बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक पुनर्जन्म के लिए, फिलिस्तीन का अस्तित्व समाप्त करने के लिए ही, यह लड़ाई पिछले डेढ़ सालों से अधिक समय से शुरू की गई है, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही बेंजामिन नेतन्याहू के साथ में हैं।

14 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने भारत छोड़ने के पहले जैसे पाकिस्तान की निर्मिति की है, बिल्कुल वैसे ही ‘बाँटो और राज करो’ की कूटनीति के अंतर्गत 15 मई 1948 को फिलिस्तीन से निकलने के पहले उसे बाँटकर इजराइल नाम के एक और नए देश का निर्माण किया है, क्योंकि भू-राजनीति के हिसाब से फिलिस्तीन का भूगोल लगभग पृथ्वी के मध्य बिंदु पर स्थित है।

और गोरों की न्यायप्रियता का कमाल देखिए, फिलिस्तीन में मूलनिवासि अरबों की जनसंख्या ज्यादा रहने के बावजूद यहूदियों को 55% फिलिस्तीनी जमीन का हिस्सा दे देते हैं। और इसी से नाराज होकर फिलिस्तीनियों की तरफ से 15 मई 1948 से 8 महीने की लड़ाई की शुरुआत होती है, जिसमें फिलिस्तीन की तरफ से सभी अरब देश होते हैं और इजराइल के साथ सभी पश्चिमी देश।

फिलिस्तीनियों को जबरन उनके घरों से निकाला जाता है। अरब मुस्लिम इस दिन को ‘अल नकबा’ यानी विनाश के दिन के तौर पर याद करते हैं। जुलाई 1949 तक इजराइली सेना साढ़े सात लाख फिलिस्तीनियों को निकाल चुकी होती है। 1949 में युद्धबंदी के ऐलान के साथ जंग रुकती है।

इस युद्ध के बाद फिलिस्तीन का ज्यादातर हिस्सा इजराइल के कब्जे में चला जाता है। जो जमीन जॉर्डन के कब्जे में थी, उसे आज वेस्ट बैंक के नाम से जाना जाता है, और जो हिस्सा सिनाई रेगिस्तान से सटा हुआ है जो इजिप्त के कब्जे में था, वही आज की गाजा पट्टी है, जहाँ से 7 अक्टूबर 2025 के दिन हमास ने हमला किया, ऐसा बेंजामिन नेतन्याहू का आरोप है। और उसने तथा इजराइल एवं अमेरिका ने मिलकर गाजा पट्टी को बर्बाद करने के लिए संयुक्त युद्ध शुरू कर दिया, जिसमें अब तक एक लाख से अधिक संख्या में लोग मारे गए, उसमें आधी संख्या बच्चों की है, और गाजा पट्टी खंडहर में तब्दील कर दी गई है।

फिलिस्तीन की राजधानी यरूशलम को भी दो हिस्सों में बांटा जाता है: एक जॉर्डन के पास होता है, तो एक पर इजराइल का कब्जा हो जाता है। 28 मई 1964 को अरब लीग की बैठक काहिरा में हुई थी, और उस बैठक में 2 जून 1964 के दिन फिलिस्तीन को इजराइल से आजाद करने के लिए ही एक संगठन की स्थापना की गई है, जिसका नाम पैलेस्टाइन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) है, और वह यूएनओ में नॉन-मेंबर ऑब्जर्वर की हैसियत से 1974 के ‘ओस्लो अकॉर्ड’ की वजह से बैठता है।

1967 के युद्ध में इजराइल, इजिप्त और सीरिया को हराकर ईस्ट यरूशलम, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी तथा गोलान हाइट्स पर कब्जा कर लेता है। इसे (Six-Day War) छः दिनों का युद्ध भी कहा जाता है, और इजराइल ने कब्जा किए हुए इलाकों में यहूदियों की कॉलोनियों का बसाना शुरू किया, और हजारों की संख्या में फिलिस्तीनियों को अपना घर छोड़ना पड़ता है। यही सिलसिला इजराइल के जन्म से आज तक लगातार जारी है।

