ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ

१. पूछ रही है बेटी

पूछ रही है बेटी

अक्सर क्या पढ़ती रहतीं हैं दादी

क्या कुछ लिखती रहती हैं

पूछ रही थी बेटी

इस सवाल का उत्तर देने के लिए

कोई भाषा नहीं है मेरे पास

माँ की अधीरता है या

इस वाक्य में भी मैं नहीं कह पाया

पूरी बात गोया वह बहुत

मुत्मइन भी रहतीं हैं अपने आप से

वह खोज रहीं थीं कुछ किताब में

तो मिली लोकगीत की चार पंक्तियां

वह फेकी जा रही हर चीज़

एक बार और देखतीं हैं

कागज और किताबें तो

ज़रूर

न जाने कौनसा दस्तावेज

गुम हो गया उनका

जिससे सीखा उन्होंने सहेजना अब

हर टुकड़ा

या उन्होंने खो दिया पिता को

हो सकता हो कोई कविता मिल जाए

आया यह अहसास इस पल

पिता को दुनिया छोड़ते समय

सबसे ज्यादा दुख हुआ होगा

माँ के साथ छूट जाने का

जो तब भी सहेज रही होगी

हर चीज़ को

दस्तावेज की तरह

— ब्रज श्रीवास्तव

२. #आजादी

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बादल से छूटकर

एक बूँद आजाद होती है

एक बीज आजाद होता है

प्रस्फुटित होकर

एक हर्फ लिखकर आजाद होती है कलम

एक रुदन करके

जातक आजाद होता है

एक स्वर आजाद होता है

फूटकर कंठ से

हारमोनियम के

एक आवाज

आजाद होती है

सच को जोर से बोलकर

🛑

३. दिन का झोला

सुबह मैं खाली दिन लेकर जागा था

सबसे पहले मैंने इसमें

दो किलोमीटर की टहल डाली

फिर पौधों में सींचा पानी

दिन का पैकेट फिर भी खाली था

बहुत दूर बैठे मित्रों से कीं बातें

टीवी पर देखे

इतने सारे शो

रिक्त सा ही रहा दिन का झोला

शुभकामनाएं, शुभकामनाएं

से मन बहलाया

सोशल मीडिया पर

हर रोज़ की तरह

एक छोटी लड़की थी

कक्षा छह में पढ़ने वाली

जिसका मैं शिक्षक रहा आया

सुबह से बुला रही थी

आज ईद पर अपने घर मुझे

दो तीन दोस्तों के घर

गया भी

इतना सब कुछ करके

लग ही रहा था दिन खाली खाली

फिर फोन आ गया उसी लड़की का

मैं चला गया

उसके घर

इतनी छोटी दो बच्चियां

कितनी खुश थीं अहा

लौट आया मैं

और अब नहीं लग रहा था

खाली खाली

पूरा भरा था दिन का झोला।

४. सुई

घने रिश्ते

अगर व्यवहार करने लगें

अजनबियों की तरह

सुई चुभती ही है

एहसास के बदन पर।

— ब्रज श्रीवास्तव

५. …की तरह

अंतरिक्ष की तरह

खुलापन तो है

अंतरिक्ष की तरह

नीरवता नहीं है

बातचीत हो तो रही हैं

मगर स्वप्न में हुई

बातचीत की तरह

विस्मरण में समा जाती है

इतनी शर्तों से चल रहे हैं रिश्ते

जो हो रहे हैं बोझिल

शून्य सबसे महत्वपूर्ण पद है

इन दिनों

उधर अंक आना चाहते हैं

दिनचर्या के पेज पर

चाहता हूं जीवन को

भाषा से समझूं

मगर गणित आ ही जाता है

कुछ तस्वीरें कहीं नहीं हैं

मगर बन रहीं होतीं हैं स्मृति के कैमरे में।

— ब्रज श्रीवास्तव

टिप्पणियाँ एवं समीक्षाएँ

अजय कुमार श्रीवास्तव की टिप्पणी

ब्रज जी की पाँचों कविताएँ पाँच अलग-अलग रंग हैं।

  1. पूछ रही है बेटी – तीन पीढ़ियों को जोड़ती, माँ के एकाकीपन और सहेजने की आदत को बहुत आत्मीयता से पकड़ती कविता। शीर्षक में जिज्ञासा है। सुझाव: बेटी की भूमिका शीर्षक के बाद और विस्तार माँगती है।

