मैं कांशी राम जी को तबसे जनता था जब वह ‘मान्यवर’ नहीं बने थे. एक बहुत अच्छे इंसान थे और मेरे लिए वह सदा ऐसे ही रहे.उन दिनों उनके दिल में एक ही हसरत थी, जज्बा था, कुछ अनोखा, अद्वितीय करने का और बंधी बंधाई लीक से हट कर कुछ ‘ क्रांतिकारी कार्य’ करने का मन था. कांशी राम सिद्धांतवादी नहीं थे, व्यवहारिक सोच वाले व्यक्ति थे. गांव की स्वच्छ आबोहवा में पलने बढ़ने वाले कांशी राम स्कूल और कॉलेज तक अपनी जाति और वर्णप्रथा की जानकारी तक नहीं रखते थे. वह इतना भर जानते थे कि वह रामदासिया सिख परिवार की चमार जाति में जन्मे हैं और सैनिकों के परिवार से ताल्लुक रखते हैं. इस नाते वह धर्म और जाति बिरादरी को महत्त्व नहीं देते थे. उनके अनुसार सिख गुरुओं की शिक्षाएं अधिक समतावादी थीं और धर्म परिवर्तित चमारों को कम से कम सामाजिक उन्नति का अवसर तो देती थीं. इस नाते उनमें हीनभावना कभी पैदा नहीं हुई. इसी प्रकार सैनिकों के परिवार में जन्मे एक युवा सिख के रूप में पंजाब में स्कूल या कॉलेज में रहते हुए वह अपनी जाति के बारे में काफ़ी हद तक अनजान थे.उन्होंने 1956 में रोपड़ (वर्तमान रूपनगर) गवर्नमेंट कॉलेज से बीएससी की डिग्री हासिल की. इसलिए न तो स्कूल और न ही कॉलेज में जातियों और संप्रदायों के बीच के मतभेदों को उन्हें जानने का मौका मिला था.उनमें सहजता, सरलता और सादगी के सभी पुट मौजूद थे. धुर देहाती मासूमियत ऐसी कि एक बार मैंने देखा कि अपने आप को बारिश से बचाने के लिए लोहे के संदूक (जिसे पंजाबी में संदूकची कहते हैं) को सिर पर रखकर तेज़ क़दमों से भागते-हुए-से अपने ठिकाने की तरफ जा रहे हैं. मिलने पर जब मैंने उनसे इस बाबत पूछा तो उन्होंने बिना किसी संकोच के बताया था कि अपने सिर को बचाने का इससे बढ़िया और नायाब तरीका नहीं हो सकता. अपने गांव पृथीपुर बुंगा ( जिला रोपड़) में भी हम लोग बारिश से अपने सिर को बचाने के लिए बस्तों का इस्तेमाल किया करते थे. यह संदूकची ही तो आज मेरी संपत्ति है. यह घटना उस समय की है जब वह दिल्ली के रेहगड़पुरा ( करोलबाग़ के करीब) में एक छोटे से कमरे में रहते थे. उन दिनों मैं ‘दिनमान’ में काम करता था. वह दौर ऐसा था जब उनके पास वक़्त की किल्लत नहीं थी और वह मुझे बेहिचक अपने भविष्य की योजनाओं की जानकारी देते रहते थे. तब तक उनकी कोई संस्था वजूद में नहीं आयी थी लेकिन वह अपने मन की बात समान सोच वाले पुराने साथियों से बिना किसी लागलपेट और खटके किया करते थे. तब मैं भी उनके श्रोताओं में हुआ करता था.

कांशी राम (15 मार्च, 1934-9 अक्टूबर, 2006) ने अपने जीवन का यह विवरण मुझे खुद सुनाया था एक लंबी बैठक में. उस दिन उनके कमरे में हम दोनों ही थे. वह अपनी सोच वाली पार्टी के निर्माण में बहुत सक्रिय रहा करते थे. उम्र ज़्यादा नहीं थी, जोश और लक्ष्य आसमान छूने वाला था. हम दोनों हमेशा पंजाबी में बातचीत किया करते थे. मेरे लिए खुशी और संतोष की बात यह रही कि बहुजन समाज पार्टी का संस्थापक होने के नाते जब कांशी राम की व्यस्तता बहुत बढ़ गयी तब भी वह मुझसे हुमायूं रोड वाले निवास या गुरुद्वारा रकाबगंज रोड के ऑफिस में मिल लेते थे और मेरे लिए उनके पास खुला वक़्त भी रहता था. जब मैं दिनमान” छोड़ ‘संडे मेल’ में कार्यकारी संपादक बनकर चला गया तब तो हम लोग खूब मिलते थे, दिल्ली में भी और देशभर के उन तमाम स्थानों पर भी जहां वह बसपा का प्रचार प्रसार करने के लिए जाया करते थे. कभी हम दोनों विमान में साथ साथ सफर करते तो कभी हेलीकाप्टर में. उत्तर भारत में बसपा की जड़ें काफ़ी हद तक जम चुकी थीं लिहाज़ा वह दक्षिण में अपनी पार्टी को मज़बूत बनाने के लिए बहुत आतुर रहते थे. हैदराबाद, बंगलुरु और चेन्नई में मैं उनके कई कार्यक्रमों में उपस्थित रहा था. उनका हिंदी और पंजाबी के अलावा अंग्रेज़ी भाषा पर भी खासा अधिकार था. दक्षिण में वह जनमत को अंग्रेज़ी भाषा में संबोधित करते थे जिसका अनुवाद कोई दुभाषिया उस प्रान्त की भाषा में किया करता था.