1973 में अरब देशों का समूह इजिप्त के नेतृत्व में एक बार फिर इजराइल पर हमला करता है। यह हमला यहूदियों के पवित्र दिन, नए साल के दिन यानी ‘योम किपुर’ 6 अक्टूबर को किया जाता है। इजराइल फिर एक बार अमेरिका की मदद से अरब देशों को हरा देता है।

1974 के UN के प्रस्ताव 181 के तहत फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांट दिया जाता है—एक यहूदियों के लिए और दूसरा अरब मुस्लिमों के लिए। और उसी समय यरूशलम को इंटरनेशनल सिटी घोषित किया जाता है। UN के इस प्रस्ताव को यहूदी सिर्फ कूटनीतिक रूप से पसंद करते हैं, लेकिन अरब देश इसे स्वीकार करने से मना कर देते हैं।

1978 में इजिप्त के राष्ट्रपति अनवर सादत और इजराइल के प्रधानमंत्री मेनाचेम बेगिन के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर शांति समझौता कराने की कोशिश करते हैं। इसे ‘कैम्प डेविड एकॉर्ड’ के नाम से जाना जाता है, और इस तथाकथित शांति समझौते की वजह से ही नोबेल पुरस्कार कमेटी अपने विश्व प्रसिद्ध ‘शांति पुरस्कार’ से सम्मानित दोनों राष्ट्राध्यक्षों को बाँटकर करती है। हालांकि इसके तहत दिए गए सुझावों का कभी भी पालन नहीं किया गया है, वह बात अलाहिदा है।

6 जून 1982 को इजराइल फिलिस्तीनी उग्रवादियों पर हमला करने के लिए लेबनान में घुसपैठ करता है। इसमें इजराइल के समर्थन वाले मिलिशिया, बेरुत के कैंपों में रह रहे कई सौ से अधिक फिलिस्तीनी शरणार्थियों को मार डालते हैं।

1987 में फिलिस्तीन पहले ‘फर्स्ट इंतिफादा’ यानी विद्रोह की शुरुआत करता है। वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी और इजराइल में हिंसक झड़पें शुरू होती हैं जो पूरे 1987 के साल भर तक जारी रहती हैं। दोनों तरफ के लोगों की जानें जाती हैं। इसी गड़बड़ी का फायदा उठाकर इजराइल यरूशलम को अपनी राजधानी घोषित कर देता है, और अमेरिका उसका तुरंत समर्थन कर देता है।

1993 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की अगुवाई में छह महीनों तक चली गुप्त बातचीत के बाद इजराइल और फिलिस्तीन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन के बीच दो समझौते कराए जाते हैं। इसे ‘ओस्लो एग्रीमेंट’ का नाम दिया जाता है। इस एग्रीमेंट के बाद भी दोनों देशों के बीच कोई हल नहीं निकल सका।

नई शताब्दी की शुरुआत में ही 2000 में फिलिस्तीनियों की तरफ से ‘सेकंड इंतिफादा’ की शुरुआत होती है। इसकी वजह इजराइल के नेतृत्व में एरियल शेरोन का मुस्लिमों के लिए पवित्र मानी जाने वाली जेरूसलम की ‘अल-अक्सा’ मस्जिद में जाना बनता है। दरअसल ईसाई और यहूदी भी इसी जगह पर स्थित अपने पवित्र स्थल टेंपल माउंट और वैलिंग वॉल को मानते हैं।

2002-2004 के दौरान इजराइल आत्मघाती हमलों की जवाबी कार्रवाई में वेस्ट बैंक में घुसपैठ कर देता है, और इजराइल की इस कार्रवाई को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) बताता है कि वेस्ट बैंक और गोलान हाइट्स में इजराइल का कब्जा गैरकानूनी है। लेकिन इजराइल हमेशा की तरह इस फैसले की भी अनदेखी करता है। और इसी साल 11 नवंबर 2004 को पैलेस्टाइन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख यासर अराफात की मृत्यु पेरिस के अस्पताल में संशयास्पद स्थिति में होती है।

