अभी एक हफ्ता पहले बिहार के समाजवादी नेता श्री. शिवानंद तीवारीजी का सुबह- सुबह ही ‘आचार्य विनोबा भावे और आर एस एस’ शिर्षक से लिखा हुआ मेरे 11 सितंबर के लेख पर प्रतिक्रीया देने हेतु फोन आया था. और उसी क्रम में उन्होंने कहा कि “महात्मा गाँधी और आचार्य विनोबा भावे के ग्रामस्वराज्य की बात को जवाहरलाल नेहरू जी ने प्राथमिकता दी होती तो आज भारत की यह हालत नहीं हुई होती.” तो मैने कहा था कि “जवाहरलाल नेहरू गाँधीजी की ‘हिंदस्वराज्य’ मे लिखि हुई बातो से पूरी तरह से सहमत नहीं थे. इस विषय पर उन दोनों के बीच में काफी लंबा पत्राचार तथा बातचित के रेकॉर्ड्स और पुस्तके उपलब्ध है डी जी तेंडूलकर के महात्मा शिर्षक से लिखित आठ खंडो मेसे 6 वे खंड मे तथा समाजवादी नेता मधु लिमये की Mahatma Gandhi and Jawaharlal Nehru : A Historic Partnership (1916 – 1948) यह पुस्तक चार खंडो मे प्रकाशित हुई है. इन चार खंडों मे मधु लिमये जीने महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के आपसी वैचारिक संबधों, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका और दोनों के बीच के मतभेदों व गहरी साझेदारी का बारीकी से विश्लेषण किया है. इसके अलावा मधु लिमये की अन्य पुस्तके जैसे Birth of Non – Congressism और Galaxy of Indian Socialist Leaders इन दोनों किताबों में भी जवाहरलाल नेहरू की नितियो और उनके दौर की राजनीति की गहरी समिक्षा लिखने की कोशिश की है. मधु लिमये डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुयायी होने के नाते उन्होंने नेहरू सरकार की कई आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का विरोध किया था, लेकिन नेहरू की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष सोच का आदर भी करते थे.
महात्मा गाँधी जी को भी लगता था कि नेहरू मेरी धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई को जड़ से खत्म करने की बातों को सही मायने में अपनाया है . लेकिन उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) और आधुनिकता का रास्ता चुना. यह बात स्वतंत्रता के पहले ही 1938 में सुभाषचंद्र बोस जब काँग्रेस के अध्यक्ष थे, उस दौरान उनके प्रयास से ही पहले नियोजन मंडल की बैठक मुंबई में अक्तुबर 1938 मे जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता मे सुनियोजित आर्थिक विकास और उद्योगों के विस्तार की रुपरेखा तैयार करने का पहला व्यवस्थित प्रयास था. यही समिति आगे चलकर स्वतंत्रता के बाद भारत का योजना आयोग के रूप में जानी जाती है. (Planning Commission) जिसको नरेंद्र मोदी जी ने 2014 मे पहलीबार प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण करने के बाद बर्खास्त कर दिया और उसकी जगह नीती आयोग का गठन किया गया है. सोविएत रुस की समाजवादी क्रांती (October Revolution) की 10 वी वर्षगांठ के अवसर पर 1927 मे अपने पिता मोतीलाल नेहरू के साथ 38 साल की उम्र में जवाहर गए थे. इसी यात्रा के बाद उनके विचारों पर समाजवाद (Socialism) का गहरा प्रभाव पडा था. सोविएत रुस के विकास के माॅडल से नेहरू काफी प्रभावित हुऐ थे. और इसके बावजूद भी महात्मा गाँधी जी ने उन्हें ही 25 जनवरी 1942 को वर्धा में आल इंडिया काँग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान सार्वजनिक रूप से अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी (वारिस) घोषित करते हूऐ कहां था कि “कुछ लोग कहते हैं कि जवाहरलाल और मेरे बीच मतभेद है – हमे अलग करने के लिए हमारे वैचारीक मतभेदों से कही ज्यादा बड़ी ताकतों की जरूरत होगी. मैने पिछले कुछ सालों से कहां है, और आज भी दोहराता हूँ कि राजाजी (सी. राजगोपालाचारी) या सरदार पटेल नही, बल्कि जवाहरलाल नेहरू ही मेरे उत्तराधिकारी होंगे. जब मै नहीं रहुँगा तब वह मेरी ही भाषा बोलेंगे. ”
नेहरू को चुनने के मुख्य कारण:
(1) आधुनिक और वैश्विक दृष्टीकोण : गाँधी जी का मानना था कि आजाद भारत को आंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के लिए नेहरू का वैश्विक दृष्टीकोण, आधुनिक सोच और अंग्रेजी हुकूमत से बातचित की कला सबसे उपयुक्त थी.
