साथियों नमस्कार,

आज मेरे घर में आने वाले अंग्रेजी, मराठी तथा हिंदी—तीनों भाषाओं के अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर शिवसेना (शिंदे गुट) के सचिव संजय मोरे के सौजन्य से यह इश्तिहार छपा हुआ देखकर मुझे यह लेख लिखने की प्रेरणा हुई है।

नरेंद्र मोदी की राजनीति का सफर, अंग्रेजी भाषा के सफर और उर्दू भाषा के सफर का मतलब जिन्हें मालूम है, बिल्कुल उसी सफर के जैसा ही उनका भी 7 अक्तूबर 2001 से आज के 7 अक्तूबर 2026 तक, गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी राजनीतिक जमीन बनाने के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया? और किस कीमत पर? इसका खाका खींचने हेतु मैं उनके 25 सालों से लगातार सत्ता की राजनीति में पैर जमाने के लिए भारतीय संविधान को तोड़-मरोड़कर रखते हुए, उन्होंने सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए दंगों की राजनीति से तथाकथित आतंकवाद की घटनाओं की शुरुआत की। 2001 के पहले महात्मा गांधी जी की हत्या के पचास सालों के बाद पुनः एक के बाद एक आतंकवादी घटनाओं की झड़ी शुरू हो गई है। जिसमें से आधी से ज्यादा घटनाओं की जांच मेरे नेतृत्व में होने के कारण मैं इतने आत्मविश्वास के साथ यह सब लिख रहा हूँ।

लेकिन अब उन्हें पता चल गया है कि कितना भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के बावजूद आम भारतीयों के रोजमर्रा के सवाल दिन-प्रतिदिन और भी बद-से-बदतर होते जा रहे हैं और आम लोगों में असंतोष फैल रहा है। इसलिए उन्होंने हमारे देश के चुनाव के इतिहास में पहली बार 2023 के शीतकालीन संसदीय सत्र के दौरान 146 विरोधी दलों के संसद सदस्यों को (जिसमें लोकसभा के 100 और राज्यसभा के 46 शामिल थे) सदन से निष्कासित करने की कृति की। संसदीय इतिहास में पहली बार गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर सदन में चर्चा की मांग करने की तख्तियां सदन में दिखाते हुए प्रदर्शन करने के बाद, उसे अमर्यादित व्यवहार का हवाला देते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया था और 19 संवेदनशील विधेयक बगैर किसी भी चर्चा के पारित करने का काम किया। जिसमें चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया को बदलकर, चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया में एकतरफा बदलाव करते हुए, अपने मनमुताबिक आयोग का गठन करने के लिए अपने दल का बहुमत बनाने से लेकर उस आयोग को बेतहाशा अधिकार देते हुए, उसे हर तरह की मनमानी करने के लिए खुली छूट दी गई। एसआईआर की आड़ में अपने दल के खिलाफ मतदाताओं को छांटने तथा अपने दल के मतदाताओं को सूची में डालने जैसे गैर-संवैधानिक काम करने के लिए खुली छूट देकर, उसी चुनाव आयोग की निगरानी में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा के चुनाव सेना तथा अर्धसैनिक बलों की देखरेख में कराना—जम्मू-कश्मीर के बाद पहली बार भारत के किसी अन्य राज्यों में करने का कारनामा करके दिखाने के बाद, अब देश के चुनाव सिर्फ दिखावे के रूप में लाकर रख देने का कारनामा कर लिया है।

जिंदगी का आधे से भी ज्यादा समय संघ के प्रचारक के रूप में गुजारने के बाद, संघ के आदेशानुसार भाजपा के काम के लिए भेजा गया एक कार्यकर्ता कभी-कभी प्रवक्ता के रूप में टीवी चैनलों पर अन्य दलों के प्रवक्ताओं के बीच में एक सफेद-काली हाइब्रिड दाढ़ी वाले, हाफ बांह का कुर्ता-पजामा पहने हुए आदमी के रूप में दिखाई देता था। वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी को अचानक आज ही के दिन, गुजरात की विधानसभा में बार-बार अनुशासन के लिए मशहूर भाजपा जैसे दल में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री केशुभाई पटेल के खिलाफ बगावत की वजह से ही गुजरात में 2001 के 7 अक्तूबर को (उम्र के 51 साल पार करने के बाद) जिम्मेदारी मिली। केशुभाई पटेल के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में भाजपा की अंदरूनी कलह की वजह से, क्रिकेट के खेल में जैसे शाम को खेल समाप्त होने के कुछ समय पहले जान-बूझकर नए बैट्समैन को भेजा जाता है (अगर वह अंतिम समय में आउट हुआ तो भी कोई हर्ज नहीं, तो उस खिलाड़ी को ‘नाइट वॉचमैन’ कहते हैं, क्योंकि वह खेल समाप्त होने के पहले आउट भी हो जाए तो चलेगा), ऐसे खेल की युद्ध-नीति के हिसाब से ही नरेंद्र मोदी को तात्कालिक रूप से गुजरात की बगावत के बवंडर में मुख्यमंत्री के बतौर भेजा गया था। जिस समय तक वह अपने राजनीतिक जीवन में विधानसभा चुनाव तो दूर, ग्राम पंचायत का भी चुनाव नहीं लड़े थे।

