डोनाल्ड ट्रंप ने 20 जनवरी 2025 को दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद से दुनिया को डराने का जो ‘कु-अभियान’ शुरू किया है, उस तकनीक का पेटेंट तो 1925 में संघ की स्थापना के साथ ही करा लिया गया था, जिसे अब आने वाले दशहरे पर 101 साल पूरे होने जा रहे हैं। इसीलिए, हाल ही में रिकॉर्ड तोड़ कमाई करने वाली फिल्म ‘धुरंधर’ के हीरो ने जब रेशमबाग स्थित संघ मुख्यालय में आपसे डेढ़ घंटे तक मुलाकात की, तो ऐसा लगता है कि आपने उन्हें विस्तार से समझाया कि सौ साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का एकमात्र उद्देश्य गुलामी की बेड़ियों में जकड़े राष्ट्र को मुक्त कराना था। अब चर्चा है कि आपने उन्हें इसी थीम पर ‘धुरंधर पार्ट 2’ बनाने की सलाह दी है।

इसी संदर्भ में, ट्रंप द्वारा ईरान युद्धविराम को लेकर ‘X’ (ट्विटर) पर चर्चा शुरू करते ही आपने तुरंत कहा था, “अब केवल भारत ही शांति का मार्ग दिखा सकता है।” पूरी दुनिया देख रही है कि शांति का रास्ता निकालने में किसकी पहल चल रही है। आप हिंदी सिनेमा के स्टाइल में कह सकते हैं: “1946-47 के सांप्रदायिक मेले में खोया हुआ अपना भाई यही तो है ना?” यही बात मैं भी कहता आया हूँ, क्योंकि हमने विभाजन को कभी दिल से स्वीकार नहीं किया। हमारे लिए ‘अखंड भारत’ में पाकिस्तान का हिस्सा सदियों से शामिल है। रेडक्लिफ नामक एक अंग्रेज ने पेंसिल से कागज पर लकीर खींचकर भारत-पाकिस्तान बना दिया, जिसे हमने कभी नहीं माना। हमारा अखंड भारतवर्ष ईरान, अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, इंडोनेशिया और मलेशिया तक फैला हुआ है।

आज आप कह रहे हैं कि आरएसएस की स्थापना देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए हुई थी। संघ 1925 में बना और आजादी 1947 में मिली। इन 22 वर्षों में स्वतंत्रता संग्राम में संघ की क्या भूमिका थी? इसे खोजने के लिए मुझे 1982 की एक घटना याद आती है। मेरी पत्नी का तबादला पुलगांव से कलकत्ता (अब कोलकाता) हो गया था। हम चिंतित थे क्योंकि वहां हमारा कोई परिचित नहीं था। तब पुलगांव के विवेकानंद केंद्र के हमारे मित्र अरविंद और सुलभा गोरे ने हमें कलकत्ता के विवेकानंद केंद्र (जो शायद विधान सरणी में अखिल भारतीय मुख्यालय था) के पदाधिकारियों के नाम एक पत्र दिया था ताकि जरूरत पड़ने पर मदद मिल सके।

कलकत्ता में प्रभारी प्रभात अवस्थी जी ने हमारी बहुत मदद की। उन्होंने हमारे घर के काम और बच्चों की देखभाल के लिए एक कुशल लड़की की व्यवस्था भी की। प्रभात जी समय-समय पर हमारा हालचाल लेने आते थे और मुझे कलकत्ता के महत्वपूर्ण लोगों से मिलवाने ले जाते थे। उनमें एकनाथ रानाडे जी, डॉ. बालकिशन जी, डॉ. लक्ष्मी, डॉ. नागेंद्र और विशेष रूप से हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर सेन शामिल थे, जो उस समय कलकत्ता महानगर संघ के प्रमुख थे। डॉ. सेन के पास चिकित्सा के अलावा अन्य विषयों की पुस्तकों का एक बड़ा पुस्तकालय था। उनका अस्पताल थिएटर रोड पर श्री अरबिंदो के जन्मस्थान के बगल में था। डॉ. सेन के माध्यम से ही मेरी पहचान कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विष्णुकांत शास्त्री जी से हुई, जो बाद में राज्यपाल भी बने।

डॉ. सेन ने मुझे ब्रिटिश संसद द्वारा गोपनीयता कानून हटाकर प्रकाशित किए गए 1756 से 15 अगस्त 1947 तक के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दस्तावेजों के मोटे खंड दिखाए थे। जब मैं उन्हें पढ़ने के लिए ले जाने लगा, तो प्रोफेसर विष्णुकांत शास्त्री जी ने कहा, “सुरेश भाई, इसे पढ़कर आपको बहुत दुख होगा।” पूछने पर उन्होंने बताया:

“अंग्रेज बहुत चतुर थे। आरएसएस की स्थापना केवल राष्ट्र सेवा के लिए हुई थी। हमें केवल सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करना था, राजनीति में रुचि नहीं थी। 1925 में स्थापना के कुछ समय बाद, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बैरिस्टर सावरकर को ब्रिटिश सैन्य भर्ती बोर्ड में सवेतन सदस्य बनाया गया था। इसका कारण यह था कि उन्होंने 1911 से अंडमान जेल से ब्रिटिश सरकार को लगातार पांच-छह माफीनामे लिखे थे। उन्होंने वादा किया था कि यदि उन्हें मुक्त किया गया, तो वे ‘भटके हुए’ क्रांतिकारी युवाओं को ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा के लिए तैयार करेंगे। इसी आधार पर अंग्रेजों ने उन्हें कलेक्टर से भी ज्यादा पेंशन देकर रिहा किया था।

