I. विस्मृति का भूगोल
अतीत अब याद नहीं—
धीरे-धीरे
संख्या हो गया है।
लोग लालटेन की लौ के पास
अपने नाम को गर्म रखते थे।
अब वे
ठंडे कमरों में हैं—
बिना आवाज़।
देह काँपती थी।
अब आत्मा
हल्की है।
हमने आँखें
एक उजले दरवाज़े की देहरी पर रख दीं—
भीतर देखा
तो अँधेरा नहीं गया था,
हम ही छूट गए थे।
II. उधार का मनुष्य
यह कुआँ—
पानी नहीं,
प्यास रखता है।
बिना औज़ारों के
हम थे—
जैसे हवा।
हमारी बात
किसी अनुमति से नहीं गुजरती थी।
अब हमारा वैश्विक होना
उस नदी जैसा है
जो समुद्र में
नमक पाती है,
नाम खो देती है।
हम बुद्धि भेजते हैं।
घर में
विवेक घटता है।
III. शब्दावली का अवसान
सहयोग—
कभी कंधे पर रखा हाथ था।
अब एक खिड़की है
जिससे देखा जाता है।
जब कहीं
कोई तय करता है
कि आवाज़ मान्य है या नहीं—
भाषा घर छोड़ देती है।
नरम कानून
धीमा ज़हर है—
तर्क में ठंड भरता हुआ।
जो रोया
उसका नाम गया।
जो चीखा
संख्या हो गया।
IV. उत्सव
हम रोशनी जलाते हैं—
राख देखे बिना।
खुशी उधार है।
ज्ञान भी।
आज़ादी—
एक खिड़की
जो बाहर से बंद है।
दुनिया हमें
तौलती है।
V. मौन का व्याकरण
यह विरोध नहीं—
एक शोक है।
वे तार
अब भी हैं—
ध्वनि नहीं।
हम दूर आ गए हैं—
इतना
कि भीतर का वह कोना
अजनबी है
जहाँ “नहीं”
अपने आप आता था।
अब शब्द
आने से पहले
देखा जाता है,
और लौट जाता है।
हम आज़ाद हैं—
जैसे कहा हुआ वाक्य
जो सुना नहीं गया।
x = वह जो था
y = वह जो है
बीच में
कोई चिन्ह नहीं—
सिर्फ़ खाली जगह
जो बढ़ती है
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