(2) युवाओं और जनता मे लोकप्रियता : नेहरू उस समय देश के युवाओं और वामपंथियों (Left Leaning) विचारधारा के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय चेहरा थे.
(3) धर्मनिरपेक्षता (Secularism) : गाँधी जी को पूरा भरोसा था कि नेहरू भारत में सभी धर्मों (विशेष रूप से अल्पसंख्यक) को समान अधिकार देने के उनके विजन को पूरी इमानदारी से लागू करेंगे.
(4) उम्र का अंतर : सरदार पटेल उम्र में जवाहरलाल नेहरू से 14 वर्ष बडे थे. और उनका स्वास्थ भी ठीक नहीं रहता था. गाँधी जी चाहते थे कि देश की कमान किसी अपेक्षाकृत युवा नेता के हाथों में हो.

वर्तमान समय में बेतहाशा टेक्नोलॉजी के वजह से संपूर्ण विश्व वैज्ञानिक, वैचारिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. जिसमें सभी अपने- अपने मान्यताओं को मंथन करने की कोशिश कर रहे हैं . जिसमें मार्क्सवादी विचारधारा के लोग हैं. और समाजवादी, गांधीवादी तथा धार्मिक आधार पर हिंदूत्ववादी तथा जेसुइट, इस्लाम तथा बौद्ध धर्म के भी लोग अपने – अपने ढंग से कोशिश कर रहे हैं.
जिसमें हमारे जैसे लोग महात्मा गाँधी की 79 साल की जीवनयात्रा मे, शुरुआत के 20-25 साल छोडकर दुनिया को बेहतर बनाने के लिए 65 साल की कुल सक्रिय कोशिश की शुरूवात, दक्षिण अफ्रीका के भारतीय अप्रवासीयो के अधिकारों को लेकर किए गए आंदोलन से लेकर, भारत में 1915 मे आने के बाद बिहार के चंपारण,गुजरात के खेड़ा के किसानों के आंदोलन से लेकर 1920 मे लोकमान्य तिलक की मृत्यु(1-8-1920) के बाद भारत के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व उनके कंधोपर आ गया. उसी दौरान रशिया को लेनिन और उनके कम्युनिस्ट सहयोगी क्रांतिकारी झार के कब्जे से मुक्त करने मे कामयाब हूए थें ( 1917 ) प्रथम महायुद्ध (1914 – 1918) और इक्कीस साल के अंतराल के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के ( 1920 – 1945) दौरान इटली तथा जर्मनी में फासीवादी तानाशाहों का उदय होना. और हमारे पड़ोस के चीन में भी माओत्से तुंग के नेतृत्व में क्रांतिकी कोशिश (1911 – 1949) हुई है. एकतरह से बीसवीं शताब्दी की शुरुआत संपूर्ण विश्व में ही राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तन का दौर शुरू था . और उस कोशिश में ज्यादा से ज्यादा हिंसा के माध्यम से की गई कोशिशों के उदाहरण है. उसी समय महात्मा गाँधी भारत में हमेशा के लिए दक्षिण अफ्रीका के अपने जीवन के 45 ( 9-1-1915 ) वर्ष पूरे करने के बाद, उनके गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के बार – बार आग्रह करने की वजह से हमेशा के लिए वापस आए थे . लेकिन उनके आगमन के एक महिने के भितरही (19 – 2-1915) गोखले की मृत्यु हो गई थी .लेकिन गोखले ने उन्हें भारत आने के बाद कहा था कि “सबसे पहले संपूर्ण भारत का गौर से अध्ययन करना और उसके बाद ही भारत में आजादी के आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने (1915- 1917) रेलगाड़ी से जानबूझकर थर्ड क्लास से संपूर्ण देश की यात्रा करते हूए ही, उन्हें भारत की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक स्थिति का सही – सही अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ.

