12 अक्तूबर को डॉ. राममनोहर लोहिया के 59वें पुण्यस्मरण दिवस पर और जयप्रकाश नारायण के 124वें जन्मदिन (11 अक्तूबर) के अवसर और कल 8 अक्तूबर पर 47वें पुण्यस्मरण दिवस पर मेरे जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले दोनों नेताओं की स्मृति को क्रांतिकारी अभिवादन।
इस उपलक्ष्य में मुझे लगा कि सालभर पहले ही नेपाल में जेन-ज़ेड आंदोलन के बाद सत्तापलट हो रहा था। तभी से ही मुझे डॉ. लोहिया और जेपी की याद आ रही है। क्योंकि मुझे पहली बार (1994) नेपाल के मानवाधिकार संगठन हूरोन (शायद नेपाली काँग्रेस की ही विंग है, क्योंकि प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला उद्घाटन के लिए आए थे और उनके मंत्रिमंडल के कुछ मंत्री भी हाजिर थे, और हमें स्टेट गेस्ट के रूप में रखा गया था) के अधिवेशन में हूरोन के निमंत्रण की वजह से शामिल होने के लिए जाने का मौका मिला था। अधिवेशन में मैंने मेरे संबोधन की शुरुआत ही नेपाल की राजशाही के खिलाफ मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर डॉ. राममनोहर लोहिया ने ही सबसे पहले सूत्रपात किया था और उनके नारीवादी दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में नेपाल की महिलाओं को लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सेक्स वर्कर के रूप में हो रहे शोषण की बात क्या हूरोन को मानवाधिकार के उल्लंघन की नहीं लग रही है? मेरे ये दोनों मुद्दे सुनने के तुरंत बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने मेरे भाषण के बाद अपनी जगह से उठकर पोडियम पर आकर दोबारा माइक हाथों में लेकर मुझसे कहा कि “मैं डॉ. सुरेश खैरनार को आश्वासन देता हूँ कि जब इसके आगे वह नेपाल आएंगे, तो इस ट्रैफिकिंग को हम लोगों की तरफ से बंद किया हुआ देखेंगे।” और डॉ. राममनोहर लोहिया को हम लोग नेपाल के स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा मानते हैं।
जेन-ज़ेड आंदोलन के तुरंत बाद कार्यकारी प्रधानमंत्री का निर्वहन कर रही न्यायमूर्ति सुशीला कार्की जी ने तो मुझे उद्घाटन के बाद ही मुझसे कहा कि अगर आपके नेपाल में कोई और कार्यक्रम नहीं होंगे, तो आप नेपाल महिला संगठन की महिलाओं के सामने कल सेक्स वर्कर विषय पर विस्तार से चर्चा करने के लिए काठमांडू के अपने आवास पर रात्रि में महिला साथियों के साथ चर्चा तथा भोजन के लिए आमंत्रित करने का प्रसंग, जैसे ही उनका नाम कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में आया, तभी मुझे याद आया था। और उस संगठन के भी प्रेरणा स्रोत डॉ. लोहिया ही थे। यह बात मुझे सुशीला जी ने विशेष रूप से कही थी। और नेपाली भाषा में, जो देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है, उसमें नर-नारी समता, सीता-द्रौपदी और सावित्री, वशिष्ठ और वाल्मीकि ऐसे कुछ शीर्षक आज याद आ रहे हैं। लोहिया की लिखी हुई कुछ पुस्तिकाएँ भी भेंट दी थीं और टिपिकल नेपाल का विशेष भोजन खिलाया था। और उस दौरान वह नेपाल सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता थीं।