2006 को, 38 सालों तक गाजा पट्टी को कब्जे में रखने के बाद, इजराइल की सेना गाजा पट्टी को छोड़कर चली जाती है, और उसके बाद ‘हमास’ गाजा पट्टी में हुए चुनावों में जीतकर सत्ताधारी पार्टी बन जाती है। और आज भी दोबारा चुनाव जीतकर गाजा पट्टी पर ‘हमास’ का ही राज जारी है, जिसे आज विश्वभर की मीडिया आतंकवादी संगठन बोल रही है।

2008 में फिलिस्तीन इजराइल पर इजिप्त द्वारा भेजी गई मिसाइल के साथ हमला करता है, और जवाबी कार्रवाई में इजराइल भी गाजा पट्टी पर हमला करता है। इस लड़ाई में फिलिस्तीन के 1110 लोगों की जान चली जाती है, जबकि इजराइल के 13 लोगों की मौत होती है।

2012 में इजराइल हमास के मिलिट्री चीफ अहमद जबारी को मार डालता है। बदले में गाजा पट्टी की तरफ से रॉकेट दागे जाते हैं, इजराइल एयरस्ट्राइक करता है। इसमें इजराइल के छह और फिलिस्तीन के 150 लोगों की मौत हो जाती है।

2014 में हमास के मिलिटेंट 3 इजराइली बच्चों को मार देते हैं, और बदले में इजराइली मिलिट्री हमला करते हुए सात हफ्ते तक लड़ाई जारी रखती है। इस लड़ाई में फिलिस्तीन के 2200 और इजराइल के 67 सैनिकों की तथा छः बच्चों की मौत होती है।

2017 में अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यरूशलम को इजराइल की राजधानी घोषित कर देते हैं, और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरूशलम में स्थानांतरित करने की घोषणा करते हैं।

2018 में गाजा पट्टी में जबरदस्त प्रदर्शन शुरू होता है और इजराइली सेना के ऊपर पथराव किया जाता है, क्योंकि फिलिस्तीन के पास कोई हथियार नहीं होते हैं। जवाबी कार्रवाई में इजराइल की सेना 170 प्रदर्शनकारियों को मार गिराने का काम करके ही दम लेती है।

मैंने यह क्रोनोलॉजी जानबूझकर देने की एकमात्र वजह “खरबूजा तलवार पर गिरा या तलवार खरबूजा के ऊपर गिरी, आखिर में नुकसान खरबूजा का ही होता है” इस कहावत के अनुसार 14 मई 1948 के दिन फिलिस्तीन के भीतर इजराइल की निर्मिति करने के बाद और आज 10 अक्टूबर 2026 के दिन बचे हुए कुल मिलाकर फिलिस्तीन का क्षेत्रफल, 14 मई 1948 के बाद से अब तक लगातार इजराइल हर लड़ाई में फिलिस्तीन के क्षेत्र को अपने क्षेत्र में शामिल करते हुए, फिलिस्तीन का क्षेत्रफल अब दस प्रतिशत से भी कम में सिमटकर रह गया है।

और मैं दावे के साथ लिख रहा हूँ कि इस मौके का फायदा उठाकर इजराइल गाजा पट्टी में रहने वाले सभी फिलिस्तीनियों का सफाया करके गाजा पट्टी को इजराइल का हिस्सा बनाने के मौके के रूप में इस्तेमाल किए बगैर नहीं रहेगा, क्योंकि बेंजामिन नेतन्याहू को उग्र जिओनिस्ट राष्ट्रवाद का बुखार पैदा करके अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा बनाने के लिए जो मौका मिला है।

