समाजवादी पार्टी के 92 वें स्थापना दिवस के अवसर पर पटना में इकठ्ठा होने वाले सभी साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन .

समाजवादी पार्टी के 92 वां स्थापना दिवस के उपलक्षमे. कुछ मुक्त चिंतन करते हूऐ सभी साथियों को आज हमारी स्थिति सिर्फ जन्मदिन और पुण्यतिथियां मनाने तक ही सिमित होने की वजह को इमानदारी से हमारे अपने खुद के ही अंतरमनो के भितर झांकने की आवश्यकता मै हमेशा ही अपने पुरखों की याद में करना चाहिए इस विचार का रहा हूँ. इसलिए मेरा आप सभी साथियों को भी यही प्रार्थना है कि ऐसी स्थिति हमारे अपने आंदोलन जिसकी स्थापना ही हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी पर्व मे आजसे 92 साल पहले इसी पटना में विधिवत समाजवादी पार्टी की स्थापना करते हूए हुई थी और जिसके प्रथम अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव और प्रथम सचिव जयप्रकाश नारायण जैसे क्रांतिकारियों से शुरू हुई थी आचार्य नरेंद्र देव(जन्म 31 अक्तुबर 1889 और मृत्यु 19 फरवरी 1956) दमे की बिमारी की वजह से 67 सालों की जीवनयात्रा पूरी करते हूऐ जल्द ही इस दुनिया से चले गए. लेकिन जयप्रकाश नारायण जन्म (11 अक्तूबर 1902 मृत्यू 8 अक्तूबर1979) कम- से – कम 77 सालों का जिवन जिऐ है. और इसी पटना में उनका निधन हुआ है. और तीसरे नेता डॉ. राममनोहर लोहिया (23 मार्च 1910 मे जन्म और मृत्यु के समय जयप्रकाश नारायण से 20 साल पहले और आचार्य नरेंद्र देव से और भी दस सालों से कम जीवन के रहते हुए ही उनका प्रोस्टेट ग्रंथि के आपरेशन फेल होने की वजह से उम्र के साठ साल के पहले ही वह इस दुनिया से विदा हूऐ है तीनों नेताओ को समाजवादी पार्टी की निंव रखने वाले नेताओं के रूप में हम सभी उन्हें आज भी याद करते हैं. आचार्य नरेंद्र देव तो आजादी के बाद सिर्फ नौ साल जिऐ थे और डॉ. राममनोहर लोहिया 20 साल और जयप्रकाशजी को उनसे और दस साल की जिंदगी जीने का मौका मिला है.
तीनों नेताओं की समाजवादी विचारधारा के बारे में निष्ठा को लेकर कोई शंका का सवाल शायद उनके विरोधी लोगों के भी जेहन में नही होगा सवाल समाजवाद को अमलीजामा पहनाने के लिए जो कार्यकर्ताओं को तैयार करने के लिए जमीनी स्तर पर करना चाहिए था उसमे बहुत बड़ी गलती हुई है सिर्फ तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ माहौल पैदा करने मे ही हमारे तीनो नेताओं का ज्यादातर समय व्यतीत हुआ है. लेकिन उसके लिए अपने खुद के प्रतिबध्दता वाले साथियों को तैयार करने की जगह अन्य विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को लेकर जो लडाई लडने की रणनीति से सत्ताधारी पार्टी के प्रभावक्षेत्र को कम करने में कामयाबी तो मिली है. लेकिन संघटना के स्तर पर सबसे लाभार्थी पार्टी सिर्फ भारतीय जनसंघ जो भारतीय जनता पार्टी का मूल नाम था को उस समय से ही मिलने की शुरुआत हुई है इसकी एकमात्र वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जैसा कार्यकर्ता निर्माण करने का मातृसंघठन 1925 से ही बनाया था उसिकी राजनीतिक ईकाई वर्तमान भाजपा है समाजवादीयों को भी समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद सात साल पश्चात महाराष्ट्र के समाजवादी विचारधारा के लोगों ने मिलकर जनतांत्रिक – समाजवादी सेक्युलर समतामूलक तथा वैज्ञानिक सोच के आधार पर कार्यकर्ताओं को निर्माण करने के लिए राष्ट्र सेवा दल के नाम से संघठन की स्थापना 4 जून 1941 मे पुणे में की थी जिसका 85 वा स्थापना दिवस आ रहा है. लेकिन हिंदुत्ववादी आर एस एस और उसकी राजनीतिक ईकाई भाजपा की तुलना में राष्ट्र सेवा दल और समाजवादी पार्टी की वर्तमान स्थिति में अंतर कितना है और क्यो है इस विषय पर आप सभी साथियों का ध्यान खिचने की कोशिश के रूप में मै यह मुक्तचिंतन लिखने की कोशिश कर रहां हूँ. क्योंकि आज भाजपा की ताकत उसके मातृसंघठन की ताकत के उपर खडी है. सुना है कि कम्युनिस्ट पार्टी ने भी 1925 मे अपनी स्थापना के साथ बालसंघठन की भी स्थापना की थी. लेकिन वर्तमान समय में कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ पदाधिकारियों को भी उस ईकाई का अता-पता मालुम नहीं है. शायद वैसे ही स्थिती समाजवादी पार्टी के ज्यादातर लोगों की भी राष्ट्र सेवा दल को लेकर हो सकती है.
