साथियो इस साल के 24 अक्तुबर को भागलपुर दंगे को 37 साल पुरे हो रहे हैं. बटवारे के दौरान ( 1946 – 47) जिस तरह से हजारों की संख्या में लोग पारंपरिक हथियारों को लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के उपर हमला करने की शुरुआत भागलपुर के दंगे मे हुई है. गुजरात के दंगे भागलपुर के दंगों के तेरह साल के बाद (2002) हूऐ है. आजादी के बाद भागलपुर दंगे के पहले भी भारत में दंगे हुए हैं. लेकिन ज्यादातर दंगों की तिव्रता कुछ चंद गली – मोहल्ले तक होते थे. लेकिन भागलपुर दंगे में लगभग संपूर्ण भागलपुर कमिश्नरी का इलाका शामिल था. पडोसी मुंगेर, गोड्डा, बांका, साहेबगंज, दुमका तक के हिस्से इस दंगे की चपेट में आने की वजह से डेथ टोल और संपत्तियों का नुकसान ज्यादा हुआ है. इस दंगे के बाद ही हिंदुत्ववादी संघटनो ने लगातार बाबरी मस्जिद – रामजन्मभूमी मंदिर के विवाद को नियोजित ढंग से बढ़ावा देते हुए, संपूर्ण देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करते हुए, आज बीजेपी को दिल्ली के तख्त तक पहुंचने में सफल होने की वजह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को सत्तारूढ करने के लिए पुंजिपतियों ने अपनी थैलियां खोलकर मदद करने का काम किया है.

भारतीय जनता पार्टी को सांप्रदायिक कार्यक्रम देने की गलती (23 अप्रैल 1985 ) में इंदौर की एक महिला शाहबानो के तलाक के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने उसे राहत दिलाने के लिए दिये गये फैसले को, मुलतत्ववादी मुस्लिम समुदाय के दबाव में आकर “सवाल आस्था का है कानून का नही है ” इस तरह की संविधान की धज्जियाँ उडाने वाले नारेबाजी के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने, एक तरफ लोकसभा में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को (1986 Muslim Women Protection of Rights on Divorce Act, 1986 ) बदलने का काम लोकसभा में बिल लाकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलने और बाबरी मस्जिद के ताले 23 दिसंबर 1949 मे लगाऐ गए थे) जो 37 वर्षो के बाद 1 फरवरी 1986 के दिन को खोलने की गलतियों के कारण, सौ साल से अधिक समय से हिंदुत्ववादीयो की, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की राजनीति के लिए लॉन्चिंग पॅड बनाने के बाद, बटवारे के बाद सिंध प्रांत से विस्थापित लोगों में से एक आर एस एस के स्वयंसेवक जो बाद में बीजेपी नेता बन गए वह श्रीमान लालकृष्ण आडवाणी ने, बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमी के विवाद का उपयोग करते हूऐ ,सोमनाथ से आयोध्या तक की रथयात्राओके दौरान भागलपुर दंगे का आज ही के दिन 37 साल पहले, राममंदिर निर्माण के लिए देशभर से इटो को (शिलापूजा) इकठ्ठे करने वाली यात्रा के दौरान 24 अक्टूबर 1989 के दिन दंगेकी शुरुआत हुई थी. जिसे 37 वर्ष पूर्ण होने पर मै आज भारत की वर्तमान समय में चल रही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का मुल्यांकन करने की कोशिश कर रहा हूँ .