और तथाकथित पश्चिमी देशों से लेकर भारत के वर्तमान सत्ताधारी उग्र हिंदुत्ववादी तत्व, जिनके प्रतिनिधि वर्तमान सत्ताधारी दल और उसके साथ शामिल तथाकथित मीडिया, 7 अक्टूबर के बाद लगातार इजराइल की तरफ से अपने आपको दिखाते हुए, अप्रत्यक्ष रूप से इस्लाम के खिलाफ मामला दिखाते हुए, भारत में आने वाले समय में चुनाव प्रचार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। और इसीलिए प्रधानमंत्री पद पर बैठे हुए नरेंद्र मोदी ने एक क्षण का इंतजार न करते हुए अपने खुद के ट्विटर हैंडल से ‘इजराइल के साथ भारत है’ की घोषणा कर दी है, और इसी साल के फरवरी महीने के अंतिम सप्ताह में अचानक इजराइल में पहुंचकर इजराइल को हमारी ‘पितृभूमि’ जैसे गैरजिम्मेदाराना बयान देकर, अप्रत्यक्ष रूप से 28 फरवरी से इजराइल को ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने का सिग्नल देकर आए हैं। यहीं से भारत की नॉन-अलाइनमेंट परराष्ट्र नीति को दफन करके आए हैं, जिसकी वजह से 3000 सालों से चले आ रहे ईरान के साथ के संबंधों को भी दफन करने से भारत के लिए हर तरह से घाटे का सौदा करके गले में कोई मेडल प्राप्त करने के बाद लौट कर आना शत-प्रतिशत भारतीय हितों की अनदेखी किए है।

और वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 में भले ही हिटलर और मुसोलिनी की नकल करते हुए अपने संगठन की स्थापना की होगी, लेकिन 14 मई 1948 से इजराइल वजूद में आने के तुरंत बाद ही चारों तरफ से इस्लामिक मुल्कों से घिरा हुआ ‘इजराइल’ मुसलमानों को ‘नाकों तले चने चबवा रहा है’, यह बात संघ के द्वारा इजराइल के बारे में लिखे जा रहे साहित्य में भरमार है। और किसी समय में फासिस्ट मॉडल का अनुकरण करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज जिओनिस्ट इजराइल का हिमायती बन गया है, और इसीलिए नरेंद्र मोदी ने बगैर कोई देर किए हम इजराइल के साथ होने का ऐलान कर दिया है।

हर लड़ाई हो या झड़प, इजराइल के लिए बचा-कुचा फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा करने के मौके के तौर पर इस्तेमाल करने की कृतियों को देखते हुए लगता है कि इजराइल बहुत ही चालाकी से फिलिस्तीन के लोगों को उकसा-उकसाते हुए और यूएनओ के किसी भी प्रस्ताव को न मानते हुए इजराइल का विस्तार करने के लिए उन सभी घटनाओं का इस्तेमाल करता है, और अमेरिका उसे सपोर्ट करने का काम करते रहता है।

और 7 अक्टूबर शनिवार के दिन हमास द्वारा किए गए हमले के बाद भी, भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे हुए इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह वरदान साबित हुआ है, क्योंकि नेतन्याहू ने अपने भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त होने के लिए इजराइल की सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारों को कम करने के लिए बिल जो पास करा लिया है।

और इजराइल की जनता काफी समय से उसके खिलाफ जबरदस्त आंदोलन कर रही है, और हमास के इस हमले से स्वाभाविक रूप से आंदोलन को रोकने से लेकर विरोधी दलों को नेतन्याहू को सपोर्ट करने के लिए मजबूर कर दिया है। इसलिए मुझे इस हमले के बारे में काफी शंकाएं दिखाई दे रही हैं, क्योंकि हमास की निर्मिति खुद इजराइल ने ही पीएलओ के प्रभाव को कम करने के लिए स्थापित की थी।

क्योंकि अमेरिका में बैठी हुई जिओनिस्ट लॉबी जबरदस्त सक्रिय रूप से अमेरिका में अपनी भूमिका निभाने का काम करते रहती है, और अमेरिका में भले ही रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति हो या डेमोक्रेटिक पार्टी के, उन्हें इजराइल की तरफ से सतहत्तर सालों से लगातार अंधे होकर सपोर्ट करते हुए देखा जा सकता है। वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन में दोनों में स्पर्धा चल रही है कि कौन सबसे ज्यादा इजराइल की तरफ से है। और इतिहास के क्रम में हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजराइल को मदद देने से लेकर यूएनओ में इजराइल को बचाने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया है।

