एक बरामदगी ने देश को हिला दिया। गिरफ्तारियां हुईं, मौत की सजाएं सुनाई गईं। फिर वर्षों बाद अदालत में जांच की बुनियाद ढह गई। उन परिवारों के हिस्से क्या आया, जिनके बच्चे कभी घर नहीं लौटे?

निठारी की एक मां को खाना खाते वक्त अपनी बेटी की थाली याद आती थी।

बेटी वर्षों पहले लापता हुई थी। अक्टूबर 2023 में जब इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता ने उस महिला से बात की, तब भी घर की उस खाली जगह का दुख बना हुआ था। उसी रिपोर्ट में दूसरी मां ने अपने बेटे को याद किया। छोटा बच्चा गन्ने का रस खरीदने निकला था। लौटकर नहीं आया।

इन परिवारों के लिए निठारी कोई चर्चित मुकदमा बनने से पहले अपने बच्चे को ढूंढ़ने की कहानी थी।

फिर एक दिन जमीन से ऐसे अवशेष निकले कि उनके इंतजार का अर्थ बदल गया।

29 दिसंबर 2006: वह पता जो देश को याद हो गया

नोएडा, सेक्टर 31। मकान नंबर डी-5।

कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर थे। सुरेंद्र कोली वहां घरेलू सहायक का काम करता था। आसपास निठारी की बस्ती थी, जहां से बच्चों और महिलाओं के लापता होने की शिकायतें आ रही थीं।

29 दिसंबर को कोठी के आसपास की खुली जगह से मानव अवशेष, कपड़े और जूते-चप्पल बरामद हुए। बाद में पास के नाले से भी अवशेष निकाले गए। कोली को एक गुमशुदगी के मामले में हिरासत में लिया गया और पंढेर को भी उसी दिन रोका गया।

अब डी-5 एक मकान का नंबर भर नहीं रहा।

अवशेष किसके थे? लापता लोगों के साथ क्या हुआ था? क्या इस कोठी में उन सवालों का जवाब छिपा था?

ये जांच के सवाल थे। लेकिन जल्द ही सार्वजनिक चर्चा में एक पूरी अपराध-कथा आकार लेने लगी। बेहद भयावह आरोप सामने आए। परिवारों की शिकायतें भी खबरों में आईं कि बच्चों के लापता होने की बात पुलिस ने पहले गंभीरता से नहीं सुनी थी।

उस समय सामने आ रही बातों में आरोप थे, जांचकर्ताओं के दावे थे और अटकलें भी। वर्षों बाद मुकदमों में यही फर्क निर्णायक होने वाला था—किस बात का प्रमाण था, और किस बात को सच मान लिया गया था?

जांच सीबीआई तक पहुंची

जनवरी 2007 में जांच सीबीआई को सौंप दी गई।

अलग-अलग पीड़ितों के मामले अदालत पहुंचे। अभियोजन की कहानी में कोली के कथित इकबालिया बयान और उसकी निशानदेही पर बताई गई बरामदगियों की बड़ी भूमिका थी। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के जरिए उसे अपराधों से जोड़ने की कोशिश हुई।

कागज पर कहानी का क्रम बन चुका था। बच्चे लापता हुए। अवशेष मिले। एक व्यक्ति ने कथित तौर पर अपराध स्वीकार किया। जांच एजेंसी ने उसके खिलाफ साक्ष्य पेश किए।

लेकिन मुकदमे में हर जोड़ को परखना होता है।

बयान कैसे दर्ज हुआ? क्या वह स्वेच्छा से दिया गया था? बरामदगी की जगह के बारे में पुलिस को पहले से कितना पता था? वैज्ञानिक साक्ष्य आरोपी की भूमिका के बारे में क्या कहते थे?

इन सवालों के जवाब निचली अदालत और बाद की अपीलीय अदालतों में एक जैसे नहीं रहे।

मौत की सजा का फैसला

फरवरी 2009 में एक नाबालिग पीड़िता से जुड़े पहले मुकदमे में निचली अदालत ने कोली और पंढेर को दोषी ठहराया। दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया।

आगे कोली को दूसरे मामलों में भी मौत की सजाएं मिलीं। अपीलों और अलग-अलग मुकदमों के साथ दोनों की कानूनी स्थिति बदलती रही।

फिर अक्टूबर 2023 में बड़ा मोड़ आया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली को अपने सामने आए 12 मामलों में और पंढेर को दो मामलों में बरी कर दिया। अभियोजन जिन साक्ष्यों पर भरोसा कर रहा था, अदालत ने उन्हें दोषसिद्धि कायम रखने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

जिन परिवारों ने सजा की उम्मीद के साथ वर्षों तक मुकदमा देखा था, उनके लिए फैसला एक और आघात था।

उसी वक्त न्यायिक रिकॉर्ड दूसरी मुश्किल दिखा रहा था। जांच की कमियां इतनी बुनियादी थीं कि अदालत के सामने आरोपियों को दोषी ठहराने का भरोसेमंद आधार नहीं बच रहा था।

कहानी का सबसे मजबूत बताया गया हिस्सा कमजोर कैसे पड़ा?

