1990 में मुझे पाकिस्तान जाने का अवसर मिला, 1947 के बाद पहली बार. 5 अगस्त, 1947 को हमने रावलपिंडी वाला अपना घर छोड़ा था, सोचा था जल्दी लौट आएंगे लेकिन ऐसा हो न सका. हम यह सोचकर रावलपिंडी छोड़कर बस्ती के पास टिनिच (उसे आमा बाजार भी कहते हैं) चले गए थे कि दंगे फसाद थम जाने के बाद अपने घर लौट आएंगे. ऐसी उम्मीद इसलिए भी थी, क्योंकि एक बार इसी साल मार्च में हम लोग बेघर होकर दो हफ्ते तक सेना के संरक्षण में शरणर्थियों जैसी जिंदगी जी आए थे. लेकिन इस बार हालात वैसे नहीं थे. 14-15 अगस्त को जो खून खराबा हुआ उस बाबत भीष्म साहनी ने अपने उपन्यास ‘तमस’ में लिखा है. उन्होंने भी मार्च, 1947 के दंगों को झेला था. वह भी रावलपिंडी के थे और हम भी. क्योंकि उस समय वह 32 बरस (जन्म 8 अगस्त 1915) के थे और मैं बारह (11 अगस्त, 1935) के आसपास इसलिए उन दंगों की भयाहवता को जिस तरह से उन्होंने देखा और महसूसा था मैंने नहीं. मार्च, 1947 के ये दंगे उनके कहीं भीतर तक बैठ गए थे जो ‘तमस'(अंधकार) का रूप लेकर निकले.

1990 में मैं पाकिस्तान एक मिशन के साथ गया था. उस समय मैं ‘संडे मेल’ में कार्यकारी संपादक था जिसके मालिक थे समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया. वह लाहौर जन्मा हैं. उनके परिवार की लाहौर और कराची में सीमेंट फैक्ट्रीयां थीं. संजय डालमिया समाजवादी नेता और विचारक डॉ राममनोहर लोहिया से बहुत प्रभावित थे.लिहाज़ा दोनों के बीच अक्सर बातचीत और मुलाक़ात होती रहती थी. डॉ लोहिया भारत और पाकिस्तान के बीच एक ढीले संघ जैसे रिश्ते चाहते थे जो गैरराजनीतिक ढंग से ही संभव हो सकते थे. ‘संडे मेल’ के प्रकाशन के कुछ समय बाद उन्होंने प्रधान संपादक डॉ कन्हैयालाल नंदन और मुझ से डॉ लोहिया के सुझाव की चर्चा करते हुए सलाह दी कि क्यों न हम लोग एक साप्ताहिक स्तंभ ‘भारत-पाक महासंघ’ शुरू करें और उसमें कुछ बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, राजनेताओं, विधिवेताओं आदि से लिखवा कर छापें ताकि दोनों देशों के इस वर्ग के लोगों के खुले विचार सामने आएं. हमारे इस स्तंभ को खासा सराहा गया और उन सभी लोगों ने दिलखोल कर अपने विचार प्रकट किए जो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक संबंध विकसित करना चाहते थे. इंदरकुमार गुजराल, भीष्म साहनी, वेदप्रताप वैदिक, प्रो गोपीचंद नारंग, एच.के. दुआ, असगर वजाहद, इंदर मल्होत्रा, रबि राय जैसे लोगों ने जमकर लिखा. जिन लोगों के अविभाजित भारत से संबंध थे उसके चलते उनके विचार भावनात्मक अधिक थे. बज़रिया इस कॉलम दोनों देशों के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों के बीच एक सकारात्मक संदेश भी गया, माहौल भी बना.

संजय डालमिया को भी इस कॉलम का अच्छा फीडबैक मिला. एक बार फिर उन्होंने मुझसे और नंदन जी से कहा कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक स्तर पर तो संबंध सुधरने से रहे बेहतर है कि हम लोग गैरराजनीतिक स्तर पर दिल्ली में एक सेमिनार आयोजित करें जिसमें भारत और पाकिस्तान के समान सोच वाले व्यक्तियों को आमंत्रित कर इस विषय पर गहन विचार विमर्श किया जाए. इसमें दोनों देशों के बुद्धिजीवी, न्यायविद, समाजसेवी, पत्रकार, साहित्यकार, वकील आदि मिलकर दोनों देशों के बीच व्याप्त जड़ता को तोड़ने की कोशिश करें. नंदन जी का सुझाव था कि उधर के लोगों के विचार जानने के के लिए दीप जी को पाकिस्तान भेजा जाए, एक तो पंजाबी होने का इन्हें लाभ मिलेगा और दूसरे वहां के जन्मे होने से बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की उन्हें मदद मिलेगी. संजय डालमिया ने नंदन जी का सुझाव मान लिया और मैं 1990 में पाकिस्तान के लिए रवाना हो गया, 1947 के बाद पहली बार.

