कुमार सप्तर्षी के नेतृत्व में कुछ युवक-युवतियाँ आई हुईं मैंने देखीं। उनमें कुमार शिराळकर थे या नहीं, अब याद नहीं। लेकिन वे, दिलीप कामत, गोवा के अजित, दिनानाथ मनोहर—ये युवक श्रम-संस्कार शिविर के बाद बाबा आमटे की कल्पना वाले सोमनाथ के श्रमिक विश्वविद्यालय में अपनी नौकरियाँ छोड़कर बाबा आमटे के साथ शामिल हो गए थे।
उसी काल में शहादा तालुका के आदिवासियों की जमीनें गैर-आदिवासियों द्वारा हथियाई गईं वापस दिलाने के लिए सतपुड़ा सर्वोदय मंडल के अंबरसिंह सुरवंती और अध्यक्ष श्री गोविंदराव शिंदे अपने स्थानीय सहयोगियों की मदद से प्रयास कर रहे थे। उसमें बाबा आमटे को आग्रह करके एक बार ले जाया गया था।
सत्तर के दशक में सोमनाथ की जंगल भूमि काटकर तैयार करने में लगे लोगों को, हजारों वर्षों से जंगल काटकर आदिवासियों द्वारा तैयार की गई जमीन शहादा तालुका के सतपुड़ा पर्वत की तलहटी में बाहर से आए दबंगों के कब्जे से छुड़ाने का संघर्ष। सोमनाथ श्रमिक विश्वविद्यालय के प्रकल्प में शामिल तरुण मित्रों को ज्यादा चुनौतीपूर्ण लगा होगा। और वे शहादा सतपुड़ा सर्वोदय मंडल की ओर से आदिवासियों की जमीनें वापस दिलाने के काम में शामिल हो गए होंगे। जिसमें कुमार शिराळकर सबसे आगे थे।
फिर जल्दी ही जमीन के सवाल के लिए ग्राम स्वराज्य मंडल के बैनर पर काम शुरू हुआ। लेकिन हिंसा-अहिंसा के मुद्दे पर इतने मतभेद हुए कि शहादा से वर्धा जिले के पवनार आश्रम में आचार्य विनोबा भावे के पास दोनों पक्षों के लोग गए कि उस विवाद पर विनोबा का क्या मत है। और विनोबा ने अपनी शैली में अंबरसिंह सुरवंती से पूछा कि “आदिवासी अपने हाथ में लाठी लेकर चलते हैं क्या?” तो अंबरसिंह ने बताया कि “हाँ, आदिवासी घर से निकलते समय हाथ में लाठी लेकर ही निकलते हैं।” तब विनोबा ने कहा कि “कोई उस आदिवासी पर लाठी उठाने का प्रयास करे, तो आदिवासी ने अपनी हाथ की लाठी से वह हमला रोकने के लिए लाठी आड़ी कर दी तो बाबा उसे आत्मरक्षा कहता है।” ऐसा फैसला आचार्य विनोबा भावे ने दिया।
पुणे में ‘माणूस’ शीर्षक से पुस्तक के आकार का साप्ताहिक श्री ग. माजगावकर चलाते थे। और उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के कामों में सहयोग के लिए ‘ग्रामायन’ नाम का एक ट्रस्ट बनाया था। स्वयं माजगावकर हिंदुत्ववादी विचारों के थे। लेकिन तब तक इतनी कटुता नहीं बनी थी। माजगावकर हिंदुत्ववादियों में थोड़े लोकतांत्रिक और उदारमतवादी रहे होंगे, ऐसा मुझे लगता है। उन्हें शहादा परिसर के काम में रुचि थी। इसलिए वे अपनी क्षमता के अनुसार इस आंदोलन की मदद करते थे। आंदोलन के भील नेता अंबरसिंह महाराज की बीमारी में उन्हें पुणे के अस्पताल में इलाज के लिए लाना, और जब वे नहीं बचे तो पुणे से उनका पार्थिव रात भर यात्रा करके शहादा पहुँचाने की तकलीफ भी उठाई। लेकिन कुछ बड़े मोर्चे या परिषदों में भी उपस्थित रहकर शहादा आंदोलन का समर्थन करते थे।