क्योंकि उत्तराखंड के रामगढ मे उत्तराखंड राष्ट्र सेवा दल के एक कार्यक्रम में मेरे राष्ट्र सेवा दल के अध्यक्ष रहने के (2017 – 2019) दौरान समाजवादी पार्टी के एक प्रवक्ता के साथ, एक जगह पर ठहरने की व्यवस्था की गई थी. तो उन्होंने पूछा था कि यह राष्ट्र सेवा दल क्या है ? तो मैंने कहा कि यह एक जनतांत्रिक- समाजवादी, सेक्युलर, विज्ञाननिष्ठ, समतामूलक समाज बनाने के लिए कार्यकर्ताओं का निर्माण करने का काम करने के लिए महाराष्ट्र के समाजवादीयों ने 1941 मे स्थापित किया हुआ संघठन है. जिसमें से बैरिस्टर नाथ पै, प्रोफेसर मधु दंडवतें, मधु लिमये मृणाल गोरे तथा प्रमिला दंडवतें जैसे समाजवादी नेता बचपन में शामिल होने के वजह से ही समाजवादी आंदोलन को ऐसे नेता रेडिमेड उपलब्ध हुऐ हैं. तो उन्होंने कहा कि यह तो बहुत ही अच्छा संघटना है जो समाजवादी विचारधारा के लोगों को बनाने का महत्वपूर्ण काम करता है इसलिए जब भी कभी आप लखनऊ में आओगे तो कृपया हमें बताएं हम आपकी और अखिलेश यादव जी की मुलाकात करांएगे, उसके तुरंत बाद ही मुझे लखनऊ में संदीप पांडेजी ने राष्ट्र सेवा दल के कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिबीर आयोजित किया था, तो मै दो दिन के लिए लखनऊ में रहते हुए उस प्रवक्ता को बोला था, कि “मैं लखनऊ में हूँ, आपको संभव हो तो मेरी और अखिलेश यादव जी की मुलाकात कराइए”. पर वह मुलाकात नहीं हो पाई. उसितरह ही पटना में नितिश कुमार ने जब आर एस एस मुक्त भारत की घोषणा की थी, तो मैंने उनके पार्टी के एक राज्यसभा संसद सदस्य को सूचित किया की मै पटना में हूँ. और मैंने भी राष्ट्र सेवा दलके अध्यक्ष बनने के बाद तुरंत आर एस एस मुक्त भारत की घोषणा की है. तो हमारी नितिश बाबु के साथ मुलाकात करने का प्रबंध किजिये लेकिन नितिश कुमार के साथ वह मुलाकात नहीं हो पाई. क्या सचमुच ही हमारे सभी समाजवादी पार्टी के सभी राजनेताओं को समाजवादी पार्टी के लिए प्रतिबद्ध समाजवादी साथियो की आवश्यकता है या सिर्फ उनके सही – गलत नितियो को अंधसमर्थकोकी फौज चाहिए ?
