उन्हें पत्रकार प्रधानमंत्री भी कहते हैं और जननेता भी
मैंने देश और विदेश की बहुत यात्राएं की हैं, अधिकांश 20वीं सदी में. सही संख्या तो याद नहीं पड़ती लेकिन कई सैकड़ा तो होंगी ही. देश विदेश में कई चुनाव कवर किए. इनके अतिरिक्त सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़ी भी यात्राएं थीं. ‘दिनमान’ में मेरी बीट विदेश और प्रतिरक्षा थी लिहाज़ा खूब विदेश जाना हुआ तथा सेना, वायुसेना, नौसेना और सीमा सुरक्षा बल द्वारा प्रायोजित यात्राओं में भी गया. नेपाल के तराई क्षेत्र बीरगंज भी गया जिन दिनों मैं बिहार में भूदान कवर कर रहा था. पटना में मुझे प्रख्यात साहित्यकार फरिश्वरनाथ रेणु ने दो सलाह दी थीं : एक सहरसा और पूर्णिया में बिहारी सिखों से मिलने की और दूसरी नेपाल तराई में बीरगंज जाने की. उन्होंने कहा कि अच्छा लगेगा. वाकई यह बहुत ही अच्छा और यादगार अनुभव रहा. सहरसा और पूर्णिया में मुझे से बिहारी सिख मिले जो सचमुच गुरुसिख लग रहे थे, गले में छोटी कृपान लटकाये हुए. उन्हें गुरूद्वारे में कीर्तन करते हुए भी सुना और गुरु ग्रंथ साहब से ‘वाक’ लेते हुए भी. कीर्तन बहुत अच्छा कर रहे थे और गुरु ग्रन्थ साहब का पाठ भी शुद्ध. लेकिन पंजाबी में बातचीत करने में वह दिक्क़त महसूस कर रहे थे,ठीक से नहीं बोल पा रहे थे.
नेपाल में बीरगंज की यात्रा को मैं विदेश यात्रा की कोटि में नहीं रखता, इसे तो मैं अपनी बिहार यात्रा का विस्तार मानता हूं. असली विदेश यात्रा मैं ने फ़रवरी, 1975 में की थी जब मुझे पश्चिम जर्मनी से निमंत्रण प्राप्त हुआ था. उस समय दो जर्मनी थी पूर्व और पश्चिम. पूर्व में कम्युनिस्ट सरकार थी, जिसे वह समाजवादी कहते थे, और पश्चिम में लोकतंत्री सरकार. मुझे दो हफ्ते का निमंत्रण मिला था देश के कई राज्यों में जाने और वहां की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए. उस वक़्त पश्चिम जर्मनी की राजधानी थी बॉन. बेर्लिन भी दो भागों में विभाजित था पश्चिम और पूर्व बर्लिन के रूप में. दोनों के बीच एक दीवार थी. मुझे सलाह दी गयी कि यदि पूर्व बर्लिन जाना चाहें तो दीवार के पास एक गेट है उधर जाने के लिए, आप अपना पासपोर्ट दिखकर पूर्व बर्लिन भी देख सकते हैं. मैं दो बार पश्चिम बर्लिन से पूर्व बर्लिन की ओर गया था जो पश्चिम बर्लिन की तुलना में मुझे बहुत ही शुष्क, उदास और मायूस शहर लगा. मैं दीवार से कुछ दूरी तक ही गया शहर के भीतर नहीं. 3 अक्टूबर, 1990 को जर्मनी के दोनों भागों का विलय हो गया और बर्लिन फिर से जर्मनी की राजधानी बन गयी.
