करप्शन, परसेप्शन और मोदी सरकार
एनपीए ने भी बैंकों की रीढ़ तोड़ी और अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा धक्का दिया. सबसे बड़ा सवाल एनपीए से ये उठा कि क्या बैंकों की मिलीभगत से पिछले तीन सालों में बैंकों से रिश्ता रखने वाले बड़े व्यापारियों ने जान-बूझकर बड़े लोन लिए और उन्हें फिर एनपीए में कन्वर्ट किया. ये बहुत बड़ा सवाल है क्योंकि जिन लोगों के एनपीए की कहानी है, उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है, जिनके पास नोटिस जा ही नहीं पाए. रेवेन्यू सेक्रेटरी, फाइनेंस सेक्रेटरी दोनों परेशान हो गए कि जिन लोगों ने लोन लिए, उनका नाम और पता क्यों नहीं मिल रहा है? उनका पता है ही नहीं कहीं? वही लोग जो इस देश को छोड़कर विदेशों में बसे हैं, उन्होंने बैंकों से मिलीभगत कर पैसे लिए और एनपीए में उस सारे धन को डाल दिया.

अब बैंक जाने, सरकार जाने, ये पिछले तीन साल में बहुत हुआ. इसने इकोनॉमी को बहुत धक्का पहुंचाया. एनपीए की वजह से मनी सर्कुलेशन टूट गया. बहुत सारे लोगों का व्यापार, जिसे धंधा कहते हैं, बंद होने की कगार पर पहुंच गया. इस स्थिति को मौजूदा सरकार का वित्त मंत्रालय नहीं संभाल पाया. सरकार इस पूरी स्थिति का आकलन ही नहीं कर पाई कि अगर ये स्थिति पैदा होगी तो इसका सामना कैसे करेंगे? शायद देश की अर्थव्यवस्था को अगर सबसे ज्यादा धक्का किसी एक बिन्दु पर लगा है, तो वो एनपीए है.

नरेंद्र मोदी के तीन साल की उपलब्धि ये है कि राजनैतिक भ्रष्टाचार लगभग बंद होता दिखाई दिया. बंद हुआ कि नहीं, ये फिर कभी तय होगा, लेकिन आज धारणा ये बनी है कि नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री भ्रष्टाचार नहीं कर रहे हैं. ये अलग बात है कि उन्हीं मंत्री के सूत्र ये बताते हैं कि अब भ्रष्टाचार सचिव या नौकरशाही के लेवल पर हो रहा है. राजनैतिक भ्रष्टाचार यानि मंत्रियों का भ्रष्टाचार, लेन-देन नहीं हो रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं कि लोगों के बीच में इस धारणा का बनना कि राजनेता जो सत्ता में हैं, भ्रष्टाचार से दूर हैं. ये बड़ा परसेप्शन है और इसने प्रधानमंत्री को काफी साख दी है.

हरियाणा और राजस्थान की सरकारों के काम-काज ने दोनों राज्यों के निवासियों के मन में भारतीय जनता पार्टी को लेकर काफी शंकाएं पैदा की हैं. वे लोग अपने प्रदेश के काम-काज से प्रधानमंत्री के तीन साल के काम-काज को आंक रहे हैं. समय पर फैसला न करना, जिसमें शायद दोनों ही प्रदेशों के मुख्यमंत्री शामिल हैं, भी इन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी के विपक्ष में गया है. ये विफलताएं लोगों के सामने इसलिए नहीं आ पाईं, क्योंकि आप उत्तर प्रदेश में बहुत अच्छी तरह सफल हुए. सफल होना सारी विफलताओं को ढंक तो सकता है, लेकिन समाप्त नहीं कर सकता.

उनके निशान, विफलता की आवाजें बनी रहती हैं और वो कब असर करेंगी, वो बस वक्त की बात होती है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सब कुछ ठीक किया, ऐसा नहीं है. दरअसल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की भयंकर गलतियों की वजह से भारतीय जनता पार्टी जीत गई, लेकिन जीत के बाद वो इन गलतियों का मूल्यांकन नहीं कर पाई, जो गलतियां उसने इन चुनावों में की थी. सफलता का नशा बहुत खराब होता है और तीन साल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी पर उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद सफलता का नशा चढ़ा है. असम के बाद वो नशा नहीं चढ़ा था, लेकिन उत्तर प्रदेश के बाद पूरी भारतीय जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के जिम्मेदार लोग सफलता के नशे में झूम रहे हैं.

संवादहीनता और कटुता से विश्वास बहाली नहीं होगी
अगर तीन साल के शासन की सबसे बड़ी विफलता या स्वयं प्रधानमंत्री मोदी की विफलताओं को देखा जाए, तो देश में एक तनाव और आपस में गुस्से का वातावरण बना हुआ है. इस वातावरण की जड़ में सिर्फ और सिर्फ एक कारण है संवादहीनता. प्रधानमंत्री का संवाद किसी भी विपक्षी दल से नहीं है. राष्ट्रीय दल मानी जाने वाली कांगे्रस, जो संसद में सबसे बड़ा विपक्ष है, उसके साथ तो है ही नहीं. किसी के साथ भी प्रधानमंत्री का संवाद नहीं है और जब हम संवाद की बात करते हैं, तो विपक्षी दलों को छोड़ दीजिए, प्रधानमंत्री का संवाद अपने दल के लोगों से नहीं है. प्रधानमंत्री से कौन मंत्री मिल पाता है, कौन मंत्री बात कर पाता है, किस मंत्री को प्रधानमंत्री बुलाते हैं, ये उनका चुनाव होता है, लेकिन प्रधानमंत्री सामूहिक तौर पर मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श नहीं करते.

