न्याय के दलालों को देखा है और न्याय को बिकते हुए देखा है
न्याय और कानून के संदर्भ में कहना चाहता हूं कि लोकतंत्र में कानून और न्याय का महत्व सबसे ऊपर रहता है. अगर कानून और न्यायालय न हो, तो लोकतंत्र का चलना मुमकिन नहीं है. न्यायालय का काम है, आम जनता, गरीब और असहाय लोगों को उसका हक दिलाना, उनकी मदद करना और बचाव करना. लेकिन मैंने इसके बिल्कुल उल्टा होता देखा है. न्याय के दलालों को देखा है और न्याय को बिकते हुए देखा है. आज कानून खुद न्याय का दलाल बन बैठा है.

अरुणाचल राज्य में हुए पीडीएस घोटाला मामले को राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि गलत हुआ, एफसीआई ने माना कि गलत हुआ, केंद्र सरकार ने भी कहा कि गलत हुआ, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को खुला छोड़ दिया और उनका पूरा पेमेंट करने का आदेश दे दिया. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने 36 करोड़ रुपए घूस लेकर गलत फैसला दिया था. उन्होंने अपने बेटे के जरिए समझौता किया था. जबकि वो फैसला गलत था. अल्तमस कबीर अपने फैसलों के कारण पहले भी विवादों में रहे हैं.

वर्तमान अदालती मामले
16-17 दिसंबर को हुए विधानसभा सत्र में नबाम तुकी सरकार को वोट ऑफ कॉन्फिडेंस से हटाया गया. इस पर नबाम तुकी कोर्ट से स्टे लेकर आ गए और उनकी सरकार चलती रही. इसके साथ स्पीकर नबाम रिबिया भी अपने पद पर बने रहे. इतना कुछ होने पर भी हमने सरकार नहीं बनाई. 13 जनवरी को गुवाहाटी होईकोर्ट ने इस स्टे को खारिज कर दिया और पेटिशन भी खारिज कर दी. इस पर नबाम तुकी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इसके बाद भी उनकी सरकार चलती रही. गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर भी हमने सरकार नहीं बनाई. इसके बाद राज्य में कानून व्यवस्था बिगड़ती गई. राज्य के हर कोने में घटनाएं बढ़ने लगीं. यहां तक कि गवर्नर से भी बदसलूकी की गई. राज्य में शांति व्यवस्था नहीं रही. हर दिन हड़तालें होने लगीं. फाइनेंशियल क्राइसिस आ गया और राज्य की हालत दिन-ब-दिन खराब होती गई. 16-17 दिसंबर के विधानसभा सत्र को मान्य नहीं माना गया, जिसके कारण पिछले 6 महीने से विधानसभा का सत्र नहीं हुआ. इसके चलते राज्य में संवैधानिक संकट भी पैदा हो गया. राज्य में बढ़ती वारदातों और घटनाओं को देखकर 26 जनवरी को राज्य में प्रेसिडेंट रूल लगाया गया. जिसके कारण नबाम तुकी सरकार हटी. 19 फरवरी को राज्य से प्रेसिडेंट रूल हटाया गया. राज्य में प्रेसिडेंट रूल हटने के बाद हमने 33 विधायकों के साथ नई सरकार बनाने की पेशकश की, इस पर राज्यपाल ने हमें सरकार बनाने का न्यौता दिया और 10 दिनों में बहुमत सिद्ध करने को कहा गया. सात दिनों में ही यानि 25 फरवरी को हमने सदन में अपना बहुमत सिद्ध किया. हमारी सरकार कहीं भी गलत कारणों से नहीं बनी थी, हमने हमेशा संविधान, कानून, न्याय और नीति को मानते हुए काम किया और सरकार बनाई.

जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला इस प्रकार है- सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान बेंच ने राज्यपाल के पूर्वाहूत आदेश और विधायकों को भेजे गए उनके संदेश को खारिज कर दिया. पहले और दूसरे (1 और 2) को ध्यान में रखते हुए (16-17) को हुए सत्र को खारिज कर दिया.पहले, दूसरे और तीसरे को ध्यान में रखते हुए विधानसभा के फैसले को खारिज किया. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में मेरी सरकार के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में लागू प्रेसिडेंट रूल के बारे में भी कुछ नहीं कहा. 25 फरवरी को विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट, जो कि छठी विधानसभा का सातवां सत्र था, के बारे में भी कोई टिप्पणी नहीं की. इसके बाद विधानसभा का बजट सत्र हुआ, बजट पारित हुआ, जो छठी विधानसभा का आठवां सत्र था, इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं कहा.

इस केस में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला बिल्कुल गलत था, हमारे संविधान में दिए गए ये कानून बहुत ही आम हैं और बच्चे-बच्चे इन कानूनों से वाकिफ हैं.

Article 174 – The Governor shall from time to time summon the House or each House of the Legislature of the state to meet at such time and place as he thinks fit- राज्यपाल को ये शक्ति है कि वे विधानसभा को नियमित अंतराल से चलाएं. राज्यपाल विधानसभा में कोई बाधा होने पर अपने हिसाब से समय और जगह तय कर सत्र बुला सकते हैं.
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Article 175- The Governor may sent messages to the House or House of the legislative of the state, whether with respect to a bill then pending in the legislature or otherwise, and a House to which any message is so sent shall with all convenient dispatch consider any matter required by the message to be taken into consideration- राज्यपाल विधानसभा के दोनों हाउस को अपना मैसेज भेज सकते हैं, सत्र में भेजे गए मैसेज को हर हाल में अमल में लाना होगा.