कहा जाता है “कि मुस्लिम बहुल तातारपूर चौक में इस यात्रा पर पथराव हुआ. ” हालांकि प्रशासन ने जब जुलूस को निकालने की परमिशन दी थी, तब तातारपूर के रास्ते से जुलुस जाने की मनाही थी. लेकिन हमेशा की तरह, जानबूझकर उसी रास्ते से जाना. जो रास्ते मुस्लिमों की बस्तियों से होते हैं. यह भी दंगे की पूर्वतयारी की ही योजना होती हैं. यही सिलसिला 79 साल के आजादी के बाद के लगभग सभी दंगों के बाद देखने में आया है. ज्यादा से ज्यादा दंगों में मुसलमानों की बस्ती में या उनके प्रार्थना स्थल के पास रुककर बाजा बजाने से लेकर,नारेबाजी करना, इसिलिए मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से जबरदस्ती से जुलूस निकालने से लेकर, मस्जिद में सुअर के मांस को फेकने या , मंदिर में गाय का मांस फेकने से, या मूर्ती की शक्ल को बिगाड़ने से लेकर गुलाल फेंकने जैसे सस्ते हथकंडे अपनाते हुए, और उसके तुरंत बाद ही जबरदस्त ढंग से अफवाहों को फैलाने के बाद ही, ज्यादातर दंगों की तिव्रता बढी हैं. भिष्म साहनी का ‘तमस’ शिर्षक से उपन्यास मे इसका बहुत ही सटीक वर्णन किया है. जो दूरदर्शन पर ‘तमस’ शिर्षक से ही हिंदी में टीवी सीरियल के रूप में यूट्युबपर उपलब्ध है.

सत्तर के दशक में महाराष्ट्र के जलगांव भिवंडी तथा महाड मे (7 और 8 मई 1970 के शिवजयंती के दिन हूऐ दंगों ) की जांच-पड़ताल के लिए मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पी. डी. मादान ( Dinesh Pirosha Madon ) एक सदस्यीय कमिशन ने अपनी रिपोर्ट में साफ – साफ लिखा है ” Bhiwandi – Mahad – Jalgaon Riots in the 1970 have abjured the Police from allowing indiscriminate passage to religious processions,) कि प्रत्यक्ष दंगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग थे या नहीं यह बात दिगर है. लेकिन दंगे के लिए लोगों की मानसिकता बनाने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 से लगातार मुस्लिमों के खिलाफ अपनी शाखाओं मे करता रहता है. और इसी कारण लोग बहुत बड़ी संख्या में दंगों में शामिल होकर, अल्पसंख्यक समुदायों के उपर हमले करने के लिये उद्युक्त होते हैं. ” और भागलपुर दंगा उसकी जिती – जागती मिसाल है.

मैं उस समय कलकत्ता वासी था. (1982 – 97) कलकत्ता भागलपुर का फासला 400 कीलोमीटर का है. भागलपुर कभी बंगाल प्रोविन्स का हिस्सा था.राज्य पूनर्रचना के बाद आज बिहार में है. बंगालियों की जनसंख्या भी अच्छि – खासी हैं. शरदचंद्र चटर्जी की ननिहाल यहिपर थी. उनके श्रीकांत उपन्यास का लेखन, भागलपुर-कलकत्ता की गंगा नदी के किनारे, और उसके जलयात्रा पर ही आधारित है. बँगला भाषा के कवि लेखक बनफूल,मशहूर विचारकों मेसे एक आशिष नंदी,फिल्म निर्माता तपन सिन्हाजी भी यही के थे. जो बाद में कामकाज के कारण भागलपुर से बाहर गये हैं .

वैसेही भागलपुर महाभारत कालीन शहर है. इसके बगल का चंपानगर यही पूराना भागलपुर, और अंगप्रदेश यानी महान योध्दा और सर्वस्व दान करने वाले मशहूर दानी कर्ण के अंगप्रदेश की राजधानी (चंपानगर भागलपुर का उपनगर ) रहा है. और इसीलिए भागलपुर की लोकल डायलेक्ट (बोली-भाषा) अंगिका है.

गंगा नदी के किनारे, और सबसे बडी विशेषता यही से गंगा, 90 डिग्री के कोण से बंगाल के तरफ मुडती है. इस कारण बहुत ही विशाल पात्र हैं. और डालफीन मछलियों की भरमार है. जो चांदनी रात में डालफीन मछलियों की उछलकूद देखकर मनविभोर हो जाता है.