क्षमा करें बीच में विषयान्तर हो गया. कांशी राम के साथ इतनी मुलाकातें थीं जिनके बारे में ज़्यादा खुलकर लिख पाना उचित नहीं होगा. फिर भी काफ़ी कुछ लिखने का प्रयास करूंगा कांशी राम के बारे में. उन्होंने अपने बचपन, पढ़ाई-लिखाई और पुणे में विस्फोटक अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला में नौकरी के बारे में बताया.तब उन्होंने पहली बार जातिगत भेदभाव का अनुभव किया था.’मुझे पहली बार पता चला (या बताया गया) कि मैं अनुसूचित जाति से हूं जिसे निम्न जाति माना जाता है.मेरे लिए यह बहुत बड़ा धक्का था. इस सदमे से उबरने के लिए मैंने उस जाति/ जातियों का उत्थान करने की कसम खाई. मैंने भीमराव अम्बेडकर की पुस्तक जाति का विनाश (एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट) पढ़ी जिसने मुझे सक्रिय सामाजिक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया. मैंने 1964 (जन्म 15 मार्च, 1934)) में नौकरी छोड़ दी. इसके बाद संघर्ष शुरू हुआ. नौकरी छोड़ने के बाद मैं अपने परिचितों, करीबियों और मित्रों से मिल कर अपने मन के विचार उनसे साझा किया करता था कि हम निम्न समझी जाने वाली जातियों को एकजुट होना होगा यानी अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति,दलित,शोषित, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों को एक साथ मिलकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़नी होगी. देश में हम लोगों की संख्या तथाकथित उच्चवर्ग की जातियों से कहीं अधिक है. उन्होंने एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताया था कि बाबा साहब अम्बेडकर का जन्मदिन मनाने के लिए एक व्यक्ति ने अपने ऑफिस से छुट्टी मांगी. इस पर एक तो उसकी छुट्टी की अर्जी को ख़ारिज कर दिया गया और दूसरे निम्न जातियों के खिलाफ उलटी सीधी बातें कही गयीं और भला बुरा भी कहा गया. वहां के अधिकारियों का यह भेदभावपूर्ण व्यवहार देखकर मेरे मन में विद्रोह की ज्वाला फूट पड़ी. इस हादसे के बाद मैंने अपने आपसे वादा किया कि एक दिन ऐसा आएगा कि आज जो लोग हमें हेय दृष्टि से देखते हैं, आने वाले कल वही लोग हमारे हुक्म की तामील करने के लिए बाध्य हो जाएंगे.तब बाबा साहेब अम्बेडकर के जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश भी घोषित कर दिया जाएगा. कांशी राम को अपने आप पऱ गजब का भरोसा था. उन्होंने मुझे बताया था कि बेशक यह बहुत बड़ी चुनौती थी. मेरे पास सिवाय अपनी दिलेरी, परिश्रम और विवेक के और कुछ नहीं था.मैं पूरी शिद्द्त के साथ अपने संकल्प को साकार करने की दिशा में जुट गया और लोगों की सोई हुई चेतना जगाने की कोशिश करने लगा. शुरू शुरू में मुझे कुछ कटु अनुभव भी हुए. जिन लोगों को मैं ‘अपना’ समझता था उन लोगों ने यह कहकर मेरे साथ सहयोग करने से मना कर दिया कि ‘ तू तां छड़ाछांट (अकेला) है, असी टब्बरदार (परिवार वाले) हां, फालतू दे कम्मा लई साडे कोल टाइम नहीं.’ एक बुज़ुर्ग महिला ने तो यहां तक कहा कि ‘ जे साडा नड्डा (बेटा) तेरे नाल तुरता फिरता रवेगा तां घर दा खर्च किवें चले दा.