इसिलिये उन्होंने कहा कि अंग्रेजी राज के लिए हम भारत के लोग ही जिम्मेदार है. क्योंकि हमारी – अपनी ही कमजोरी का फायदा उठाकर ही वह मुठ्ठी भर लोग सौ साल से 35 करोड़ आबादी के भारत पर राज कर रहे हैं. और बेतहाशा शोषण कर रहे हैं. और जबतक हमारे देश के हरएक आदमी – औरत मे निर्वैर और निर्भयता, नहीं आती तबतक हमारे देश में कोई भी बदलाव संभव नहीं. इसलिए उन्होंने (1906) दक्षिण आफ्रिका की सरकार के खिलाफ साधनसूचितापूर्ण (purity of means ) के साथ अहिंसक सत्याग्रह के द्वारा वहाँ रहने वाले भारतीय लोगों के आंदोलन के द्वारा कामयाबी हासिल की.उसके लिए उन्हें और उनके सहयोगियों को कई बार जेल में जाना पडा. और इसी कोशिश में उन्होंने सत्याग्रह की खोज की जिसका इस्तेमाल उन्होंने अपने जीवन भर और भी अपने आप को तथा अपने द्वारा किए गए जीवन की सभी कोशीशो को परिष्कृत करते हूए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया है. और अपनी इसी प्रतिबध्दता को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बखुबी इस्तेमाल किया है.(1893-1915) इस दौर में अन्य लोगों द्वारा हिंसक मार्ग से भी कोशिशें हूई है. 20 वी शताब्दी के शुरुआती दिनों से (1905) बंगभंग के बाद कुलमिलाकर चालिस साल (1945) के भितर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के बाद हिंसा के माध्यम से आजादी का दौर समाप्त हो गया था. और सबसे महत्वपूर्ण बात हिंसक क्रांतिकारी गतिविधियों का गौर से अध्ययन करने के बाद पता चलेगा कि यह संपूर्ण भारत की तुलनामे कुछ चंद प्रदेश के कुछ चंद लोगों के द्वारा कि गई कोशिश थी. बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब कुछ उत्तरभारत मे उन्हें मीलने वाला जनाधार की तुलनामे महात्मा गाँधी को मिलने वाला जनाधार (आज के जैसे प्रचार – प्रसार करने के साधनों के न रहते हूऐ भी ? ) सबसे अधिक था. शायद ही भारत का कोई हिस्सा होगा जहां पर लोग महात्मा गाँधी द्वारा किया गया सत्याग्रह मे शामिल नहीं हूऐ हो. इसका सबसे बड़ा कारण एक साधारण से साधारण आदमी- औरत को सिर्फ अपने मनमे संकल्प करना है कि मुझे इसमे शामिल होना है. इसके लिए अस्र – शस्र तथा गोपनियता की कोई जरूरत नहीं है. इसलिए हर जाति- धर्म, भाषा के लोगों ने हिस्सा लिया है. और जेल में जाने मे गौरव महसूस किया है. हिंसक कारवाईयों के लिए सबसे पहले गोपनियता, फिर हिंसा के लिए अत्याधुनिक हथियार और उन्हें चलाने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षण. इन सभी बातों के लिए हर तरह की मर्यादा की वजह से हर व्यक्ति इस गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता. और हिंसा मे (collateral damage) की बात निहित होती है. और हमेशा ही स्टेट द्वारा किया जाने वाली जवाबी कार्रवाई की वजह से सभी को शामिल करना युध्दनिती के हिसाब से भी अव्यवहारिक होता है. इसलिए संपूर्ण विश्व में आज महात्मा गाँधी के सत्याग्रह का अध्ययन किया जा रहा है. जनता के द्वारा संघटित रुप से किया जाने वाला अहिंसक प्रतिकार के सामने कोई भी बडा शस्त्र काम नहीं कर पाता. जिसका उदाहरण सभी क्रांतियों का अध्ययन करने के बाद पता चलेगा कि शस्त्रों की तुलनामे सबसे ज्यादा संख्या में लोगों का शामिल होने का नजारा देखने के बाद ही शासको को अपने शस्त्रों के साथ गद्दियों को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.