साथियो आज समाजवादी पार्टी का 92 वा स्थापना दिवस है. मैं बचपन से ही राष्ट्र सेवा दलके कारण जनतांत्रिक समाजवादी, सेक्युलरिज्म, वैज्ञानिक तथा समतामूलक समाज की सोच अनुसार समाज का निर्माण करने वाली विचारधारा को मानने वालों में से एक रहा हूँ. और जानबूझकर ही संसदीय क्षेत्र में शामिल होने की जगह राष्ट्र सेवा दल के काम में अपने आप को मर्यादित करते हूऐ आज 73 सालों की उम्र में रखा हुआ है. लेकिन तब से लेकर अभितक (1966 – 2026)लगभग 60 सालों से भी अधिक समय से मेरे मन में लगातार एक उधेड़बुन बनीं हुई है, कि कौनसी समाजवादी पार्टी सही है ? और कौन सी गलत है ? इस पेशोपेश मे अभितक हूँ. और इसिलिए मै किसी भी पार्टी का सद्स्य कभी नहीं बन सका. क्योकी जब मैं राष्ट्र सेवा दलकि शाखा चलाता था, उस समय दो सेवादल के पूर्व अध्यक्ष (उस समय दलप्रमुख)मेरी शाखामे आकर गये थे. एक थे श्री. एस. एम. जोशीजी जो सयुंक्त सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष थे. दुसरे थे श्री. नाना साहब गोरे जो प्रजा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष थे. और मुझे तो दोनो के दोनों बहुत प्रिय थे. लेकिन उनकी समाजवादी दो पार्टिया मेरी समझ में नहीं आता था की, ये दोनो महाराष्ट्र के नेता एक ही शहर के खुब अच्छे मित्र, लेकिन दो अलग-अलग पार्टीयोके नेता क्यो है ? मैं जब इस पेशोपेश मे था तब ड़ॉ. लोहिया इस दुनिया को अलविदा कह गए थे. और जेपी सर्वोदय में लोक सेवक बन गए थे. तो मेरे लिए एस. एम. जोशी ,नाना साहब गोरे ,जॉर्जफर्नांडीज ,बैरिस्टर नाथ पै,प्रो मधु दंडवते, मधु लिमये, मृणाल गोरे,प्रोफेसर सदानंद वर्दे,भाई वैद्य,ड़ॉ. जी. जी. पारीख ,प्रोफेसर जी. पी. प्रधान मास्तर,ड़ॉ. बापु कालदाते, पन्नालाल सुराणा, से लेकर दोनो समाजवादी पार्टीयो के नेता अच्छे लगते थे. इंन्दुमती-आचार्य केलकर पुत्रवत प्रेम करते थे. और उन्होने ड़ॉ. लोहिया की मराठी में अनुवादित की हुई सभी पुस्तको को उम्र के बीस साल के पहले ही पढ़ चुका था. फिर राष्ट्र सेवा दल के अभ्यास शिबिरोमे विनायक कुलकर्णी,हमिद दलवाई,नरहर कुरुंदकर ,ए बी शाह,प्रधान मास्तर,यदुनाथ थत्ते,बापूसाहेब कालदाते,नाना साहब गोरे,एस. एम. जोशी सभी महानुभावो के भाषण सुन कर बडा हूआ हूँ. पर इनकी दो अलग- अलग पार्टीया क्यो है ? यह मैं अभितक नहीं समझ पाया. फिर इनको क्या सुझा मालुम नहीं जेपी आंन्दोलन के दौरान या पहलेही इनकी एक पार्टी हो गई थी (1973 – 74) और अध्यक्ष बने थे तेज तर्रार चक्का जाम के शब्द के जन्मदाता जॉर्ज फर्नांडीज. लेकिन बहुत जल्दी आपात्काल में ही जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर (1976) जनता पार्टी के निर्माण में यह पार्टी 1 मई 1977 के दिन विठ्ठल भाई पटेल हाऊस के लॉन में विसर्जित की गयी जिसका मै साक्षियोंमेसे एक हूँ, आचार्य केलकर जी के साथ.