पश्चिम जर्मनी की यात्रा के बाद मैं तीन दिन लंदन में रुका और दो दिन पेरिस में. क्योंकि यह निजी यात्रा थी, उन दिनों मेरी किसी से जान पहचान भी नहीं थी लिहाज़ा नगर दर्शन कर भारत लौट आया. कह सकता हूं कि मैंने साढ़े तीन देश देख लिए थे – पश्चिम जर्मनी पूरा, पूर्व बर्लिन आंशिक तथा लंदन और पेरिस नगर तक. लेकिन 1977 में सोवियत संघ के निमंत्रण की वजह से मुझे अन्य कई देशों की यात्रा करने का भी अवसर मिला जिन में ब्रिटेन और फ्रांस भी थे. न्योता तो मुझे पूर्व जर्मनी ने भी था लेकिन ऐन वक़्त पर उसने अपना फैसला बदल दिया जिसका पता मुझे ऑस्ट्रिया जाकर लगा. शायद इसलिए कि मैं 1975 में पश्चिम जर्मनी न्योता जा चुका हूं. लेकिन दिल्ली छोड़ने से पहले मैंने पूर्व जर्मनी के दूतावास को यह स्पष्ट कर दिया था कि मेरा मुख्य मेजबान सोवियत संघ है. तब तक सोवियत संघ एकजुट था. ( 26 दिसंबर, 1991 में सोवियत संघ 15 स्वाधीन देशों में विभाजित हो गया) बहरहाल, सोवियत संघ का भी मेरा दो हफ्ते का न्योता था. उसमें मैं ताशकंद, समरकंद, लेनिनग्राद ( वर्तमान पीटर्सबर्ग) और मास्को गया. मास्को से मैं बेलग्राद गया. तब युगोस्लाविया एकजुट था और राष्ट्रपति थे मार्शल टीटो. टीटो के बाद 1990 में इसका विघटन हुआ था जो सात स्वाधीन राष्ट्रो में विभाजित हो गया. आज बेलग्राद सर्बिया की राजधानी है.खैर मैं पांच दिनों तक मार्शल टीटो के युगोस्लाविया में रहा. उसके बाद मैं हंगरी के बुदापेश्त और लंदन से होता हुआ ऑस्ट्रिय की राजधानी वीएना पहुंचा एक सप्ताह के लिए. दिल्ली में उस समय ऑस्ट्रिया दूतावास में प्रेस सचिव थे हर्बर्ट ट्रक्सल जो बाद में भारत में ऑस्ट्रिया के राजदूत बन कर आये. भारतीय कथक की नृयांगना शोवना नारायण के वह पति हैं.
3 अक्टूबर, 1977 को मैं लंदन से ऑस्ट्रिया की राजधानी वीएना पहुंचा था. एयरपोर्ट पर मेरा भव्य स्वागत किया गया. होटल ले जाते हुए मेरे साथ चल रहे विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि ऑस्ट्रिया मध्य यूरोप में स्थित एक खूबसूरत देश है जो समुद्र का तटहीन या स्थल-रुद्ध देश कहलाता है जो अपने शानदार आलप्स पहाड़ों, समृद्ध इतिहास और शास्त्रीय संगीत के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. इसके आठ पड़ोसी देशों में जर्मनी, हंगरी, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, इटली, स्विट्ज़रलैंड आदि हैं. यह देश बीथोवेन, मोजार्ट और स्ट्रास जैसे महान संगीतकारों का जन्मस्थान है जिसकी वजह से इसे ‘वार्टज और संगीत की भूमि’ भी कहा जाता है. ऑस्ट्रिया के दर्शनीय स्थलों में साल्ज़बर्ग (मोज़ार्ट का घर) और हॉल्स्टैट का जादुई अल्पाइन गांव शामिल है. वीएना के शाही महल भी बहुत मशहूर हैं. कल डॉ फिशर चांसलर ब्रूनो क्राइस्की के बुंदेस कांस्लेरएम ( संघीय चांसलर का कार्यालय) में जहां मिलवाएंगे वह भी एक पुराना महल है जिसकी नींव 1717 में रखी गयी थी.