अमेरिका और अंग्रेजों के फिलिस्तीन के ऊपर राज का मिलाजुला षड्यंत्र की पैदाइश है आज का इजराइल। 1907 में ‘चैइम वाइज़मैन’ नाम का एक यहूदी केमिस्ट, ब्रिटेन को महायुद्ध में नया और प्रभावशाली बम बनाने के लिए केमिकल खोजकर देने की वजह से, ब्रिटेन ने उसे खुश होकर कहा, “चाहें वह माँगो, हम आपकी इस मदद के एवज में कुछ भी देने के लिए तैयार हैं।” तो वह पहले से ही यहूदियों का बड़ा लीडर होने के नाते उसने अपनी कौम के लिए फिलिस्तीन में यहूदियों को राष्ट्र देने की मांग की। उस समय फिलिस्तीन ब्रिटेन के कब्जे में था, और वह पहली बार फिलिस्तीन जाता है, वह वहाँ के इलाके में कंपनी खोलता है जिससे फिलिस्तीन में इजराइल की नींव पड़ती है। इसके 3 साल के भीतर एक यहूदी नेशनल फंड बनाया जाता है जिससे फिलिस्तीन में यहूदियों की कॉलोनी बसाने के लिए जमीन खरीदी जाती है।

इसके चलते ‘मर्ज बिन आमेर’ में पहली बार 60,000 फिलिस्तीनियों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। विरोध के बावजूद सालों तक फिलिस्तीन में यहूदियों की एंट्री का सिलसिला और फिलिस्तीन के लोगों को फिलिस्तीन छोड़कर जाने का सिलसिला जारी है। 14 मई 1948 में इस इलाके में यहूदियों के लिए अलग देश इजराइल की स्थापना होती है।

मुझे इस भूभाग में आज से पंद्रह साल पहले पहला एशियाई देशों की तरफ से अमन-ओ-कारवान के बहाने जाने का मौका मिला है, और गाजा पट्टी में एक सप्ताह तक रहने का मौका मिला है।

इसलिए यह हमला मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि जिस 27/9 साइज की और 20-25 लाख के भीतर आबादी वाली गाजा पट्टी में इजराइल ने बंदरगाह से लेकर एयरपोर्ट तक नष्ट कर दिए हैं, और मिलिट्री का सवाल ही नहीं पैदा होता है—अपने यहाँ जैसे होमगार्ड होते हैं, वैसे ही कुछ गार्डों को मैंने देखा था—और सब कुछ तो इजराइल के भरोसे पानी, बिजली, संचार के साधनों से लेकर सीवेज सिस्टम, सब कुछ इजराइल की मेहरबानी पर चल रहे हैं। गाजा पट्टी के सभी व्यवहारों पर इजराइल का कब्जा है। इस कारण मुझे तो वह संसद और तथाकथित गाजा पट्टी की आजादी एकदम नकली ही लगी थी, और हमास की सरकार गाजा पट्टी पर राज करने का राज भी इजराइल ही है।