मेरा पहला स्टॉप लाहौर था. बड़े राजनेताओं और क्रांतिकारियों ने भी यहां शिक्षा ग्रहण की है भगत सिंह, अज्ञेय, भीष्म साहनी, इंदरकुमार गुजराल, बलराम जाखड़ और भी अन्य अनेक. यह सूची बहुत लंबी है. ख़ुशक़िस्मती से लाहौर में मुझे पाकिस्तान टाइम्स के दो एडिटर मिल गए अज़ीज़ सिद्दीकी और आई ए रहमान. मुलाक़ात एक शाम अज़ीज़ सिद्दीकी के घर पर हुई जहां अज़ीज़ ने बड़ी तादाद में पूर्व राजनयिकों, पूर्व न्यायाधीशों, पत्रकारों आदि को बुला रखा था. वे सभी मुझसे मिलने को आतुर थे और हमारे प्रस्ताव पर खुलकर चर्चा भी करना चाहते थे जिसके बारे में मैंने अज़ीज़ सिद्दीकी को पहले बता रखा था. मैंने उन्हें तफसील से ‘ संडे मेल’ पेपर और उसके मालिक संजय डालमिया के बारे में बताया. डालमिया नाम सुनकर उनमें से कुछ लोग चौंक गए. एक ने पूछा कि यह डालमिया क्या उसी खानदान के हैं जिनकी यहां सीमेंट फैक्ट्री थी. मैंने कहा, जी हां. यह जानकारी पाकर वह खुश हुए. हो सकता है किसी न किसी रूप से उनका डालमिया परिवार से रसूख रहा हो. बहरहाल, मैंने उन्हें बताया कि सदियों तक हम दोनों देश एक साथ रहे हैं. दोनों का एक तरह का उठना बैठना, खाना पीना, ओढ़ना पहनना बिछाना , बोलचाल, रीति रिवाज समान हैं. दोनों ओर के बौद्धिक, साहित्यकार, संगीतकार,लेखक, कलाकार एक दूसरे से परिचित हैं. कुछ ऐसे ऐतिहासिक बेशकीमती दस्तावेज हैं जो दोनों तरफ की लाइब्रेरियों में बंद पड़े होंगे, ऐसे कई गैरराजनीतिक क्षेत्र हैं जहां दोनों ओर के बौद्धिकों, इतिहासकारों, संस्कृतिकर्मियों को इनमें रखे ग्रंथों को पढ़ने और नोट्स लेने की ज़रूरत हो जिसके लिए उन्हें एक दूसरे के मुल्क में आने जाने की खुली छूट होनी चाहिए. बेहतर तो होगा कि ऐसे दानिशमेंदों को वीज़ा मुक्त एक दूसरे के यहां आने जाने की इज़ाज़त हो. अगर यह मुमकिन न हो तो उन्हें बिना देरी के वीजा दिया जाए. उन लोगों में से कुछ लोगों की राय थी दरअसल हम लोग भी ऐसी ही सोच रखते हैं लेकिन मसला यह है कि पहल कैसे करें.संजय डालमिया ने हिम्मत करके पहल की लिहाज़ा हममें से ज़्यादातर लोग इस तरह के सेमिनार में शिरकत करना ज़रूर पसंद करेंगे. हमें यकीन है कि दूसरी जगहों में भी ऐसी विचारधारा के लोग बड़ी तादाद में आपको मिल जाएंगे. उन्हें मैंने बताया कि सेमिनार का मज़मून होगा :’भारत- पाक: हमसायगी के रिश्ते’. सभी को यह मज़मून पसंद आया.लाहौर में जिन प्रमुख लोगों ने सेमिनार में शामिल होने की हामी भरी वे थे अस्मा जहाँगीर, मुनीर नियाज़ी,जस्टिस दोराब पटेल, आई ए रहमान, अज़ीज़ सिद्दीकी, शाहबाज़ शरीफ आदि. कुल मिलाकर करीब दो दर्जन लोगों ने हमारे प्रयासों की सराहना की. इनमें से कितने लोगों को निमंत्रित किया जाएगा इसका निर्णय इस्लामाबाद, रावलपिंडी, पेशावर और कराची की यात्राओं के बाद ही संभव हो पाएगा. वैसे एक दिन के लिए मैं मुज़फ़्फ़राबाद भी गया था. वहां के कुछ गैरराजनीतिक इस सेमिनार में शामिल होने के ख्वाहिशमंद थे. लेकिन यह मुमकिन नहीं था.

इस्लामाबाद पहुंचने पर पाकिस्तान के प्रोटोकोल अफसर ख्वाजा अख्तर हुसैन मिले, जिनका परिवार मूलतया अमृतसर का रहने वाला था. विदेश सचिव मुबारक शाह थे जिन्हें मैं दिल्ली से जानता था. उनसे भी मुलाक़ात हुई. उन्होंने भी ख्वाजा से मुझे कुछ दानिशमेंदों से मिलवाने का सुझाव दिया. इस्लामाबाद में ख्वाजा अख्तर हुसैन ने सबसे पहले मेरी मुलाक़ात प्रो ख्वाजा मसूद से पूर्व कुलपति कहकर कराई,हालांकि कि वह इस पद पर कभी नहीं रहे. वह गोर्डन कॉलेज के प्रिंसिपल थे. प्रो ख्वाजा मसूद टकटकी लगाए काफ़ी देर तक मेरे चेहरे को गौर से देखते रहे, कभी ऊपर देखते तो कभी नीचे. कभी मेरी आँखों में झाँकते तो कभी मेरे माथे पर नज़रें गढ़ा देते. फिर झेंपते हुए बोले, ‘माफ कीजियेगा मैं आपके चेहरे मोहरे को देखकर अपने एक पुराने सिख दोस्त को आपमें तलाशने की कोशिश कर रहा था. वह भी आप जैसा ही दीखता था. इसी प्रकार का अनुभव मुझे पेशावर में भी हुआ जब वहां एक पूर्व उपकुलपति मुझे गले लगा कर ऐसा रोये मानो मेरी शक्ल में उन्हें बिछुड़ा सिख दोस्त मिल गया हो. बेशक यह उनकी दिली मोहब्बत थी.

