हाईकोर्ट ने 2019 के संशोधन को रद्द किया है। रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर कार्रवाई के लिए तीन महीने का निर्देश सामने आया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले 2019 के कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया है। 9 अक्टूबर के फैसले के बाद राज्य की भर्तियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण की व्यवस्था फिर चर्चा में है।
नौकरी की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए फैसले का सबसे सीधा संबंध उन पदों से है, जिन पर लंबे समय से नतीजे या नियुक्तियां अटकी हुई थीं।
अदालत की आपत्ति किस बात पर थी?
उपलब्ध विवरण के मुताबिक, न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की पीठ ने आरक्षण बढ़ाने के लिए जरूरी विशेष परिस्थितियों का पर्याप्त आधार नहीं पाया। विवाद ओबीसी आरक्षण के अस्तित्व का नहीं, उसे 14 से 27 प्रतिशत तक बढ़ाने का था।
फैसले में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का भी उल्लेख है। हर आरक्षण श्रेणी और भर्ती की गणना को एक ही प्रतिशत में समेटना भ्रामक हो सकता है; उम्मीदवारों को अपनी परीक्षा की संशोधित सूचना देखनी होगी।
रोके गए पदों पर अगला कदम
रिपोर्टों के अनुसार, भर्ती एजेंसियों को रोके गए 13 प्रतिशत पदों के संबंध में तीन महीने के भीतर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश है। इससे प्रत्येक उम्मीदवार की नियुक्ति या परिणाम की तारीख अपने आप तय नहीं हो जाती।
एमपीपीएससी, कर्मचारी चयन मंडल या संबंधित विभाग की भर्तीवार सूचना बताएगी कि परिणाम, चयन सूची और नियुक्ति प्रक्रिया में क्या बदलाव होगा।
किस जानकारी का इंतजार है?
सरकार आगे अपील करती है या नहीं, और किसी ऊपरी अदालत से अंतरिम आदेश आता है या नहीं—इसका असर प्रक्रिया पर पड़ सकता है। अभी किसी संभावित अपील को रोक या स्थगन मानना सही नहीं होगा।
उम्मीदवारों के लिए अगली उपयोगी खबर राजनीतिक प्रतिक्रिया के साथ भर्ती एजेंसियों का स्पष्ट आदेश होगा। उसमें परीक्षा का नाम, प्रभावित पद, श्रेणीवार व्यवस्था और कार्रवाई की तारीख देखना जरूरी है।