इधर कुमार और उनके सहयोगियों ने स्थानीय आदिवासियों के जीवन में काफी घुलमिलकर उनके बीच रहकर ही (जिसे मार्क्सवादी भाषा में डीक्लास-डीकास्ट होना कहते हैं) श्रमिक संघटना नाम से पूरे शहादा और उसके पड़ोसी अन्य आदिवासी तालुकों में सत्तर से अस्सी के आसपास जबरदस्त संगठन खड़ा किया था। और उस बल पर दस हजार से अधिक एकड़ जमीन गैर-आदिवासियों के कब्जे से छुड़ाने के लिए भारी मात्रा में सभाएँ, सम्मेलन, परिषदें और धुले जिला मुख्यालय पर मोर्चे निकालकर आदिवासियों की जमीनें वापस आदिवासियों को दिलाने के लिए अपने प्राणों की भी परवाह किए बिना श्रमिक संघटना की ओर से न्याय दिलाया है।
महाराष्ट्र राज्य निर्माण के बाद यह महाराष्ट्र का सबसे बड़ा और वह भी आदिवासियों की जमीनें वापस दिलाने के लिए किया गया ऐतिहासिक आंदोलन है। कुमार शिराळकर के नेतृत्व में होने के कारण मैंने उन्हें हमारे सत्तर के दशक का चे ग्वेरा कहा है। कुमार ने इस आंदोलन में भाग लेते हुए ही एक छोटी पुस्तिका लिखी थी। उसका शीर्षक था “उठ वेड्या तोड बेड्या”।
हम उस काल में मागोवा, माणूस, साधना, मनोहर ये मराठी तथा दिनमान, धर्मयुग, सारिका, ईलेस्ट्रेटेड विकली मेनस्ट्रीम जैसे हिंदी अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिकाओं को नियमित पढ़ते थे। हाल ही में क्यूबा में क्रांति करने वाले अग्रणी नेता फिडेल कास्त्रो और चे ग्वेरा की तस्वीरें हम अपने हॉस्टल के कमरों की दीवारों पर लगाते थे। और वियतनाम में अमेरिका द्वारा छेड़े गए युद्ध-विरोधी मोर्चों तथा महाराष्ट्र में सूखा, बेरोजगारी, महंगाई विरोधी सभी दलों के कार्यक्रमों में भी भाग लेते थे।
और उसी के आसपास पहली बार गुजरात में आरक्षण-विरोधी आंदोलन और वहीं से मोरवी के सरदार पटेल इंजीनियरिंग कॉलेज की मेस में एक रुपये की थाली की कीमत चार आने बढ़ाने से विद्यार्थियों ने आंदोलन शुरू किया। जो नवनिर्माण आंदोलन में बदल गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा। और उसके बाद गुजरात राज्य की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का सफाया हो गया। और जनता पार्टी की स्थापना से दो साल पहले ही 1975 में जनता सरकार बनी और मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल हुए।
इसी दौरान बिहार राज्य में विद्यार्थी आंदोलन शुरू हुआ। और जिसका नेतृत्व सत्तर वर्ष पार कर चुके जयप्रकाश नारायण पर जबरदस्ती थोपा गया। 1975 के 25 जून को आपातकाल की घोषणा करके श्रीमती इंदिरा गांधी ने बहुसंख्यक विरोधी दल नेताओं को जेल में डाल दिया और उन्होंने जनवरी 1977 में चुनाव घोषित किए। उसके बाद जनता पार्टी की सरकार और उसी हवा में पश्चिम बंगाल राज्य की विधानसभा चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार चुनी गई। जिसने 1977 से 2011 तक लगातार चौतीस साल राज किया।
मुझे 1982-97 तक पंद्रह साल बंगाल में पत्नी की नौकरी के कारण रहना पड़ा था, इसलिए मैंने स्वयं अपनी आँखों के सामने ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बंगाल का राज चलाए जाने के काल में रहने का अवसर पाया। और मैं बुर्जुआ कांग्रेसी राज्य महाराष्ट्र में जन्म लेकर तीस वर्ष पूरे करके वामपंथी क्रांतिकारी बंगाल राज्य का निवासी बनकर लगातार पंद्रह साल। जीवन में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से सरकार चलाए जा रहे राज्य में गया था, इसलिए बहुत अपेक्षाएँ लेकर गया था।