भावनात्मक माहौल अब थम चुका था. उससे बाहर निकलते हुए प्रो मसूद ने यकायक मुझसे पूछा, ‘क्या आप भीष्म साहनी को जानते हैं?’ यह सवाल सुनकर मैं अवाक रह गया. मैंने कहा, जी हां. उन्हें मालूम है कि इस वक़्त मैं पाकिस्तान में हूं. अब मैंने उनसे पूछा कि आप भीष्म जी को कैसे जानते हैं? प्रो ख्वाजा मसूद फिर कहीं खो गए. उन्होंने धीरे धीरे बोलना शुरू किया ‘वह तो मेरे जिगर का टुकड़ा है. मैं दोनों भाइयों युधिष्ठिर (बलराज का असली नाम) और भीष्म को अच्छी तरह से जानता हूं. हम एक ही सोच के लोग थे और मिलकर एक पत्रिका निकाला करते थे ‘लोटस’. इसमें हम लोग वैचारिक लेख छापते थे. हम लोग खुले ख़्यालात के बंदे थे जिसे आज की जुबान में ‘वामपंथी’ कहा जा सकता है. जिस व्यक्ति को मैं आपमें तलाशने की कोशिश कर रहा था वह है गुरुबख्श सिंह दीवान. बात भीष्म साहनी तक सीमित रखते हुए प्रो मसूद ने कहा था कि दोनों मुल्कों में हमसायगी के रिश्ते कायम करने में जितनी मदद भीष्म कर सकते हैं शायद ही दूसरा कोई कर पाये.’ उन्होंने अपनी बात पर ज़ोर देकर कहा कि ‘एक तो आपने मेरे दोस्त से रूबरू मिलने का मुझे मौका दिया और दूसरे मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि दोनों मुल्कों के बीच नकली दीवारें ढहाने का काम बुद्धिजीवी और अराजनीतिक तत्व ही कर सकते हैं दूसरा कोई नहीं.’ भीष्म साहनी का उल्लेख करते हुए प्रो मसूद ने बताया कि ‘वह बहुत पढ़ाकू है, बहुत अध्ययन अध्यापन करता है, साफगो इंसान है, सादगी भरी जिंदगी जीता है, बहुआयामी शख्सियत है उसकी, आम आदमी के संघर्ष को जानने और जांचने की कुव्वत है. उसके पास पारखी और बारीक निगाह है. वह भी पिंडी ( रावलपिंडी को पिंडी ही आम तौर पर संबोधित करते हैं) का और मैं भी पिंडी का हूं और आप भी तो पिंडी के ही हैं, हम तीनों गिराईं (एक जगह के) हैं. इसलिए मैं आपसे अपने यार भीषम (पंजाबी में ऐसे ही उच्चारण किया जाता है) के कुछ गुणों के बारे में बताता हूं. जवानी में क्रांतिकारी सोच कोई अजूबा नहीं, हमारी मित्रमंडली में सभी लोग वामपंथी विचारधारा के थे लेकिन मैं भीष्म को खुली और ठोस विचारधारा का व्यक्ति मानता हूं. उसका लाहौर में भी एक दोस्त है मुनीर नियाज़ी. अगर नहीं मिले हो तो एक बार ज़रूर मिल लेना और पेशावर जाने पर कलंदर मोमंद से मिलना न भूलना. वह वामपंथी तो नहीं लेकिन खान अब्दुल गफ्फार खान का बहुत करीबी है और पश्तो का विद्वान है और डेरा इस्माइल खान स्थित गोमल विधि महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में भी उसने काम किया है. इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1 मई, 1974 को तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने की थी. यह डेरा इस्माइल खान, खैबर पख्तूनख्वा की दूसरी पुरानी यूनिवर्सिटी है. इसके लिए ज़मीन नवाब अल्लाह नवाज़ खान ने दान में दी थी और वही इसके पहले कुलपति थे.

पेशावर में कलंदर मोमंद से मुझे मिलवाया सैयद शेर बादशाह ने. वह सरकार के जनसंपर्क अधिकारी थे और पश्तो के कवि भी. उन्होंने बताया था कि कलंदर मोमंद पश्तो के कवि हैं और कुछ समय तक वह गोमल विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रह चुके हैं. बहुभाषी होने के नाते वह पश्तो, उर्दू, अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी और हिंदी धाराप्रवाह बोल सकते हैं. सरायकी उनकी मादरी जुबान है जो पंजाबी के काफ़ी करीब है. इस वक़्त वह पश्तो का शब्दकोष तैयार करने में जुटे हुए हैं. कलंदर मोमंद बाचा खान के करीबी लोगों में रहे हैं और उनके विचार अहिंसा दर्शन के अनुरूप थे. पत्रकार के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय अवामी पार्टी के आधिकारिक प्रकाशन ‘शाहबाज़’ का संपादन किया था. उनकी विरासत पश्तो साहित्य, प्रगतिशील चिंतन और पश्तो पहचान के अलावा उन्हें एक सिद्धांतवादी सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में सम्मानित किया जाता है जिन्होंने न्याय, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक गरिमा के मुद्दों से कभी समझौता नहीं किया.प्रो मसूद ने मुझसे वादा किया कि हम तीनों मित्र साथ आने की कोशिश करेंगे ताकि भीष्म के साथ अपने दूसरे कई बिछुड़े हुए दोस्तों को भी तलाश सकें और आपके सेमिनार के मज़मून को हक़ीकी शक्ल दे सकें. कलंदर मोमंद पश्तो का शब्दकोष तैयार कर रहे हैं नामुमकिन नहीं इस सिलसिले में उन्हें किसी लाइब्रेरी में जाने के लिए आपकी मदद की दरकार पड़ जाए. बहरहाल, मैंने कलंदर मोमंद को उन्हें दिल्ली आने पर पूरी इमदाद का भरोसा दिलाया था. कलंदर मोमंद और मुनीर नियाज़ी भीष्म साहनी के अदबी दोस्त थे जबकि डॉ. ख्वाजा मसूद गिराईं यानी पिंडी के दोस्त थे.