इस कारण उन्हें मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण करने के बाद छह महीने के भीतर विधानसभा का चुनाव लड़कर सभागृह का सदस्य होना जरूरी था। अहमदाबाद शहर में एलिसब्रिज नाम का एक विधानसभा क्षेत्र पड़ता है, जहाँ से हरेन पंड्या नाम के विधायक तत्कालीन गुजरात विधानसभा में सबसे अधिक मतों से चुनकर आये हुए थे। नरेंद्र मोदी ने उनको ही सीट खाली करने के लिए कहा, क्योंकि उस समय नरेंद्र मोदी सुरक्षित रूप से विधानसभा में आना चाहते थे। जिसे हरेन पंड्या ने इस्तीफा देने से मना कर दिया, क्योंकि हरेन पंड्या, नरेंद्र मोदी को अपने राजनीतिक प्रतिस्पर्धी के रूप में नापसंद करने वालों में से एक थे।

नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री तो बन गए थे, पर पूरे गुजरात के 182 विधानसभा क्षेत्रों में उनके लिए एक भी ऐसा सुरक्षित क्षेत्र नहीं था जहाँ से वह सुरक्षित रूप से चुनाव जीतने के लिए खड़े हो सकें; क्योंकि उस समय गुजरात में उनकी राजनीतिक हैसियत नहीं के बराबर थी। वे जन्मना घांची-तेली जाति से हैं। उस जाति के मुस्लिम और हिंदू दोनों परंपराओं के लोगों की संख्या पूरे गुजरात में दो लाख से अधिक नहीं है। 2001 के नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में ऐसी कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी कि वह आसानी से कहीं से भी खड़े हो जाएँ और चुनाव जीत जाएँ। यह बात इस शताब्दी के शुरुआती दौर में गुजरात की राजनीति में असंभव थी। अंततः 24 फरवरी को राजकोट विधानसभा के तत्कालीन भाजपा सदस्य वजूभाई वाला ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और उस सीट से नरेंद्र मोदी 14,728 वोटों से कांग्रेस के अश्विन मेहता को हराने के बाद 25 फरवरी को गुजरात विधानसभा के सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण किए। नरेंद्र मोदी को इस तरह हमारी देश की संसदीय प्रणाली को लेकर अपनी राजनीतिक अनिश्चितता का साक्षात्कार हुआ और यहीं से नरेंद्र मोदी जी के चुनावी राजनीति के सफर की शुरुआत हुई है, जिसे दो दिन के बाद ही 27 फरवरी के गोधरा कांड के बाद अपनी खुद की राजनीतिक पैठ और जमीन तैयार करने के लिए बेरहमी से इस्तेमाल किया गया।

जिसे देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भी गुजरात दंगों में पुलिस-प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई को देखते हुए नरेंद्र मोदी जी की उपस्थिति में ही साफ शब्दों में कहा था कि “आपको एक मुख्यमंत्री के रूप में अपने राजधर्म का पालन करना चाहिए था, जो आपने नहीं किया।” और तुरंत बाद ही नरेंद्र मोदी जी ने कहा था, “साहब, मैं वही तो कर रहा हूँ।” जो राजधर्म का पालन नरेंद्र मोदी जी आज के दिन तक 25 सालों से लगातार कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री पद की शपथ 7 अक्तूबर के दिन ग्रहण करने के 150 दिनों के भीतर और गुजरात विधानसभा में विधायक के रूप में शपथ ग्रहण करने के दो दिन बाद, 27 फरवरी 2002 को गोधरा कांड के बाद हुए दंगों को उन्होंने अपना राजनीतिक करियर बनाने के लिए बहुत ही बेरहमी से इस्तेमाल किया है। जिस कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि “आपने राजधर्म का पालन नहीं किया है।” और नरेंद्र मोदी ने उन्हें उसी क्षण जवाब दिया था कि “साहब, मैं वही तो कर रहा हूँ।” मतलब उनके राजनीतिक धर्म का प्रयोग गुजरात से शुरू हो गया था। इसलिए गोधरा कांड के बारे में आज भी एक रहस्य बना हुआ है। सचमुच ही इस घटना के बारे में विभिन्न प्रकार के तथ्यों के आधार पर दर्जनों लोगों ने खोजपूर्ण पत्रकारिता के माध्यम से जो किताबें लिखी हैं, मैं उन्हीं के आधार पर यह लेख लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।

उनकी बनियान की साइज 44 इंच होने के बावजूद, उन्होंने 56 इंच छाती का जुमला उछालने की बात गोधरा कांड के बाद गुजरात के मुस्लिमों के खिलाफ हुए दंगों को भुनाते हुए की। उन्होंने अपने आप को “56 इंची छाती का मर्द” वाले पुरुषी अहंकार से निकले जुमले से लेकर स्वघोषित ‘हिंदू-हृदयसम्राट’ बनाया, जबकि उनके पहले 60 के दशक से मुंबई में बाल ठाकरे ने खुद को ‘हिंदू-हृदयसम्राट’ कहलवाना शुरू कर दिया था। फिर उसके बाद नरेंद्र मोदी जी ने तीन बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के लिए अपनी ‘हिंदू-हृदयसम्राट’ वाली छवि स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा उन्हें जान से मारने की धमकियों के नाम पर बेरहमी से किए गए एनकाउंटर—जिसमें इशरत जहाँ, सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति के अलावा अन्य एनकाउंटर भी शामिल थे—उन्हें भी उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की जगह पक्की करने के लिए बखूबी इस्तेमाल किया।