अगले दिन 4 अक्टूबर, 1977 को जब मैं ऑस्ट्रिया के चांसलर ब्रूनो क्राइस्की से मिलने के लिए पहुंचा तो प्रेस विभाग के प्रमुख डॉ फिशर ने मेरा स्वागत किया. उन्होंने बताया कि अभी चांसलर अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ विचार विमर्श कर रहे हैं इसलिए आइये आपको यह महल दिखाएं. यह महल ढाई सौ साल पुराना है. 1717 में इसकी नींव रखी गयी थी. इस महल की इमारत का नमूना बरोक शैली पर आधारित है जिसके वास्तुकार हैं जॉन लुकास हिल्डब्रांट. 1740 से लेकर 1780 तक मारिया टेरेसा और उनके प्रधानमंत्री कोनिश ने इस भवन को गौरवान्वित किया. कोनिश ने इस भवन को सजाने संवारने और कमरों को विभिन्न लोगों को बांटने का काम स्वयं किया था. अपने पास उसने कुछ कम हवादार और अंधेरे कमरे रखे क्योंकि सूर्य की रौशनी उसे पसंद नहीं थी. यहां से ही वह अपनी विदेशनीति का संचालन करता था लिहाज़ा शुरू से लेकर आज तक वह संघीय कार्यालय
प्रधानमंत्री के कार्यालय के तौर पर माना जाता है. इस महल की खूबसूरती को बरकरार रखा गया है. बड़े बड़े भारी नक्कशीयुक्त दरवाज़े हैं. इन कमरों की छतें खासी ऊँची हैं. प्राचीन वास्तुकला का प्रतीक है यह महल. हम लोग अपनी विरासत को बहुत संभाल और सहेज कर रखते हैं. आपने और भी कई यूरोपीय देश देखे होंगे और वहां भी कुछ में पुराने महल हैं जिन्हें संरक्षित रखा गया है. हमारे यहां तो हिटलर की यादों को भी सहेज कर रखा गया है. उस कालखंड में तो ऑस्ट्रिया जर्मनी का भाग था. ऐसे ही महल आपको पोलैंड की पुरानी राजधानी क्राकोव में देखने को मिलेंगे और ऑश्विच में हिटलर के खूनी शिविर भी. हां वीएना में सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन की याद में एक स्मारक पट्टीका लगी हुई है. यह पट्टीका उस इमारत पर लगी है जहां 1913 में स्टालिन ने कुछ समय बिताया था और अपनी प्रसिद्ध रचना ‘ मार्क्सवाद और राष्ट्रीय प्रश्न’ लिखी थी. राजनीतिक स्तर पर इस पट्टीका को हटाने के कई प्रयास किए गए लेकिन वह इसलिए सफल नहीं हो पाए, क्योंकि शहर में एक बड़ा सोवियत वॉर मेमोरियल भी मौजूद है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जान गँवाने वाले सोवियत सैनिकों की याद दिलाता है. डॉ फिशर ने बताया कि ऑस्ट्रिया को वास्तविक स्वतंत्रता 27 जुलाई, 1955 को मिली जब ब्रिटेन, अमेरिका, रूस और फ्रांस के साथ हुई ऑस्ट्रियन
स्टेट संधि (15 मई, 1955) लागू की गयी और विदेशी सेनाएं वापस चली गयीं.
आइये चांसलर की मीटिंग खत्म हो गयी है. डॉ फिशर कहते हैं.पहले वह वहां पर जमा पत्रकारों को ब्रीफ करेंगे. आप भी चाहें तो उन पत्रकारों के साथ खड़े हो सकते हैं. पुराने समाजवादी हैं जर्मनी के विली ब्रांट की तरह. उन्होंने बताया कि हर मंगलवार को चांसलर पत्रकारों से मिलते हैं. इसे हम लोग ‘प्रेस फोयर्स’ कहते हैं. इस प्रेस फोयर्स में वह पत्रकारों को स्वयं संबोधित कर मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए फैसलों की जानकारी देते हैं और पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर भी. चांसलर पत्रकारों के साथ कॉफ़ी भी पीते हैं और अनौपचारिक बातचीत भी करते हैं. उनके साथ सादे कपड़ों में दो सुरक्षा कर्मचारी रहते हैं. वह पत्रकारों को रोकते नहीं. चांसलर क्राइस्की ने पत्रकारों को बताया कि देश में मुद्रास्फीति की स्थिति पैदा होने से हमारे यहां बेरोज़गारी एक प्रतिशत बढ़ गयी है. कारें, प्रसाधन सामग्री और कुछ विलासी वस्तुओं पर कर लगाने होंगे.वीएना में कार कारखाना नहीं है. ज़्यादातर वस्तुएं जर्मनी से आती हैं. ऑस्ट्रिया की राजभाषा जर्मन है. लिहाज़ा पत्रकारों और चांसलर जर्मन में ही बातचीत करते हैं. यदि कोई गैर जर्मन पत्रकार हो तो चांसलर क्राइस्की अंग्रेज़ी में भी उसका उत्तर देते हैं.