पेशावर में जिस व्यक्ति का मैंने ज़िक्र किया था यह वही कलंदर मोमंद थे जो मेरे कंधे पर सिर रखकर ज़ार ज़ार रोये थे. रोते रोते कह रहे थे कि मेरा सिख दोस्त बलदेवा था और हिंदू भीषम. उनके बलदेवा यानी बलदेव सिंह को तो मैं नहीं जानता था लेकिन जब भीषम का नाम लिया तो उन्हें अपने से अलग करते हुए पूछा कि आपका भीषम मतलब भीष्म साहनी तो नहीं. जवाब में बोले, ‘बिल्कुल वही’.मुझ से सवालिया सवाल किया, ‘आप भी उसे जानते हैं क्या!’हां, यहां आने से पहले मिला था. आप प्रो ख्वाजा मसूद से मिल चुके हैं क्या. मैंने हामी भरते हुए कहा, हां और मुनीर नियाज़ी! उनसे मुलाक़ात नहीं हो पायी है, अगली बार ज़रूर मिलूंगा. भीषम और मुनीर दोनों गहरे दोस्त हैं और दोनों के बीच खूब पटती थी. पंजाबी और उर्दू में भीषम मुनीर के साथ शेरोशायरी भी किया करता था. भीष्म का परिवार रावलपिंडी के छाछी मोहल्ले में रहता था और उनके पिता हरबंसलाल साहनी आर्य समाज से ताल्लुक रखते थे. वह वहां की मशहूर हस्तियों में हैं. भीष्म और ख्वाजा मसूद के परिवारों के बीच भी बड़े खुशगवार रिश्ते थे. कभी कभी बलराज साहनी भी भीष्म और ख्वाजा मसूद की बातचीत में शामिल हो जाते थे. एक अलग किस्म का माहौल रहता था तब. बलराज खांटी के कम्युनिस्ट थे. कलंदर मोमंद गंभीर प्रकृति के हैं. उन्हें भीष्म साहनी में उनकी संजीदगी
और बहुमुखी प्रतिभा का स्मरण है.

ख्वाजा मसूद (11अगस्त, 1922-16 जनवरी, 2010) को प्रगतिशील सोशलिस्ट विचाधारा के चलते उन्हें ‘पाकिस्तान का चे गुआरा’ कहा जाता था.उनकी शिक्षा गोर्डन कॉलेज, रावलपिंडी तथा गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में हुई थी. बलराज और भीष्म साहनी भी गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में पढ़े थे.ख्वाजा मसूद पाकिस्तान के प्रतिष्ठित शिक्षाविद, मज़दूर संघवादी,गणीतज्ञ,बुद्धिजीवी, दार्शनिक और प्रगतिशील विचारों के मानवाधिकारों के पोषक माने जाते हैं. वह रावलपिंडी के गोर्डन कॉलेज के एक शिक्षक (1944 से) और प्रिंसिपल (1972-1982) के रूप में रहे थे. वह मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखक थे जिनकी विद्वता की पूरे पाकिस्तान में छाप थी. वह एक बेहतरीन गणीतज्ञ, दार्शनिक और सामाजिक वैज्ञानिक थे.वह फैज़ अहमद फैज़ और सज्जाद ज़हीर जैसे बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर वामपंथी विचारों से प्रेरित थे. उन्होंने डेमोक्रेटिक फेडरेशन (डीएसएफ) और प्राग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (पीडब्लूए) जैसे छात्र व साहित्यिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वह इस्लामाबाद कल्चरल फोरम के संस्थापक सदस्य थे.उन्होंने अपना जीवन गणीत, दर्शन और सामाजिक विज्ञानं को समर्पित कर दिया. उनके छात्रों में कई प्रतिष्ठित राजनेता,पत्रकार और पूर्व प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़ शामिल थे. प्रो ख्वाजा मसूद ‘डॉन’ और ‘द न्यूज़’ जैसे समाचार पत्रों के लिए नियमित रूप से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर कॉलम लिखते थे.उनकी पत्नी प्रो सलमा मसूद भी एक प्रतिष्ठित शिक्षिका और प्रिंसिपल थीं. वह अपने पति के साथ मिलकर सामाजिक और शैक्षिक कार्यों में बहुत सक्रिय रहतीं. चलते चलते प्रो ख्वाजा मसूद ने बताया कि भीषम के साथ खतोकिताबत तो होती रहती है लेकिन रूबरू मुलाक़ात का अपना अलग ही मज़ा होता है. मेरे दोस्त को मेरा पैगाम दे दीजियेगा कि “यार मैं सेमिनार में आ रहा हूं और कोशिश करूंगा कि सलमा भी साथ आये. टिकट तो दीप साहब भेज ही रहे हैं. मिलकर हम लोग फिर से ‘ लोटस’ जैसा कोई रिसाला निकालने बाबत सोचेंगे. मुनीर नियाज़ी और कलंदर मोमंद भी साथ होंगे इंशाअल्लाह.”

मैं प्रो ख्वाजा मसूद, मुनीर नियाज़ी और कलंदर मोमंद से अपने सेमिनार के सिलसिले में मिला लेकिन ये सभी भीष्म साहनी के दोस्त हैं इस हक़ीक़त का पता मुझे इस्लामाबाद में प्रो ख्वाजा मसूद के माध्यम से चला. बेशक भीष्म जी इस खबर को सुनकर बहुत खुश होंगे. मैं पाकिस्तान छह बार गया हूं 1990 और 1999 के बीच. नेशनल असेंबली के तीन चुनाव कवर किए थे. 1990 के आखिर में दिल्ली में हमारा सेमिनार प्रस्तावित था. सारी तैयारियां भी हो चुकी थीं. इस बीच इराक और कुवैत के बीच जंग छिड़ गयी. हमें अपना कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. अक्टूबर,1990 में मुझे दूसरी बार पाकिस्तान जाना पड़ा नेशनल असेंबली के चुनाव के सिलसिले में. इस बार लाहौर में अज़ीज़ सिद्दीकी और उनके परिवार के साथ खासा वक़्त बिताया. जौनपुर की रहने वाली उनकी बेगम के लिए कुछ सूती साड़ियां ले गया और ‘संडे मेल’ की प्रतियाँ भी. वह हिंदी पढ़ना जानती थीं.

