बिहार में यह चुनाव काल है और राजनीति वोट की जमा-पूंजी के लेखा-जोखा के साथ आगे बढ़ रही है. अलग-अलग सामाजिक समूहों के कार्ड बड़े सलीके से खेले जाते रहे हैं. चुनाव काल में इन सामाजिक समूहों के कार्ड खेलने में आसानी होती है, जहां राजनीतिक आकांक्षा की अभिव्यक्ति की अपनी सुनिश्चित शैली नहीं होती, वह सामान्य हो या आक्रामक. इस लिहाज से बिहार में दलित, महादलित एवं अति पिछड़ों के बीच राजनीति-राजनीति का खेल आसान रहा है और इसे मौजूदा हालत में रहने दिया जा रहा है. पिछले कई दशकों में मंडलवादी सामाजिक न्याय की राजनीति ने इन समूहों के राजनीतिकरण की प्रक्रिया तो तेज कर दी, पर इनमें आक्रामक राजनीति विकसित होने के उपाय नहीं किए गए. राजनेताओं एवं नौकरशाहों की एक जमात इन सामाजिक समूहों की मार्केटिंग तो करती रही, लेकिन इनके सशक्तिकरण का प्रयास नहीं किया गया. बिहार की हाल की कुछ घटनाएं और उनके मुतल्लिक राजनीतिक दलों के आचरण इसे गहरे तक रेखांकित करते हैं.

पटना उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति-जनजाति के सरकारी सेवकों को प्रोन्नति में आरक्षण के बिहार सरकार का निर्णय निरस्त कर दिया है. इतना ही नहीं, न्यायमूर्ति बी. नाथ की एकल पीठ ने इस बारे में राज्य सरकार की ओर से पेश आंकड़ों को भी सही नहीं माना है. इस बारे में सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुरूप अनुसूचित जाति-जनजाति के पिछड़ेपन के आकलन का निर्देश दिया गया है. हालांकि, सरकार की दलील थी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आलोक में अनुसूचित जाति-जनजाति के पिछड़ेपन और सेवा में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का आकलन करके ही आरक्षण देने का ़फैसला लिया गया था, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया और फैसले को चुनौती देने वालों की इस दलील को लगभग स्वीकार कर लिया कि इन सामाजिक समूहों के लोग निर्धारित कोटे से अधिक संख्या में सेवा में तैनात हैं. ग़ौरतलब है कि राज्य सरकार ने अगस्त, 2012 में प्रोन्नति में आरक्षण लागू करने का आदेश जारी किया था. वैसे तो बिहार में प्रोन्नति में आरक्षण की सबसे पहली व्यवस्था अभियांत्रिक सेवा में 2008 में की गई थी, लेकिन 2011 में पटना उच्च न्यायालय ने उसे रद्द कर दिया था.
दरअसल, सरकार ने वरिष्ठ आईएएस केपी रमैया की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसे विभिन्न विभागों में एससी-एसटी अधिकारियों के प्रतिनिधित्व का आकलन करना था. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में हर विभाग के ऐसे अधिकारियों-कर्मचारियों का ब्यौरा सरकार को दिया था. उसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने प्रोन्नति में आरक्षण का आदेश जारी किया था, जिसे एकल पीठ ने खारिज कर दिया. पीठ ने पिछड़ेपन के आकलन और उसके निर्धारण की राज्य सरकार की पद्धति को ग़लत करार देते हुए कहा कि आरक्षण का लाभ क्रीमीलेयर के दायरे से बाहर के लोगों को मिलना चाहिए. अदालत ने कहा कि सरकार नए सिरे से पिछड़ेपन का आकलन करके आरक्षण लागू कर सकती है. अदालत अनुसार, इस निर्णय के पहले से जारी आरक्षण यथावत रहेंगे. चुनाव का समय होने के कारण उच्च न्यायालय के इस निर्णय से सरकार गहरे राजनीतिक दबाव में आ गई है. नतीजतन, इस निर्णय को चुनौती देने की तैयारी युद्ध स्तर पर की गई है. साथ ही, इस मसले पर भारत के अटॉनी जनरल से भी सलाह ली जा रही है. इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक सरकार की ओर से अपील दायर हो जाने की हरसूरत उम्मीद है.