आर्टिकल 163- मुख्यमंत्री या उनके परिषद राज्यपाल से सलाह ले सकते हैं. अगर किसी भी तरह का कोई विवाद खड़ा होता है, तो राज्यपाल का फैसला ही अटल व मान्य होगा. इसके लिए राज्यपाल के फैसले को किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती.
हमारे देश के संविधान में बताए गए इन कानूनों के अनुसार, किसी राज्य में सरकार गिरने या माइनॉरटी में होने और राज्य में किसी तरह का संकट आने पर राज्यपाल को ये अधिकार रहता है कि वे राज्य में विधानसभा के सत्र को बुलाकर, मुख्यमंत्री को बहुमत सिद्ध करने का आदेश दे सकते हैं.

इस केस में सिर्फ नबाम तुकी को ही हटाने की बात नहीं थी, बल्कि स्पीकर नबाम रिबिया को भी हटाने का प्रस्ताव था. ये जानकर नबाम रिबिया ने एक महीने की जगह दो महीनों से भी ज्यादा समय देकर विधानसभा सत्र बुलाया, जबकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. ऐसा कर वे विधायकों का खरीद-फरोख्त करने में अपने भाई नबाम तुकी की मदद कर रहे थे. जबकि स्पीकर को हटाने का नोटिस और प्रस्ताव आने के सिर्फ 14 दिन बाद ही कार्यवाई की जानी चाहिए. इस बात को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल ने विधानसभा सत्र को पूर्व आहूत किया. राज्यपाल ने हमेशा कानून के दायरे में रहकर काम किया, इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी.

सुप्रीम कोर्ट से ऐसा फैसला मिलने पर मेरा न्यायालय से विश्वास उठ गया है. मुझे दुख तो इस बात का है कि अरुणाचल राज्य के विधायक तो बिके हुए हैं और बिकते हैं, कांग्रेस भी बिकी हुई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज भी बिके हुए होंगे मैंने कभी नहीं सोचा था. उन्होंने फैसला मेरे हक में देने के लिए मुझसे और मेरे करीबियों से कई बार सम्पर्क किया. उन्होंने मुझसे 86 करोड़ रुपए की घूस मांगी थी. जबकि मैं एक आम और गरीब आदमी हूं, मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, जिससे मैं सुप्रीम कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के जज और उसके फैसले को खरीद सकूं और न ही खरीदना चाहता हूं. क्योंकि मुख्यमंत्री की जो कुर्सी है, वो जनता की सेवा और सुरक्षा के लिए है, जिसको मैं खरीदकर हासिल नहीं करना चाहता हूं. इसीलिए मैं कोर्ट में दुबारा नहीं गया और न ही दुबारा अर्जी डाली.

वीरेंद्र केहर ने मेरे आदमियों से सम्पर्क कर मुझसे 49 करोड़ रुपए मांगे
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जगदीश सिंह केहर के छोटे बेटे वीरेंद्र केहर ने मेरे आदमियों से सम्पर्क कर मुझसे 49 करोड़ रुपए मांगे. वहीं जस्टिस दीपक मिश्रा के भाई आदित्य मिश्रा ने मुझसे 37 करोड़ रुपए की मांग की थी. कपिल सिब्बल की भी सुप्रीम कोर्ट में अपनी लॉबी है. हर वकील, हर जज इन्हीं के इशारे पर घूस लेकर, झूठे फैसले करते हैं और नाचते हैं. कपिल सिब्बल ने चार्टर्ड विमान से गुवाहाटी आकर आधे घंटे में ही हाईकोर्ट से स्थगन आदेश ले लिया था. जबकि पहले कोर्ट ने उसी केस को खारिज कर दिया था.

इस पर मैं प्रशांत तिवारी के साथ कपिल सिब्बल से चार बार मिला. मैंने सिब्बल जी को नबाम तुकी की सारी हकीकत बताई. जब मैं कपिल सिब्बल से उनके घर पर (1-जोरबाग, मेट्रो स्टशेन के पास, अरबिंदो मार्ग, नई दिल्ली) मिला तब उन्होंने मुझसे 9 करोड़ रुपए की मांग की थी और उन्होंने मुख्यमंत्री (पू.) ने आत्महत्या से पहले आखिरी बार लिखा फैसला टालने के लिए 9 करोड़ मांगे एडवांस में चार करोड़ रुपए देने की मांग की. ये बात तय होने के बाद, उन्होंने गुवाहाटी होईकोर्ट में नियमित सुनवाई में जाना ही छोड़ दिया.

गुवाहाटी हाईकोर्ट में जहां कांग्रेस का वकीलों और जजों पर दबाव नहीं था, वहां हमने ये केस जीता था. बाद में हमें यह पता चला कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजने का लालच देकर नबाम तुकी का केस दुबारा लड़ने को कहा था. कपिल सिब्बल ने ही सुप्रीम कोर्ट में जजों को पैसे देकर सारा खेल रचा और नबाम तुकी को झूठी जीत दिलाई. बदले में आज वे राज्यसभा के सांसद बन गए हैं. मैंने अपने 31 साल के राजनीतिक जीवन में देखा है कि न्यायालय में कांग्रेस के ही वकील और जज हैं, जो आपस में मिले हुए हैं.

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