अज़ीज़ सिद्दीकी से मैंने मुनीर नियाज़ी से मिलने की बात की तो वह तुरंत तैयार हो गए. मुनीर नियाज़ी से मेरा तारुफ अज़ीज़ सिद्दीकी ने कराया हमारे सेमिनार के बाबत. मुनीर नियाज़ी पंजाबी और उर्दू के मशहूर लेखक हैं. वहां पंजाबी फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है. कुछ साहित्यिक विषय पर चर्चा होती रही हालांकि यह मेरा विषय नहीं है फिर भी गहेबगाहे इस बाबत बातचीत हो ही जाती है. मैंने मुनीर से यह पूछ कर चौँका दिया कि क्या आप भीष्म साहनी को जानते हैं? यह सवाल सुनकर वह उछल पड़े और बोले कैसे है मेरा यार. तुम्हें शायद मालूम नहीं होगा कि हम अदबी दोस्त हैं और एक ही विचारधारा के भी. कैसा है भीष्म अब तो खासा बुज़ुर्ग हो गया होगा. जी जब मैं 1947 के बाद पहली बार पाकिस्तान आया हूं और मैं बुज़ुर्ग लगता हूं वह तो मुझसे 18-20 साल बड़े हैं, माशाअल्लाह तंदरुस्त हैं.

मुनीर नियाज़ी (9 अप्रैल,1923-26 दिसंबर, 2006) होशियारपुर ज़िले में एक पंजाबी भाषी नियाज़ी पठान परिवार में जन्मे थे. 1947 में भारत विभाजन के बाद उनका परिवार पलायन कर साहिलवाल में आकर बस गया. वहाँ उनकी मुलाक़ात कवि मजीद अमजद से हुई जो बाद में उनके गुरु मित्र बन गए. वह बहावलपुर से होते हुए लाहौर आ गए. वहां दयालसिंह कॉलेज से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की. साहिवाल में रहते हुए मुनीर नियाज़ी ने ‘सेवन कलर्स’ नामक एक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की. उनकी कुछ कविताओं का उपयोग फिल्मों में किया गया और ये फ़िल्मी गीत जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुए जिसके फ्लास्वरुप वह 1960 के दशक में पाकिस्तानी फिल्मों के अग्रणी गीतकारों में शुमार हो गए. उन्होंने कई प्रसिद्ध गीत लिखे. 1962 में ‘शहीद’ फ़िल्म के लिए लिखा उनका नसीम बेगम का गाया गीत ‘उस बेवफा का शहर है और हम हैं दोस्तो’ बहुत मशहूर हुआ. मुनीर नियाज़ी के लिखे गीतों को मेहदी हसन ( ‘जिसने मेरे दिल को दर्द दिया’ और ‘कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं’ ), नूर जहां (‘आ अपनी हसरतों पे आंसू बहा के सो जा’) और नाहीद अख्तर (‘ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएं हम तो क्या’) आदि की कुछ मिसालें हैं. मुनीर नियाज़ी उर्दू और पंजाबी की पत्र पत्रिकाओं में लिखा करते थे और रेडियो से भी अपने प्रोग्राम नश्र किया करते थे. 1960 में उन्होंने ‘अल- मिसाल’ नामक एक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की थी. पाकिस्तान टेलीविज़न लाहौर से भी वह ताजिंदगी जुड़े रहे.

भारत लौटकर मैं भीष्म साहनी को उनके घर मिलने के लिए गया. उन दिनों वह दिल्ली के ईस्ट पटेल नगर में रहते थे. उन्हें मैंने अपनी पाकिस्तान के सफर के बारे में बताया कि इस्लामाबाद में प्रो ख्वाजा मसूद, लाहौर में मुनीर नियाज़ी और पेशावर में कलंदर मोमंद मिले थे और सभी आपको बड़ी मोहब्बत से याद कर रहे. याद तो आपको कराची के पत्रकार एम वी नकवी और ‘ जंग’ समूह के महमूद शाम भी कर रहे थे, जो मुझे कराची में हिंदू विधायक मेहरूमल जगवानी के घर मिले थे. जब भी मैं कराची जाता था मेहरूमल जगवानी मेरे सम्मान में एक डिनर पार्टी रखा करते थे जिसमें कराची के पत्रकार और लेखक शामिल होते थे. भीष्म साहनी एक ऐसा नाम है जिससे पाकिस्तान का पढ़ा लिखा तबका वाकिफ है. लेकिन ये तीन तो दीवानों की हद तक आपको अपना ‘महबूब’ मानते थे. पाकिस्तान में अपने दोस्तो के बारे में इतना विस्तार से वर्णन सुनने के बाद भीष्म जी ने मुझसे ताकीद की कि जब भी हमारे सेमिनार की तारीख़ तय हो और उनके ये दोस्त सेमिनार में शिरकत करने के लिए आएं तो मुझे सबसे पहले इत्तला दीजियेगा. उनसे हुई इतनी लंबी बातचीत से लगा कि प्रो ख्वाजा मसूद उनके ज़्यादा करीब हैं. इसकी वजह भी है. दोनों रावलपिंडी के रहने वाले थे, मिलजुल कर रिसाला निकालते थे, दोनों के ख़्यालात भी मिलते थे मार्क्सवाद से प्रभावित होने के साथ ही वे यथार्थवादी और प्रगतिवादी थे.और मार्च, 1947 के दंगों में पीड़ित लोगों की मदद करने में ख्वाजा मसूद भीष्म साहनी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे. प्रो मसूद को यह भी पता था कि भीष्म जी ने छह बरस तक मास्को में रहकर क्लासिक रूसी किताबों का अनुवाद किया है. भीष्म जी अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, पंजाबी, संस्कृत, फ़ारसी के साथ साथ पश्तो भी जानते थे लेकिन लेखन उन्होंने हिंदी में किया था जिसका दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ है. उन्होंने कुछ दोस्तों को मास्को भी आमंत्रित कराया था.