हमें गाजा की संसद को संबोधित करने का मौका मिला है, और हमने कहा, “कि जब तक फिलिस्तीन की मांग धर्म से ऊपर उठकर वियतनाम के जैसे मानवीय आधार पर नहीं होती, तब तक फिलिस्तीन को संपूर्ण विश्व के लोगों का सपोर्ट नहीं मिल सकता। इसलिए मेरी सलाह है कि फिलिस्तीन को सिर्फ इस्लाम धर्म के लोगों का सपोर्ट देखते हुए, अन्य लोगों को लगता है कि यह तो मुसलमानों का आपसी धार्मिक मामला है, हमें क्या करना है? इसलिए फिलिस्तीन की मुक्ति के लिए व्यापक स्तर पर कोशिश करते हुए हमें इस मुद्दे पर व्यापक आधार पर बात करना चाहिए। और मैं ‘भारत-फिलिस्तीन सॉलिडेरिटी फोरम’ के अध्यक्ष के नाते आप लोगों को आश्वस्त करते हुए घोषणा करता हूँ कि फिलिस्तीन की लड़ाई अपने अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई है, और इसे मानवीय आधार पर विश्व के सभी सभ्य समाज के लोगों को समर्थन देना चाहिए।” मुझे खुशी है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री महमूद अब्बास ने जवाब दिया कि “हम आपकी बात से शत-प्रतिशत सहमत हैं, और हमारे साथ गाजा पट्टी तथा वेस्ट बैंक में रहने वाले ख्रिस्ती तथा कुछ यहूदी लोग भी हमारे साथ शामिल हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया पश्चिमी देशों के कब्जे में होने की वजह से फिलिस्तीन की लड़ाई के बारे में इस्लाम धर्म का आपसी मामला है, ऐसा प्रचार-प्रसार करते रहता है। आप अभी कुछ दिनों से गाजा पट्टी में रह रहे हो, क्या आपको यहाँ पर सिर्फ अरब मुस्लिम समुदाय के लोग ही दिखाई दे रहे हैं?”

और गाजा पट्टी के एक तरफ कैस्पियन (भूमध्य सागर) समुद्र है, और दूसरी तरफ से इजराइल ने 25-30 फीट ऊंची कंक्रीट की दीवारों से गाजा पट्टी को घेर कर रखा है। और एक छोटे से भूभाग जो इजिप्त के सिनाई रेगिस्तान से सटा हुआ है, जिसे राफा बॉर्डर बोला जाता है, वही गाजा पट्टी के लोगों के लिए विश्वभर में आने-जाने का एकमात्र रास्ता है। इजिप्त के राष्ट्रपति अनवर सादत के समय से ही इजराइल के साथ शांति वार्ता करने की वजह से इजराइल के इशारे पर इजिप्त भी नाचता है, और यह नजारा हम लोग खुद अपनी आँखों से देखकर लिख रहे हैं। तो 7 अक्टूबर को इतना बड़ा असलहा हमास के पास कैसे पहुँचा? यह मेरे लिए पहेली है।

1917 प्रथम विश्वयुद्ध में ऑटोमन एम्पायर की हार के बाद फिलिस्तीन पर ब्रिटेन कब्जा कर लेता है। उस समय यहाँ ज्यादा आबादी अरब मुस्लिमों की होती है और यहूदी अल्पसंख्यक होते हैं। 1920-40 के दौरान यूरोपीय देशों में यहूदियों के खिलाफ नफरत की भावनाओं को पैदा करने का अभियान हिटलर के द्वारा पैदा किया जाता है, तो ब्रिटेन को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाने का काम सौंपा जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की फौज लाखों यहूदियों का नरसंहार करती है, इस कारण विश्व की बहुत बड़ी आबादी के लोगों की यहूदियों के प्रति सहानुभूति रही है। और इसी परिस्थिति का फायदा उठाकर जिओनिस्ट लॉबी ने एलाइड फोर्सेज के देशों के माध्यम से यहूदियों के लिए अलग देश इजराइल को जमीनी हकीकत में तब्दील कर लिया है। और आज सतहत्तर सालों से लगातार अशांति और युद्ध की संभावना बनी हुई है, जब तक फिलिस्तीन की समस्या का समाधान नहीं होता है, तब तक ऐसा ही चलते रहेगा। क्योंकि 1948 के बाद समय-समय पर हुए हमलों की वजह से लाखों की संख्या में फिलिस्तीनियों को पलायन करते हुए पड़ोसी देशों में पनाह लेने के लिए इजराइल ने मजबूर कर दिया है। और हमें बेरुत, दमिश्क के फिलिस्तीनी निर्वासित लोगों की कॉलोनियों में जाने का मौका मिला है। बहुत ही बुरी स्थिति में उन लोगों को रहते हुए देखकर मुझे उस रात को नींद नहीं आई, और रात को सोने के पहले खाना खाने का मन नहीं हुआ, और रातभर मन में सोचते रहा कि विश्व के किसी भी कौम को इस तरह अपने जन्मस्थान से विस्थापन होने की नौबत नहीं आनी चाहिए; फिर वह हमारे अपने देश के कश्मीरी पंडित हों या पिछले तीन सालों से मणिपुर के मैतेई और कुकी समुदाय के लोग हों। असली सवाल राष्ट्र-राज्य का पचड़ा है, जिसकी विश्वकवि रविंद्रनाथ ठाकुर ने बहुत पहले ही आलोचना की है, और मैंने भी।