फिर दोहरी (जनसंघ के आर एस एस के साथ) सदस्यता के मुद्देपर जनता पार्टी दो साल के भितर ही मधु लिमये और जॉर्ज फर्नाडिस तथा राजनारायणजी के आक्षेप लेने की वजह से टुट गई.चरणसिंग की भारतीय क्रांति दल नाम की पार्टी में मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, राजनारायणजी से लेकर कुछ समाजवादीयों ने उत्तर भारत में शामिल होकर अपना अलग रास्ता अपनाया, और उसके ही आसपास हमारे वरिष्ठ मित्र किशन पटनायक,भाई वैद्य जी की अगुआई में ठाणे मे मैं विषेश रुप से भाई वैद्य और किशनजी के आग्रह पर कलकत्ता से आया था. पहले समाजवादी जन परिषद और उसके बाद हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडियाके भी बनने के समय सबसे ज्यादा भाई वैद्य जी ने आग्रह करने के बावजूद मैं उसमे नही गया था. क्योकी मुझे लगता था की जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के नाम से एक पार्टी बना ली है, तो उसि समाजवादी शब्द को डॉ. राममनोहर लोहिया के अंग्रेजी विरोध को अनदेखा करते हूए अंन्ग्रेजीमे सोशलिस्ट पार्टी आफ इंडिया बोलते हूऐ अंग्रेजी नाम देकर समाजवादी पार्टी बनाने का तुक मेरी समझ में नहीं आया था . और सभी बनाने वाले लोग अपने – अपने घरों में पराये हो गये थे . जिनकी राजनीति की शुरुआत ग्राम पंचायत स्तर से होते हूऐ संसद तक पहुंचने मे हुई थी. पर आज उनका किसीका भी जनाधार क्यों खो गया है ? उन के कारणों की जांच करने का छोड़कर सिर्फ सोशलिस्ट शब्द से भावनिक लगाव होने की वजह से सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया नाम देकर आज कम-से-कम पच्चीस साल से अधिक समय होने के बावजूद भी इस नाम की पार्टी का भारतीय संसदीय राजनीति के क्षेत्र में अभी तक ग्रामपंचायत मे भी खाता नहीं खुला है. यह छोटे बच्चों के घर- घर खेलने जैसा पार्टी – पार्टी खेलने वाला हमारे अपने मन को भरमाने का एक खेल भर लग रहा है. और कुछ लोगो को अपनी-अपनी भड़ास निकालने का प्लेटफार्म के अलावा इस पार्टी का फिलिस्तीन से लेकर ईरान के साथ चल रहे युद्ध से लेकर भारत पाकिस्तान के संबधों तिब्बत के सवाल को लेकर ग्लोबल वार्मिंग जैसे संवेदनशील विषयों के उपर भूमिका को देखकर तो जयप्रकाशजी और डॉ. राममनोहर लोहिया की यादे आती है. लेकिन बगैर संघठन की ताकत की वजह से सिर्फ एक बौध्दिक घटापट के आगे कुछ नहीं हो रहा है.
भारत में आज की तारीख में कितनी समाजवादी या कम्युनिस्ट पार्टीयो की संख्या है मै भी बता नहीं सकता क्योंकि हर कुछ दिनों में वह मिलते हैं और फिर अलग भी होते रहते हैं और सबसे ज्यादा समय एक दूसरे को नीचा दिखाने मे ही व्यतीत करते रहते हैं और सच्चे समाजवादी या सच्चा कम्युनिस्ट मै ही हूँ का दावा करते रहते है. शायद पटना के एक वक्ताओं मे से एक श्रीमान रघु ठाकुरजी ने भी समाजवादी पार्टी(लोहियावादी) की स्थापना की है. हालाकि वे अगर मैं गलत नहीं तो मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पहले राष्ट्रिय महासचिव भी रहे हैं और वह उससे क्यों अलग हूऐ यह अभी भी मालूम नहीं है. उसके बावजूद उनकी क्या मतभिन्नता हूई ? जिस वजह से उन्होने अपनी अलग पार्टी का बनाने का रास्ता अपनाया ?