ऐसे लोगों की ये भावनाएँ मेरे लिए कोई अजूबा नहीं होती थीं. ज़रूरी तो नहीं मेरे जूनून में सभी मेरे हमसफ़र बनें. लेकिन हथियार टेकने वाला तो मैं भी नहीं था. शुरू में मैंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का समर्थन किया था लेकिन उसका कांग्रेस से जुड़े होने की वजह से मैंने उसे छोड़ दिया. 1971 में अखिल भारतीय अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के शिक्षित सदस्यों को अम्बेडकरवादी सिद्धांतों का समर्थन करने के लिए राज़ी कर लिया. इसप्रकार हमारा एक संगठन बीएएमसीईएफ (बामसेफ) वजूद में आया. यह संगठन मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों को एकजुट करने और उनके माध्यम से दलित और पिछड़े वर्गों के उत्थान की दिशा में कार्य करता था. कांशी राम ने बताया था कि हमारी यह संस्था न तो धार्मिक थी और न ही राजनीतिक और न ही हमारा उद्देश्य आंदोलन करना था. हम लोगों ने इस संस्था की ओर उस वर्ग को आकर्षित किया जो संपन्न था, शहरों और बड़े क़स्बों में सरकारी नौकरी करता था और अपनी अछूत होने की पहचान से पूरी तरह से वाकिफ नहीं था. लिहाज़ा मैंने 1981 में दलित, शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस4) की एक सामाजिक संगठन की स्थापना की जिसके माध्यम से दलित वोटों को एकजुट करने का प्रयास किया. उस वक़्त मेरा नारा था ‘ ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया छोड़ बाकी सब डीएस4.’ इस संस्था के माध्यम से मैंने दलितों, शोषितों तथा अन्य पिछड़े वर्गो के बीच चेतना जगाई और उनकी की मदद से जगह जगह बिखरे और छितरे हुए मतों का एकीकरण करने का काम किया. अभी तक इन लोगों के वोट थोक भाव से कांग्रेस पार्टी तथा अन्य को जाया करते थे. 1984 में हमने बहुजन समाज पार्टी ( बसपा).की स्थापना कर अपने मतों को बिखरने से बचाने की कोशिश की जिसमें हम काफ़ी हद तक कामयाब भी हुए. इसमें हमारा मुख्य नारा था ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी’. यह नारा वंचित समाज के लोगों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त करने का एक महत्वपूर्ण संदेश था. इसप्रकार बसपा देश में दलितों की सबसे बड़ी राजनीतिक आवाज़ बनी जिसका मकसद सत्ता के पदों से अधिक विचार और संगठन पऱ ध्यान देना था.

अपनी इस नवनिर्मित राजनीतिक आवाज़ के प्रभाव को जानने और जांचने के लिए 1984 में कांशी राम ने छत्तीसगढ़ के जांजगीर- चांपा से लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन वह हार गए. इस पऱ कांशी राम ने कहा था कि ‘बसपा पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव नज़र में आने के लिए और तीसरा चुनाव जीत दर्ज करने के लिए लड़ती थी.’ लेकिन कांशी राम तीन चुनाव हारे. दूसरा चुनाव 1988 में इलाहबाद से राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ लड़ा जहां उनका प्रदर्शन तो प्रभावशाली था लेकिन वह राजा साहब से 70 हज़ार मतों से पराजित हो गए. तीसरा चुनाव 1989 में पूर्वी दिल्ली और अमेठी से कांग्रेस के उम्मीदवारों क्रमशः हरिकृष्णलाल भगत और राजीव गांधी के खिलाफ लड़ा और दोनों जगह से परास्त हो गये. 1991 में कांशी राम की बसपा और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन हो जाने से कांशी राम ने इटावा से चुनाव लड़कर अपने निकततम भाजपा उम्मीदवार को बीस हज़ार से अधिक मतों से हराया. 1996 का चुनाव उन्होंने होशियारपुर से जीता. वह 1998-2004 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. जांजगीर से कभी कंग्रेस के अमरसिंह सहगल जीता करते थे. इन चुनाव परिणामों के बाद कांशी राम ने मुझे बताया था कि बसपा की राजनीतिक जड़ें जम गयी हैं. अब पार्टी के लोग उन्हें ‘मान्यवर,’ ‘साहब कांशी राम’ और ‘बहुजन नायक’जैसे शब्दों से संबोधित करने लगे थे.

कांशी राम 14 अप्रैल,1984 से 18 सितम्बर, 2003 तक बहुजन समाज पार्टी के पहले अध्यक्ष रहे. उनकी उत्तराधिकारी बनीं मायावती.