वीएना के पत्रकारों के चले जाने के बाद मेरी ओर मुख़ातिब होकर चांसलर ब्रूनो क्राइस्की (22 जनवरी, 1911-29 जुलाई, 1990) ने स्वत: बताया कि मेरे पत्रकारों से सीधी बातचीत करने का मतलब है दिलखोल और बेसख्ता बातचीत. मैं पत्रकारों से कुछ भी नहीं छुपाता. इसका लाभ यह होता है कि बेवजह की अटकलों पर विराम लग जाता है. फिर भी अगर कोई पत्रकार अटकलबाज़ी करता है तो उसका तुरंत खंडन कर स्थिति स्पष्ट कर दी जाती है. 1970 से मैं प्रधानमंत्री हूं और तभी से मैंने हर मंगलवार को कैबिनेट की मीटिंग के तुरंत बाद सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों की जानकारी मैं खुद पत्रकारों को देता हूं ताकि किसी प्रकार का संशय न रहे. इससे कयासबाज़ी की गुंजाइश नहीं रहती. इसप्रकार सरकार और पत्रकारों के बीच परस्पर सद्भाव और विश्वास की भावना सदा कायम रहती है. मंगलवार के अलावा भी मैं पत्रकारों से अलग से मिलता रहता हूं. एक तरह से हफ्ते में पांच बार तो पत्रकारों से मिलजुलना हो ही जाता है किसी न किसी सूरत में. बहुत से लोग तो मुझे पत्रकार प्रधानमंत्री भी कहते हैं. मुझे भी यह संबोधन अच्छा लगता है, भला लगता है और रुचता भी है.
अब जब हम लोगों ने ऑस्ट्रिया और भारत के संबंधों पर बात शुरू की तो चांसलर क्राइस्की ने बताया कि भारत एक महान लोकतंत्र है. मेरी पंडित जवाहरलाल नेहरू से 1928 में पहली बार मुलाक़ात हुई थी. उनके एक महान लोकतंत्री के विचार थे. वह 1955 में ऑस्ट्रिया आये थे और 1971 में इंदिरा गांधी भी. श्रीमती गांधी से मेरी बहुत ही अच्छी और सारगर्भित बातचीत हुई थी. ऑस्ट्रिया सरकार और यहां के लोग भी भारत की उपलब्धियों की सदैव सराहना करते रहते हैं. एशिया में भारत ने जो लोकतान्त्रिक परंपराएं कायम रखी हैं ऑस्ट्रिया उनका सम्मान करता है.
लेकिन जब भारत में इमरजेंसी की स्थिति में आपने जॉर्ज फर्नाडीस की पैरवी करने के लिए एक वकील भेजने की बात कही थी तो उस पर भारत की तत्कालीन सरकार में खासी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. क्या इस तरह का सुझाव किसी देश की आंतरिक नीति में हस्तक्षेप करना नहीं है? डॉ क्राइस्की ने कहा, ‘नहीं, मैं यह नहीं मानता. मैंने महसूस किया कि इमरजेंसी में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है. जॉर्ज फर्नाडीज़ पर बड़ौदा डायनामाइट केस चला. जॉर्ज इंटरनेशनल सोशलिस्ट के सदस्य हैं और मैं भी उस संस्था का सदस्य हूं. इस संस्था का सदस्य होने के नाते हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम अपने एक सदस्य की, जिनपर किन्ही कारणों से मुकद्दमा चलाया जा रहा है, सहायता करें. इसलिए तत्कालीन सरकार से हमने एक वकील भेजने का अनुरोध किया था. इसका मतलब भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना कदापि नहीं था. सोशलिस्ट इंटरनेशनल दुनिया भर के सामाजिक,
लोकतान्त्रिक, समाजवादी और श्रमिक राजनीतिक दलों का एक प्रमुख वैश्विक संगठन है जो 1951 में स्थापित हुआ. इसका मुख्य उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा करना, वैश्विक शांति, निरस्त्रीकारण और लोकतान्त्रिक समाजवाद को बढ़ावा देना है.’
इसी साल 1977 में भारत में जनता पार्टी की नयी सरकार बनी है जिसके प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई हैं. जॉर्ज फर्नाडीस उसमें उद्योगमंत्री हैं. इस बारे में आपकी क्या राय है. इससे पहले इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ क्राइस्की ने बिना किसी लागलपेट के कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि नयी सरकार लोकतान्त्रिक मूल्यों को बनाए रखते हुए मानवाधिकार की कद्र करेगी. इस सरकार में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें कुशल और बुद्धिमान नेता माना जाता है. हमें खुशी है कि हमारी संस्था के सदस्य जॉर्ज फर्नाडीस भी सरकार में हैं.