भागलपुर की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार पाँच लाख के आसपास बताई जा रही है. शायद भागलपुर दंगे के दौरान 1989 मे ढाई-तीन लाख की रही होगी. जिसमें मुसलमानों का अनुपात 29% है. और हिंदूओकी जनसंख्या 70 % तातारपूर, चंपानगर इत्यादि मुस्लिम बहुल इलाके है. और उनका मुख्य व्यवसाय भागलपुर का मशहूर सिल्क बुनने का है. जो भारत में कम विदेशो में ज्यादा बिकता है. ज्यादातर यंत्रमाग के मलिक हिंन्दु मारवाडी है. मेहनत और हुनर के कारण कुछ मुसलमानों के भी यंत्रमाग होने लगे थे. जो दंगे मे चुन -चुन कर जलाए गए हैं. और इस करतूत के लिए, यंत्रमाग के हिंदुत्ववादी मालिको ने, पडदे के पिछेसे बाकायदा पैसे दे- दे कर मुसलमानों के उपर आक्रमण करने का काम करने के लिए पिछड़े जातियों के लोगों के द्वारा किया है. और लगभग ज्यादातर मारवाड़ी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना 1925 के समय से ही उसके समर्थक है. और आज उसी आर एस एस की राजनीतिक इकाई बीजेपी के समर्थक है.

वैसे गंगा नदी के किनारे बसे, हजारों-हजार सालों से लगातार बह रही गंगा की मट्टी से तैयार जमिन से इस शहर के अगल-बगलमे खेती भी अच्छी-खासी उपजाऊ होती है. चावल,दलहन तथा अन्य जरुरत की चीजे, सब कुछ यही उगाया जाता है. सब्ज़ियों मे हर तरह की सब्जी होती है जिसमें मुख्य रूप से परवल,खीरा,गोभी, आलू तथा अन्य सभी तरह की पत्ती वाली हरी सब्जियां प्रचुर मात्रा में होती है. फलोमे आम,केला कुछ हद तक लीची भी होती है.एक तरह से सुजलाम- सुफलाम इलाका है. बारह महीने हरियाली दिखते रहती है.

ज्यादातर मुसलमानों का बुनकरों में समवेश होता है. अन्य उससे सम्बंधित व्यवसाय जैसे धागा,मशीन और मशीनरी के लिए उसका,साजो-सामान,रिपेयरिंग,बुने हुये कपड़े की खरीद फरोख्त. हालाकि इसमे सबसे ज्यादा मारवाडीयोकी दखलंदाजी है. वजह पूँजी, उनके पास लागत लगाने के लिए बेतहाशा पैसा है. सो उन्हीका दबदबा इस धंदेमे है. इसलिए ज्यादातर मालिकोंमें मारवाडी है. इक्का दुक्का मुसलमानों में से कोई है. और लगभग ज्यादातर मारवाडी शूरू सेही आर एस एस परिवार के सदस्य हैं. या इन्हीकी वजह से आर एस एस भागलपुर में हैं. यह सिलसिला कम अधीक प्रमाणमे पुरे भारत का है. सभी साधन संपन्न, और उंची जाति के सामंतवादी मानसिकता के लोग अनायास ही आर एस एस के समर्थक होते हैं. क्योंकि यथास्थिति को बनाए रखना, यही आर एस एस का उद्देश्य होने के कारण सभी साधन संपन्न और उंची जाति के पूंजीवादी समाज ही आर एस एस का असली समर्थक वर्ग है. और दंगे के समय “गर्व से कहो हम हिंदू हैं.” के नारे की मदद से पिछडी, दलित और आदिवासियों को भी हिंदू होने का एहसास दिला कर मुसलमानों के उपर हमले करने के लिए, बहुत ही आसानी से उन्हें उकसाकर इस्तेमाल किया जाता है. भागलपुर से लेकर गुजरात के दंगों तक का यही नजारा है.