बेशक कांशी राम ने दलितों, शोषितों, अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को एकजुट कर बहुजन समाज पार्टी (बीएसएफ) के रूप में ऐसी पार्टी स्थापित कर दी जो बड़ी और राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के विकल्प के तौर पर उभरी. उन्होंने दलितों, पिछड़ों और वंचितों के भीतर आत्मसम्मान और सामाजिक जागरूकता की भावना जागृत की.यह पूछे जाने पर कि बसपा का सफर तो काफ़ी लंबा रहा, आपको शुरुआती झटकों के बाद गति कब मिली?उन्होंने बताया जब निम्न जाति के शिक्षित लोगों ने मेरा साथ दिया. मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों को एकजुट करने और उनके माध्यम से दलित और पिछड़े वर्गों के उत्थान की दिशा में कार्य करना शुरू किया. ‘मैं तो सरकारी कर्मचारियों से चंदा भी वसूल किया करता था.’ एक बार कांशी राम ने मुझे बताया था. बावजूद इसके ये सरकारी नौकरियों के लोग ही नहीं बल्कि वे सभी छोटे मोटे दल जो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा छले जाते थे हमारी तरफ आकर्षित हुए थे. हमसे जुड़ने वाले कई बड़े नाम भी शामिल थे.

और मायावती आपके संपर्क में कैसे आयीं ? कांशी राम ने बताया था कि समय समय पर जितने लोग भी हमारी संस्था से जुड़े, उनमें से कुछ स्वतः आये तो कुछ को लाया गया. जहां तक मायावती की बात है उससे 1977 में मेरी मुलाक़ात को एक इत्तेफाक ही कहा जा सकता है. एक बार कुछ लोगों के साथ मैं एक स्कूल में गया. वहां मायावती को बड़ी लगन के साथ बच्चों को पढ़ाते हुए देखा. उनकी बातचीत का तरीका भी मुझे रुचा. मैंने उनसे पूछा कि बच्चों को पढ़ाने के अलावा आप क्या करती हैँ? उन्होंने बताया कि वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की तैयारी कर रही हैँ. उनके आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया और मैंने छूटते ही कहा, छोड़िये इस परीक्षा को, हम आपको ऐसा बना देंगे कि आईएएस अधिकारी हमेशा आपकी सेवा में रहेंगे. यह उस वक़्त की बात है जब बीएसएफ का गठन नहीं हुआ था. इसप्रकार उन्होंने आईएएस की तैयारी बीच में ही छोड़ दी और हमारी पार्टी में शामिल हो गयीं. उस समय दोनों ओर का परस्पर विश्वास था जो हमें उज्जवल भविष्य का सपना दिखा रहा था. मुझे बताया गया कि मायावती दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैँ, मेरठ विश्वविद्यालय से बी.एड. की है और दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी करने वाली हैं. दलित समाज में उस समय इतनी शिक्षित महिला और कोई नहीं थी. लिहाज़ा मायावती का हमसे जुड़ने के चलते इस समाज की बहुत सी महिलाएं हमसे जुडी और पार्टी की कोर टीम का हिस्सा बन उसे शक्तिशाली बनाया

कांशी राम दूरदर्शी थे. खतरा मोल लेना उनकी फ़ितरत थी. एक झटके से नौकरी छोड़ वह एक ऐसे सपने को साकार करने में जीजान से जुट गए जिसका कोई ओरछोर नहीं था. मायावती को आईएएस की तैयारी न करने की सलाह देना उनका ज़ोखिम भरा फैसला था. लेकिन उन्होंने लिया, अपने आत्मविश्वास और दूरदर्शी सोच के चलते. और मायावती भी कांशी राम के उस फैसले की राहगीर हो ली. उन्होंने बताया था कि मायावती बहुत ही दिलेर और निडर हैँ इसलिए उत्तरप्रदेश की कमान मैंने उन के हाथों में सौंप दी जहां उन्होंने पार्टी को खड़ा करने में खूब मेहनत की. तीन तीन उपचुनाव हारने के बाद भी उनके हौसले पस्त नहीं हुए. 1989 में बिजनौर से भारी मतों से लोकसभा का चुनाव जीत कर बसपा की धाक जमा दी. अब बसपा को राष्ट्रीय स्तर
पऱ पहचान मिली और अहमियत भी.