कोली का कथित स्वीकारोक्ति बयान मामले के केंद्र में था।

उस बयान को पढ़कर कोई अपराध का पूरा घटनाक्रम बना सकता था। मगर अदालत को उसकी सामग्री के साथ यह भी देखना था कि वह किन परिस्थितियों में दर्ज हुआ।

नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में लगभग 60 दिन की पुलिस हिरासत, प्रभावी कानूनी सहायता की कमी और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल दर्ज हैं। जांच अधिकारी की मौजूदगी और प्रभाव भी चिंता का विषय थे। बयान की स्वैच्छिकता भरोसेमंद नहीं पाई गई।

इसका असर सीधा था। जिस बयान पर अभियोजन ने बहुत भरोसा किया था, वह कानूनी रूप से दोषसिद्धि का सुरक्षित आधार नहीं रह गया।

अब बाकी साक्ष्यों को उस खाली जगह को भरना था।

बरामदगी थी, लेकिन अधूरी कड़ी भी थी

अवशेष मिलने की बात अपनी जगह थी। लेकिन उन्हें आरोपी की निशानदेही पर हुई ऐसी खोज साबित करना अलग बात थी, जिसकी जानकारी पहले किसी को नहीं थी।

अदालत के रिकॉर्ड में सामने आया कि बरामदगी वाली जगह खुली थी। आरोपी के वहां पहुंचने से पहले खुदाई शुरू हो चुकी थी। लोगों और पुलिस को उस जगह अवशेष होने की जानकारी थी।

वैज्ञानिक जांच ने कुछ अवशेषों का संबंध लापता व्यक्तियों के परिवारों से स्थापित किया। उससे पीड़ितों की पहचान में मदद मिली। लेकिन आरोपी को हत्या के कृत्य से जोड़ने वाली जरूरी कड़ी पूरी नहीं हुई। कथित हथियारों और कोठी की तलाशी से भी अभियोजन को अपेक्षित वैज्ञानिक समर्थन नहीं मिला।

यह मुकदमे का कठिन केंद्र था।

अपराध हुआ था। परिवारों ने अपने लोगों को खोया था। मगर अदालत को आरोपी की भूमिका संदेह से परे सिद्ध करने वाले स्वीकार्य साक्ष्य चाहिए थे।

जांच की कमजोरियां उस प्रमाण का स्थान नहीं ले सकती थीं।

बारह मामलों में बरी, फिर भी जेल में

30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के बरी करने वाले फैसलों के खिलाफ अपीलें खारिज कर दीं।

लेकिन कोली की एक पुराने मामले में दोषसिद्धि बची हुई थी। उस मामले में मौत की सजा जनवरी 2015 में आजीवन कारावास में बदल चुकी थी। उसकी ओर से क्यूरेटिव याचिका दाखिल हुई।

अब सवाल था—जिन साक्ष्यों को साथ के मुकदमों में अस्वीकार किया जा चुका है, उनके आधार पर एक मुकदमे की सजा कैसे कायम रहे?

11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम मामले में भी दोषसिद्धि रद्द कर दी। किसी अन्य मामले में जरूरत न होने पर कोली की तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।

लगभग दो दशक लंबी कानूनी यात्रा के अंत में वह निठारी से जुड़े सभी 13 मामलों में बरी हो चुका था।

फैसले में अदालत ने परिवारों की पीड़ा स्वीकार की। साथ ही इस बात पर गहरा खेद जताया कि वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं की जा सकी।

सितंबर 2026 में फिर खबर आई

18 सितंबर 2026 को हरिद्वार से कोली की मृत्यु की खबर आई। पुलिस के अनुसार, वह वहां किराए पर चाय की दुकान चला रहा था।

पोस्टमॉर्टम के आधार पर पुलिस ने मृत्यु को आत्महत्या बताया।

उसकी मृत्यु निठारी के अपराधों में उसकी भूमिका का प्रमाण नहीं है। अदालतों द्वारा दर्ज बरी होने के फैसले ही उसकी अंतिम कानूनी स्थिति हैं।

एक थाली की खाली जगह

इस कहानी को डी-5 से शुरू करके अदालत के फैसले पर खत्म किया जा सकता था।

लेकिन शुरुआत में जिस मां ने बेटी की थाली याद की थी, उसकी बात वहां भी बाकी रहती है।

अवशेष मिलने से लेकर अंतिम बरी होने तक जांच एजेंसियों और अदालतों के सामने कई मौके आए। गिरफ्तारियां और सजाएं परिवारों के लिए उम्मीद बनीं। फिर साक्ष्यों की जांच में ऐसी खामियां सामने आईं जिनके कारण दोषसिद्धियां कायम नहीं रह सकीं।

उन खामियों का नुकसान वर्षों बाद साफ दिखाई दिया। अदालत में कमजोर मामला पहुंचा तो आरोपी बरी हुए। परिवारों को अपने बच्चों की हत्या करने वाले की प्रमाणित पहचान नहीं मिल सकी।

निठारी की लंबी कहानी का सबसे जरूरी सवाल अब भी वही है, जो बरामदगी के बाद उठा था—

उन बच्चों और महिलाओं की हत्या किसने की?

प्रकाशित रिपोर्टों और न्यायिक रिकॉर्ड पर आधारित अपराध-कथा। घटनाक्रम 9 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध सामग्री के अनुसार है। नाबालिग पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखी गई है।

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