वीएना में संयुक्तराष्ट्र का एक नगर विकसित हो रहा है. इस दायित्व को स्वीकार करने की कोई खास वजह है? इस पर डॉ क्राइस्की खुलकर बोले. उन्होंने कहा कि ‘ऑस्ट्रिया को सही मायने में एक गुटनिरपेक्ष देश माना जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर के बहुत से सम्मेलन और महत्वपूर्ण बैठकें वीएना में होती रहती हैं. अंतरराष्ट्रीय परमाणु आयोग ( आईएईए)का कार्यालय तो वीएना में है ही. लिहाज़ा हमने संयुक्तराष्ट्र के सामने जब यह प्रस्ताव रखा कि वीएना न्यूयॉर्क और जिनेवा के अलावा एक तीसरे नगर के तौर पर विकसित किया जा सकता है. हमने उन्हें आश्वास्त किया कि इस पर होने वाला सारा खर्च ऑस्ट्रिया सरकार वहन करेगी. हमारे इस प्रस्ताव का स्वागत किया गया. आपने देखा होगा कि इस कार्य में बहुत प्रगति हो गयी है और हमें पूरा विश्वास है कि 1979 तक संयुक्तराष्ट्र का यह नगर अस्तित्व में आ जाएगा. बाद में मुझे पता चला कि वास्तव में 1979 में वीएना में संयुक्तराष्ट्र के इस नगर ने काम करना शुरू कर दिया था. इस समय यहां पर 150 देशों के 5000 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं जिसमें ऑस्ट्रिया के एक तिहाई कर्मचारी हैं.
डॉ ब्रूनो क्राइस्की से रोचक और उपयोगी बातचीत हुई. उन्होंने एक से अधिक बार जॉर्ज फर्नाडीस को ‘मेरा मित्र’ कहकर याद किया. उन्होंने बताया कि हम दोनों के बीच अक्सर फोन पर बातचीत होती रहती है फिर भी दिल्ली में अगर आपकी उनसे मुलाक़ात हो तो कहियेगा मैं उन्हें याद कर रहा था. हमारे बीच जो बातचीत हुई है उसका ज़िक्र भी कर दीजियेगा. चाहें तो पूरा ब्यौरा दे दीजियेगा. मुझे अगली मीटिंग के लिए निकलना है आपके साथ डॉ फिशर रहेंगे जो आपको ऑस्ट्रिया के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे. आप खुद भी पूरी तैयारी के साथ आये होंगे फिर भी हमारा कर्तव्य है आपको अपने खूबसूरत और संगीतमय देश के बारे में बताना. मुझसे हाथ मिला डॉ फिशर के हवाले कर डॉ क्राइस्की निकल गए. क्या तहज़ीबयाफ्ता राजनेता हैं वह.
डॉ फिशर ने बताया कि डॉ ब्रूनो क्राइस्की के कुशल नेतृत्व से ऑस्ट्रिया की प्रतिष्ठा विश्व भर में बढ़ी है. वीएना ऑस्ट्रिया के लिए ‘वीन’ है और यहां की मातृ और राजभाषा जर्मन है. वीएना को पूर्व और पश्चिम यूरोप में कड़ी के तौर पर माना जाता है. जिन दिनों मैं ऑस्ट्रिया गया था पूर्व यूरोपीय देशों में कम्युनिस्ट सरकारें थीं, जिन्हें वहां समाजवादी सरकार कहा जाता है. ऑस्ट्रिया और हंगरी के बीच बहुत ही सहज और मधुर संबंध थे गोकि तब हंगरी में समाजवादी सरकार थी. अब लोकतंत्री सरकार है. पिछले दिनों वहां के चुनाव बहुत चर्चित रहे.