जैसे हमने कहा कि इराक और कुवैत के बीच जंग के चलते 1990 में हमारा सेमिनार नहीं हो पाया जो अंततः नवंबर, 1991 में हुआ. उन दिनों इंडियन एयरलाइन्स दिल्ली से लाहौर और कराची की उडानें थीं. उन्हीं से हमने अपने मेहमानों को टिकटें भेजी थीं. इंडियन एयरलाइन्स का एयर इंडिया का विलय 2007 में हुआ था. बेशक हमारा सेमिनार गैरराजनीतिक था लेकिन राजनीति ने अपना असर दिखा दिया. जिन दिनों हमने पाकिस्तान से मेहमानों को आमंत्रित किया था, वहां बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार थी जबकि सेमीनार के वक़्त नवाज़ शरीफ की सरकार. सबसे पहले शाहबाज़ शरीफ ने यह कह कर अपनी असमर्थता जताई कि वह राष्ट्रीय असेंबली के काम में मसरूफ हैं. पूर्व असेंबली स्पीकर मलिक मेराज खालिद को भी ‘अचनाक’
कुछ काम पड़ गया था. वह नवंबर, 1996 से 17 फरवरी, 1997 तक मुल्क के कार्यवाहक प्रधानमंत्री भी रहे. अज़ीज़ सिद्दीकी को अपनी यात्रा मुल्तबी करनी पड़ी. याहिया बख्तियार को वीज़ा नहीं मिला. वह ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के एटॉर्नी जनरल थे और बेनज़ीर भुट्टो के सलाहकार. उनकी अभिनेत्री बेटी जेबा बख्तियार को वीज़ा कभी मना नहीं किया गया. क्योंकि उन दिनों दोनों देशों के बीच फोन पर हम लोग बेसख्ता बातचीत कर सकते थे बावजूद इसके कुछ लोग सेमिनार में न आने की खुलकर वजह फोन पर बताने से कतराते थे. कह सकते हैं कि घबराते थे. मुनीर नियाज़ी ने अलबत्ता बताया कि वह एयरपोर्ट तो पहुंच गए थे लेकिन वह अपनी ‘ नालायकी से फ्लाइट नहीं पकड़ पाये क्योंकि वह वक़्त पर उठ नहीं पाये थे. उनके लेट लतीफ़ होने के किस्से पाकिस्तान भर में मशहूर हैं और उन्होंने उनके मॉडल टाउन स्थित घर में मुलाक़ात होने पर स्वीकारा भी.

इस्लामाबाद के प्रो ख्वाजा मसूद ने फोन करके बताया कि लगता है खुदा को मेरे दोस्तों से मिलना गवारा नहीं. उनकी जुबान में दर्द था. बोले हम दोनों ने हिंदुस्तान आने की पूरी तैयारी कर ली थी कि अचानक बेगम साहिबा को दिल का दौरा पड़ा. उन्हें फ़ौरन अस्पताल ले जाना पड़ा. बेशक अब वह कुछ ठीक हैं लेकिन सफर करने की डॉक्टरी इज़ाज़त नहीं. मेरी फैमिली की खबर सुनकर कलंदर मोमंद ने भी अपनी यात्रा मुल्तबी कर दी जबकि मुनीर नियाज़ी की वक़्त पर नींद ही नहीं खुली. कहाँ हम तीनों एक साथ हिंदुस्तान आने के लिए बहुत उत्साहित थे और कुदरत ने अपना खेल रच दिया. भीष्म से हमारी मजबूरी के बारे में बता दीजियेगा, मुझे मालूम है वह बहुत मायूस होगा,क्योंकि हम लोगों की अपने यार से मिलने की हसरत मन में ही रह गयी. मैं उसे खत भी लिखकर अपनी मजबूरी बयां करूंगा.

नवंबर, 1991 को ‘भारत-पाक: मैत्री और भाईचारा’ नामक सेमिनार दिल्ली के अशोक होटल में आयोजित हुआ. वहां सबसे पहले पहुंचने वाले लोगों में भीष्म साहनी थे. उन्होंने छूटते ही मुझसे पंजाबी में पूछा ‘मेरे यार आ गए हैं क्या!’ मेरा चेहरा उतर गया. वह भांप गए. बोलो त्रिलोक क्या हुआ? मैंने भीष्म जी को बताया कि प्रो ख्वाजा मसूद ने मुझे फ़ोन करके बताया कि वह अपनी बेगम के संग आने को तैयार थे कि अचानक उनकी बेगम को दिल का दौरा पड़ा और सारा प्रोग्राम चौपट हो गया. उन्होंने मुझे खास तौर पर कहा है कि मेरे मन मन की बात मेरे मन में ही रह गयी. एक मुद्द्त बाद यार से मिलने का मौका मिला था वह भी हाथ से निकल गया. यह सुनकर भीष्म जी उदास हो गए. भीष्म जी को यह जानकारी भी दी कि मुनीर नियाज़ी ने फोन करके अपने आपको कोसते हुए कहा कि अच्छा खासा मैं सुबह के लिए अपने आप को तैयार करके सोया था कि जल्दी से उठकर दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी है लेकिन मेरे एयरपोर्ट पहुँचते ही मुझे बताया गया कि अभी अभी फ्लाइट उड़ी है. मैं तबसे अपनी नालायकी के लिए अपने आप को कोस रहा हूं. जब जनवरी, 1993 में मैं उनके घर उनसे मिला तो मुनीर नियाज़ी ने एकबारगी फिर से दिल्ली न पहुंच पाने के लिए दुख का इज़हार किया और बताया कि इस सेमिनार की खबरें पाकिस्तान की अख़बारों में बड़ी तफसील के साथ छपी हैं. मुमकिन है सरकार ने भी इस तरफ तवज्जो दी हो.