यह बात तत्कालीन डीआईजी डी. जी. वंजारा ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के बाद हुई गिरफ्तारी के बाद साबरमती जेल से 10 पन्नों के पत्र में अपने इस्तीफे के साथ विस्तार से लिखी है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि “यह गांधीनगर में सबसे बड़े पद पर बैठे आदमी के दिमाग से निकली हुई सोची-समझी साजिश (Conscious Political Conspiracy) है।” वंजारा ने अपने खत में दावा किया है कि उनके या अन्य पुलिस अधिकारियों के द्वारा किए गए एनकाउंटर कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं थे। इसलिए उन्होंने लिखा कि “अगर सीबीआई और सीआईडी सोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति, सादिक जमाल और इशरत जहाँ एनकाउंटर मामले में फील्ड अधिकारियों को (पुलिस) जिम्मेदार मानकर जेल में रख रही है, तो एनकाउंटर की फर्जी नीतियों को बनाने वाले राजनेताओं को भी गिरफ्तार करना चाहिए।”

वंजारा का इशारा तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी (जो गृह मंत्रालय का भी काम देख रहे थे) और उस समय उनके मातहत भारत के वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह (जो 2002 में गुजरात के गृह राज्यमंत्री थे) की तरफ था। जिसमें अमित शाह को 25 जुलाई 2010 के दिन गिरफ्तार किया गया था और 29 अक्तूबर 2010 को उन्हें गुजरात हाईकोर्ट से जमानत पर रिहा कर दिया गया था, लेकिन अगले दो सालों तक उन्हें अपने गृह राज्य गुजरात में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था—जिसे बंबई की फिल्मों की भाषा में ‘तड़ीपार’ बोला जाता है।

सीबीआई की स्पेशल कोर्ट को, गुजरात में नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप को देखते हुए ही महाराष्ट्र स्थानांतरित कर दिया गया था। उस सीबीआई स्पेशल कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस बृजगोपाल हरकिशन लोया अमित शाह के मामले में काफी तटस्थ होकर संज्ञान लेते हुए अपना काम कर रहे थे। ‘हू किल्ड जस्टिस लोया’ (Who Killed Justice Loya?) किताब के लेखक निरंजन टकले ने 1 दिसंबर 2014 के दिन सुबह नागपुर के रवि भवन नाम के वीआईपी गेस्ट हाउस में उनकी मृत्यु होने के बाद, उनके परिवारवालों द्वारा इस मृत्यु पर उठाए गए संदेह की ओर ध्यान दिलाया। जब उसे अनदेखा किया गया, तो खोजी पत्रकार निरंजन टकले ने 300 से अधिक पन्नों की, बहुत ही मेहनत करते हुए अपनी जान को दांव पर लगाकर किताब लिखी, जो आज भारत की सभी भाषाओं में अनुदित होकर धड़ल्ले से बिक रही है।

आज यही वह ‘गुजरात मॉडल’ है, जो पिछले 12 सालों से भारत में लगातार चल रहा है।

और उसी को मजबूत बनाने के लिए नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह ने दो गुजराती उद्योगपतियों को चुना, जिन्हें नरेंद्र मोदी के पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल में गुजरात राज्य में और अब पिछले 12 सालों से भारत सरकार द्वारा सभी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर खुली छूट दी गई है। उनमें पहले से ही मौजूद अंबानी बंधु, टाटा और विश्व के औद्योगिक जगत में शायद ही कोई और उदाहरण होगा कि 40 साल से भी कम उम्र के गौतम अडानी नाम के आदमी को लगभग जमीन से उठाकर आसमान तक पहुँचाने के लिए—पहले पूरे गुजरात में और अब विश्व में—सभी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर, सहूलियतें देकर ऊर्जा, पोर्ट, रेल, रक्षा, हवाई यात्रा और अन्य उद्योग-धंधों में फलने-फूलने में मदद की जा रही है। इसीलिए औद्योगिक जगत से लेकर राजनीति के क्षेत्र तक में ‘नरेंद्र मोदी-अडानी कनेक्शन’ एक रहस्य बना हुआ है।

सभी नियम-कानूनों की अवहेलना का उदाहरण देखें तो कांडला पोर्ट भारत का पहला पोर्ट है, जो अडानी उद्योग समूह के प्राइवेट सेक्टर को सौंपा गया है। आने वाले समय में विभिन्न सरकारी प्रतिष्ठान औने-पौने दामों में बेचने के अभी दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं। हमारे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड की 47,251 करोड़ रुपये की डूबने वाली कंपनी को बड़े भाई मुकेश अंबानी को सिर्फ 455 करोड़ रुपये में बेचने की अनुमति दी है।

और इस तरह के व्यवहार करने के लिए वर्तमान केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद ऐसी कंपनियों के लिए विशेष कानून पास किए हैं। तब लगता था कि सरकार ऐसी कंपनियों को कब्जे में लेकर बाजार में उनकी संपत्तियों को बेचकर पैसा वसूल करेगी।