क्या मायावती का कार्यक्षेत्र उत्तरप्रदेश तक ही सीमित था या उन्हें और भी ज़िम्मेदारियां दी गयी थीं? उत्तर में कांशी राम ने बताया था कि अभी अभी हमने उत्तरप्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज की है. उसे राज्य भर में विस्तृत करने की ज़िम्मेदारी मायावती की है. आपके और समाजवादी नेता मुलायम सिंह के साथ रिश्ते कैसे थे के जवाब में कांशी राम ने बताया था, मिश्रित. 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वस्त होने के बाद हम दोनों के बीच करीबी आयी थी. बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद मुस्लिम भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों से मायूस हो गये.1993 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों के ज़्यादातर मत हमें और समाजवादी पार्टी को मिले. हमारी दोनों पार्टियों को मिली सीटें बहुमत के करीब थीं लिहाज़ा हम दोनों पार्टियों ने मिलकर राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया. यह नया प्रयोग था सपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का. मुख्यमंत्री मुलायम सिंह बने (5 दिसंबर, 1993-3 जून, 1995), और बसपा ने सपा को बाहर से समर्थन दिया. इस दौरान मैंने और मुलायम सिंह ने कई सार्वजनिक सभाओं को संबोधित कर अपनी एकता और एकजुटता प्रदर्शित भी की (लखनऊ और हैदराबाद की ऐसी दो सार्वजनिक सभाओं में मैं भी उपस्थित था). हमारी मिलीजुली सरकार करीब दो बरस तक चली लेकिन जाते जाते अपने पीछे सौहार्द के बजाय कटुता छोड़ गयी. कांशी राम ने मुझे बताया था कि अगर सपा प्रलोभन में न फंस कर आधा कार्यकाल बसपा को देने के लिए सहमत हो जाती तो यकीन जानिए यह गठबंधन बहुत मज़बूत होता जिसे पराजित कर पाना आसान नहीं होता.

इस गठबंधन में वे सभी पार्टियां शामिल थीं जिन्हें निम्न जातियों की पार्टियों माना जाता है. कांशी राम ने भारतीय राजनीति में क्रांति ला दी थी. उन्होंने बहुजन शब्द को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाया. इस शब्द का अर्थ था ‘बहुसंख्यक समुदाय’.समाज के इस समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए संगठित होना शुरू कर दिया था. कांशी राम की दूरदर्शिता और संघर्षो ने इनके वोटों की संख्या तथाकथित अगड़ी जातियों की तुलना में अधिक थी . कांशी राम का यही प्रमुख मुद्दा था जिसका प्रचार उन्होंने देश भर में किया. बहुत-सी जगह मैं भी उनके साथ गया था. उन्होंने दक्षिण में बसपा की उपस्थिति दर्ज करने के लिए कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और चेन्नई में अच्छी खासी मज़बूत टीम खाड़ी कर ली थी. मायावती को उन्होंने उत्तरप्रदेश तक ही महदूद रखा, बाकी सभी राज्यों की यात्राएं वह स्वयं करके बसपा के प्रति दलितों, शोषितों, अनुसूचित तथा अनुसूचित जनजातियों में ‘जागृति’ पैदा किया करते थे. उन्होंने कुछ तुलनात्मक आंकड़े भी इकट्ठाकर लिए थे जो अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच की वोटों का अंतर दर्शाते थे.

अपने अध्ययन के आधार पऱ कांशी राम ने एक पुस्तक भी लिखी ‘ चमचा युग ‘ ( द ऐरा ऑफ़ द स्टूजेस) जिसमें उन्होंने दलितों, शोषितों और पिछड़े वर्ग की दुर्दशा के लिए अपनी बिरादरी को ही ज़िम्मेदार ठहराया है.अपनी यह एकमात्र पुस्तक उन्होंने महाराष्ट्र के समाज सुधारक और क्रन्तिकारी कार्यकर्त्ता ज्योतिराव फुले (महात्मा फुले के नाम से प्रसिद्ध ), विधिवेता, समाज सुधारक और दलित बौद्ध आंदोलन के प्रेरेता और अछूतों के प्रति होने वाले सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले तथा भारतीय संविधान के जनक भीमराव अम्बेडकर, तमिलनाडु के एक महान समाज सुधारक ई.वी.रामासामी पेरियार तथा दलित मुक्ति के लिए काम करने वाले अन्य कई विद्रोही आत्माओं को समर्पित की.पेरियार को ‘द्रविड़ राजनीति का जनक और ‘ एशिया का सुकरात’ कहा जाता है.चमचा युग का जन्म कैसे हुआ उसकी पृष्ठभूमि का ज़िक्र करते हुए लिखा कि किस प्रकार दलित नेताओं को उच्च जाति की कठपुतली बना दिया गया. दलित मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों के चुनाव में बहुत कम भूमिका निभाने का अधिकार था. उन्होंने जगजीवन राम और रामविलास पासवान जैसे दलित नेताओं का वर्णन करने के लिए ही ‘चमचा’ शब्द का प्रयोग किया. उनका मानना था कि दलितों को अन्य दलों के साथ समझौता करने के बजाय अपने उद्देश्य को दृष्टिगत रख स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए था. इन दलित नेताओं पऱ कांशी राम ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों के लिए स्वार्थी होने का आरोप लगाया. एक बार कांशी राम हुमायूं रोड वाले अपने घर के बाहर मुझसे इस मुद्दे पऱ बात कर रहे थे कि कांग्रेस नेता अजीत जोगी ने झांका और पूछा कि ‘क्या मैं आ सकता हूं?’ कांशी राम ने हाथ के इशारे से उन्हें बुला लिया. मेरी तरफ मुखातिब होकर अजीत जोगी ने पूछा, ‘भाई साहब का इंटरव्यू कर रहे हैं क्या!’ मेरे उत्तर देने से पहले कांशी राम ने जोगी की तरफ इशारा करते हुए मुझे बताया कि यह भी दलित हैँ और कांग्रेस पार्टी में ‘पड़े’ हुए हैँ. यह दलित और वंचितों के हितार्थ पहल कर सकते थे. लेकिन कुछ नहीं किया, साहस नहीं जुटा पाए. आईएएस छोड़कर राजनीति में आए हैं और कांग्रेस से जुड़े हुए हैँ. इनमें भी स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी.