शायद भारत के संसदिय राजनीतिके इतिहास में (1934) यह पहली पार्टी होगी जो अमीबा के जैसे अपने ही सेल से दुसरी पार्टी निर्माण करनेका उदहारण हैं. 1934 से लेकर आज तक कितनी-कितनी बार सुधरो या टूटो का ड़ॉ. राम मनोहर लोहिया के सिद्दांत को अमली जामा पहनाया होगा ? सुधरनेकी सुध अभि भी नहीं है. लेकिन टुटो को ही सभी ने याद रख लिया. ऐसा सभी समाजवादी पार्टियों के बनने बिगड़ने के खेल को देखकर को मुझे लग रहा है कि क्या सचमुच ही यह सभी साथियों को हम अकेले के बल पर 145 करोड आबादी के देश में समाजवादी समाज बनाने के लिए सक्षम है ? और हमारे साथ नऐ साथियों का आने का सिलसिला कब से बंद है ? हमारे सभी के हमउम्र के लोग कितने है और नए साथियों का समावेश क्यों नहीं हो रहा है इसपर पटना के 92 साल के उपलक्ष्य में आप सभी का मंथन होना चाहिए. और अब 92 साल की बरसी के उपलक्षमे हमारे अपने ही लोग अलग – अलग पोस्ट लिख कर दावा कर रहे हैं, की फलना महान है. जो पार्टी को आगे बढ़ाने के लिये उपयुक्त होगा. और पहले के 92 साल के भीतर जो हो गये हैं, वो क्या थे ? क्या किये क्यो किये ? और इतनी बार टुट होनेके कारण क्या रहे ? इसका बगैर मूल्यांकन किये आप कहा पहुँचने वाले हैं ? फिर वही घूमकर वापस आ जायेंगे और सुधरो या टुटो का खेल खेलते रहोगे ?
मेरी व्यक्तिगत मान्यता है की बराबर एक विशिष्ट स्वभाव या पृकृति वाले लोग अपने – आप ही ऐसे संगठन या आयोजनों में शामिल होते हैं. वहा इझम सेकंडरी होता हैं. क्योंकि कितने लोग वह दर्शन पढ कर समझ कर उस दल या संगठन में शामिल होते है ? इसपर मुझे सभी कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टियों के लोगों को देख-कर लगता है. इसके लिए एक कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों मे से एक नेता जो आपातकाल के समर्थन में और जयप्रकाश नारायण का आंदोलन सीआईए के शहपर चल रहा है जैसे बोलते हूऐ मुंम्बई में रहने वाले एक बहुत बड़े कमुनिस्ट नेता जिनका नाम कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों मे से एक था. को मुझे काफी फुर्सत से मिलनेका मौका मिला है. जो इंन्दिराजी के प्रति इतने अंधभक्त हो गये थे. कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक रहे नेता को उनके ही पार्टी के बहुसंख्यक लोगों ने उन्हें अपनी पार्टी से ऐतिहासिक भूल करने के नाम से कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासित कर दिया था. जिससे उनका राजनैतिक करियर सम्माप्त हो गया था. और गुमनामी मे ही मृत्यु हुई है. उन्होने मुझे कहा की उन्होंने दास कापिटल की क्लिष्टता की वजह से उसके पहले 50 पन्नौ से ज्यादा पन्नौ को मैने नही पढ़ा हैं . और वो कमुनिस्ट पार्टी के संस्थापकोमेंसे एक थे. उसी तरह समाजवादी पार्टी मे कितने लोग समाजवादी दर्शन पढकर समाजवादी पार्टी या सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्यता स्विकार करते हैं. मुझे आम आदमी पार्टी के गठन के बाद कुछ उसमे शामिल होने वाले लोगों ने पुछा था कि “स्वदेशी या स्वावलंबन तथा सत्याग्रह के लिए कौन सा साहित्य पढना चाहिए ? कानू सान्याल की फ़र्स्ट नक्सल नामकी सेज प्रकाशन ने छपि हूई जीवनी में देखा हूँ . और उनका नक्सल आंन्दोलन का सफर देखकर लगता है, कि यह लोग भी टुट के बारे में समाजवादीयों के ही भाईबंद लगते हैं. 23 मार्च 2010 में कानूबाबुने आत्महत्या करने के पहले तक टुट का सिलसिला जारी था. और मतभिन्नता देखकर लगता है, कि इतने समर्पण वालों की बद्धी को क्या हो गया है ? इसिलिये देश एकदम बुद्धिहीन लोगोके हाथोमे चला जा रहा है. और हमारे बुद्धिमान मित्र बालकी खाल निकालनेका काम कर रहे हैं.