  2. आजादी – अच्छी वैचारिक कविता। आजादी को ‘एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना’ के रूप में देखना नया है। बूँद, बीज, स्वर – सबके उदाहरण सोचने पर मजबूर करते हैं।

  3. दिन का झोला – दिनचर्या का सबसे जीवंत चित्रण। सुबह की सैर से लेकर ईद पर छात्रा के घर जाने तक, दिन कैसे भरता है – बहुत सहजता से कहा। यही कविता आज के युवा पाठक को सबसे ज्यादा जोड़ेगी।

  4. घने रिश्ते – कम शब्दों में बड़ी बात। कवि के कद की कविता। रिश्तों में आई अजनबीपन की पीड़ा को सुई की तरह चुभोती है।

  5. की तरह – इस पखवाड़े की सबसे परिपक्व कविता। रिश्तों में खुलेपन के साथ बढ़ते शोर, कंडीशनल होते संबंध और अंत में – जो तस्वीर खिंची ही नहीं, वही सबसे सुंदर है – यह समापन बहुत यादगार बन पड़ा है।

विशेष – मेरे बैरोमीटर से: ब्रज जी की ये पाँच कविताएँ पाँच कक्षाओं जैसी हैं। बेटी पूछ रही है – प्राथमिक स्तर के नवोदित पाठकों के लिए आत्मीयता हेतु, आजादी – माध्यमिक स्तर के लिए वैचारिक, दिन का झोला – स्नातक युवा के लिए जो जीवन में कुछ खोज रहा है, चौथी – परिपक्व गृहस्थ के लिए और की तरह – शोधार्थी / पूर्ण परिपक्व पाठक के लिए। हर पाठक अपनी पसंद से अपनी ऊँचाई नाप सकता है।

— अजय कुमार श्रीवास्तव

हरगोविंद पुरी की टिप्पणी

ब्रज श्रीवास्तव साहित्य की दुनिया में जाना माना नाम है। उनकी कविताओं में हमारे समय की विडंबनाओं और चुनौतियों को स्वीकार किया गया है। यह समय निश्चित रूप से हमें बहुत सारे विषय दे रहा है और संवाद के लिए बहुत अधिक मंच। आज सोशल मीडिया ने एक अलग तरह की क्रांति को जन्म दिया है। और हर कोई अपनी बात अपने तरीके से सबके सामने रख रहा है। ब्रज श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति साहित्य में दर्ज कराई है। इतना ही नहीं उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण कवियों को अनुवाद के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत किया है।

छोटे से कस्बे में रहकर और पूरी दुनिया की समस्याओं को देखना और उन पर लिखना और जो कुछ हमारे जीवन में राजनीतिक बदलाव से समस्याएं और कई चीजे एक साथ उत्पन्न हो रही है और जिनका प्रभाव आम आदमी पर पड़ रहा है उन्होंने हर उसे बात को अपनी कविता में लिखा है।

ब्रज की कविताएं राजनीतिक चेतना की कविता तो है ही साथ में घर परिवार रिश्ते दोस्त और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से कविता में निभाया है। निश्चित रूप से उनकी कविताएं बहस मांगती है और एक जरूरी हस्तक्षेप उनकी कविताओं ने हिंदी साहित्य में किया है।

ब्रज की कविताएं मुक्ति की प्रार्थनाएं

यह प्रार्थना आजादी की

यह प्रार्थना समाज में सद्भाव और अपने माता-पिता बुजुर्गों के लिए है।

बहुत बड़ा कैनवास और उस पर बहुत सारे रंग जिस तरह फैलते हैं इस प्रकार से ब्रज श्रीवास्तव की कविताएं हमें एक नया धरातल देती हैं। उन्हें खूब-खूब शुभकामनाएं।