लेकिन बंगाल में जाने के बाद महाराष्ट्र के बुर्जुआ कांग्रेसी सरकार द्वारा 1957 में पारित ज्योतेगा उसकी जमीन के तहत एक विधेयक की वजह से एक झटके में ही ज्योतदारो को जमीन पर कानूनी कब्जा हमेशा के लिए दिलाने का ऐतिहासिक काम बगैर किसी आंदोलन से किया गया है. यह कानून मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बंगाल में किए गए ऑपरेशन बरगा से ज्यादा क्रांतिकारी लगा। क्योंकि ऑपरेशन बरगा में केवल कुलक (बरगादार) का नाम सात-बारह के कागज पर चढ़ाने के अलावा अन्य किसी प्रकार की मालिकी की गारंटी नहीं दी गई। और इसीलिए 2006-07 में टाटा मोटर्स कंपनी ने नैनो प्रोजेक्ट सिंगुर, बंगाल में बरगादार लोगों ने प्राणों पर खेलकर विरोध किया। और वही कहानी नंदीग्राम परिसर के तथाकथित केमिकल हब उद्योग की भी। वहाँ के बरगादार लोगों ने तो बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर सरकारी मशीनरी को नही आने दीया था. और पर्यायी सरकार शुरू कर दीए थे । मैं स्वयं 2007 में 1 दिसंबर से 6 दिसंबर तक एक सप्ताह कुछ स्थानीय मित्रों के साथ फैक्ट-फाइंडिंग के लिए रहकर आया हूँ।
मूल मुद्दा ऑपरेशन बरगा पर ईपीडब्ल्यू से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ल्ड बैंक तक कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी मंडली ने अपनी पीठ थपथपाई है। और सिर्फ उसी एक मुद्दे पर बंगाल राज्य की विधानसभा चुनाव में लगातार तीस साल से अधिक समय तक Left Front की सरकार ने लगातार विजय प्राप्त की है। लेकिन नंदीग्राम-सिंगुर के आंदोलन में लोगों को एहसास हुआ कि हम चाहे कुलक (बरगादार) ही क्यों न हों, जमीन का मुआवजा मूल मालिक को ही मिलेगा, भले वे कलकत्ता, मुंबई, दिल्ली, न्यूयॉर्क, लंदन में हों। इसलिए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य कहते थे कि “हम मालिक से कहेंगे कि कुछ हिस्सा बरगादार को भी दें।”
इससे पहले हावड़ा के कनोरिया जूट मिल मजदूर आंदोलन की 1990-91 की घटना है। ‘दुनिया के मजदूर एक हों’—यह वाक्य हर कम्युनिस्ट किताब के पहले पन्ने पर लिखा होता है। लेकिन कनोरिया जूट मिल की संग्रामी यूनियन को कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार मान्यता देने को तैयार नहीं थी—इसका क्या कारण रहा होगा? सुशांत चक्रवर्ती ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की यूनियन छोड़कर स्वतंत्र यूनियन बनाकर कनोरिया जूट मिल की लड़ाई लड़ी। सुशांत चक्रवर्ती ने तत्कालीन बंगाल के राज्यपाल प्रोफेसर नूरुल हसन के समय कलकत्ता राजभवन के चारों तरफ सभी मजदूर और उनके परिवारों के साथ पहचान पत्र हाथ में लेकर दिनभर धरना दिया। फिर भी ज्योति बसु मुख्यमंत्री पद पर बैठे वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेताओं ने इस धरना आंदोलन की साधारण नोटिस भी नहीं ली।