स्वयं भारतीय जनता पार्टी के बीच जितने भी संगठन हैं, चाहे वो अध्यक्ष से नीचे के पदाधिकारी हों, चाहे वो कार्यकारिणी हों, चाहे वो राष्ट्रीय प्रतिनिधि सभा हो, जितने भी अंग हैं, वो कोई भी प्रधानमंत्री से या स्वयं अध्यक्ष से संवाद में नहीं हैं. अब वहां फैसले नहीं होते, अब वहां फैसले सुनाए जाते हैं. जो पिछले अध्यक्ष के समय में नहीं हो पाया, वो मौजूदा अध्यक्ष के समय पार्टी में हो गया, जिससे भारतीय जनता पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं के बीच एक अजीब सा ठहराव आ गया है.

भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं का कहना है कि थोड़ी सी बातचीत से जिन बातों पर सहमति हो सकती है, बातचीत न करने की वजह से वो भी कटुता के बिन्दु बन गए हैं. भारतीय जनता पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राजनैतिक माहौल की कटुता देश के लिए अच्छी बात नहीं है. इस चीज को समाप्त करने के लिए सरकार को जो प्रयत्न करने चाहिए, सरकार वो प्रयत्न बिल्कुल ही नहीं कर रही है. पाकिस्तान का सवाल इनमें सबसे प्रमुख है. पाकिस्तान के साथ ऑल पार्टी मीटिंग बुलाना तनाव कम करने का तरीका नहीं है. ये सरकार ट्रैक टू पर भरोसा नहीं कर रही है.

अगर ट्रैक टू पर संवाद हो, तो शायद पाकिस्तान से भी कटुता कम हो सकती है. दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि कन्शेंसेस यानि आम सहमति की जो समझ होनी चाहिए, वो समझ इस सरकार में कहीं दिखाई नहीं देती. सुरक्षा, सीमा, पाकिस्तान और कश्मीर का सवाल, ये ऐसे सवाल हैं जिन पर देश के राजनैतिक दलों में आम सहमति बन सकती है, पर वो बनाने की इच्छा सरकार में दिखाई नहीं देती.

यही भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच चिंता का विषय है. भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने मुझे कहा कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित अगर सात दलों के साथ ही सरकार आम सहमति बनाने की कोशिश करती है और सहमति बना ले तो सरकार का मोरल फैब्रिक बन जाएगा. इस देश में सरकार को काम करने में बहुत आसानी होगी और जनता के बीच विश्वास का बहुत अच्छा माहौल पैदा हो जाएगा.

पिछले तीन साल में भारतीय जनता पार्टी के संगठन की स्थिति भारतीय जनता पार्टी के ही संविधान के अनुसार गड़बड़ा गई है और वो उसके हिसाब से नहीं चल रही है. ठीक उसी तरह देश की सरकार राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा नहीं चल रही है, मंत्रियों द्वारा नहीं चल रही है, बल्कि सचिवों के जरिए चल रही है. हर मंत्री डरा हुआ है कि उसका सचिव प्रधानमंत्री के साथ मीटिंग में उसके बारे में क्या बोल दे और लगभग हर मंत्री उस अपमानजनक स्थिति में है कि वो प्याज भी खा रहा है और जूते भी खा रहा है.

वो मंत्री भी है और अपना दर्द भी प्रधानमंत्री से नहीं कह सकता, क्योंकि प्रधानमंत्री या अमित शाह किसी मंत्री का दर्द सुनने के मूड में नहीं हैं, मनःस्थिति में ही नहीं हैं. इसलिए वो अपने मंत्रालय में दरअसल चाय पीने के अलावा कोई महत्वपूर्ण काम नहीं कर रहे हैं. ये मेरा आरोप नहीं है, ये भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में धारणा है. इसे भारत के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए स्वयं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अच्छा नहीं मानते. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि अमित शाह जी का यह दूसरा टर्म है. उन्होंने न अपने सारे ऑफिस बीयरर्स बनाए और न ही कार्यकारिणी बनाई.

उनके द्वारा प्रधानमंत्री की इच्छा आ जाती है और वो मान लिया जाता है कि वो पार्टी का फैसला है, न बात होती है, न बहस होती है, न विचार होता है. इलेक्शन कमिटी, पार्लियामेंट्री बोर्ड, ऑफिस बीयरर्स, ये अब बस दिखाने के हिस्से रह गए हैं. इनमें फैसले नहीं होते. एक बड़े नेता ने मुझे कहा कि जब संगठन विंग भी एक व्यक्ति केंद्रित हो जाए, सरकार भी एक व्यक्ति केंद्रित हो जाए, तो यह व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है, स्वयं भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छा नहीं है.

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