इजराइल की मिलिट्री के द्वारा वेस्ट बैंक स्थित जेनिन के फिलिस्तीनी शरणार्थियों के शिविर, जिसमें 1948 के युद्ध से विस्थापित फिलिस्तीनी लोग जो 18000 के ऊपर जनसंख्या में हैं (“Operation Home and Garden”, जो उस साल की इजराइल की करतूतों का मामला है) और इस तरह से मूल निवासी फिलिस्तीनियों को जिसमें बड़ी संख्या में अरब मुस्लिम और ख्रिश्चन धर्म के लोग भी हैं, लगभग संपूर्ण वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में यही हाल है।

वैसे भी यहूदी पैदाइशी यरूशलम को अपना घर मानते हैं। इनका दावा है कि यह जमीन भगवान ने अब्राहम और उनके वंशजों को सौंपी थी, ऐसा मानकर चलते हैं, और दूसरी बात वह ईश्वर की एकमात्र चुनी हुई कौम हैं (Chosen people)। इसी मानसिकता के लोग ज्यादातर जिओनिस्ट होते हैं, और हिटलर भी इसी मानसिकता की वजह से यहूदियों के खिलाफ रहा है। और भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय संघ प्रमुख, सबसे लंबे समय तक रहे हुए (1940-73, 33 साल) श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने भी अपनी किताबों में अन्य धर्मों के लोगों को कमतर कहते हुए उन्हें बहुसंख्यक समुदाय की सदाशयता के आधार पर ही निर्भर रहना चाहिए तथा उनके मताधिकार के अधिकारों को वापस लेने का तर्क दिया है, जो भाजपा एसआईआर (SIR) की आड़ में मतदाताओं को छाँटने का काम कर रही है।

और इजराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू उन सभी सांप्रदायिक ‘जिओनिस्ट’ के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं। यह हमला उनके लिए राजनीतिक संजीवनी का काम करेगा, क्योंकि पिछले कई दिनों से इजराइल की जनता बेंजामिन नेतन्याहू के भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चल रहे मामलों की वजह से इजराइल की न्यायिक व्यवस्था पर नकेल कसने के निर्णय लेने के विरोध में इजराइल में जबरदस्त विरोध का आंदोलन चल रहा है। और वैसे भी बेंजामिन नेतन्याहू अल्पमत में हैं और बड़ी मुश्किल से वह प्रधानमंत्री के पद पर टिके हुए हैं। और इस हमले के बाद इजराइल के विरोधियों ने कहा कि हम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हैं—मतलब इस हमले के पीछे कौन हो सकता है? यह शक-शुबहा निर्माण होता है। इसलिए भारत की वर्तमान सरकार ने भले ही इस घटना में “हम इजराइल के साथ हैं” और हमास की भर्त्सना करते हुए, सरकारी मीडिया अपनी ट्रायल में तथाकथित रक्षा विशेषज्ञों को लेकर गाजा पट्टी के अस्तित्व को खत्म करने से लेकर फिलिस्तीन को अरबों से मुक्त कराने की वकालत करते हुए, ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध में तथाकथित मौन धारण करने को देखकर, उनकी विशेषज्ञता के होने पर मुझे सवालिया निशान लगाने के लिए मजबूर कर दिया है।

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