लेकिन 47,251 करोड़ की कंपनी का वारे-न्यारे करते हुए इस तरह की कोई बात नहीं की गई। अनिल अंबानी की इस कंपनी को बड़े भाईसाहब मुकेश अंबानी को सिर्फ 455 करोड़ रुपये में बेचने की अनुमति दे दी गई, हमारे सरकारी बैंकों से लिए गए कर्ज पर पानी छोड़कर। जबकि एक सामान्य आदमी अपने घर-परिवार के लिए छोटा-मोटा कर्ज ले ले, तो वही सरकारी बैंकों के अधिकारियों की तरफ से वसूली के लिए कैसे अपमानजनक तरीके अपनाए जाते हैं, यह सभी जानते हैं। लेकिन चुनिंदा उद्योगपतियों के लिए यही बैंक इतने उदार होकर लाखों करोड़ रुपये के कर्ज माफ करने की कृपा कैसे कर सकते हैं? जो कि सर्वसाधारण लोगों की बैंकों में जमा पूंजी, बहुत ही मामूली ब्याज दरों पर रखा गया पैसा ही तो है! और आराम से सरकारी बैंकों की तरफ से उद्योगपतियों को दी जाने वाली लाखों करोड़ रुपये की कर्ज माफी की बात कहीं चर्चा में भी नहीं आती है, न ही विरोध किया जाता है। मतलब, सरकार को सर्वसाधारण मतदाता चुनकर दे रहे हैं, लेकिन उसे इन सब बातों की भनक तक नहीं लगने देना और हमारी सरकार का कारोबार पारदर्शी होने का दावा करना कितना बड़ा पाखंड है?

इसी तरह अडानी उद्योग समूह को कांडला पोर्ट सौंपा गया और उसने हाथ में लेते ही पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन किया। भारत के समुद्री क्षेत्र में कुछ पर्यावरणीय नियम हैं, जिसमें ‘मैंग्रोव वनस्पति’ को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है। उनका संवर्धन करना चाहिए, ऐसा हमारे समुद्री क्षेत्र के लिए नियम बना हुआ है और उसे नष्ट करने की कृतियां करने वाले लोगों को दंडित करने का प्रावधान है। उसके लिए ग्रीन ट्रिब्यूनल बना हुआ है, जिसने अडानी समूह पर कुछ करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। लेकिन हमारे देश के पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाले मंत्री महोदय ने “ग्रीन ट्रिब्यूनल की क्या आवश्यकता है?” कहते हुए अडानी उद्योग समूह के ऊपर लगे जुर्माने को देखते हुए बयानबाजी की।

मतलब हमारे देश और दुनिया के पर्यावरण संरक्षण के लिए 1972 के जिनेवा कन्वेंशन से तैयार किए गए कई महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक निर्णय भारत के इतिहास में पहली बार पर्यावरण मंत्रालय का निर्माण किया जाना था। और उस मंत्रालय ने तीस साल के भीतर हमारे देश और दुनिया के पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत महत्वपूर्ण नियमों को बनाने का काम किया है, जिसमें समुद्र के तटीय क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण नियम बनाए गए हैं और उनके उल्लंघन करने वाले लोगों के ऊपर दंडात्मक कार्रवाई करने के अधिकार दिए गए हैं। लेकिन गौतम अडानी के लिए नरेंद्र मोदी ने किसी भी कानून और नियमों की परवाह किए बगैर उसे हर उद्योग में कुछ भी करने की छूट दी, जो शुरू से ही उद्योग जगत में विवाद का विषय रही है। ‘हिंडनबर्ग’ रिपोर्ट उसका परिचायक है। लेकिन इस हेराफेरी पर हमारे देश के सर्वोच्च सभागार लोकसभा में सवाल करने वाले सदस्यों को अपनी सदस्यता गंवाने की नौबत आ रही है—राहुल गांधी और महुआ मोइत्रा इसके उदाहरण हैं। और संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी चरण में 150 से भी अधिक विरोधी दलों के संसद सदस्यों को सदन से निष्कासित करने की कृति भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार देखने में आ रही है।

आज अडानी उद्योग समूह हमारे देश की आधी बिजली का उत्पादन कर रहा है और 2014 के चुनाव में 400 से अधिक चुनावी रैलियों में पूरे देश में घूमने के लिए नरेंद्र मोदी जी को अपना प्राइवेट जेट विमान अडानी ने ही उपलब्ध कराया था। अन्य उद्योगपतियों ने भी धन मुहैया कराया। अंबानी समूह ने कई प्राइवेट टीवी चैनल चुनाव को मद्देनजर रखते हुए पहले से ही उपलब्ध करा दिए थे और वे नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री वाली इमेज बनाने में रात-दिन जुट गए। आज तो संपूर्ण मीडिया को ही ‘गोदी मीडिया’ बोला जा रहा है, क्योंकि पिछले 11 सालों से नरेंद्र मोदी को छोड़कर किसी भी नेता के न तो फोटो छपते हैं और न ही कोई खबर।