मैंने कांशी राम से पूछा कि अगर इनमें से कोई व्यक्ति आपकी तरह दलितों, शोषितों की बात करता तो आपका आंदोलन कैसे बहुजन समाज के तौर पऱ वजूद में आता. कांशी राम तब मुस्कुराए थे. बोले, जब मुझे अपनी जाति बिरादरी का अहसास हो गया तो मैंने तुरंत फैसला लिया, नौकरी छोड़ दी और अपनी जाति बिरादरी को एक सूत्र में पिरोने का अपने आपसे वादा किया. यह रास्ता बहुत कठिन, दुर्गम और थकाऊ था और इसमें ज़रूरत थी. समर्पण और प्रतिबद्धता की. कह सकते हैँ घर में आग लगाकर तमाशा देखने की. संघर्ष के इस इस पूरे दौर से कैसे गुज़रा हूं आप से बेहतर दूसरा कोई नहीं जानता, क्योंकि आप शुरू से मेरे साथ जुड़े हुए हैं. उन्होंने बताया कि अगर दलित, शोषित, पिछड़ी जातियों के मत एकजुट नहीं हो सके तो इसके लिए इन बड़े बड़े नेताओं का अपना अपना स्वार्थ ज़िम्मेदार है. अपनी जाति बिरादरी के नाम पऱ ये नेता अपने अपने घर भरते रहे और पिछड़ी जातियां पिछड़ती चली गयीं.

कांशी राम ने बताया था कि 1995 में मायावती उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री (3 जून, 1995- 18 अक्टूबर, 1995) का पद संभालने वाली पहली दलित महिला बनी.वैसे पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपालानी थीं. बसपा ने अपना वह सपना साकार कर दिया कि अगर पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक मिलकर काम करें तो वे कमाल कर सकते हैँ. भाजपा के बाहरी समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं. इसी प्रकार 1997 और 2002-2003 में भी भाजपा के बाहरी समर्थन से तथा 2007-2012 तक वह शुद्ध बसपा की नेता के तौर पऱ मुख्यमंत्री रहीं.अब मुझे लगा कि दलितों की अहमियत कुछ हद तक बढ़ी है. कांशी राम ने मुझे बताया. क्या आपकी भाजपा नेताओं से मुलाक़ात हुई थी? कांशी राम ने बताया, कई बार. भाजपा ने मायावती की सरकारों को तीन बार बाहर से समर्थन दिया था इसलिए अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह आदि से भेंट हुआ करती थी. भई, मैं भी तो साढ़े बारह बरस तक सांसद रहा हूं, सभी पार्टियों के नेताओं के साथ मेरा राब्दा था. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब बोफोर्स मुद्दे पऱ हमारी पार्टी का सहयोग और समर्थन माँगा तो हमने बेहिचक दिया था.

अलग अलग कई मुलाक़ातों में कांशी राम ने मुझे बताया था कि उत्तरप्रदेश में उन्हें एकजुट रखने का दायित्व मायावती को सौंपकर मैं दूसरे राज्यों में बसपा की जड़ें मज़बूत करने के लिए निकल पड़ा. पंजाब मेरा अपना प्रान्त था वहां मेरी बिरादरी के लोग बिना ज़्यादा मेहनत के मेरे साथ जुड़ने लगे. हरियाणा में भी ज़्यादा दिक्कत पेश नहीं आयी. अगर मैं कहूं कि उत्तरी भारत के राज्यों में बसपा की मशाल जलाने और उसे आगे बढ़ाने वाले लोग स्वतः आगे आते चले गए, अगर ऐसा कहूं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. धीरे धीरे हमारी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने स्थानीय निकायों में अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया. कई राज्यों की विधानसभाओं में भी बसपा के उम्मीदवार जीतकर पहुंचने लगे और लोकसभा में भी. आप एक बार राज्यसभा (1998-2004) और दो बार लोकसभा (1991-1996) तथा 1996-1998) के सदस्य रहे लेकिन आपका सांसद के तौर पऱ योगदान कुछ अधिक नहीं रहा, इसकी कोई खास वजह! उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा कि वहां बैठकर वक़्त ज़ाया करने से बेहतर था पार्टी संगठन को मज़बूत करना. मैं संसद की दोनों सदनों का सदस्य रहा था और मेरे सभी पार्टियों से अच्छे संबंध थे, कांग्रेस और भाजपा नेताओं के अलावा दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं से भी.