अविभाजित भारत का भी लगभग यही चरित्र रहा है. एक खास बात है कि दंगे को पडदे के पिछेसे जरूर आर एस एस ने हवा दी है. लेकिन डायरेक्ट एक्शन में संपूर्ण मंडल कैटिगरी के लोग शामिल थे. और इसके बारे में अधिकृत रूप से दंगे के बाद बिहार विधानसभा के चुनाव में (1990) हुए परिवर्तन में जनता दल के नेता श्री. लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बनने के बाद, मुझे बंगाल प्रदेश जनता दल के अध्यक्ष प्रोफेसर दिलिप चक्रवर्ती खुद पहल करते हुए, बहुत ही आग्रह करते हुए, अपने साथ पटना लालू प्रसाद यादव के साथ मिलने के लिए लेकर गए थे. शायद (1991-92) के समय की बात है. तो लालू प्रसाद यादव को उन्होंने मेरा परिचय देते हुए कहा कि ” मै महाराष्ट्र के राष्ट्र सेवा दल का एक कार्यकर्ता हूँ.” तो लालू प्रसाद यादव तपाक से बोलें की “मुझे मालूम है कि डॉ. सुरेश खैरनार अपने बंगाल के कुछ साथियों के साथ भागलपुर दंगे के बाद लगातार शांतिसदभावना के काम में लगे हुए हैं. ” तो मैंने कहा कि “अभी अभी आप सत्ता में आए हैं.जब दंगा हुआ तब काँग्रेस के एस. एन. सिन्हा मुख्यमंत्री थे. तो आप से मेरी विनम्र प्रर्थना है, कि आपको दंगे में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की शुरुआत करनी चाहिए. ” तो लालू प्रसाद यादव ने तुरंत कहा कि “मैं दंगे में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करुंगा. क्योंकि उसमें 99% प्रतिशत मंडल केटेगरी के लोग शामिल थे. हाँ हम आपको एक आश्वासन देते है, कि जबतक मैं लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री पदपर हूँ. उस दौरान अगर बिहार में कहीं भी दंगे हुए तो आप मुझे जिम्मेदार ठहरा सकते हो. लेकिन भागलपुर दंगे में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मत कहिए. सबके सब पिछड़े वर्ग के लोग हैं. ” उस मुलाकात के बाद मुझे बहुत बुरा लगा था. और मैंने दिलिपदा को वापसी के यात्रा में कहा था कि ” पार्लंमेट के बारे में 1909 में महात्मा गांधी ने अपनी छोटी सी किताब ‘हिंदस्वराज्य’ मे जो लिखा है, वह शतप्रतिशत सही है. उन्होंने तत्कालीन इंग्लैंड के राजनेताओं के नाम लेकर लिखा है, कि यह सभी पार्लियामेंट में लाचार है. चुनकर आने के लिए किसी भी प्रकार की समस्या पर समझौता करने को तैयार हो सकते हैं. आज लालू प्रसाद यादव से मुलाकात करने के बाद मुझे लगता है, कि वह अपने जनाधार को नाराज नहीं करना चाहते.

कुछ ही दिनों में भागलपुर दंगे के बाद भागलपुर में आए नए पुलिस कमिश्नर श्री. अजित दत्ता से फुर्सत से उनके आवास पर मिलने का मौका मिला. तो उन्होंने कहा कि “आप भागलपुर दंगे के बाद, भागलपुर आकर जब भी दंगे के बारे में बोलते हैं, तब पुलिस – प्रशासन के खिलाफ खुब बोलते हैं. यह मुझे मालूम है. लेकिन मैं आपको अपने अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ कि मेरे जीवन की कुल पुलिस की नौकरी में मैंने पांच मुख्यमंत्री देखे हैं. और लालू प्रसाद यादव यह छठवें है. तो मैंने लालूप्रसाद यादव पहले मुख्यमंत्री देखें जिन्होंने अपने मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेने के तुरंत बाद बिहार केडर के सभी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को संबोधित करते हुए, कहा कि “मैं लालूप्रसाद यादव आजसे बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद, मेरा आप सभी अधिकारियों को निर्देश है, कि मेरे मुख्यमंत्री के कार्यकाल में बिहार के किसी भी हिस्से में सांप्रदायिक दंगा-फसाद नही होना चाहिए,और कही हुआ तो मैं वहांपर खुद पटना से चलकर, उस जिले के कलेक्टर और एसपी को तलब करुंगा. और उनके कपड़े उतार कर गधे के उपर बैठाकर उनके मुंह पर कालिख पोतकर पूरे शहर में जुलूस निकालुंगा. “और बाद में बजरंग दल या सीमी, आर एस एस या किसी मुस्लिम तंजिम को देखूंगा.” अजित दत्ता ने कहा कि “सुरेशजी भारत के किसी भी दंगे में पटना, लखनऊ, मुंबई या गांधीनगर के गद्दी पर कौन मुख्यमंत्री बैठा है ? और सांप्रदायिकता के बारे में उसका मिजाज क्या है ? यह बात भी बहुत मायने रखती है. भले ही हमारे पुलिस का जवान आर एस एस की शाखाओं से निकल कर आया होगा लेकिन वह अपनी वर्दी को तभी दांवपर लगाएगा की जब उसे पता है कि पटना में बैठे हुए सरकार के मुखिया का मिजाज क्या है