डॉ फिशर ने मुझे ऑस्ट्रिया के बारे में बताते हुए कहा कि ऑस्ट्रिया का इतिहास बहुत पुराना है. लौहयुग में यहां इलिरियन लोग रहते थे. बाद में रोमनों ने देश पर कब्ज़ा कर लिया और संस्कृति पर प्रभाव डाला. इस देश का उद्भव नवीं सदी में हुआ ऊपरी और निचले हिस्से के तौर पर. ऑस्ट्रिया अपने खूबसूरत पहाड़ों और प्राकृतिक वातावरण के लिए जाना जाता है. भौगोलिक दृष्टि से ऑस्ट्रिया का अधिकांश भाग मध्य यूरोप में स्थित आल्प्स पर्वत श्रृंखलाओं में आता है जिसका बहुत प्रभुत्व है. इस देश की समुद्र से कोई सीधी पहुंच नहीं. यह लैंडलॉक्ड देश है.पूर्वी भाग में पहाड़ियां अधिक ऊँची नहीं हैं. डन्यूब (2850 किलोमीटर)देश की सबसे महत्वपूर्ण नदी है. यह यूरोप की दूसरी सबसे लंबी नदी है और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है.दर्जनों झीलें पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित हैं जो प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाती हैं. डन्यूब नदी कई यूरोपीय देशों से होकर गुज़रती है. देश के 38 प्रतिशत भाग में जंगल हैं जिनमें 70 फीसदी चीड़ जाति के, 20 प्रतिशत पतझड़ वाले तथा 10 प्रतिशत मिश्रित जंगल हैं. आल्प्स के भागों में ‘स्प्रूस’ ( एक प्रकार का चीड़) तथा देवदार के वृक्ष पाए जाते हैं. वन देश की बहुत बड़ी संपदा है.लकड़ी निर्यातक देशों में ऑस्ट्रिया छठे स्थान पर है.देश के कुल क्षेत्रफल (83,879 किलोमीटर और जनसंख्या 91 लाख) का 29 प्रतिशत भाग कृषि के लिए उपयोग किया जाता है. सबसे अधिक उपजाऊ क्षेत्र डेन्यूब के पश्चिमी क्षेत्र जिसे ‘वीएना का दोआब’ भी कहा जाता है में तथा वर्जिनलैंड में है. यहां की मुख्य उपजें गेहूं, जो, मक्का, राई, ओट आदि हैं, आलू और चुकंदर यहां के मैदानी इलाकों में खूब होता है. ईजबर्ग पहाड़ के आसपास लोहे और कोयले की खांनें हैं. लोहा, इस्पात और कपड़ों के कारखाने देश भर में फैले हुए हैं. लकड़ी का सामान, कागज़ की लुगदी, वाद्ययंत्र बनाने के कारखाने यहां के अन्य बड़े धंधे हैं.यहां नमक, ग्रैफाइट तथा मैगनेसाइट पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.मैगनेसाइट तथा ग्रैफाइट के उत्पादन में ऑस्ट्रिया का संसार में क्रमशः दूसरा और चौथा स्थान है.यहां से निर्यात होने वाली वस्तुओं में इमारती लकड़ी का बना सामान, लोहा, इस्पात, रासायनिक वस्तुएं और कांच मुख्य हैं.
ऑस्ट्रिया गणराज्य नौ संघीय राज्यों (बुंडेसलैंडर) में विभाजित है. वीएना प्रान्त में स्थित वीएना नगर देश की राजधानी है. यह सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला शहर है जो देश का प्रशासनिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र भी है.अन्य संघीय राज्य हैं बर्गनलैंड, कैरिंथिया, लोअर ऑस्ट्रिया, साल्ज़बर्ग, स्टायरिया, टायरॉल, अपर ऑस्ट्रिया और वोरार्लबर्ग. इनके प्रमुख शहरों में ग्राज़, लिंज, साल्ज़बर्ग, इंसब्रुक आदि हैं. विभिन्न विषयों की उच्चतम शिक्षा के लिए ऑस्ट्रिया का बहुत महत्त्व है. वीएना, ग्रेज़, लिंज तथा इंसब्रुक में संसार प्रसिद्ध विश्वविद्यालय हैं.