समाजवादीयों का तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर, जबरन ज्योत, अगडे – पिछड़े के दर्शन से लेकर समतामूलक समाज बनाने को लेकर तो भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा योगदान रहा है . जो आज संघ परिवार जो कि ‘मनुस्मृति’ तथा ‘एकचालकानुवर्त ‘को प्रतिष्ठित करनेवाले लोगों को मदद करने वाले समाजवादी जॉर्ज फर्नांडीज,रामविलास पासवान,नितीश कुमार,समाजवादी विचारधारा की बचिखूची आबरू मट्टीपलित करते रहे है. हालांकि आपातकाल के आखिरी पर्व मे जब जनता पार्टी के गठन की तैयारी चल रही थी तो यही तर्क दिया जा रहा था कि आदमी बदलता है. यह विश्वास है तो जनसंघ भी जयप्रकाश नारायण के बिहार आंदोलन में शामिल होने के बाद काफी बदला है. और इसलिए जनसंघ और समाजवादी पार्टी की एक पार्टी बननी चाहिए. इस तरह के अंधविश्वास को मै उस समय भी विरोध कर रहा था. और अचरज की बात जॉर्ज फर्नाडिस भी जनसंघ के साथ एक पार्टी बनाने के खिलाफ थे उस समय वह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पदपर प्रतिष्ठित थे और बडोदा डायनामाइट के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद थे. और मैंने भी अमरावती की जेल से उसी डायनामाइट के आरोप में गिरफ्तार रहते हूऐ साफ-सफाई के साथ एस एम जोशी जी को कहां था कि आपको श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने आपातकाल में जेल में नहीं डालने की वजह से आपको पता नहीं है कि जनसंघ या उनका मातृसंघठन आर एस एस मे रत्तीभरका भी बदलाव नहीं हुआ है . उन्होंने बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर के जैसे एक युद्धनीती के तहत कुछ रणनीती बना लिया है. जिसकी वजह से वह गाँधीयन समाजवादी होने का मुखौटे को पहनकर पाखंड कर रहे हैं. और आज देख ही रहे हैं कि भाजपा कौनसा समाजवादी अजेंडा लागु कर रही हैं ? नरेंद्र मोदी लगभग पूरे देश को बेच रहे हैं . और नितीशबाबु सचमुच ही भ्रम के शिकार हूऐ है या यह भी उनकी भाजपा को बिहार के मैदान में लाकर उसे पटकनी देने की रणनीति है क्योंकि कुछ समाजवादी अभी भी उनके साथ है इसलिए मुझे ऐसा लगता है . ये लोग कभी समाजवादी रहे होंगे इस बारे में शक होने लगता है. और इसके बावजूद भी हमारे कुछ साथियों को उनसे काफी उम्मीद दिखाई देती है. क्या यह समाजवाद का दर्शन जानने समझने वाले लोगों का लक्षण है ?
शायद व्यक्तिगत अहंकार के भरमार वाले लोग इसी पार्टी में शूरू सेही एक चुम्बक की तरह खिचे चले आऐ हैं. वैसे 1934 से ही इस पार्टी में अहंम की बिमारी से ग्रसित लोगोकी भरमार रही है. और अभि भी है. और इसी लिये सामाज वादी पार्टी का सपना देखने के लिए ठीक है. लेकिन उसे जमिन पर उतरने के लिए जो करना चाहिए वह समाजवादीयों ने कभी नहीं करने की वजह से आज तक संभव नहीं हो सका. इसका चिंतन पटना के संमेलन मे करेगे तो शायद कुछ बात बन सकती है. अन्यथा कुछ विद्यालय के या कॉलेज के पुराने सहपाठियों का एल्युमनी के नाम से एक दूसरे को मिलने का आयोजन भर होता है. जिसमें पुराने सहपाठी एक दो दिन के लिए मिलते हैं. एकदूसरे से बातचीत करते हैं. और अगली बार जिंदा रहे तो मिलने का वादा करते हूऐ अपने रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं . आशा करता हूँ कि पटना की बैठक में देश दुनिया की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कुछ सार्थक पहल करने का प्रयास होगा इस उम्मीद के साथ. सभी साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन.
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