उसमें अन्ना हजारे का तथाकथित जन लोकपाल आंदोलन, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों ने भी नरेंद्र मोदी को सत्ता के पायदान तक लाने के लिए काम किया है। नरेंद्र मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाला जुमला और ‘सिर्फ एक बार हमारी सरकार’ वाले लोकलुभावन नारों से लोगों को आकर्षित करने में मदद मिली। 2014 के चुनाव में भाजपा 280 के ऊपर लोकसभा सीटों की संख्या तक पहुँच गई। उसमें मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगे की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उत्तर प्रदेश में 70 से ज्यादा लोकसभा सीटें मिलने में इस दंगे ने बहुत योगदान दिया—जैसा कि 2002 के दंगे ने गुजरात में नरेंद्र मोदी जी को तीन बार मुख्यमंत्री पद देने का काम किया था। वही भूमिका मुजफ्फरनगर, अन्ना हजारे के आंदोलन और पुलवामा की आतंकवादी घटना ने निभाई है।

इतिहास में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए और केंद्र में सरकार बनाने के लिए अमेरिका की तरह एक व्यक्ति-केंद्रित प्रचार किया गया था। इसीलिए इसे ‘भाजपा सरकार’ से ज्यादा ‘मोदी सरकार’ बोला जाता है। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिसके परिणामस्वरूप सबसे पहले योजना आयोग को खत्म करने से शुरुआत हुई थी (जिसका किसी ने भी विरोध किया हो, मुझे याद नहीं आ रहा है)। फिर क्या था? नरेंद्र मोदी को जैसे अगले सभी निर्णय लेने के लिए लाइसेंस ही मिल गया! तो उन्होंने नोटबंदी की।

लगभग सभी बड़े बैंकों में जमा राशि कुछ चंद धन्नासेठों के हवाले कर देने से लेकर, 100 वर्ष पुरानी भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व मुद्रा कोष को हाथ लगाया गया। बैंक के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 28,000 करोड़ से भी अधिक जमा पूंजी को लेने के लिए सबसे पहले रघुराम राजन और बाद में उर्जित पटेल नाम के दो गवर्नरों को इस्तीफे देने के लिए मजबूर किया गया। संसद से लेकर सभी संवैधानिक संस्थाओं—ईडी, आईबी, सीबीआई, सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग—का इस्तेमाल विरोधी दलों के नेताओं तथा अपने विरोध में लिखने-बोलने वाले लोगों के ऊपर कार्रवाइयाँ करने के लिए भारतीय दंड संहिता की आड़ में शुरू कर दिया गया।

पुलवामा के बाद की सच्चाई सुषमा स्वराज ने खुद कह दी थी कि बालकोट ऑपरेशन में पाकिस्तान का कोई भी सैनिक या नागरिक मारा नहीं गया है। लेकिन नरेंद्र मोदी पूरे देश में चुनावी सभाओं में बढ़ा-चढ़ाकर बोल रहे थे कि “मेरी सेना ने पाकिस्तान के इतने लोग मारे और इतने विमान गिराए” (तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर)। तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल श्री सत्यपाल मलिक ने तो इस बात को लेकर मुहिम छेड़ दी थी और खुलेआम बोल रहे थे कि “पुलवामा के चालीस जवानों की शहादत पर नरेंद्र मोदी ने 2019 का चुनाव जीता है।” अन्यथा नोटबंदी, किसानों का आंदोलन तथा एनआरसी के खिलाफ चले आंदोलन और आसमान को छूती महंगाई, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार की वजह से लोगों का गुस्सा सिर चढ़कर बोल रहा था। लेकिन पुलवामा का मुद्दा नरेंद्र मोदी की राजनीतिक नैया पार कराने के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

काला धन विदेशों से वापस लाने के लिए की गई नोटबंदी से एक रुपये का भी काला धन वापस नहीं आया, उल्टा उसके असर से छोटे उद्योगों के बंद होने से अब तक 50 लाख लोगों को रोजगार से वंचित होना पड़ा है। 2014 के चुनाव प्रचार में हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का एलान किया गया था, लेकिन पूरे 11 साल में इतने रोजगार देने के बजाय 45% बेरोजगारी हो गई है और कृषि क्षेत्र लगभग खत्म होने के कगार पर पहुँच गया है। किसानों की आत्महत्या रुकने के बजाय हर रोज देश के किसी न किसी हिस्से में आत्महत्या की खबर आना जारी है। और यह सब कम लग रहा था, तो संपूर्ण भारत की कृषि को तथाकथित नए उदारवादी आर्थिक सुधारों के हवाले करने हेतु संसद के सत्र में (राज्यसभा में अपना बहुमत न होते हुए भी) तथाकथित ध्वनि मत से निर्णय लिया गया। जो कानून भारत की बची-खुची कृषि को भी खत्म करने वाला था, वह भी भारत के संसदीय इतिहास में लोकतंत्र का गला घोंटने के सबसे बड़े उदाहरण के रूप में दर्ज हो गया है। भारत के कृषि क्षेत्र को धन्नासेठों की सुविधा के लिए कानून बदलकर दिया जा रहा है।

‘भूख, भय, भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ के सपने की जगह भय, भ्रष्टाचार और भुखमरी बदस्तूर जारी है। देश की एक-चौथाई अल्पसंख्यक आबादी को असुरक्षा की भावना में डालकर देश के सामाजिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। आये दिन अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को बार-बार बदनाम करने के लिए कोरोना फैलाने वाले ऊल-जुलूल आरोप लगाकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं? केरल का पत्रकार, वह भी मुसलमान, तो घोषित कर दिया कि यह आईएसआईएस (ISIS) का आतंकवादी है!