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ऑस्ट्रिया का सांस्कृतिक महत्त्व सदियों से यूरोपीय सभ्यता का केंद्र रहा है जिसने कला, दर्शन और समाज को गहराई से प्रभावित किया है और संपूर्ण विश्व के कला, साहित्य, भव्य वास्तुकला, शास्त्रीय संगीत और बौद्धिक इतिहास के क्षेत्र में इस की केंद्रीय भूमिका रही है. यह देश विश्व स्तर पर अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, वस्तुकला और शास्त्रीय संगीत परंपराओं की एक अद्वितीय और अनूठी पहचान रखता है. वीएना सदियों से संगीत की वैश्विक राजधानी रहा है. यहां वोल्फगैंग अमाडेउस मोज़ार्ट (27 जनवरी, 1756-5 दिसंबर, 1791) एक शास्त्रीय संगीतकार और वादक थे. उन्होंने अपने जीवनकाल में 800 से अधिक रचनाएं पूरी कीं जिन में उनके समय की अधिकांश शैलियों के उत्कृष्ट उदाहरण शामिल हैं सिम्फ़नी, कंसर्ट, चैम्बर संगीत. ऑपेरा और कोरल संगीत. लुडविग वैन बीथोवेन (17 दिसंबर, 1770-26 मार्च, 1827) जर्मन संगीतकार और पियानोवादक थे. 21 साल की उम्र में वह वीएना आ गए.उन्होंने 1802 से लगभग 1812 तक जोसेफ हेडन और मोज़ार्ट की शैलियों से प्रेरित अपने व्यक्तिगत विकास का परिचय दिया. पहले कलाप्रवीण पियानोवादक के रूप में ख्याति अर्जित की. उन्होंने अपने जीवनकाल में नौ सिम्फ़नी, 32 पियानो सोनाटा और एकमात्र ऑपेरा ‘ फिदेलियो’ जैसे कई कालजयी संगीत रचे. उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में ‘सिम्फ़नी नंबर 9’ (जिसमें प्रसिद्ध ‘ ‘ओड टू जॉय’ शामिल है) को माना जाता है. वह मानते थे कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि यह भावनाओं और विचारों को गहराई से व्यक्त करने का माध्यम है. उन्होंने साउंड और वॉल्यूम के हिसाब से संगीत के पारंपरिक ढांचे मे क्रांतिकारी बदलाव किए. उनकी धुनों मे प्रेम, पीड़ा,विद्रोह और असीम मानवीय इच्छा- शक्ति का अद्भुत संगम है.इस दौरान बीथोवेन बहरे होते जा रहे थे. अपने अंतिम काल में 1812 से 1827 तक उन्होंने संगीत के रूप में और अभिव्यक्ति में अपने नवाचारों का विस्तार किया. शुबर्ट और जोहान स्ट्रास जैसे महान संगीतकारों ने ऑस्ट्रिया में जन्म लिया या काम किया, जिनकी विरासत आज भी वीएना ऑपेरा हाउस, वोक्सऑपेरा और वीएना फिलहारमोनिक जैसे संस्थान संगीत की इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं. ऑस्ट्रिया में शानदार महलों, कैथेड्रल और किलों का निर्माण हैब्सबर्ग राजवंश के काल में हुआ. वीएना के शानब्रन पैलेस और साल्ज़बर्ग के होहंसाल्ज़बर्ग किला जहां से सबसे बड़े और पूरी तरह से सुरक्षित माध्ययुगीन किलों में से एक है.यहां से पूरे शहर और आल्प्स का शानदार नज़ारा दीखता है. मिराबेल पैलेस और गार्डन्स अपने शानदार फूलों की क्यारियों और संगमरमर के फव्वारों के लिए प्रसिद्ध यह स्थान अमेरिकी संगीत और फ़िल्म ‘साउंड ऑफ़ म्यूजिक’ के कुछ भागों को फिल्माया गया, जिसमें ऑस्ट्रिया के प्रसिद्ध स्थलों को दर्शाया गया है. यह संगीत रिचर्ड रोजर्स और ऑस्कर हैमरस्टेन द्वितीय के बीच एक साझेदारी का मुख्य आकर्षण है.ओल्ड टाउन यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल यहां की संकरी गलियों में पैदल घूमना और मोज़ार्ट के जन्मस्थान व आवास को देखने का एक अद्भुत अनुभव है. साल्ज़बर्ग कैथेड्रल बरोक वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है जो शहर के बीचोंबीच स्थित है. पुनर्जागरण शैली की इमारतें यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में शामिल हैं.
पश्चिमी देशों में कॉफ़ी हाउस की संस्कृति ऑस्ट्रिया में शुरू हुई और आज भी इसकी संस्कृति का अभिन्न अंग है. 19वीं सदी के अंत में इन्हें जो ख्याति मिली उसका श्रेय काफ़ी हद तक पीटर अल्टेनबर्ग, कार्ल क्रॉउस, हरमन ब्रोच और फ्रेडरिक टोरबर्ग जैसे लेखकों को जाता है जिन्होंने इन्हें काम करने और सामाजिक मेलजोल के स्थान के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया. प्रसिद्ध ऑस्ट्रियाई लेखक पीटर अलटेनबर्ग के बारे में अफवाह है कि उन्होंने अपना निजी पता ‘विएन 1, कैफे सेंट्रल’ रखा था, क्योंकि वह कैफे सेंट्रल में बहुत समय बिताते थे. उस समय के विचारक, कलाकार और राजनीतिक नेता जैसे स्टीफन ज़िवग, एगान शिएले, गुस्ताव क्लिमट, थियोडोर हर्ज़ल और यहां तक कि लियोन ट्राटस्की भी नियमित रूप से कॉफ़ी हाउस आते थे.ऑस्ट्रियाई जीवन शैली में वीएना की पारंपरिक कॉफ़ी हाउस संस्कृति को यूनेस्को द्वारा ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा प्राप्त है.