तेरह साल के बाद गांधीनगर में 27 फरवरी 2002 के गोधरा कांड के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोधरा कांड को अपनी राजनीतिक गद्दी मजबूत करने के लिए कैसे – कैसे इस्तेमाल किए हैं ? यह बात आपके – हमारे सामने दर्जनों पत्रकार तथा जांच एजेंसियों के दस्तावेजों मे मौजूद है.इसलिए अजित दत्ता ने लालू प्रसाद यादव के बारे बारे में जो बताया वह सचमुच मेरे जैसे एक्टिविस्ट के लिए एकदम नया पहलू सिखने के लिए मिला है. जनरली हम सेक्युलर एक्टिविस्ट लोग भी हमेशा स्टेट के बारे में बायस होकर सोचते हैं. वैसे तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की शुरुआत अंग्रेजो के समय से ही शुरू की गई है. और उसकी ही वजह से आजादी के साथ – साथ भारत का बटवारा सांप्रदायिक आधार पर ही हुआ. यह सांप्रदायिक राजनीति का भयावह पहलू हमनें आजसे 79 साल पहले देखा है. महात्मा गाँधी जी की हत्या भी उसी दौरान आर एस एस से प्रशिक्षणप्राप्त स्वयंसेवक ने ही की है.और उससे कुछ सिखने की जगह हमारे देश में सांप्रदायिकता के आधार पर जो संघठन अंग्रेजों के समय से ही अंग्रेजो की शहपर शुरू किए गए थे. आज भारत में उन्होंने सत्ताधारी पार्टी बनने की हैसियत सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करते हूऐ ही बना ली है. और दिन-प्रतिदिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए नए – नए हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं. अभी – अभी संपन्न हुआ दुर्गा पूजा के उत्सव से लेकर पिछले महीने हुआ गणपति पूजा या श्रावण मास में कावडयात्रा या कुंभमेले तथा अलग- अलग प्रकार के धार्मिक आयोजन जिसमें तथाकथित धर्म गुरु तथा बाबा – महाराजो को प्रोजेक्ट करने के उदाहरण हमारे – अपने आखो के सामने ही है.

भागलपुर दंगे के तेरह साल बाद हूऐ गुजरात मे दंगे का भी यही हाल है. 27 फरवरी 2002 के दिन से शुरू किया गया, आजाद भारत के इतिहास का सबसे पहले दंगा जो शत-प्रतिशत राज्य प्रायोजित था. और वर्तमान समय के भारतीय प्रधानमंत्री उसके लिए सबसे ज्यादा उत्तरदायी है. और यह सिर्फ मै नहीं कह रहा हूँ. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयीजी ने खुद गुजरात के दंगों को देखते हुए, “मुख्यमंत्री ने राज धर्म का पालन नहीं किया यह अहमदाबाद में मोदीजी के मुहपर बोल कर आये है.” जो आज भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

भागलपुर दंगे की विदारकताको देखने के बाद मेरा आकलन है ” कि आने वाले पचास साल की भारतीय राजनीति सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द ही रहेगी. और आज 37 सालों के पश्चात वास्तव आप सबके सामने है. अब गंगा – जमुना , साबरमती और देश की अन्य नदियों से इतना सारा पानी बह जाने के बाद” भारत जोडो और नफरत छोडो” जैसे सांकेतिक अभियान करने पड रहे हैं . लेकिन आर एस एस अपने 101 सालों की यात्रा मे भारत के काफी बडे हिस्सेपर कट्टर हिंदुत्ववादी विचारो का प्रभाव डालने मे कामयाब हूऐ है यह वास्तव स्वीकार करते हूऐ हमे हमारी कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए. क्योंकि आर एस एस के संस्थापक भले ही महाराष्ट्र के ब्राम्हण रहे होंगे लेकिन आर एस एस ने कट्टर हिन्दुत्व की दिक्षा दलित आदिवासी तथा पिछडी जातियों के लोगों को भी देने की वजह से ही नरेंद्र मोदी, कल्याण सिंह, विनय कटियार,जैसे पिछड़ी जातियों मे पैदा हूऐ बच्चे बचपन मे आर एस एस की शाखाओं जाकर ही कट्टर हिंदुत्ववादी बने हैं.