लेकिन फिलहाल मैं डॉक्टर साहब के 59वें पुण्यस्मरण दिवस पर कुछ लिखने के लिए पिछले कुछ दिनों से उज्जैन के डॉ. प्रवीण मल्होत्रा जी ने “डॉ. लोहिया देशज समाजवाद और समाजवादी आंदोलन की विचारधारा” शीर्षक से एक किताब को इसी साल के शुरुआत में 349 पन्नों की छापने का कष्ट किया है, जो मूलतः उनके पीएचडी का प्रबंध है। इसलिए इतनी बड़ी साइज़ और साढ़े तीन सौ पन्ने को मेरी कोशिश तो पुस्तक पढ़ने के बाद विस्तार से समीक्षा लिखने की है, लेकिन नेपाल के राजशाही के खिलाफ चले आंदोलन के प्रेरणा स्रोत डॉ. राममनोहर लोहिया के योगदान को लेकर डॉ. प्रवीण मल्होत्रा जी ने डेढ़ पन्ना (48, 49, 50-ब) “नेपाली क्रांति और लोहिया की भूमिका” इस शीर्षक से लिखित मजमून को हूबहू नकल करते हुए दे रहा हूँ—
(ब) नेपाली क्रांति और लोहिया की भूमिका
स्वातंत्र्योत्तर भारतीय राजनीति और समाजवादी आंदोलन के विकास के इस युग में, नेपाल में नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए लोहिया की संघर्षशील भूमिका और उनके योगदान का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा, क्योंकि लोहिया ने ही सर्वप्रथम नेपाल में लोकतांत्रिक जन-क्रांति की व्यापक रूपरेखा बनाने में नेपाल के राष्ट्रवादी-क्रांतिकारियों को सक्रिय सहयोग दिया था।
लोहिया के प्रयत्न और सहयोग से ही नेपाली कांग्रेस का गठन हुआ था। नेपाली कांग्रेस की स्थापना के बाद लोहिया के निर्देश और विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला के नेतृत्व में राणाशाही के विरुद्ध जन-आंदोलन तीव्र वेग से आरंभ हो गया था। सैकड़ों आंदोलनकारी गिरफ्तार कर लिये गए। जेलों में राजनीतिक बंदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में 1 मई 1949 से कोइराला जेल में आमरण अनशन कर रहे थे। नेपाली कांग्रेस के आंदोलन के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति व्यक्त करने की दृष्टि से 25 मई 1949 को सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से “नेपाल दिवस” मनाने का तय किया गया था। कनॉट प्लेस (नई दिल्ली) में एक जनसभा आयोजित की गई थी, जो बाद में एक जुलूस में परिवर्तित हो गई। प्रदर्शन का उद्देश्य नेपाली राजदूत को ज्ञापन देना था। लगभग 300 व्यक्तियों के इस प्रदर्शन का नेतृत्व लोहिया कर रहे थे। जुलूस पर पहले लाठीचार्ज किया गया और फिर आँसू गैस छोड़ी गई। लोहिया सहित 50 सत्याग्रही गिरफ्तार कर लिये गए, जिनमें दो युवतियाँ और दो 12 से 15 वर्ष के बच्चे भी थे, जिन्हें तत्काल रिहा कर दिया गया। स्वतंत्र भारत में लोहिया की यह पहली गिरफ्तारी थी। इस घटना के विरोधस्वरूप 4 जून को सोशलिस्ट पार्टी की दिल्ली इकाई ने “विरोध दिवस” मनाने के लिए जनसभा आयोजित की और पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने 20 जून को “लोहिया दिवस” मनाने का निश्चय किया। कानून तोड़ने के अपराध में लोहिया तथा अन्य सत्याग्रहियों पर मुकदमा चलाया गया तथा उन्हें दो-दो महीने की सादी कैद और सौ-सौ रुपये जुर्माने की सजा दी गई। जुर्माना न देने पर डेढ़ महीने की अतिरिक्त सजा का प्रावधान था।
दिसंबर 1950 में नेपाल में जन-क्रांति आरंभ हो गई थी और उसने अप्रत्याशित रूप से कई क्षेत्रों में सफलता भी प्राप्त की थी, किंतु इसके साथ ही नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में समझौतावादी प्रवृत्तियाँ भी प्रकट होने लगी थीं। भारत सरकार और प्रधानमंत्री नेहरू ने कोइराला और अन्य नेपाली नेताओं पर दबाव डालना आरंभ किया कि वे महाराजा त्रिभुवन से, जिन्होंने उस समय भारत में शरण ले रखी थी, समझौता कर लें। कोइराला स्वयं भी समझौते के इच्छुक थे। लोहिया ने समझौते के विरुद्ध चेतावनी देते हुए कहा कि, “अगर नेपाली कांग्रेस ने इस समय साहसपूर्ण कदम उठाया, तो नेपाल की क्रांति विश्व इतिहास में एक प्रमुख स्थान बना लेगी, लेकिन जल्दबाजी में समझौता कर लिया, तो एशिया में विद्रोहों, समझौते और निराशाओं की पुरानी कहानी ही दोहराई जाएगी।”