लगभग सभी क्षेत्रों में अफरा-तफरी का माहौल बना, तो पुलवामा के मुद्दे से पूरे चुनाव प्रचार को देशभक्ति और पाकिस्तान की आड़ में लड़ने की कोशिश की गई। और वह कम लगा तो कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म करके, राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील करके, लेह-लद्दाख को अलग करके क्या हासिल किया? जिस लद्दाख के लोगों ने 370 हटाने का स्वागत किया था, आज वे राष्ट्रद्रोही हो गए?

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के पहले, राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति के सामने—”मैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी आज से भारत का प्रधानमंत्री पद ग्रहण करते हुए यह शपथ लेता हूँ कि मैं भारतीय संविधान के तहत किसी भी तरह का धर्म, जाति, भाषा, प्रांत, लिंग भेद-भाव न करते हुए सिर्फ और सिर्फ भारतीय संविधान की संप्रभुता की रक्षा करूँगा”—शपथ लेने के बावजूद अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना तथा कश्मीर, लद्दाख, मणिपुर, असम जैसे सीमावर्ती इलाकों के लोगों के साथ जो बर्ताव गत कुछ दिनों से चल रहा है, क्या उसे देखते हुए संविधान के अनुसार ली गई शपथ का सही अनुपालन किया जा रहा है?

भारत जैसे बहु-धार्मिक, बहु-भाषिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में सिर्फ हिंदुओं को एकजुट कराकर एक-दूसरे से लड़ने के लिए उकसाने का काम जारी है। सर्वोच्च न्यायालय का, सिर्फ असम के 44 साल पुराने आंदोलन के कारण नागरिकता को लेकर दाखिल 15 साल पुराने केस पर, असम से आए हुए मुख्य न्यायाधीश महोदय की अध्यक्षता वाली बेंच के निर्णय को पूरे देश पर थोपने की राजनीति की गई। एनआरसी का नाम देकर खुलेआम ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाकर इसे जोर-जबरदस्ती से थोपने का काम वर्तमान सरकार कर रही है। चुनाव आयोग, जिसे निष्पक्ष होकर लोकतंत्रात्मक गणराज्य की चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने के लिए बनाया गया था, उसकी चयन प्रक्रिया में सत्ताधारी दल का बहुमत बनाकर आयोग का गठन किया गया। आज 74 सालों से चली आ रही चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को पहली बार दांव पर लगा देना कौन सी पारदर्शिता का परिचायक है?

बगल के देशों में राजनीति में सेना का हस्तक्षेप लगातार जारी है। वहाँ के लोगों ने हमसे कहा था कि “भाई, कुछ भी हो, लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या वाले भारत में निष्पक्ष चुनाव होते हैं, यह सबसे बड़ी बात है; हम तो सेना के साए में रहने को मजबूर हैं।” ऐसी प्रतिक्रियाएं सुनकर हमारा सीना चौड़ा हो जाता था। लेकिन वर्तमान समय में सेना के पराक्रम को चुनाव प्रचार में भुनाना देखकर लगता है कि भारत की सेना को भी पाकिस्तान की तर्ज पर ले जाने की बात हो रही है। इसलिए देश की रक्षा के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

वही बात 2019 के नवंबर माह के अंत में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने के फैसले में दिखी। और उसके एवज में उन्हें रिटायर होने के एक महीने के भीतर राष्ट्रपति महोदय द्वारा राज्यसभा में मनोनीत करने का निर्णय भी भारतीय न्यायपालिका की बची-खुची आबरू को खत्म करने की बात है, जिसे नरेंद्र मोदी जी के 25 सालों के सत्ता की राजनीतिक उपलब्धियों में ही गिना जा सकता है।

लाखों की संख्या में छोटे उद्योगों को खत्म करने की विधि के तौर पर नोटबंदी को इतिहास में याद रखा जाएगा। उस कारण करोड़ों लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है, सो अलग। अब इस विषय पर इतने सारे अर्थशास्त्रियों ने बोला और लिखा है, पर नरेंद्र मोदी जी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। यह बात उनकी 25 सालों की राजनीतिक उपलब्धियों में किसी को गिनना हो तो जरूर गिना सकता है, लेकिन मैं तो बोलकर रहूँगा कि यह भारत की आजादी के बाद अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने वाला सबसे बड़ा फैसला था, जिसकी कीमत पूरा देश चुका रहा है।

इतने भयंकर अनुभव से कुछ भी नहीं सीखे और 22 मार्च 2020 को नोटबंदी की तर्ज पर अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी। संपूर्ण देश में जो अफरा-तफरी मची, वह नोटबंदी की रही-सही कसर पूरी करने के काम आई। जिस तरह से करोड़ों की संख्या में मजदूरों का पलायन हुआ, वह भी भारत के मजदूरों के इतिहास के सबसे भयावह काल के रूप में याद किया जाएगा। अप्रैल-मई की 45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल, अपना सामान सिर पर उठाकर और नंगे पांव लहूलुहान होकर देश के एक कोने से दूसरे कोने पर स्थित अपने गांवों की तरफ जाने वाली तस्वीरों को भी नरेंद्र मोदी जी के सत्ता के 25 सालों की उपलब्धियों में किसी को गिनना हो तो जरूर गिना सकता है।

और इस तरह अर्थव्यवस्था जो चौपट हो गई है, उसमें हमारे जीडीपी तथा तथाकथित हैप्पीनेस इंडेक्स का क्या कहना! अब तक लाखों की संख्या में जो लोग इस महामारी के शिकार हो गए हैं, सो अलग। लेकिन महामहिम नरेंद्र मोदी जी को इस बात का कितना गम है, पता नहीं। क्योंकि वह कोरोना की आड़ में देश के महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्योगों को बेचने—जिसमें रेल, एयरपोर्ट और विमान सेवा, रक्षा सामान के उद्योग, खनिज उद्यम, शिक्षा, कृषि, आरोग्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग शामिल हैं—प्राइवेट सेक्टर को सौंपने का काम करते रहे। क्या यही आपकी 25 सालों की उपलब्धियों में गिना जाएगा?