मेरे हिसाब से सदियों से चली आ रही निचली जातियों की जातिगत कुंठा को गत पचासवर्षसे भी ज्यादा समय हो रहा है. आर एस एस ने बहुत ही चतुराई से हरावल दस्ते के तौर पर, इन जातियों को पुचकारते हुए, बहुत ही प्लानिंग के साथ, तथाकथित पिछडी जातियों के लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल करने की कोशिश 1973 के बाद बने तृतीय संघप्रमुख बालासाहब देवरस के द्वारा समरसता मंच तथा वनवासी कल्याण आश्रम जैसे भ्रामक नाम देते हूऐ, मै भ्रामक इस लिए लिख रहा हूँ कि आदिवासी की जगह वनवासी शब्द मतलब एक झटके में आदिवासी की मुलनिवासियों की संकल्पना को नकारते हूऐ उसे सिर्फ वनो मे रहने वाला वनवासी बोलना उसीतरह समता की जगह समरसता मतलब तुम जिस भी जाति मे पैदा हूऐ हो उसिमे रहते हूऐ समरस होकर हमेशा रहो इस चतुराई की आड मे उन्हे संघठित करते हूऐ, उन्हें हिंन्दू होने का एहसास दिलाते हूऐ ( ‘गर्व से कहो हम हिंन्दू है’ जैसे नारे की आड मे ) दंगे-फसाद,माबलिंचिग तथा गोहत्या के नाम पर अल्पसंख्यकों के उपर आक्रमण करने का काम उनके द्वारा कर ले रहे हैं. और नरेंद्र मोदी उसके सबसे बड़े उदाहरण के रूप में मौजूद है.

इसलिए सिर्फ ब्राह्मणोके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बोलनेवाले हमारे प्रगतिशील मित्र पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं. लेकिन खैरलांजि से लेकर भागलपुर, गुजरात दंगो मे प्रत्यक्ष रूप से भागीदारी ज्यादा तर पिछडी जातियों के लोगों की है. और इस बात का संज्ञान जबतक जातिनिर्मुलन करने वाले लोग नहीं लेते तबतक दंगे करने की परंपरा भी जारी रहने वाली है.

‘ हूँ किल्ड करकरे’ जैसी किताब लिखने वाले मेरे मित्र पूर्व आइपीएस अफसर एस. एम. मुश्रीफ ने तो मिल्ली गॅझेट नाम की अंग्रेजी पत्रिका में “आज भारत का एकमात्र राजनेता नरेंद्र मोदी है कि जो ब्रामणवादी आई बी और सीबीआई का बंदोबस्त करेंगे. ” ऐसा विश्वास किस आधार पर होता है ? और कमाल की बात यह लेख लिखने के दौरान नरेंद्र मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे. और 2002 का गुजरात का दंगा हो चुका था. जो आज भारत के सबसे बड़े पदाधिकारी प्रधानमंत्री बनने के बाद सभी एजेंसियों से लेकर, सभी संविधानिक संस्था और मिडिया तक किस तरह का और किस के लिए बंदोबस्त कर रहे हैं ? यह आज वास्तव आज संपूर्ण दुनिया के सामने मौजूद हैं. नरेंद्र मोदी सिर्फ गैरब्राम्हण है, इतनी सी बात पर फुले – आंबेडकर और शाहूमहाराज का, नाम लेने वाले लोगों को क्या हो गया था ? क्योंकि उम्र के शत्रहवे साल में, संघ की शाखा में जाने वाले आदमी से बहुजन बुध्दिजीवियों को उम्मीद दिखाई देना मेरे जैसे पचास साल सार्वजनिक जीवन में रहने वाले कार्यकर्ताको बहुत ही अचरज लगता है. और हमारे मित्रों की इस तरह की भूमिका को देखते हुए, बहुत ही हैरानी होती है.