— हरगोविंद पुरी, अशोकनगर, मध्य प्रदेश

डॉ. जीवन एस. रजक की टिप्पणी

ब्रज भाईसाब साधारण जीवन के असाधारण अर्थों वाले कवि हैं। उनकी कविताएँ जीवन की उन सूक्ष्म अनुभूतियों का काव्यात्मक दस्तावेज हैं, जिन्हें हम प्रतिदिन जीते तो हैं, किंतु प्रायः अनुभव की गहराइयों में उतरकर देख नहीं पाते। उनकी कविता साधारण जीवन के भीतर छिपी असाधारण संवेदनाओं को खोज निकालती है। वे अपने शब्दों से दृश्यों के भीतर मौन पड़े अर्थों को जगाते हैं।

‘पूछ रही है बेटी’ में माँ का कागजों और स्मृतियों को सहेजना वस्तुतः जीवन के बिखरते संबंधों और अनुपस्थित पिता की उपस्थिति को बचाए रखने का मार्मिक उपक्रम है। ‘आजादी’ में स्वतंत्रता अस्तित्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाती है। ‘दिन का झोला’ जीवन का एक विलक्षण दर्शन प्रस्तुत करती है, जिसमे दिन की सार्थकता जीवन में प्रसन्नता का कारण बनने में निहित दिखाई देती है। वहीं ‘घने रिश्ते’ और ‘की तरह’ आधुनिक मनुष्य की उस त्रासदी को उद्घाटित करती हैं, जिसमे आत्मीयता का स्पंदन क्षीण होता जा रहा है।

ब्रज भाईसाब संवेदनाओं का अलंकरण नहीं करते, बल्कि उनका अनावरण करते हैं। उनकी कविता में भाषा की चमत्कारिकता से अधिक अनुभूति की प्रामाणिकता है। वस्तुतः उनकी कविताएँ एक गहरा दार्शनिक प्रश्न उपस्थित करती हैं कि मनुष्य के जीवन में कितनी मनुष्यता बची है। उनकी कविता अपने ही जीवन को नए सिरे से पढ़ने की दृष्टि प्रदान करती है।

इतने श्रेष्ठ, संवेदनशील और मनुष्यता के मर्म को स्पर्श करने वाले काव्य-सृजन के लिए ब्रज भाईसाब को अनंत मंगलकामनाएँ।

— डॉ. जीवन एस. रजक, भोपाल

वशिष्ठ मुकेश की टिप्पणी

  1. साधारण घरेलू गतिविधियों में गहरी संवेदना।

  2. वस्तुओं को स्मृति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना।

  3. प्रश्न और संभावनाओं के माध्यम से अर्थ के पर्दे खोलना।

उपरोक्त विशेषताएँ कविता में परिलक्षित होती हैं। पाँचों कविताओं में भावनात्मक गहराई और स्मृति के सूक्ष्म चित्रण की दृष्टि से सबसे सशक्त रचनाएँ हैं।

— वशिष्ठ मुकेश, विदिशा

आशीष मोहन की टिप्पणी

ब्रज श्रीवास्तव समकालीन हिंदी कविता के एक अत्यंत संवेदनशील और विचारशील हस्ताक्षर हैं। उनकी कविताएँ भागदौड़ भरी इस दुनिया में कुछ देर ठहरकर जीवन के छोटे-छोटे पलों, मानवीय रिश्तों की नाजुक डोर, स्मृतियों और अकेलेपन को बहुत गहराई से टटोलती हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी पाँचों कविताएँ जीवन के अलग-अलग रंगों को खूबसूरती के साथ प्रदर्शित करती हैं।

  • “पूछ रही है बेटी” यह कविता पीढ़ी दर पीढ़ी के अंतर और विस्मृति के बीच पुरानी पीढ़ी के सहेजने के स्वभाव को बहुत खूबसूरती से उघाड़ती है। एक बेटी का अपनी दादी के बारे में पूछना और कवि का यह अहसास करना कि पिता के जाने के बाद माँ ने हर छोटी चीज़ को किसी दस्तावेज़ की तरह सहेजा है, कविता को बेहद मार्मिक बना देता है। (शिल्प के स्तर पर कुछ जगहों पर वाक्य-विन्यास थोड़ा अस्पष्ट हो सकता है, जिससे अर्थ तक पहुँचने के लिए दोबारा पढ़ना पड़ता है।)