लोहिया ने नेपाली कांग्रेस से आग्रह किया था कि जिन क्षेत्रों को मुक्त कर लिया गया है और जो गाँव नेपाली कांग्रेस के अधिकार में हैं, वहाँ वयस्क मताधिकार से चुनाव कराकर पंचायतें कायम कर दी जाएँ और नौकरशाही को उन्हीं के नियंत्रण में कर दिया जाए। पाँच या दस पंचायतों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर अस्थायी क्रांतिकारी संसद निर्मित की जाए और उसी के द्वारा एक अस्थायी सरकार बने। जो क्षेत्र नेपाली कांग्रेस के अधिकार में आ जाएँ, वहाँ जोत की सीमा निर्धारित करके जमीन का बँटवारा कर दिया जाए। किंतु नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में समझौतावादी प्रवृत्तियाँ पैदा हो गई थीं। कोइराला ने नेहरू की मध्यस्थता में महाराजा त्रिभुवन से अवसरवादी समझौता कर अधूरी जनक्रांति की भ्रूण हत्या कर दी।
शायद यही नेपाल में उलट-पलट कर पिछले 77 सालों से लगातार चल रहा है। और अभी भी जेन-ज़ेड के बाद भी अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, क्योंकि जेन-ज़ेड कोका-कोला की बोतल खोलने के बाद जिस तरह से बोतल से तुरंत झाग बाहर निकलता है और कुछ देर में बंद हो जाता है, कोई ढंग की वैचारिक प्रतिबद्धता का संगठन नहीं है और इसलिए उसका कोई मैच्योर नेतृत्व भी दिखाई नहीं देता है। इसलिए मुझे लगता है कि अकेली सुशीला कार्की जी भी क्या कर सकती हैं? जैसे बांग्लादेश में पिछले साल भर से अधिक समय से लगभग ऐसे ही घटनाक्रमों को देख रहे हैं। और इन दोनों देशों की तुलना में भारत पिछले 12 सालों से लगातार फासिस्ट, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक इकाई के कब्जे में है और तीन लाख जनसंख्या के सीमावर्ती लद्दाख में किस तरह आंदोलन को कुचल दिया है तथा मणिपुर में तो पिछले तीन सालों से लगातार चल रहा हिंसक आंदोलन तथा किसान-मजदूरों का आंदोलन और पिछले मई से युवाओं का आंदोलन निमित्त तो मुख्य न्यायाधीश की बेकारी की मार झेल रहे युवकों को दुत्कारते हुए उन्होंने ‘कॉकरोच’ बोला और सुदूर अमेरिका के बोस्टन में पीएचडी के लिए गए हुए एक युवक ने सोशल मीडिया पर ‘हाँ, हम सभी कॉकरोच अगर इकट्ठा हो गए’ तो… इतनी सी संक्षेप में लिखने के बाद उन्हें जवाब में कुछ करोड़ युवाओं का प्रतिसाद मिलने के बाद 6 जून से आज 125 दिनों से भारत में बारह सालों के पश्चात पहली बार नेपाल या बांग्लादेश के जैसे ही 30 सालों से कम उम्र के युवाओं तथा युवतियों का प्रतिसाद मिला है, जिसमें इस देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया।
और भारत की वर्तमान चुनाव प्रणाली को भाजपा की सरकार ने 2023 में संसद के शीतकालीन संसदीय सत्र में 19 संवेदनशील विधेयक मंजूर करने के पहले 146 विरोधी दलों के दोनों सदनों के सदस्यों को संसद से निष्कासित कर दिया और बगैर किसी बहस के सभी विधेयकों को पारित करने का संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा असंसदीय काम कर लिया है। उसी में चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया को बदलते हुए अपने दल का बहुमत कराते हुए उस चुनाव आयोग के सदस्यों को चुनाव आयोग की ड्यूटी निभाने के दौरान जो भी काम करेंगे, उसे लेकर उनके ऊपर कोई भी सिविल या क्रि क्रिमिनल कार्रवाई नहीं होगी, जैसे सुरक्षा कवच दिलाने का प्रावधान भी कर लिया। इसके बारे में तुरंत कोई प्रतिरोध तो नहीं हुआ, लेकिन जब बिहार के विधानसभा चुनाव के पहले मतदाता सूची को दुरुस्त करने के नाम पर (एस.