इसी तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में एक चौथाई सरकारी गाड़ियाँ छोड़कर बाकी सभी निजी गाड़ियाँ हैं। और वे ज्यादातर पार्टी कैडर के लोग अपनी गाड़ियों के आगे पार्टी का झंडा लगाकर ही गाड़ियाँ चलाते हैं। पुलिस, शिक्षक और अन्य सरकारी कर्मचारी चुनते समय पार्टी के पाड़ा यूनिट से लेकर अलीमुद्दीन स्ट्रीट के राज्य मुख्यालय की सिफारिश के बिना एक भी कर्मचारी नौकरी में नहीं लिया जाता। सबसे बड़ा कहर यह कि पुलिस थाने में अपराध दर्ज करने से पहले पाड़ा पार्टी ऑफिस की सिफारिश है या नहीं—यह देखकर ही थाने में अपराध दर्ज होता था।
यह सब लिखने का कारण यह है कि मेरे महाराष्ट्र के चे ग्वेरा कुमार शिराळकर ने कुछ सहयोगी मित्रों के साथ तभी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में 80 के दशक मे प्रवेश कर लिया था। तब मैंने उन्हें और सुधीर बेडेकर को ऑफर दिया था कि “कलकत्ता में मेरे घर रहकर आठ-पंद्रह दिन आराम से बंगाल राज्य में तुम्हें पसंद आने वाले दल की चाल कितनी मार्क्सवादी दर्शन के अनुसार चल रही है, एक बार मेरे घर रहकर अपनी आँखों से देखो और फिर तय करो। सत्ता में न रहने वाले महाराष्ट्र राज्य मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता-कार्यकर्ता अत्यंत ईमानदार हैं—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन मुझे बंगाल में जाने के बाद अपनी अपेक्षाओं का भंग हुआ है। लेकिन प्रेम अंधा होता है—इस कहावत का अनुभव कुमार शिराळकर और उनके साथ शहादा आंदोलन को काफी नुकसान हुआ है । और महाराष्ट्र राज्य का सर्वश्रेष्ठ येनान बनाने का साम्यवादी प्रयोग काल के पर्दे के पीछे चला गया है—ऐसा मुझे आज कुमार के चौथे स्मृतिदिन पर लगता है।”
पड़ोसी गुजरात राज्य के डांग-अहवा क्षेत्र में बंगाल से एक स्वामी आसिमानंद नाम के सज्जन 1990-91 में आते हैं। और नब्बे प्रतिशत आदिवासी बहुल लोगों से कहते हैं कि “तुम रामा को उच्छिष्ट बेर खिलाने वाली शबरी की अबकी संतानें हो।” उन्होंने एक पहाड़ी खोज निकाली है और दावा करते हैं कि “इसी पहाड़ी पर राम-लक्ष्मण आए थे. और कुछ बड़े पत्थर हैं, जिन पर बैठकर राम-लक्ष्मण ने शबरी के उच्छिष्ट बेर खाए थे।”
इसलिए संघ की ओर से 2004 में फरवरी महीने में शबरी कुंभ मेला आयोजित करने का निर्णय लिया गया। एक महीना पहले ही मैं डॉ. राम पुनियानी, इरफान इंजीनियर, दिगंत ओझा, फादर सेड्रिक प्रकाश के साथ दो दिन शबरी के बेर खिलाने वाली जगह से लेकर कृत्रिम रूप से तैयार किए जा रहे चंपा सरोवर के लोकेशन तक शबरी कुंभ मेला की तैयारी के लिए अस्थायी रूप से खड़े किए गए मेला हॉल में बैठकर, तैयारी के लिए आए संघ के पदाधिकारी सुरेश कुलकर्णी (परभणी) और संघ की ओर से अस्थायी रूप से भेजे गए प्रचारकों के साथ बातचीत हुई।
तब मैंने पूछा कि “भारत में हजारों वर्ष बीत गए, चार कुंभ मेले ज्ञात हैं। लेकिन यह पाँचवाँ तुमने नया खोज निकाला है और तुम हिंदू धर्म के पहले के चारों कुंभ मेलों का अपमान कर रहे हो। और इस कुंभ मेले का कोई ऐतिहासिक-धार्मिक आधार न होते हुए भी तुम आदिवासियों की धार्मिक भावनाएँ भड़काने की अत्यंत आपत्तिजनक कृत्य कर रहे हो”—यह कहकर हम वहाँ से उठ गए।