बहरहाल, यह सेमिनार बहुत ही मक़बूल रहा. किन्ही वजुहात के चलते काफ़ी लोग इस सेमिनार में शिरकत करने से महरूम रह गए लेकिन पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश जस्टिस दोराब पटेल और डॉ जावेद इक़बाल की मौजूदगी ने इस सेमिनार का महत्त्व बढ़ा दिया. इनके अलावा पूर्व मंत्री जावेद जब्बार, पत्रकार एम वी नकवी, सुल्तान अहमद, शायरा फातिमा हसन, अवामी नेशनल पार्टी के अजमल खटक जैसे धारदार नेता थे. पाकिस्तान के तत्कालीन उच्चायुक्त अब्दुस सत्तार अपनी पूरी टीम के साथ मौजूद थे.अब्दुस सत्तार बाद में पाकिस्तान के विदेशमंत्री भी रहे.भारत की ओर से भीष्म साहनी के अतिरिक्त इंदरकुमार गुजराल, पूर्व लोकसभा स्पीकर रबि राय, पूर्व मंत्री हरिकिशोर सिंह, पूर्व विदेश सचिव एस.के. सिंह और ए.पी. वेंकटेश्वरन , संपादकों में गिरिलाल जैन, इंदर मल्होत्रा और एच के दुआ थे तो पत्रकारों में सैयद नकवी, शाहिद सिद्दीकी, वेद प्रताप वैदिक, जमनादास अख्तर तथा बुद्धिजीवियों में प्रो ए एम खुसरो, प्रो गोपीचंद नारंग, असगर वजाहद आदि थे. दोनों ओर से दिलखोल कर बातचीत हुई. इस सेमिनार का उद्घाटन करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के लोगों को नज़दीक लाने के लिए जिस बेहतरीन काम में आप जुटे हैं इससे से बढ़िया और कोई इबादत नहीं. दोनों देशों में भाईचारे की बहुत ज़रूरत है, आज इतिहास उसी तरफ बढ़ रहा है. कब तक हम लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे,मुठभेड़ों में उलझे रहेंगे. उम्मीद है कि दोनों देश एक अच्छे पड़ोसी की तरह रहते हुए भाईचारे और सौहाद्र का परिचय देंगे. संजय डालमिया को इस महत्वपूर्ण पहल के लिए उन्हें बधाई दी.

इस सेमिनार की भावना की सराहना करते हुए हिंदी के प्रसिद्ध लेखक भीष्म साहनी ने संजय डालमिया की इस अनोखी और क्रन्तिकारी सोच की तारीफ करते हुए कहा कि दोनों देशों के बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, न्यायविदों और राजनेताओं की एकसाथ जुटी यह महफिल ही तो हमसायगी के रिश्तों का पैगाम सारी दुनिया को देती है. मेरा पेशावर का दोस्त कलंदर मोमंद यहां आने का बहुत चाहवान था. वह पश्तो का एक शब्दकोष तैयार कर रहा है जिस में भारत की लाइब्रेरियां उनकी बहुत मददगार हो सकती हैं लेकिन वह आ न सके. मुनीर नियाज़ी यहां के पंजाबी कवियों और साहित्यकारों से मिलकर दोनों देशों के साहित्य पर चर्चा करना चाहते थे और होशियारपुर भी जाकर अपना जन्मस्थान देखना चाहते थे तो प्रो ख्वाजा मसूद यहां के mathematician से मिलने के चाहवान थे. वह मेरे हमसफर थे मेरे रकीब थे. वह भी रावलपिंडी के और मैं भी वहीं का. ऐसे ज़्ज़बात और भावनाओं का संदेश अगर दोनों देशों के लोगों के बीच हम साझा कर सकें तो इस सेमिनार की इससे बड़ी कामयाबी नहीं होगी. इस सेमिनार की समाप्ति पर अब्दुस सत्तार ने कहा भी कि अगर संजय डालमिया की सोच वाले ऐसे गैरराजनीतिक सम्मलेनों का आयोजन करते रहें तो दोनों देशों के लोगों के बीच नज़दीकियां बढ़ेंगी इंशाअल्लाह.

भीष्म साहनी से दिल्ली में कई सामाजिक समारोहों में भेंट होती रहती थी. वह समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के कुछ प्रक्रमों के प्रशंसक हैं. वह जुग्गी झोंपड़ी में रहने परिवारों के दिव्यांग बच्चों के लिए एक स्कूल चलाते हैं ‘मासूम’. इस स्कूल में गूंगे बहरे बच्चे भी हैं और हाइपर, मंदबुद्धि तथा लो आईक्यू वाले भी. ऐसे बच्चों के शिक्षण प्रशिक्षण और घर से लाने लेजाने की व्यवस्था है.ऐसे विशेष स्कूल के लिए अध्यापक भी विशेष होते हैं. इस स्कूल की देखरेख का ज़िम्मा श्रीमती नफीस खान पर है. भीष्म जी नफीस जी और उनकी अंग्रेज़ी की प्रतिष्ठित लेखिका और पत्रकार बहन अनीस जंग से भलीभांति परिचित हैं. क्योंकि मेरा भी इस स्कूल में आना जाना लगा रहता है, एक दिन भीष्म जी ने भी इस स्कूल को देखने की इच्छा व्यक्त की. भीष्म जी स्कूल के हर कमरे में जाकर बच्चों से मिले. उन्होंने देखा कि कोई बच्चा ड्राइंग बना रहा है तो कोई हारमोनियम बजा रहा है, कुछ लड़कियां डांस सीख रही हैं तो कोई कुछ गुनगुना रहा. उन्हें हर बच्चे में कोई न कोई हुनर दीखा. नफीस जी ने उन्हें बताया कि अगर कुदरत इन बच्चों को पूरी तरह से सामान्य नहीं बनाती तो उन्हें कोई न कोई हुनर बख्श देती है जिसे पहचानने का काम स्कूल में काम करने वाली विशेष अध्यापिकाएं खोज निकालती हैं. जब ये बच्चे किसी मेहमान के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए कोई गाना गाते, डांस करते, साज बजाते या कोई अपनी ड्राइंग दिखाता तो यह जान पाना मुश्किल होता कि ये सामान्य बच्चे हैं या मंदबुद्धि. भीष्म जी ने बड़े मनोयोग और तन्मयता से इन बच्चों के काम की सराहना करते हुए श्रीमती नफीस खान को बधाई दी.