बदले में, जब हिटलर और मुसोलिनी के हमलों से ब्रिटिश साम्राज्य हिलने लगा था, तब सावरकर ने भारतीय युवाओं को ब्रिटिश सेना और पुलिस में भर्ती करने की प्रक्रिया शुरू की। अंग्रेज इतने होशियार थे कि वे संघ के लोगों द्वारा लिखी गई रिपोर्टों को लंदन भेजने से पहले खुद जांचते थे। संघ प्रमुख गोलवलकर ने संघ को स्वतंत्रता आंदोलन से दूर ही रखा। हालांकि, कुछ युवा स्वयंसेवक आंदोलन में कूदने के लिए उत्सुक थे, लेकिन उन्हें सख्त ताकीद दी गई कि ‘यदि तुम्हारी बाहें फड़क रही हैं, तो कांग्रेस नेताओं की सभाओं पर हमला करो। ब्रिटिश पुलिस तुम्हें कुछ नहीं कहेगी, बल्कि वे तुम्हारी पीठ थपथपाएंगे।’ इसीलिए ब्रिटिश दस्तावेजों में संघ के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इसके उलट, सावरकर और जिन्ना की चर्चा के बाद हिंदू महासभा बंगाल और सिंध के संयुक्त मंत्रिमंडल में मुस्लिम लीग के साथ शामिल हो गई थी। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने तो वायसराय को पत्र लिखकर यह तक बताया था कि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को कैसे कुचला जा सकता है। यह सब रिकॉर्ड में है, इसीलिए मैं आपको महाराष्ट्रीयन मित्र होने के नाते सावधान कर रहा हूँ कि सच जानकर आपको पीड़ा होगी।”

मैंने जवाब दिया कि भले ही मुझे दुख हो, लेकिन मैं जानना चाहता हूँ कि उन दस्तावेजों में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्या दर्ज है। आदरणीय भागवत जी, अब चूंकि आपकी सरकार सत्ता में है, तो क्या हम इस इतिहास को नए सिरे से लिखकर पक्का कर लें कि हमारे संस्थापकों ने 1925 में संघ की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम के लिए ही की थी? जब हम कहते हैं कि डॉ. हेडगेवार कलकत्ता के नील रतन मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ‘अनुशीलन समिति’ के प्रमुख सूर्य सेन (मास्टर दा) के दाएं हाथ थे, तो लोग हमें झूठा कहते हैं। इसलिए इतिहास को दोबारा लिखकर यह दर्ज कर देना चाहिए कि छात्र जीवन में डॉ. हेडगेवार ने ही सशस्त्र क्रांति के लिए अनुशीलन समिति बनाई थी और सूर्य सेन उनके सहायक थे।

साथ ही, यह भी लिख दिया जाए कि लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव संघ स्थापना से पहले ही इसके ‘आद्य स्वयंसेवक’ थे। हमें यह भी दर्ज करना चाहिए कि 1940 में नासिक में डॉ. हेडगेवार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को बुलाकर कहा था, “मेरी हिटलर से बात हुई है, वह आपकी मदद करेंगे। आरएसएस उनके जर्मन ‘स्टॉर्म ट्रूपर्स’ (Storm Troopers) और इटालियन ‘बलाला’ (Balilla) का भारतीय संस्करण है।” हमने ही उन्हें जर्मनी और जपान जाने का रास्ता सुझाया और आरएसएस का नाम गुप्त रखने की सलाह दी।

हमें इतिहास में यह भी लिखना चाहिए कि सावरकर ने सैन्य भर्ती बोर्ड में केवल इसलिए प्रवेश लिया ताकि वे आजाद हिंद फौज के लिए प्रशिक्षित सैनिक तैयार कर सकें। यह भी लिख दें कि 15 अगस्त 1947 तक आरएसएस के प्रयासों और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में संघ के निर्देशों पर लाखों लोगों के शामिल होने के कारण अंग्रेज डरकर भाग गए।

जैसे पुष्यमित्र शुंग ने ढाई हजार साल पहले बौद्ध कालीन इतिहास को नष्ट किया था, वैसे ही हमें ‘सेकुलर’ लेखकों की किताबों को हटाकर केवल यही जानकारी आने वाली पीढ़ी को देनी चाहिए। पिछले 12 वर्षों से हम ‘प्रोपोगंडा’ फिल्में बना रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली। अब ‘धुरंधर’ फिल्म ने रास्ता दिखाया है। इसीलिए रणवीर सिंह को बुलाकर कहा गया है कि वे डॉ. हेडगेवार की भूमिका निभाएं। उनके प्रति सहानुभूति इसलिए भी है क्योंकि उनका परिवार विभाजन के समय कराची से आया था।

अंत में, हम भारत में सभी ‘देशद्रोही’ प्रचारों पर रोक लगा देंगे। जो लोग पुरानी जानकारी (70+ आयु वाले) लेकर बैठे हैं, उनके दिमाग से एआई (AI) की मदद से पुरानी यादें डिलीट कर देंगे। तब “ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी।”

भारत माता की जय।

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