बारह सालों से भी ज्यादा समय हो रहा है, नरेंद्र मोदी के कार्यकाल का जायजा लिया जाए, तो मेरे अजिज दोस्त मुश्रीफ का विशफूल थिंकिग वास्तव में आज पुरी तरह से सामने ही है. और नरेंद्र मोदी का सत्ता के उंचे पायदान के तरफ रथ जाने के वक्त ज्योतिबा फुले और डॉ. बाबा साहब अंबेडकर को मानने वाले काफी लोगों को नरेंद्र मोदी का जन्म सिर्फ पिछडी जातियों मे होने के कारण, “अगर आज संघ परिवार का बंदोबस्त अगर कोई कर सकता है,तो वह सिर्फ नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं. “यह भी हमारे इन मित्रों का खुद का डी कास्ट न होने का पर्याप्त प्रमाण है. इन लोगों को सिर्फ वह ब्राम्हण नही है. इतनी सी बात पर अगर कोई आर एस एस के बंदोबस्त करनेवाला लगने लगता है. यह मेरे जैसे 50 साल से अधिक समय से भारत में जाति-धर्मनिरपेक्ष समाज बनानेवाले कार्यकर्ता को हैरानी की बात लगती है.

वैसे ही खैरलांजि, झज्जर, हाथरस, वुलगढी, खर्डा, भीमा-कोरेगाव के सभी जगहों पर दलितों के उपर अत्याचार करने वाले कौन लोग है ? मध्य जातियों का जातिवाद कबतक ब्राम्हणी षड्यंत्र के नाम पर खपाने की कोशिश करेंगे ? शतुर्मुर्ग की तरह रेत में सर गडाने से काम नहीं चलेगा. मध्य जातियों का जातिवाद जबतक जारी रहेगा, तबतक जातिनिर्मुलन कभी भी नहीं होगा. यह मेरा आकलन भागलपुर दंगे के बाद से 37 सालों से लगातार लिख-बोल रहा हूँ. अगर सही मायने मे जाति-धर्मनिरपेक्ष,लिंगभेद के खिलाफ लड़ाई करकेही नया समाज बनाया जा सकता है, तो इस तरह के नरेंद्र मोदी जैसे सत्ता में मदमस्त लोगों के भरोसे आज दो सौ साल से भी ज्यादा समय हो रहा है. इसी तरह की निति के कारण आज यह दिन आये है. इसमेंसे मुक्त हुए बगैर सही मायने में जातिनिर्मुलन नहीं होगा.

बिहार में स्वतंत्रता के बाद 1967 तक लगातार काँग्रेसी सरकारे रही है. 1967 से डॉ. राममनोहर लोहिया के गैरकाँग्रेसवाद के सिध्दांत के कारण भारत में पहली बार मिलिजुली सरकारे बनने की शुरूआत अलग-अलग राज्योमें बननेका सिलसिला शुरू हुआ. जिसका नतीजा 1977 की जनता पार्टी की सरकार बनने के लिए गत 60 साल पहले से अधिक समय से जो भूमि तैयार की गई थी. उस बीच 1974 का बिहार-गुजरातके नवनिर्माण आन्दोलन ने ,रही सही कसर भी पूरी कर दी. इन सब आंन्दोलनोंमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार सबसे संघटित होनेके कारण सबसे ज्यादा लाभाविन्त रहा है. जिसकी वजह से वह आज केन्द्र में, और कई-कई राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रहा है.