भीष्म साहनी से दिल्ली में हम लोग अक्सर किसी न किसी समारोह में मिल जाते या मैं उनसे मिलने के लिए उनके घर भी चला जाता. उनके बड़े भाई बलराज साहनी से भी मेरी दो-तीन औपचारिक मुलाकातें थीं. भीष्म जी अपने बड़े भाई को बहुत योग्य व्यक्ति और अपने परिवार का ‘शाइनिंग स्टार’ कहा करते थे. वह बहुत अच्छे लेखक थे अंग्रेज़ी और पंजाबी में लिखते थे और कमाल के अभिनेता तो थे ही. उनकी फ़िल्में ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘वक़्त’, ‘सीमा’ आदि लाजवाब फ़िल्में थीं. पत्रकार होने के नाते कभी कभी मैं उनसे पूछ लेता कि क्या आपका फिल्मों में जाने के बारे में नहीं सोचा, भीष्म जी ने बताया था कि कुछ फ़िल्में की हैं ‘मोहन जोशी हाजिर हो’, ‘कस्बा’,’मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’ आदि लेकिन वहां मन नहीं रमा. लेकिन आपके उपन्यास ‘तमस’ पर आधारित फ़िल्म तो बहुत चर्चित रही. जी, क्योंकि मैं खुद भुक्तभोगी हूं जिसने विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण ख़ूनी इतिहास को भोगा है. उसकी अभिव्यक्ति मैंने ‘तमस’ में करने की कोशिश की है. मुझे खुशी है कि मेरे इस प्रयास को सराहा गया है.

विभाजन पर मंटो, खुशवंत सिंह और अमृता प्रीतम ने भी लिखा है? जी हां, और भी कई लेखक होंगे. सभी का अपना अपना नज़रिया है. मंटो का विषय दूसरा था तो खुशवंत सिंह का अलग. अमृता प्रीतम की बड़ी मार्मिक कविता है. उसकी कुछ लाइनें हैं ‘अज आखां वारिस शाह नू किदरे कब्रां विचों बोल, इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख लिख मारे वैन, अज लखां धीयां रोदियाँ तैनू वारिस शाह नू कहन… बहुत लंबी कविता है जो किसी की ऑंखें भी नम कर देगी.

हालांकि मैं उनके लेखन के बारे में नहीं कुछ कहना और पूछना चाहता था फिर भी मैं अपने आप को रोक नहीं पाया. भीष्म जी कुछ लोग आपकी लेखनी को मार्क्सवाद से प्रभावित मानते हैं? उनका उत्तर था कि यह तो अपना अपना दृष्टिकोण है. मैं सदा ही शोषणविहीन, समतामूलक और प्रगतिशील समाज के हक़ में रहा हूं और चाहता हूं कि समाज में व्याप्त आर्थिक विसंगतियों से उत्पन्न खोखलेपन को उद्घाटित किया जाए. यह पूछे जाने पर कि कभी कभी लोग आपको मुंशी प्रेमचंद और यशपाल की धाराओं के बीच का लेखक मानते हैं. कहा जाता है कि दोनों लेखकों की विषयवस्तु को बुनने के आप महान शिल्पी हैं? भीष्म जी ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. हर विषयवस्तु उस समय के काल और परिस्थिति पर आधारित होती है. मुंशी प्रेमचंद बहुत बड़े लेखक थे. उन्होंने उस समय की ग्रामीण अवस्था और परिवेश को बेहतरीन ढंग से चित्रित और निरुपित किया. यशपाल स्वयं क्रन्तिकारी थे और अपने क्रांतिकारी साथियों की मन:स्थिति और उस दौर के महान व्याख्याता रहे हैं. बेशक मैं भी क्रांतिकारियों की गतिविधियों से अवगत रहा हूं लेकिन यशपाल जैसी उनके साथ मेरी नज़दीकियां नहीं थीं. मानवीय संवेदनाओं को बुनने की हरेक की अपनी अपनी कला और बुनावट होती है. कहीं किसी को कुछ ऐसा लगता होगा तो वह उनका अपना विचार है. मैं भीष्म साहनी हूं और मुझे कृपया वही रहने दीजिये और उसी रूप में मुझे आप याद कीजिये.

8 अगस्त, 1915 में रावलपिंडी में जन्मे भीष्म साहनी थे तो पीएचडी लेकिन उन्होंने कभी भी अपने नाम के साथ डॉक्टर की उपाधि नहीं लिखी. कहा करते थे कि इसमें क्या रखा है, बहुत से डॉक्टर मारे मारे फिर रहे हैं. मुझ लोग लेखक के रूप में जानें यही अच्छा है. कभी कभी मैं उनसे हंसकर कहता कि आप मुझसे बीस बरस बड़े हैं लेकिन हम लोग हमउम्र जैसा व्यवहार करते हैं. इस पर भीष्म जी कहते थे,’उम्र को आप इतना महत्त्व क्यों देते हैं. आप स्वस्थ हैं आपका दिमाग़ ठीक काम करता है तो उम्र का कुछ लेना देना नहीं होता.’ लेकिन मेरा यह ज़िंदादिल और सकारात्मक सोच वाला दोस्त 11जुलाई, 2003 को 88 साल की उम्र में हमसे सदा के लिए बिछुड़ गया. मानवीय मूल्यों के पुजारी इस शिल्पी की याद अक्सर आती है और उनके साथ बिताये गए अविस्मरणीय पल बेशक आज मेरे जीवन की अटूट पूंजी हैं. अपने उस अग्रज की स्मृति को सादर नमन.

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