हालांकि गाँधी जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर भगतसिंह तथा भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफअलि के नेतृत्व में हुई हिंसक कारवाईयों को करनेवाले किसी भी क्रांतिकारी के हेतूओके उपर रत्तीभर का संशय नहीं करते हूए, उनके द्वारा किए गए हिंसक कोशिशों को भलेही नापंसद किया हो . लेकिन उन लोगों को भी अपने मतभेदों के बावजूद आदर और सम्मान के साथ ही महात्मा गाँधी जी ने तत्कालीन सरकारने उनके साथ अन्याय किया या उनके साथ कड़ी से कड़ी सजा देते वक़्त हस्तक्षेप किया है. उदाहरण के लिए भगतसिंह तथा आजाद हिंद फौज के कैदियों को छुड़ाने के लिए अच्छा वकिलो की फौज देना. तथा अंग्रेजी सरकार के उच्चधिकारियों के साथ पत्राचार करने के दस्तावेज मौजूद है. 20 मार्च 1931 को तत्कालीन व्हाईसरॉय लॉर्ड इरवीन को भगतसिंग की फांसी की सजा को कम करने के पत्र मे उन्होने लिखा है कि “Bhagat Singh’s and his colleague’s death sentence arguing that an execution would be an irreversible act that could be a grave error. He also emphasized that, while he disapproved of Bhagat Singh’s Violent methods, he was a father figure to the young man and pleaded for a stay to allow for further review of the case, highlighting the potential for misunderstanding and difficulty in his work if the execution proceeded.” यह पत्र लॉर्ड एरवीने पढने के बाद भगतसिंह और उनके साथियों की सजा फांसी से कम करने का सुझाव दिया था. लेकिन संपूर्ण पंजाब कैडर के अंग्रेज अफसरों ने सामुदायिक इस्तीफा देने का निर्णय लेने के बाद एरवीन ढिले पड गऐ. और दुसरी महत्पूर्ण बात खुद भगतसिंह और उनके साथियों की इच्छा नहीं थी की लोगो के आग्रह पर अंग्रेजों ने फांसी की सजा माफ हो गई तो मेरी देशप्रेम मे कमी आ जायेगी ऐसा भगत सिंह के मां को भगतसिंह ने कहा था.

हालांकि महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका अपने पारिवार के भरण-पोषण के लिए, नौकरी करने के लिए गए थे .लेकिन वहाँ पर भारतीय लोगों की परिस्थितियों को देखते हुए वहां की रंगभेदी अफ्रीकी गोरी सरकार के काले कानूनों के विरोध करने के लिए, किए गए, विभिन्न प्रकार की कोशिशों को करते हूए, (21) साल अपनी जिंदगी का आधे से ज्यादा समय रहने के दौरान. वह भारत में आने के समय, किसी भी प्रकार का सामना करने के लिए परिपक्व होकर लौटे थे. क्योंकि आने के बाद ही सबसे पहले उन्हें बिहार के किसानों ने 1916 के कलकत्ता कांग्रेस के अधिवेशन में विशेष आग्रह करते हूए उन्हें चंपारण के किसानोंने अपने उपर हो रहा अन्याय की दास्तान बताई. अग्रेजी जमींदारों के शोषण के खिलाफ, गाँधी जी भारत में आने के बाद सबसे पहला आंदोलन ( 1917 ) में शामिल होते है. उसके तुरंत बाद गुजरात के खेड़ा में भी किसानों के आंदोलन ( 1918 ) एक तरह से उनके सभी आंदोलन (दक्षिण अफ्रीका,1906 चंपारण (1917), खेडा(1918) , नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च- 1930), और भारत छोड़ो आंदोलन( 8-81942 ) ,यह उनके जीवन के सबसे प्रमुख आंदोलन में शामिल हो सकते हैं और तबतक वह अपने जीवन का सत्तर साल से अधिक उम्र के होने के बाद भी भारत के स्वतंत्रता के साथ, धर्म के आधार पर देश का बटवारा ( जिसके वह खिलाफ थे ) होने की वजह से पंजाब और बंगाल बिहार तथा दिल्ली में भिषण दंगे देखते हूऐ उन्होंने अपने आप को दंगो को रोकने के लिए झोक दिया था. सबसे पहले कलकत्ता और बाद में नोआखाली बिहार तथा दिल्ली और उसी दौरान उग्र हिंन्दुत्ववादी संघठन के लोगों ने उनकी हत्या कर दी.