आई.आर.) भाजपा को चुनाव में जीत दिलाने के लिए मतदाताओं के नाम हटाने तथा जोड़ने की तिकड़मबाजी देखकर कुछ विरोधी दलों ने बिहार में यात्रा निकाली, पर उसके बावजूद चुनाव में एकतरफा मतदान प्रक्रिया कराते हुए भाजपा को जिताने के लिए पूरी चुनाव प्रक्रिया—प्रचार से लेकर मतदान तथा मतों की गिनती, मतलब हर स्तर पर चुनाव आयोग ने बेतहाशा धांधली करने का काम किया।

उसके बाद जो प्रतिरोध होना चाहिए था, वह नहीं होने की वजह से चुनाव आयोग ने बंगाल-असम के विधानसभा चुनाव का संचालन करते हुए बिहार के जैसे ही धांधली करते हुए दोनों राज्यों में भाजपा की सिर्फ सत्ता ही नहीं बनाने के लिए मदद की, पूरे विरोधी दलों को नेस्तनाबूद करने के लिए साम-दाम-दंड प्रक्रिया करते हुए सेना तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती कराते हुए भाजपा की झोली में दोनों राज्यों को डालने का काम किया और उसके बाद चुनाव आयोग का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी उसे रोकने की जगह पूरे देश में ही एस.आई.आर. करने के लिए खुली छूट दे दी और 13 करोड़ मतदाताओं को मतदान के बाहर करने का रेकॉर्ड बनाने के बाद हमारे देश के विरोधी दलों तथा कुछ स्वयंसेवी संगठनों तथा ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व ने 10 अक्तूबर को दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग के लिए जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करने की घोषणा की है।
लेकिन भाजपा की सरकार ने पचास हज़ार से अधिक संख्या में अर्धसैनिक बलों को तैनात करते हुए कई रेलगाड़ियों को दिल्ली के पहले ही डायवर्ट करने से लेकर दिल्ली की सभी शिक्षा संस्थानों में पुलिसवालों को भेजकर डराने-धमकाने का आलम जारी है। यह देखकर मुझे आज से 52 साल पहले अहमदाबाद, पटना, इलाहाबाद, लखनऊ तथा उत्तर भारत के सभी विश्वविद्यालयों तथा शिक्षा संस्थानों में इसी तरह का युवाओं को रोकने के लिए तत्कालीन सरकार ने प्रयास किया था और उसके बाद आपातकाल, फिर चुनाव, लेकिन वह चुनाव निष्पक्ष चुनाव होने की वजह से ही तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी को सत्ता से बेदखल करने का इतिहास हुआ है, जिस समय मैं 25 सालों से भी कम उम्र का युवक था और मेरे दोनों हीरो डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण थे।
आज उन्हीं की जयंती-पुण्यतिथि के अवसर पर और कल 10 अक्तूबर के दिन चुनाव आयोग के खिलाफ धरना-प्रदर्शन के उपलक्ष्य में—“हर ज़ोर-जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है, भावी इतिहास हमारा है” और “सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है” इन दो नारों के साथ सबसे महत्वपूर्ण नारा—“हमला चाहे कैसा भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा”—के साथ डॉ. राममनोहर लोहिया के 59वें पुण्यस्मरण और जयप्रकाश नारायण की 124वीं जयंती पर उन्हें सबसे उचित स्मृति कल दिल्ली में भारत के जनतंत्र को बचाने के लिए किया जा रहा आंदोलन ही सबसे कृतिशील प्रयास हो सकता है।