अंतिम बात, जिस गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी जी के मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों के भीतर (मार्च 2002 के पहले दिन से ही) जो कुछ हुआ, वह अब ओपन सीक्रेट के रूप में ‘क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी’ बन चुका है। राना अय्यूब, आर. बी. श्रीकुमार, सिद्धार्थ वरदराजन, मनोज मित्ता, लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह, आशीष खेतान और दर्जनों रिपोर्टों के अनुसार, नरेंद्र मोदी जी ने मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के समय राज्यपाल महोदया के सामने शपथ ग्रहण समारोह में कहा था—”मैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी आज से गुजरात का मुख्यमंत्री बनते हुए यह शपथ लेता हूँ कि मैं गुजरात राज्य में रहने वाले हर नागरिक की, बगैर किसी भेदभाव के, सुरक्षा और सम्मानपूर्वक जीने के लिए काम करूँगा और संविधान के अनुसार काम करूँगा।”

27 फरवरी की सुबह गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगने के बाद, 59 अधजले शवों का पोस्टमार्टम रोककर, गोधरा की कलेक्टर जयंती रवि के मना करने के बावजूद उन अधजले शवों को विश्व हिंदू परिषद के लोगों को देने वाला कौन था? और उन शवों को खुले ट्रकों में अहमदाबाद शहर की सड़कों पर 28 फरवरी को जुलूस की शक्ल देने से कौन सी लॉ एंड ऑर्डर की रक्षा होनी थी? क्या यह भी 25 साल की उपलब्धियों में गिना जाएगा?

उसी दिन रात में कैबिनेट बैठक में “कल से लोगों को कोई नहीं रोकेगा” कहने वाले मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति कौन थे? और 28 फरवरी की शाम को अहमदाबाद एयरपोर्ट पर भारत की सेना के 3,000 जवानों को लेकर भेजे गए लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह ने अपनी ‘सरकारी मुसलमान’ नाम की किताब में जो विवरण दिया है कि—”हमें उतरे काफी समय हो गया था और अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर से लेकर गृह मंत्रालय व मुख्यमंत्री कार्यालय तक, किसी ने मेरे फोन का जवाब नहीं दिया। तो मैं अपने साथ लाई जिप्सी पर लोकल गाइड को लेकर रात के दो बजे सीधा गांधीनगर स्थित मुख्यमंत्री आवास पर पहुँचा। देखा कि नरेंद्र मोदी और जॉर्ज फर्नांडिस (जो उस समय देश के रक्षा मंत्री थे) खाना खा रहे थे। जॉर्ज फर्नांडिस उठकर मुझसे हाथ मिलाए और बोले कि ‘जनरल साहब, बहुत सही समय पर आप आ गए, अब गुजरात दंगों को रोकने के लिए लग जाइए।’ तो मैंने कहा कि ‘मैं अहमदाबाद एयरपोर्ट पर उतरने के पहले अपने विमान से देख चुका हूँ कि लगभग पूरा गुजरात जल रहा है। मैं उतरने के बाद शाम से लेकर अभी यहाँ आने के पहले तक सभी पदाधिकारियों को फोन करके थक गया था और मजबूरी में अभी यहाँ तक आया हूँ। मुख्यमंत्री जी को बोलिए कि हमें लॉजिस्टिक्स प्रोवाइड करें।'” और जॉर्ज फर्नांडिस ने मेरे सामने नरेंद्र मोदी जी को कहा कि “आप इनको हर तरह की मदद दीजिए।”

लेकिन 24 घंटों तक, 3,000 की संख्या में भारत सरकार की तरफ से भेजी गई सेना को अहमदाबाद एयरपोर्ट के बाहर नहीं निकलने दिया गया। यह यूट्यूब पर लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह के वीडियो रिकॉर्ड में भी देखा जा सकता है। जिस सेना को लेकर बात-बात पर नरेंद्र मोदी जी विपक्ष पर सेना का मनोबल गिराने और अपमानित करने का आरोप लगाया करते हैं, क्या उन्हें याद आ रहा है कि 2002 में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए खुद आपने भारत के गृहमंत्री को पत्र लिखकर सेना भेजने का अनुरोध किया था? और उसी सेना को अहमदाबाद आने के बाद लॉजिस्टिक्स न देकर बहुत सम्मानित काम कर रहे थे? आपकी चिट्ठी की वजह से तत्काल भारतीय सेना (जो अपनी जान जोखिम में डालकर गुजरात दंगों को रोकने के लिए आपके बुलाने पर आई थी) को लॉजिस्टिक्स न देना किसका निर्णय था?