वर्तमान समय में भारत और संपूर्ण विश्व की समस्याओं का समाधान ढूंढने में सबसे महत्वपूर्ण, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से संपूर्ण वैश्विक स्तर पर भिषण संकट शुरू हो गया है. जिसके लिए वर्तमान विकास के नाम पर चल रहे सभी तरह की परियोजनाओं के बारे में आज से 117 साल पहले महात्मा गाँधी ने ‘हिंदस्वराज्य’ नाम की सौ से भी कम पन्नौ की पुस्तिका इंग्लैंड के औद्योगिक क्रांति के बाद का तथाकथित विकास तथा संसदीय शासन प्रणाली को देख कर बहुत ही सुंदर प्रतिवाद लिखा है. जो हमे जॉन रस्किन से लेकर लिओ टॉलस्टॉय तथा थोरो, शुमाखर और वर्तमान में ग्रेटा थूनबर्ग और 1992 मे ही वैश्विक स्तर पर 1700 से अधिक संख्या में वैज्ञानिकों ने एक संयुक्त पत्र इस विषय पर लिखा है. इसे भी आज 34 साल से अधिक समय हो गया है. लेकिन संपूर्ण पृथ्वी का तपमान अंधाधुंध औद्योगिकीकरण की वजह से, दिन-प्रतिदिन बढने की वजह से, हमारे मौसम की सायकल मे गडबड़ी हो गई है. इस साल इंग्लैंड अमेरिका तथा कॅनडा मे प्रशांत महासागर मे तेजी से हुए सुपर एल नीनो और जलवायु परिवर्तन के कारण इन देशों को मई के महिने से ही अत्यधिक तापमान का सामना करना पड़ा. इतिहास का सबसे बड़ा 30 डिग्री सेल्सिअस तापमान 40 से अधिक दिन होने से हजारों लोगों की मौत हो गई, अमेरिका में तो जून से सितंबर के अंत तक दक्षिणी पश्चिमी और मैदानी इलाकों में भिषण हिटवेव चली 40 डिग्री सेल्सियस से 46 डीग्री सेल्सियस तक जिसकी वजह से पावरग्रिड फेल होने से ब्लेकाउट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. वही बात कनाड़ा में भी असामान्य तपमान और हीटवेव जून से सितंबर 2026 तक भयंकर गर्मी पडी जिसने कई शहरों के पुराने रेकॉर्ड तोड़ दिया है. और अत्याधिक गर्मि और सुखे पश्चिमी कनाड़ा मे और ओंटारिओ के जंगलो मे गर्मियों की वजह से आग लगने से लाखों हेक्टेयर जंगल तथा जीव-जंतुओं की राख हो गई है. कहां समुद्र के तुफान, तो कहीं पर अतिवर्षा, तो कहीं वर्षा नहीं के बराबर तो गर्मी और सर्दी के मौसम में परिवर्तन होने की वजह से, ध्रुव प्रदेश और पहाडों के ग्लेशियरों पिघलने की वजह से गर्मी के दिनों में बाढ आने की समस्याओं से लेकर जंगलों में आग लगने और ढंड के प्रदेशो मे गर्मी होने जैसी विश्व भर में आपत्तियों की शुरुआत हो गई है.
और भारत जैसे तथाकथित अविकसित देश की सरकारों को तो तथाकथित विकसित देशों के साथ बराबरी करने का नशा सवार होने की वजह से, हिमालय जैसे दुनिया के सबसे नऐ पहाड के क्षेत्र में जिस तरह का विकास के नाम पर विनाशकारी परियोजनाओं की भरमार चल रही है. उस वजह से भुस्खलन तथा बादल फटने से लेकर स्थानीय जनजीवन प्रभावित हो रहा है. और इसके वजह से संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में दिर्घकाल के लिए विनाश की कब्र खोदने का काम जारी है. और इस दौर में सबसे अधिक महात्मा गाँधी ने 117 साल पहले ही ‘हिंदस्वराज्य’ के माध्यम से चेतावनी दी है. संसद को उन्होंने एक वेश्याकी उपमा महिलाओं की माफी मांग कर दी है. क्या आज हमारे और वैश्विक संसदीय जनतंत्र को देख कर यह उपमा सही नहीं है ?