इस अपील पर जो भी निर्णय आए और राज्य सरकार उसके आलोक में जो भी करे, लेकिन बिहार की चुनावी राजनीति में यह तो मसला बन ही रहा है. हाईकोर्ट के उक्त आदेश को सबसे पहले राजनीति का मुद्दा राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने बनाया. उन्होंने इस फैसले के खिला़फ राज्य सरकार की निष्क्रियता पर चिंता जताते हुए मामले को सर्वोच्च न्यायालय ले जाने की मांग की. यह राजनीति ही थी कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तुरंत कहा कि अपील की तैयारी कर ली गई है, किसी के मांग करने से पहले. लालू प्रसाद के बयान और मुख्यमंत्री के कथन के साथ ही कुछ अन्य राजनीतिक दलों के भी बयान आए. बिहार सरकार ने भी आनन-फानन में सारी तैयारी की और राज्य के प्रधान अपर महाधिवक्ता ललित किशोर अप्रत्याशित ढंग से मीडिया से मुखातिब हुए. उन्होंने सब कुछ सा़फ ही नहीं किया, बल्कि राजद प्रमुख के बयान का जवाब भी दिया कि यह सिंगल बेंच का फैसला था. इसके खिला़फ सुप्रीम कोर्ट में नहीं, हाईकोर्ट की डबल बेंच में ही अपील की जा सकती है. सरकार को इसकी सलाह दी गई है.
लेकिन, इस पूरे प्रकरण में भाजपा प्राय: खामोश ही रही. यह राजनीतिक शैली राज्य की सत्ता की भावी दावेदार भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकती है, ऐसा राजनीति के जानकारों का मानना है. जब बिहार में सरकारी सेवाओं में प्रोन्नति में आरक्षण का निर्णय लिया गया था, तो उन दिनों राज्य में राजनीतिक जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार थी. इस या ऐसे सभी निर्णयों में भाजपा बराबर की हिस्सेदार है. विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनाव में जिन सामाजिक समूहों का आक्रामक राजनीतिक सहयोग भाजपा को सत्ता तक पहुंचा सकता है, उनमें आरक्षण को लेकर विरोध का भाव है. ऐसे में सत्ता के दरवाजे पर खड़ी कोई राजनीतिक पार्टी भला ऐसे अवसरों को क्यों खोना चाहेगी! कहने का आशय यह कि प्रोन्नति में आरक्षण के मसले पर भाजपा की ठंडी प्रतिक्रिया का राजनीतिक निहितार्थ वही है, जो राजद प्रमुख की सरकार को मुखर नसीहत और उस पर नीतीश सरकार की सक्रियता का है. दोनों तऱफ अपनी-अपनी राजनीतिक रणनीति है.
राजनीति में दलित कार्ड महत्वपूर्ण घटक है और चुनाव काल में इसके क्या कहने! बिहार की दलित राजनीति का हाल-हाल तक रामविलास पासवान सबसे ज्ञात चेहरे रहे हैं. 2014 के संसदीय चुनाव के पहले तक वह जनता परिवार के साथ रहे, लेकिन अब एनडीए के साथ हैं और पानी पी-पीकर जनता परिवार (अपने पुराने राजनीतिक सहयात्री) को कोस रहे हैं. लेकिन हाल के महीने में बिहार की दलित राजनीति का सबसे लुभावना चेहरा जीतन राम मांझी का दिखने लगा है और फिलहाल उनकी भाजपा से काफी छनती है. यानी बिहार की दलित राजनीति के दिग्गज चेहरे भाजपा के साथ हैं और इस मोर्चे पर जनता परिवार के घटक राजद और जद (यू) कमजोर ही नहीं, निरुपाय-से हैं. इस राजनीतिक निरुपायता से निपटने की कोशिश में ही राजद प्रमुख कभी जीतन राम मांझी की ओर देखते हैं और नीतीश कुमार दलित-महादलित से जुड़े मसले पर तुरंत सक्रिय हो जाते हैं.
राजद प्रमुख उन दिनों भी जीतन राम मांझी की प्रशंसा करते रहे थे, जिन दिनों नीतीश कुमार अपने मांझी विरोधी अभियान को अधिकाधिक धारदार बना रहे थे. लालू प्रसाद अब भी जीतन राम मांझी के प्रति कठोर कतई नहीं दिखना चाहते हैं. उनके इस रुख को राजद की भावी राजनीति की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. जीतन राम मांझी ने भी राजद प्रमुख से बैर-भाव का कभी प्रदर्शन नहीं किया. वह बार-बार कहते हैं कि लालू जी यदि नीतीश कुमार से अलग हो जाएं, तो हम उनके साथ जा सकते हैं. यानी दोनों नेता (लालू-मांझी) एक पतली पगडंडी खुली छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन, नीतीश कुमार के पास इस मोर्चे पर विकल्प बड़े सीमित बच रहे हैं. हालांकि, उन्होंने अपने शासनकाल में महादलित-दलित उत्थान के कार्यक्रमों को गंभीरता से लागू करके अपना एक सुनिश्चित सामाजिक समर्थक आधार बनाया था. यह सामाजिक समूह गत संसदीय चुनाव तक उनके साथ दिखा है. एससी-एसटी सरकारी सेवकों को प्रोन्नति में आरक्षण के सवाल पर उच्च न्यायालय से राज्य सरकार को यदि आने वाले कुछ हफ्तों में राहत मिलती है, तो वह नीतीश कुमार की राजनीति को नई ताकत देगी. लेकिन, यह कहना तो संभव नहीं है कि अदालत क्या करेगी.

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