कैफे सेंट्रल और कैफे साचर जैसी जगहें ऐतिहासिक रूप से बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों के मिलने का मुख्य केंद्र है.
ऑस्ट्रिया के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी देने के बाद डॉ फिशर ने बताया कि देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सामान्य व्यक्ति के तौर पर रहते हैं. वह अपने कार्यालय में केवल कार्यालय का ही काम करते हैं. उनके निवासस्थान शहर में हैं. दोनों के टेलीफोन नंबर टेलीफोन निर्देशिका में दिए गए हैं लिहाज़ा जब भी कोई उनसे बात करना चाहे वह उपलब्ध रहते हैं. उनके घर पर कोई निजी सचिव नहीं रहता. वह अपना फोन खुद उठाते हैं. इसप्रकार प्रधानमंत्री डॉ ब्रूनो क्राइस्की का केवल पत्रकारों से ही नहीं जनता से भी सीधा संपर्क रहता है. डॉ फिशर ने देश के दो महत्वपूर्ण राजनेताओं से जनता से सीधे जुड़ाव की बातें करते हुए मुझे सलाह देते हैं कि आप चाहें तो रात को किसी समय उनसे फोन करके मेरी बात को तस्दीक कर सकते हैं. मैंने उनकी सलाह मानते हुए ऐसा किया भी. फोन डॉ क्राइस्की ने स्वयं उठाया. मैंने शाम को उन्हें अपनी गाड़ी स्वयं चलाते हुए देख लिया था. उसी बाबत पूछा. उन्होंने बताया कि इसमें चौंकने वाली क्या बात है. यही हमारे देश के लोकतंत्र की खूबसूरती है. उन्होंने यह भी बताया कि जब हम किसी निजी काम से बाहर जाते हैं तो हमारे साथ कोई लौलश्कर नहीं रहता. हम अपने देशवासियों को यह नहीं दर्शाना चाहते कि हमारा दर्जा आम लोगों से ऊँचा है.
डॉ फिशर ने बताया था कि अगर राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अपनी गाड़ी स्वयं चलाते हुए दीख जाएंगे, जो ऑस्ट्रिया में आम बात है, तो लोगों में उन्हें देखने के लिए भगदड़ नहीं मच जाती और न ही लोग सड़कों के किनारे खड़े हो जाते हैं और न ही चलता हुआ ट्रैफिक रोका जाता है, सभी कुछ सामान्य रहता है. राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को अपनी गाड़ी से जाता हुआ देखकर लोग मुस्कुरा देंगे या हाथ हिलाकर अभिवादन कर देंगे. डॉ फिशर ही नहीं ऑस्ट्रिया में प्रतिपक्ष के नेता भी मानते थे कि पिछले सात वर्षों से डॉ ब्रूनो क्राइस्की ने आम लोगों से मिलने के लिए जिस तरह के तौर तरीके अपना रखे हैं उससे उनकी देश में ही नहीं विदेश में भी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ी है. वह केवल पत्रकार प्रधानमंत्री ही नहीं जनता के प्रधानमंत्री भी कहे जाते हैं.डॉ क्राइस्की 1983 तक ऑस्ट्रिया के चांसलर रहे.वह ऑस्ट्रिया की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीओ) के नेता थे. डॉ क्राइस्की 1980 में भारत आए थे लेकिन मेरी उनसे मुलाक़ात नहीं हो सकी. उन दिनों मैं पश्चिमी जर्मनी में बुंडेस्टैग (निम्न सदन) के चुनाव कवर कर रहा था. उसके बाद मुझे और कई यूरोपीय देशों में जाना था. दो माह का विदेश प्रवास था. बेशक डॉ ब्रुनो क्राइस्की की अक्टूबर, 1977 की विशेष भेंट आज भी कहीं मेरे दिल के गहरे में अंकित है. ऐसे राजनेता विरले ही होते हैं जो पत्रकारों और आम जनता के भी प्रिय हों. मिस यू डॉ ब्रूनो क्राइस्की. उनकी मधुर स्मृति में सादर नमन.