महात्मा गाँधी का अहिंसा का सिद्धांत काफी प्रमाण मे गौतम बुद्ध तथा येसू ख्रिस्त के जीवन सिध्दांतों के आधार पर खडा है. इसमे कोई शक नहीं, इसलिए कोई उनको दूसरे येसू ख्रिस्त या गौतम बुद्ध भी कहते हैं. लेकिन इन सभी महानुभावों का जीवन काल को दो ढाई हजार से अधिक वर्ष का समय हो गया है. और उसके बाद दुनिया में काफी युध्दो मे मनुष्य और वित्तीय हानि हुई है. लेकिन देश और दुनिया में वर्तमान समय में चल रहे संकट के दौर में महात्मा गाँधी के आगमन को आज 157 वर्ष पहले हो चुके हैं. और उसके बावजूद आज किसी भी बुध्दिजीवी की तुलनामे महात्मा गाँधी ही रंगभेद के खिलाफ की लड़ाई से लेकर, ग्लोबल वार्मिंग तथा सांप्रदायिक हिंसा से लेकर संसदीय राजनीतिक पतन की समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए संपूर्ण विश्व पुनः महात्मा गाँधी के द्वारा किए गए कोशिशों को बडी आशाओं से देख रहा है.अब इस बात को कोई व्यक्ति केंद्रित राजनीति बोल रहे हैं. लेकिन फ्रांस की क्रांति से अमेरिका की क्रांति तथा रशियन क्रांति और 77 वर्ष पहले की चीन की क्रांति के जनक भी वहाँ के लोगों से अधिक उन क्रांतिकारी नेताओं को ही सबसे अधिक जाने जाते हैं. लेकिन उन सभी क्रांतिकारी लोगों ने वहां के सत्ताधारी बनना स्विकार किया. शिवाय महात्मा गांधी के. इसलिए भी उनके बारे में हिरो का व्यकिकेंद्रित फकिर वाला फिनोमिना बना हुआ है.

हालांकि हिंन्दुत्ववादी राजनीति का जन्म ही महात्मा गाँधी के विरोध के लिए हुआ है. क्योंकि जबतक लोकमान्य तिलक जिवित थे तब सभी हिंन्दुत्ववादीयोको कॉंग्रेस अपने नजदीकी पार्टी लगती थी. इसलिए उन्होंने कोई अलग संघठन का निर्माण नहीं किया था. लेकिन तिलक की मृत्यु के बाद और वैश्विक स्तर पर हिटलर – मुसोलिनी के आगमन को देखकर, और भारत में महात्मा गाँधी के आगमन को देख कर, उनके सर्वसमावेशी राजनीतिक गतिविधियों देखकर, हिंदूत्ववादी संघटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म 1925 मे किया गया है. और उसके बावजूद संपूर्ण हिंदूओं पर प्रभाव कायम करने में कामयाबी नहीं मिल रही थी. अंततोगत्वा इर्ष्या और तिरस्कार करते हूए उनकी हत्या कर दी गई है. यही ‘हिंदू बनाम हिंन्दू’ का संघर्ष वर्तमान समय में चल रहा है.