डांग में नए शुरू किए जा रहे शबरी कुंभ मेले का मतलब है—समस्त आदिवासी समाज से कहना कि तुम शबरी की संतानें हो और हिंदुत्व की पालकी को ढोनेवाले कहार हो। पहले डांग-अहवा क्षेत्र में ईसाई धर्म के लोगों द्वारा शुरू की गई आवासीय स्कूलों और चर्चों पर हमले किए गए। बाद में गुजरात में हुई 2002 की दंगों के समय आदिवासी भी शामिल हुए थे।
बगल में ही महाराष्ट्र राज्य के नवापूर (धुले जिले का अंतिम तालुका), साक्री और अन्य आदिवासी क्षेत्रों में कॉम्रेड शरद पाटील, उनके अनुयायी के रूप में पुणे छोड़कर इसी क्षेत्र में स्थायी हुए कॉम्रेड किशोर ढमाले, प्रतिभा शिंदे, वहारू सोनवणे, दिनानाथ मनोहर, कुमार शिराळकर, मेधा पाटकर, प्रोफेसर रणजीत परदेशी, राहुल वाघ—यानी धुले-नंदुरबार जिले की विभिन्न पुरोगामी संस्था-संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ 2004 में—शबरी कुंभ मेला संघ की ओर से किस तरह आदिवासियों का हिंदूकरण अभियान चलाया जा रहा है। और तुमने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल आदिवासीयो के उपजिविका के प्रश्नों के समाधान के लिए लगाया है. और आगे भी यही काम करोगे—इसकी मुझे पूरी उम्मीद है।
लेकिन सांस्कृतिक स्तर पर संघ की ओर से किए जा रहे काम के कारण तुम्हारा पूरा काम केवल भौतिक प्रश्नों को लेकर ही चल रहा है। और इसलिए आदिवासियों की जमीनों के पट्टे दिलाने के लिए निकाले गए मोर्चों में सतपुड़ा पर्वत की तलहटी से सीधा मुंबई तक पैर खून से लथपथ होने तक सैकड़ों किलोमीटर की दूरी के मोर्चों में भी आदिवासी आते हैं। लेकिन शबरी कुंभ मेला हो या “मंदिर वहीं बनाएंगे” अभियान हो—उसे उसमें शामिल होने से रोकना हम सबको कितना संभव हो पाया है, मुझे तो संदेह है।
और यही बात हमारे शहरों की औद्योगिक मजदूर संगठनों पर भी लागू होती है। जिस तरह बाबरी मस्जिद गिराने में आगे रहने वाले लोगों में ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ की पट्टी माथे पर बाँधकर अयोध्या की दिशा में जाते हुए हम देखते थे। उनमें मजदूर, मध्यमवर्गीय, स्त्रियाँ और ज्यादातर मराठी बोलने वाले कारसेवक दिखे थे।
भारत ‘जोड़ो-नफरत छोड़ो’ अभियान कुछ मंडली चला रही है। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। अपने ही घर में जहाँ नफरत के कीड़े घुस चुके हैं, वहाँ बाहर की क्या बात?
कुमार शिराळकर आजीवन आदिवासी, किसान-खेतमजदूर और गरीबों को न्याय दिलाने के प्रयास करते-करते हमसे विदा हो गए हैं। इसलिए उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि आज पूरे देश में जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है, इस वास्तविकता को स्वीकार करके उसके खिलाफ काम करने वाले समस्त लोगों को अपने छोटे-मोटे मतभेद भुलाकर एक साथ आकर काम करना—यही कॉम्रेड कुमार शिराळकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।