  • “आजादी” कविता आज़ादी जैसी बड़ी अवधारणा को बेहद सूक्ष्म और प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से समझाती है। बादल से बूँद का छूटना, बीज का प्रस्फुटित होना, कलम से हर्फ़ का निकलना और कंठ से स्वर का फूटना—ये सभी बिंब स्वतंत्रता को बड़ी सरलता से परिभाषित करते हैं।

  • “दिन का झोला” इस क्रम की सबसे प्रभावशाली कविताओं में से एक है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, डिजिटल युग की खोखली शुभकामनाओं और सोशल मीडिया के कृत्रिम बंधनों के बीच, एक छोटी बच्ची के घर ईद पर जाना और उसका स्नेह पाना पूरे दिन की थकान और अकेलेपन को दूर कर देता है।

  • “सुई” (घने रिश्ते): महज पाँच पंक्तियों की लघु कविता हाइकु जैसी संक्षिप्त होने के बावजूद बहुत गहरी बात कह जाती है। जब बहुत करीबी या घनिष्ठ रिश्ते अजब-अजब शर्तों या औपचारिकताओं के साथ पेश आने लगते हैं, तो वह मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत कष्टदायक होता है।

  • “की तरह” कविता समकालीन रिश्तों के जटिल, यांत्रिक और शर्तों से बंधे स्वरूप को सामने रखती है। रिश्तों में खुलापन तो है, पर वह अंतरिक्ष की नीरवता जैसा ठंडा खुलापन है।

ब्रज श्रीवास्तव जी की इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी सहज ईमानदारी और सूक्ष्म अवलोकन है। कुल मिलाकर, ये कविताएँ पाठक को आत्ममंथन करने और अपने आस-पास के रिश्तों को नए सिरे से देखने के लिए मजबूर करती हैं।

— आशीष मोहन, छिंदवाड़ा

आशीष दशोत्तर की टिप्पणी

ब्रज श्रीवास्तव गहरी संवेदना के कवि हैं। उनके विषय स्वाभाविकता के साथ आते हैं। इन कविताओं में भी उनका अपना परिवेश नज़र आता है और वे उस परिवेश के माध्यम से बहुत व्यापक फ़लक पर अपनी बात कहते हैं। इन कविताओं पर अजय जी की टिप्पणी वैसी ही है जैसी एक श्रीवास्तव की कविताओं पर दूसरे श्रीवास्तव की होना चाहिए। निष्पक्ष और बहुत सूक्ष्म टिप्पणी की गई है। रचनाकार और समीक्षक दोनों को बधाई। सत्र संचालक और अध्यक्ष मंडल को भी शुभकामनाएं।

— आशीष दशोत्तर, रतलाम

मिथिलेश राय की टिप्पणी

ब्रज सर की कविताओं का मैं नियमित पाठक रहा हूँ। आपकी कविता दूसरे अन्य समकालीन कवियों से अलग आस्वाद रचती है। भाषा की सहजता, और उसका टटकापन ही उसमें पाठक की रुचि व उत्सुकता को बल देता है। आप आम जीवन के छोटे-छोटे अनेक भाव, घटना, या दृश्यों से कविता रचते हैं। कविता में सूक्ष्म सामाजिक राजनीतिक बोध को रखते हुए आप बहुत सजग दिख पड़ते हैं।

आज के समय में सबसे अधिक जो मुश्किल है, वह समय के सच को सहेजना है और उसके लिए जमीन लगातार तैयार करना है। ब्रज सर पाठक को हताश नहीं होने देते, बल्कि एक कदम बढ़ाकर उसका हाथ थाम लेते हैं। आपकी कविता में कहन मुहावरा भी है और बिंब भी है। उसमें एक दृश्य भी है और कहन का नया अंदाज भी है।