कांशी राम अक्सर कहते थे कि हम लोग देश की आबादी का 70 फीसदी से ज़्यादा है. आप खुद ही जोड़ लें. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियां, आदिवासी, अल्पसंख्यक और उनसे जुड़ी तमाम उपजातियां. एक बार जब कांशी राम से मैंने पूछा कि बसपा ने रामविलास पासवान को बहुत नुकसान पहुँचाया है तो उनका जवाब था, ‘कोई किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता, उसकी अपनी नियत इसके लिए ज़िम्मेदार होती है. वह तो मुख्यतया बिहार के नेता हैँ जबकि हमारी पार्टी अखिल भारतीय स्तर की पार्टी बन गयी है.

मैं ‘दिनमान’ छोड़कर ‘संडे मेल’ में कार्यकारी संपादक बनकर आ गया था लेकिन कांशी राम से मेरा संपर्क बना रहा, बल्कि अधिक घना हो गया. उनके साथ जहां मैं जबलपुर भोपाल, रायपुर ( मध्यप्रदेश), संबल, भुवनेश्वर, पुरी ( ओड़िसा) गया था वहीं दक्षिण में हैदराबाद,बंगलुरु और चेन्नई भी. गोवा भी उनके साथ जाना हुआ. इन सभी स्थानों पऱ बसपा के अपने ऑफिस थे जहां मेरी बसपा के समर्पित और कर्मठ कार्यकर्ताओ से मुलाक़ातें हुईं . वे सभी लोग कांशी राम को ‘ साहब’ कहकर संबोधित करते थे. अपने भाषणों में कांशी राम इस बात पऱ ज़ोर दिया करते थे कि हम ‘ बहुजन’ हैं लेकिन हमें देश में वह दर्जा प्राप्त नहीं है, जिसके हम हक़दार हैं. संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं किंतु हमारे साथ भेदभाव बरता जाता है, हम पऱ अत्याचार किया जाता है, हमें दबा-कुचला माना जाता है. ऐसा क्यों! हमें इन भेदभाव को मिटाने के लिए अपने हक की लड़ाई लड़नी है. हमें इस अन्याय,असमानता, शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा तभी मौजूदा ताकतों को हमारी शक्ति का अहसास होगा. कांशी राम उत्तर भारत के पहले ऐसे दलित नेता थे जिनकी पूरे देश में स्वीकृति और आदर सम्मान था. दक्षिण के राज्यों के दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों को भी लगता था कि देश में कोई ऐसा नेता भी है जो उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पऱ केवल उठा ही नहीं रहा था बल्कि उनके कार्यन्वयन की दिशा में भी प्रयत्नशील रहता था. अलावा इसके उत्तरप्रदेश में समय समय पऱ बसपा की बनने वाली सरकारों का भी दक्षिण के राज्यों पऱ मनोवैज्ञानिक प्रभाव था. दक्षिण में बसपा के कार्यकर्त्ता कांशीराम की इस बात से मुतासिर थे कि ‘साहब’ जैसा बेबाक और बेलाग नेता पहले उन्होंने कभी नहीं देखा था.