रहा सवाल भाषा के बारे में गांधी जी की भूमिका वह खुद गुजराती भाषी थे. और उसके बावजूद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में देखा था कि अप्रवासी भारतीय लोगों मे लगभग भारत के लगभग सभी राज्यों के लोगों का समावेश था. और उनमे सबसे अधिक जनसंख्या मजदूरों की थी. जिन्हें अंग्रेजी सिखने मे दिक्कत हो रही है. तो हिंदूस्थानी (उर्दु तथा हिंदी का मिश्रण) मे संवाद की शुरुआत उन्होंने की थी. जीस कारण दक्षिण आफ्रिका की रंगभेदी सरकार के खिलाफ अप्रवासी भारतीयों को संघठित करने के लिए काफी उपयोग हुआ था.उसी अनुभव की वजह से महात्मा गाँधी पहले काँग्रेस के नेता हैं. जिन्होने 1885 से स्थापित काँग्रेस एलिट भारतीय लोगों का क्लब जैसे संघठन का कामकाज अंग्रेजी में चलता था. दक्षिण अफ्रीका से 21 साल रहकर हमेशा के लिए भारत में (1915) आने के बाद महात्मा गाँधी ने भारत के सर्वसामान्य लोगों को कॉंग्रेस मे शामिल करने से लेकर काँग्रेस पार्टी के अधिवेशनो मे हिंदूस्थानी भाषा का प्रयोग शुरू किया था. और इतना बड़ा शेकडो भाषा और हजारो बोलीभाषा बोलने वाले देश के भितर आपसी कम्यूनिकेशन के लिए कोई एक भाषा होनी चाहिए. इस एकमात्र उद्देश्य से हिंदी राष्ट्रभाषा प्रचार- प्रसार करने का प्रयास किया था. ना कि किसी भी भाषा का अपमान या उसका महत्व कम करने का रत्तीभर का इरादा नहीं था. लेकिन शॉर्टकट राजनीतिक इरादे वालें लोगों ने जातिवाद धर्म और भाषा का इस्तेमाल किया. जिसमें महाराष्ट्र की शिवसेना तथा भारतीय जनता पार्टी यह दोनों दल भाषा को लोगों मे ध्रुवीकरण करने के लिए इस्तेमाल शुरू किया है. जिसमें महात्मा गाँधी का राष्ट्रीय स्तर पर कम्यूनिकेशन के लिए हिंदी राष्ट्र भाषा प्रचार समिति का गठन किया था. उसमे राजनीतिक उदेश्य दूर- दूर तक नहीं था.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फेडरल स्ट्रक्चर को शुरुआती दिनों से ही विरोध में रहा है. उन्हें एक देश, एक भाषा, एक ही धर्म और एक ही प्रकार का खानपान से लेकर वेशभूषा यह सब तथाकथित ‘एकचालकानुवर्त’ फासिस्ट विचारधारा के अनुकरण के कारण वर्तमान समय में हमारे देश में चल रहा है. बंगला जैसे समृद्ध भाषाने तीन देशो को राष्ट्र गीत दिये हैं.रामकृष्ण परमहंस से लेकर स्वामी विवेकानंद चैतन्य महाप्रभु, पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय मायकेल मधुसूदन दत्त, काजी नझरूल इस्लाम,और संपूर्ण एशिया का सबसे पहला साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी बंगला भाषा के साहित्यिक रविंद्रनाथ टागोर और उनके गितांजली जैसे कविता संग्रह को (1913) मिला है. तथा 21 वी शताब्दी में महाश्वेता देवी से लेकर सुनिल गंगोपाध्याय जैसे प्रतिभाशाली बादल सरकार शंभू मित्र सत्यजीत रे, अमर्त्य सेन जैसे वैश्विक स्तर पर मशहूर हस्तियों के पश्चिम बंगाल और बंगला देश को मिलाकर तीस करोड से अधिक संख्या के लोगों की मातृभाषा है. और सिर्फ भाषा के आधार पर ही लाखों लोगों ने शहादत देते हूऐ एक अलग देश बनाने का उदाहरण भी बंगला भाषा को ही जाता है. उस भाषा में बोलने वाले मजदूरों मे भी मुस्लिम समुदाय के लोगों को विशेष रूप से निशाना बना कर संपूर्ण बंगाल का अपमान किया जा रहा है. जो हरतरह से निंदनीय कृत्य है. जिसे महात्मा गाँधी ने कदापि भी पसंद नहीं किया होता. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक ईकाई भारतीय जनता पार्टी की संकीर्ण मानसिकता के वजह से ही चल रही है . क्या इस परिप्रेक्ष्य में महात्मा गाँधी के निर्वेर- निर्भय बनने के लिए साधनसूचिता वाले रास्ते पर चलने की कोशिश करने की आवश्यकता है या नहीं है ? इसिलिये आज सुबह से शांति तथा सद्भावना के लिए कोलकाता के बेलियाघाट से शांतिनिकेतन के लिए दो हफ्तों की पैदल यात्रा सर्व सेवा संघ की तरफ से शुरु की जा रही है उस यात्रा को सफल बनाने के लिए हार्दिक शुभकामनाएं एवं बहुत यात्रा के आयोजकों को क्रांतिकारी अभिवादन.
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