— मिथिलेश राय, शहडोल

वीरेन्द्र कुमार जैन की टिप्पणी

ब्रज जी की सभी कविताएं बेहतर है, मुझे सबसे अधिक जिन दो कविताओं ने प्रभावित किया है वो हैं:

  • ‘पूछ रही है बेटी’ – यह कविता पारिवारिक संबंधों, यादों के खोने के डर, और माँ के एकाकीपन व अतीत से जुड़ाव को बेहद भावुकता और सूक्ष्मता के साथ रेखांकित करती है। ब्रज जी ने एक मासूम बच्चे की जिज्ञासा के माध्यम से बुजुर्गों की मानसिक स्थिति और उनके जीवन के खालीपन को उकेरा है।

  • ‘घने रिश्ते’ – छोटी, सटीक और चुभन वाली कविता। जब अपने बहुत करीबी अजनबियों जैसा बर्ताव करने लगते हैं, तो जो दर्द होता है, उसे कवि ने “सुई चुभती ही है एहसास के बदन पर” जैसे अद्भुत बिंब से व्यक्त किया है। कम शब्दों में रिश्तों की कड़वाहट और आघात को बहुत ही प्रभावी ढंग से कहा गया है।

— वीरेन्द्र कुमार जैन, विदिशा

बबीता गुप्ता की टिप्पणी

रिश्तों के समीकरण रेखांकित करती कविता ‘की तरह’.. संवेदनहीन होते रिश्तों में मोल-तोल का होना.. खुलापन में खोखलापन.. अंतरद्वंद पैदा करता है… मौन आग्रह है कविमन का जुड़ाव रखने का.. भाव नहीं, भावनाओं में भाग नहीं, गुणा करने का… स्मृति के कैमरे में तस्वीरों का होना.. अपना आस-पास बनी आभासी दुनिया समेटता… शून्य की महत्ता.. द्विअर्थी..

दिन का झोला में मूक संदेश भाईचारे का, जात-पात से परे आत्मीय बंधन का… आज ईद पर अपने घर पर आने का बुलावा… ये दो पंक्तियाँ न केवल मानवीय मूल्यों को समझाती हैं बल्कि शिक्षक के व्यक्तित्व के साथ दायित्वबोध भी करवाती हैं। सभी कविताएं एक से बढ़कर एक हैं। बहुत-बहुत बधाई, भाई!

— बबीता गुप्ता, बिलासपुर

रश्मि वैभव गर्ग की टिप्पणी

आज का मंच ब्रज श्रीवास्तव जी की बेहतरीन कविताओं और अजय जी की शानदार प्रस्तुति से सुशोभित है। कविताओं के भावों का सूक्ष्म विश्लेषण और समीक्षा का बेबाक अंदाज़ साहित्यिक आयोजन को विशेष बना रहा है। दोनों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

— रश्मि वैभव गर्ग, कोटा

प्रमोद चौहान की टिप्पणी

इन पांचों कविताओं में घर और दुनिया दोनों एक साथ बोलते हैं। ‘पूछ रही बेटी’ सवालों से दिल को छूती है, ‘आजादी’ का अर्थ सिर्फ इतिहास नहीं, रोज़ के जीवन में खोजती है। ‘दिन का झोला’ और ‘घने रिश्ते’ ‘की तरह’ जैसी कविताएँ बहुत सादे शब्दों में बड़ी बात कह देती हैं—थकान, अपनापन और रिश्तों की गहराई। भाषा सरल है पर लेखक के भाव बहुत ही गहरे हैं, इसलिए हर पाठक को कविताएँ अपनी सी लगती हैं। सुंदर कलाबाजी शब्दों और भावों को पिरोने के लिए लेखक महोदय जी को अनन्त शुभकामनाएं।

— प्रमोद चौहान, कुरवाई

अर्चना नायडू की टिप्पणी

ब्रज जी और उनका संवेदनशील संसार। धरती से जुड़े कवि। जिनकी कविताएँ हर पढ़ने वाले के साथ संजीदगी से धड़कती रहती हैं। जिनकी लेखनी में ऐसा पानी है जो बादलों से नहीं बल्कि माँ, बेटी और रिश्तों के आंसुओं से बरसता है पर दिखता नहीं। उम्दा रचनाएँ हैं, कुछ भींगी, कुछ गीली। बस… रचनाशीलता का संसार उष्ण रहे।