दंगे के बाद के शांति सद्भावना के काम की शुरुआत में ही हमारे शांतिनिकेतन की मित्र वीणा आलासे, श्यामलीखस्तगिर, बाणी सिन्हा और मनिषा बॅनर्जी , मंदिरा मुखर्जी जैसी विद्यार्थीनो के साथ, बाबुपूर नाम की जगह पर मै और मनिषा ऊसके चप्पल खो जाने के कारण पिछे छूट गए थे. तो बाबुपूर के एक दरिद्री नारायण की प्रतिमूर्ति सज्जन ने हमें रोक कर पूछा की” हम लोग कौन हैं ? और कहाँ से आये हो ? और क्यों आए ?” एक साथ सवालों की झड़ी लगा दी. तो मैंने कहा “कि मै कलकत्ता से हूँ और यह लडकी शांतिनिकेतन से है. और आगे जो लोग निकले हैं, वह भी शांतिनिकेतन के है.” तो उसने पूछा “यहाँ काहे को आयें हो ?” तो मैंने “कहा कि यह जो दंगे मे चुन- चुन कर मुसलमानों के मकान मटियामेट किए है. यह सब देखने आये है. ” तो वह तपाकसे बोला कि” बहुत ही अच्छा हुआ. ” तो मैंने पुछा” कैसा अच्छा हुआ ?” तो वह बोला” कि हमारे रामजी के मंदिर को मियाँ लोग विरोध किया है.इसलिए ऊनके सब मकान तोड़ दिया है. ” तबतक वहां अच्छी-खासी भीड इकठ्ठा हो गई थी. तो मैंने उसके अधनंगे शरीर के तरफ इशारा करते हुए कहा कि “अगर मंदिर बनने से आपके शरीर पर नया कपडा आ जायेगा और बगल में ही एक टूटी फूटी झोपड़ी थी, तो उसे देख कर मैंने पुछा कि यह मकान आपका है. तो वह बोला कि हां हमरा ही है . तो मैंने कहा” कि अगर मंदिर के निर्माण के बाद आपका यह टूटा हुआ मकान अगर नया बन जाता है. या इसके अंदर आपको खाने-पीनेका पर्याप्त मात्रा में सामान, अगर मंदिर बनने से आ जाता है तो . तो हम आप मिलकर, दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर बनाने के लिए लग जायेंगे. तो वह बोला कि ऐसे कैसे होगा ? तो मैंने” कहा कि अगर आप लोगों ने जिनके मकान तोड़ दिया है. उनकी और आप की माली हालत में कुछ भी बदलाव नहीं होता है. तो ऐसे मंदिर और मस्जिद के झगड़े को तूल देना कहाँ तक ठीक है ?” तो भिडमेसे कोई बोला “कि ऐसे बात करने वाले आप पहले लोग आये हो. अबतक मंदिर-मस्जिद की ही बात करने वाले लोग आते रहे हैं. क्या आप लोग और नहीं आओगे ? ” यह बाबुपूर के एक फटेहाल सज्जन ने हमें रोक कर हमारे भागलपुर के भावी कार्यक्रम की दिशा तय करने के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया है. शायद आज सदतीस सालो के पस्चात भी मै भागलपुर लगातार आने की वजह क्या आप लोग फिर से नहीं आओगे के सवाल ने प्रेरित किया है.

क्योंकि वापसिके सफर में हम सभी कलकत्ता, शांतिनिकेतन के साथी, रातभर ट्रेन भागलपुर मे भविष्य में भी आने का संकल्प करने के बाद ही सो सके.और आज सदतीस साल हो रहे हैं. और हमारे भागलपुर के स्थानीय साथियों की मदद से लगातार भागलपुर के शांतिसदभावना का काम बदस्तूर जारी है.अब तो परिधि और गंगा मुक्ति, झुग्गी झोपड़ी संगठनों के साथीयो के अलावा राष्ट्र सेवा दल के और कुछ शिक्षक तथा जेपि आंदोलन के साथी रामशरण, उदय, ललन, डॉ. योगेन्द्र, रामपूजन,सार्थक भारत अनिरुद्ध,रिजवान, हुदा साहब, संगीता, राहुल, उसकी पत्नी शुषमा तथा कला केंद्र के शिष्यों की मदद से लगातार काम कर रहे हैं .

और एक तरह से इन, 37 सालों के बावजूद देश भर में 1992 और अन्य समय में काफी सारे दंगे हुए है. लेकिन हमें फक्र है कि “भागलपुर मे एक कंकड़ भी नहीं उठा है. यह हमारे सभी साथियों का अथक प्रयास से ही संभव हुआ है.

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