और अब तो पूरे देश के मुख्य पद पर तीसरी बार पहुँच गए हैं। दिल्ली दंगों से लेकर निजामुद्दीन के तब्लीगी जमात के मुख्यालय में लॉकडाउन के पहले से जमा लोगों की तरफ से बार-बार निकलने के लिए की जाने वाली विनती को दिल्ली पुलिस किसके इशारे पर अनदेखा कर रही थी? और उन्हें कोरोना फैलाने वाला बोलकर मीडिया की मदद से तथा दिल्ली पुलिस के अफसरों का इस्तेमाल करने के लिए औरंगाबाद हाईकोर्ट ने किसे दोषी ठहराया?

क्या बात है? प्रधानमंत्री पद पर पहुँचने की यह कुंजी है क्या? श्रीमती इंदिरा गांधी जी को भी जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन के बारे में यही जुमला इस्तेमाल करते हुए देखा है कि—”विदेशी षड्यंत्र”। और आप तो गुजरात दंगों से लेकर गोधरा कांड तक, अपनी हत्या करने के लिए भेजे गए लोगों के मामलों में बार-बार पाकिस्तान का नाम लेते देखे गए हैं।

देखिए, आप लोग दूसरों को उठते-बैठते ‘देशद्रोही’ करार देने का काम कर रहे हैं, लेकिन आपका और आपके अन्य सिपहसालारों का काम देखकर लगता नहीं कि यह शब्द इस्तेमाल करने का थोड़ा सा भी नैतिक अधिकार आप लोगों को है। क्योंकि 1946-47 के दौरान कौन सा कारण विशेष रूप से बंटवारे के लिए काम आया था? द्विराष्ट्र का सिद्धांत, जो 1917 में बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर जी ने पहली बार कॉइन किया था। और 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हिंदुओं का संगठन करने के लिए की गई थी। उनके मुस्लिम काउंटरपार्ट बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए उसे बखूबी इस्तेमाल किया, वह भी 23 साल बाद।

इसलिए बंटवारे के दिन को याद दिलाना नरेंद्र मोदी जी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए बहुत ही महंगा पड़ने की संभावना है। सांप्रदायिकता, पाकिस्तान, मंदिर-मस्जिद की जुमलेबाजी से अब चुनाव जीते नहीं जा सकते, यही देखकर 2023 के शीतकालीन संसदीय सत्र के दौरान 1991 के पुराने चुनाव आयोग अधिनियम (Election Commission Act, 1991) की जगह मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति का गठन किया गया है। इसमें प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विरोधी दल के नेता (या सबसे बड़े विरोधी दल के नेता) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे।

कैबिनेट मंत्री की जगह पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश होते थे। इस बदलाव से उन्हें हटाकर सत्ताधारी दल का बहुमत कराते हुए चुनाव आयोग की नियुक्ति की गई है। इस चुनाव आयोग के लिए कानून की धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके कर्तव्य का पालन करते हुए किए गए कार्यों के लिए दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है। यह विशेष कानूनी सुरक्षा (Immunity) देने के बाद ही वर्तमान चुनाव आयोग ने मनमानी करते हुए अब तक जितने भी चुनाव संपन्न कराए हैं, वे सभी के सभी भाजपा को जीत दिलाने के लिए किए गए चुनाव हैं।

यही आलम जारी रहा तो भारत का संसदीय जनतंत्र सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक इकाई भाजपा के तंत्र के रूप में रह जाएगा, जिसकी कल्पना श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के अनुसार अल्पसंख्यक समुदायों को वोट के अधिकारों से वंचित करते हुए की गई थी—कि उन्हें सिर्फ बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की सदाशयता के आधार पर ही रहना चाहिए, इसलिए ‘एकचालकानुवर्त’।

अब उस बात को 78 साल से अधिक समय हो गया है और आज भी भारत में 20 करोड़ से भी अधिक संख्या में मुसलमान रह रहे हैं। क्या आप भागलपुर, गुजरात जैसे दंगों में इन्हें समाप्त कर सकते हैं? दुनिया के इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे गए हों, ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है। यह मुसलमान आप लोगों को अच्छे लगें या न लगें, लेकिन ये कहीं भी नहीं जाएँगे। और जाना चाहेंगे तो भी कोई इन्हें लेने वाला नहीं है। तो फिर आपको इनके साथ जीने का तरीका इजाद करना होगा।

रोज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में मुसलमानों का डर दिखाकर उपाय नहीं हो सकता। कोई भी समूह डर के माहौल में जी नहीं सकता। विभिन्न तरह के वंशजों को बार-बार खत्म करने के इतिहास को देखते हुए यही सही है कि उनके साथ प्रेम, मोहब्बत और सम्मानपूर्वक जीने का तरीका अपनाया जाए, जिसके लिए हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने भी कहा था। इसीलिए हिंदुत्ववादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक नाथूराम गोडसे ने आज से 80 साल पहले उन्हें जान से मार दिया था। लेकिन इसके बावजूद भी संपूर्ण विश्व में आज उन्हीं का बोलबाला है—”जिओ और जीने दो।” इसी से राष्ट्र की एकता और अखंडता कायम रह सकती है और आतंकवाद का भी खात्मा हो सकता है।

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