— अर्चना नायडू, भोपाल

मीरा गौतम की टिप्पणी

ब्रज श्रीवास्तव की इन कविताओं से गुजरते हुए… ऐसा महसूस होता है जैसे शब्दों के इन टुकड़ों में हमने जीवन का पूरा दृश्य ही देख लिया है। ये कविताएं उस पंछी की मानिंद हैं जिसके पंख सच के हौसलों से निर्मित हुए हैं।

  • ‘पूछ रही है बेटी’ में जिज्ञासा उस पोती की है जो दादी की व्यस्ततम दिनचर्या को समझना चाहती है। कविता में तीन पीढ़ियाँ—पोती, बेटा और माँ—एक दूसरे की मनःस्थितियों को समान स्तर पर जी रही हैं। यह परिवार के सह-अस्तित्व का सुंदर चित्रण है।

  • ‘आज़ादी’ कविता अपने लघु कलेवर में ब्रह्मांड को नाप रही है। बादल और बूँद, बीज का प्रस्फुटन, शब्दों का क़लम से निःसृत होना, माँ के गर्भ से शिशु का दुनिया में आना, हारमोनियम से निकलकर सुरों की ध्वनियों का वायुमंडल में प्रसार और सच को जोरदार शब्दों में बेबाकी से बोल देना—यह आज़ादी के नैसर्गिक रूप को हमारे सामने रख रहा है।

  • ‘दिन का झोला’ कविता कवि की सुबह से शाम तक की रस्मी दिनचर्या को सामने रख रही है। नन्हीं छात्रा के बुलावे पर ईद मनाने उसके घर जाना और उस बच्ची की ख़ुशी को महसूस करके प्रफुल्लित मन से घर लौटना—यह सामाजिक सौहार्द का एक शक्तिशाली दृष्टांत है।

  • ‘घने रिश्ते’ सघन रिश्तों में अजनबीपन के व्यवहार का कड़वा यथार्थ है। कवि ने मोहभंग के इस दर्द की तुलना सुई की चुभन के तीखे दर्द से की है।

  • ‘की तरह’ यह कविता कवि का आत्मविश्लेषण है जहाँ जीवन के शून्य को स्मृतियां ही भरा करती हैं। जीवन महज़ गणित नहीं है, इस रिक्ति को भरने के लिए संवेदना और अनुभव का रसायन चाहिए ही चाहिए।

— मीरा गौतम, चंडीगढ़

आनंद सौरभ उपाध्याय की टिप्पणी

आ. ब्रज जी की सभी कविताएं बहुत पसंद आईं। कविताएँ किसी बड़े घोषणापत्र या वैचारिक नारे की तरह नहीं आतीं, बल्कि धीरे-धीरे, लगभग फुसफुसाहट में, रोज़मर्रा के जीवन, स्मृति, रिश्तों और अस्तित्व की बारीक परतों को छूती हैं। भाषा सरल है, पर भाव गहरा। पाठक जल्दी जुड़ जाता है। आपकी कविताएं शोर नहीं मचातीं, पर लंबे समय तक मन में गूँजती रहती हैं।

— आनंद सौरभ उपाध्याय, विदिशा

सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी की टिप्पणी

इधर जो लोग सधे हुए लहजे में कविता लिख रहे हैं और भाषाधिक्य या अतिकथन या सपाट विवरण की काट-छाँट करके अपनी बात कहते हैं, उनमें ब्रज जी अग्रगण्य हैं। विभिन्न मनःस्थितियाँ उनके यहाँ एक ताज़गी-भरी अभिव्यक्ति पाती हैं। जो कथ्य जितना विस्तार या शब्द-संयम चाहता है, उससे अधिक उनके यहाँ कुछ भी कदापि नहीं मिलेगा। अच्छी कविता कई बार अपनी बुनावट से असर डालती है। ब्रज जी की आज की कविताओं में हमारा साक्षात्कार एक सावधान कवि से होता है जो अपनी बात व्यक्त या प्रस्तुत की जा रही जीवन-स्थितियों के बारे में तराशे हुए अंदाज़ में करता है।

— सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी, लखनऊ

अनिता रश्मि की टिप्पणी

आज के आगाज के लिए बहुत बधाई ब्रज जी, अजय जी। कविताओं के रंगोरूप भी आगाज के योग्य हैं। सरल, सहज ढंग से बड़े और उल्लेखनीय सवालों से मुठभेड करती है।

  • बेटी जब पूछती है, दादी क्या पढ़ती-लिखती है तो जैसे जागरूक पुरानी पीढ़ी का खाका खींचती है।

  • आजादी की नई परिभाषा बड़े रोचक अंदाज में दूसरी कविता सामने लाती है।

  • दिन के झोले में दिनचर्या ही नहीं, समाजचर्या भी है। धर्म-समुदाय के परे एक निश्छल मिलाप से संपन्न होते मनुष्य की बात।

  • सारी रचनाएँ उद्देश्यपरक, मनुष्य मन की गुत्थियां खोलती हुईं बड़ी बात परोसती हैं… व्यष्टि से समष्टि की ओर बहती हैं।

— अनिता रश्मि, रांची

त्रिलोक महावर की टिप्पणी

ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ जीवन की अनुभूतियों का सजीव चित्रण करती हैं। उनकी कविताओं में संवेदना की गहराई है और शब्द अपने अर्थों की अनेक परतें खोलते हैं। ‘पूछ रही है बेटी’ जीवन के संबंधों का मार्मिक बयान है। ‘आजादी’ में स्वतंत्रता की आकांक्षा मुखर होकर सामने आती है, जबकि ‘दिन का झोला’ जीवन-दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए है। ब्रज श्रीवास्तव जी को अच्छी और संवेदनशील कविताओं के लिए हार्दिक बधाई।

— त्रिलोक महावर, रायपुर

अजय श्रीवास्तव ‘अजेय’ की टिप्पणी

ब्रज जी एक हरफ़नमौला साहित्यकार हैं—चाहे गद्य की बात हो, संस्मरण, यात्रा वर्णन, गायकी—जितनी विधाएँ हैं सब में सिद्धहस्त हैं। बात कविताओं की हो तो ब्रज जी की कविताएँ शोर नहीं मचाती हैं—धीरे से फुसफुसाते, दुलराते, सहलाते अपनी बात मुकम्मल तौर पर पहुँचा जाती हैं।

  • ‘पूछ रही है बेटी’—न जाने कौन सा दस्तावेज गुम हो गया उनका… रिक्तता का एहसास।

  • ‘आज़ादी’—आवाज़ तब ही आज़ाद होती है जब सच बोलती है।

  • ‘झोला’—हर एक अपना झोला कितना ख़ाली कितना भरा और कैसे भरा।

  • और अंत में—”तस्वीरें कहीं नहीं—मगर बन रही स्मृति के कैमरे में।” कविताएँ—कविताएँ जैसी उम्दा और बेहद उम्दा।

मित्रों, ब्रज श्रीवास्तव की कविताएं मुझे आज तक गढ़ी हुई कविताएं नहीं लगीं। साहित्य आलोचना की भाषा में आप इसे अनगढ़ भी कह सकते हैं। लेकिन मेरा तात्पर्य यह है कि आजकल हम देख रहे हैं कि कविताओं के लिए भाषा, शब्द, बिंब, प्रतीक और बहुत सारे ऐसे विधान चुने जाते हैं जिनसे कविता वास्तव में कविता नहीं लगती; ऐसा लगता है जैसे कवि जानबूझकर कोई प्रयास कर रहा हो। ब्रज श्रीवास्तव अपने आसपास से बहुत सारी चीजें लेते हैं और उसमें उनका स्व शामिल होता है। वे केवल स्थिति पर या दृश्य पर टिप्पणी नहीं करते बल्कि अपने आप को वह कविता में कहीं ना कहीं इंवॉल्व करते हैं। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता है।

— अजय श्रीवास्तव ‘अजेय’, झाँसी

(साथ ही शरद कोकास, दुर्ग का यह मंतव्य भी रेखांकित करने योग्य है कि कवि का अपने परिवेश व स्व से जुड़ना ही उनकी रचनाओं को जीवंत बनाता है।)

प्रदीप मिश्र की टिप्पणी

ब्रज भाई समकालीन हिन्दी कविता का एक परिचित नाम है। इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उनसे पाठक को कुछ अतिरिक्त चाहिए। अब यह वे अपनी भाषा में, भाव में या कौशल में हासिल करें। जहाँ भी करें लेकिन कविता के नैसर्गिक आस्वाद की रक्षा करते हुए करें।

  • पहली कविता में निज की व्याप्ति माँ के माध्यम से सार्वभौमिक होती है।

  • ‘आजादी’ कविता बहुत सुंदर और समकाल के कौशल में कवि की प्रवीणता को प्रमाणित करती है।

  • ‘दिन का झोला’ सायास कविता है, जो हिंदी कविता के बहुपरिचित मुहावरे में प्रवेश करती हुई प्रतीत होती है।

  • ‘घने रिश्ते’ एक सामान्य कथ्य का सुंदर निर्वहन कर रही है।

  • ‘की तरह’ कविता हमारे समय की संस्कृति की गाँठ खोलती महत्वपूर्ण कविता है। “कुछ तस्वीरें कहीं नहीं हैं मगर स्मृति के कैमरे में बन रहीं होतीं हैं।”—कविता को एक संवेदनशील फलक प्रदान करती है।

कुल मिलाकर, ये कविताएँ उसी कड़ी की ज़रूरी कविताएँ हैं। कवि को हार्दिक बधाई। अजय भाई का ऑडिट रिपोर्ट उनकी तीक्ष्ण और जरूरी दृष्टि को बताता है, लेकिन आलोचना और टिप्पणी भी एक रचनात्मक कार्य है। आयोजन से जुड़े सभी साथियों का आभार। धन्यवाद 🙏

— प्रदीप मिश्र, इंदौर

ज्योति खरे की टिप्पणी

जीवन, समाज और घर में जो कुछ घटता है उसे महसूसना फिर व्यक्त करना सहज नहीं है। ब्रज जी इसे महसूस करने के माहिर हैं; दरअसल इनकी अनुभूतियाँ दूर तक फैले कैनवास पर रंग भरने को लालायित रहती हैं, और ये रंग भरते भी हैं। ब्रज जी का इस तरह से रंग भरना कविता को जन्म देता है। ब्रज जी की कविताएं विषय की गहरी पड़ताल करती हैं और सहजता से व्यक्त होती हुई पाठकों को प्रभावित करती हैं। आज की कविताएं इस बात का प्रमाण हैं।

— ज्योति खरे, छिंदवाड़ा

खुदेज़ा खान की टिप्पणी

ब्रज जी की दो कविताओं ‘आज़ादी’ और ‘दिन का झोला’ ने मेरा विशेष ध्यान खींचा। आज़ादी भी कितनी तरह की होती है, स्वतंत्र होने और स्वछंद होने में फ़र्क है। स्वतंत्र होकर भी स्वछंद न होना, नैतिक मूल्यों के साथ खड़े होना है। सच का साथ देना सही मायनों में आज़ाद रहकर निर्भीक होना है। ‘दिन का झोला’ वो ख़ाली दिल है जिसका भरा जाना तभी संभव है जब तक कोई गहरी संवेदना, अपनत्व भरा भाव या निश्छल प्रेम भीतरी मर्म को न छू ले। अन्य कविताएं भी मानवीय सरोकारों की कविताएं हैं। ब्रज जी भावनाओं को आत्मसात कर लिखने वाले कवि हैं। इसलिए इनकी कविताएं बनावटी कम, सहज अनुभवों की मौलिक अभिव्यक्ति बनकर व्यक्त होती हैं। इसे विशेषता ही कहा जाना चाहिए।

— ख़ुदेजा खान, जगदलपुर

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