एक बार 15 मार्च कांशी राम के जन्मदिन पऱ मैं चेन्नई में मौजूद था. वहां मरीना बीच के पास एक विराट समारोह हुआ जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की. उनके अतिउत्साही कार्यकर्तार्ओं ने कांशी राम के सिर पऱ एक ताज रखा और उनकी फोटो से युक्त चांदी के सिक्के उन्हें भेंट किए. देखते ही देखते वह समारोह एक जनसभा में तब्दील हो गया. पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलने वाली भेंट और तोहफो को उन्होंने उनकी भावनाओं का ख्याल रखते हुए स्वीकार कर लिया लेकिन उसी सभा में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मैंने आपका मान रखने के लिए ये तोहफ़े स्वीकारे हैं जिनपर आपका हक़ है. साथ ही उन्होंने कार्यकर्ताओं को आगाह कर दिया कि अगर दूसरी पार्टियों की तरह हम भी यह प्रपंच करते रहेंगे तो हमारी अलग पहचान कैसे बनी रह पाएगी. कांशी राम ने मरीना बीच की उस सभा में कहा था कि हम लोग देश की आबादी का 70 फीसद से अधिक हैं. हमारा शोषण जो तथाकथित बड़ी पार्टियां कई दशकों से करती आ रही हैँ उन्हीं के खिलाफ हमारी लड़ाई है. अन्याय और उत्पीड़न का यह सिलसिला देश के एक भाग या एक राज्य तक सीमित नहीं बल्कि पूरा देश उसकी गिरफ्त में है. अगर हम लोग ‘वाद’ के चक्कर में न पड़ कर एकजुट होकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ेंगे तो हमारी जीत निश्चित है, उसे कोई नहीं रोक सकता. कांशी राम जिस तरह से धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में अपना भाषण दे रहे थे वैसे ही धाराप्रवाह में तमिल दुभाषिया उसका अनुवाद किए जा रहा था और आमजन दत्तचित्त हो ‘ साहब’ को सुन रहे थे. बीच बीच में तालियां भी बज रही थीं. अद्भुत था वह मंजर. ऐसा ही समां कांशी राम, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, राजस्थान के अतिरिक्त देश के सभी दक्षिण राज्यों में बांधा करते थे.

कांशी राम अनथक नेता थे, जूनूनी थे. एक ही लक्ष्य था बसपा को ऐसे राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाना जहां उसकी अवहेलना या उपेक्षा करने से पहले दूसरी तथाकथित बड़ी पार्टियां सौ बार सोचें. उन्होंने अपने जीते जी इस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया था जिसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी. उनकी सेहत दिन ब दिन गिरती जा रही थी. एक दिन मैंने उनसे पूछा कि आजकल आप बीमार रहने लग गए हैं और बसपारूपी यह पौधा अब वटवृक्ष’ बन गया है, आपकी अनुपस्थिति में इसे संभालेगा कौन! मेरे सवाल के जवाब में कांशी राम बेहिचक और बिना लागलपेट के बोले थे, ‘मायावती. मुझे उसकी काबलियत पऱ पूरा भरोसा है.’ और इसी भरोसे के चलते कांशी राम ने सितम्बर, 2003 में मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

कांशी राम के साथ मेरी बीसियों मुलाकातें थीं. उनके निजी कमरे तक जाने की मुझे पूरी छूट थी. बीमारी की हालत में मैंने उनसे पूछा था कि आपने जो प्रतिज्ञाएं ले रखी हैं क्या उसे तोड़ेंगे तुरंत उनका जवाब मिला, कतई नहीं. उनकी कुछ प्रतिज्ञाएं इस प्रकार थीं: अब कभी घर नहीं आऊंगा, कभी अपना घर नहीं खरीदूंगा, गरीब दलितों का घर ही मेरा घर होगा, किसी के शादी,
जन्मदिन, अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होऊंगा, कोई नौकरी नहीं करूंगा, जब तक बाबा साहब अम्बेडकर का सपना पूरा नहीं हो जाता, चैन से नहीं बैठूंगा. उन्होंने मुझ से ही पूछा कि बताओ मैंने कौन सी प्रतिज्ञा तोड़ी. अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ. दूर क्यों जाते हो तुम्हीं बताओ तुम्हारे किसी बच्चे की शादी में मैं शामिल हुआ. यह बात तो उनकी सही थी. लेकिन उनकी मां और दोनों भाई दरबारा सिंह और हरबंस सिंह उनसे मिलने के लिए दिल्ली आते जाते रहते थे. कांशी राम ने बताया कि घर आने वालों को मिलने से मैंने कभी मना नहीं किया.

सुना जाता है कि आप बौद्ध धर्म ग्रहण करना चाहते हैं. उन्होंने बताया कि यह बात सही है. 14 अक्टूबर, 2006 को बाबा साहब अम्बेडकर के धर्म परिवर्तन की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पऱ बौद्ध धर्म ग्रहण करने की मंशा है अपने साथ पांच करोड़ समर्थकों के साथ. हमारे धर्म परिवर्तन की इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह होगा कि उनके समर्थकों में केवल अछूत ही शामिल नहीं होंगे बल्कि विभिन्न जातियों के लोग शामिल होंगे. लेकिन उनके मन की बात मन में ही रह गयी. कांशी राम का 9 अक्टूबर, 2006 को 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया और उनकी बौद्ध धर्म ग्रहण करने की मंशा अधूरी रह गयी. उनकी इच्छा के अनुसार उनके अंतिम संस्कार बौद्ध परंपरा के मुताबिक किए गए जिसमें मायावती ने चिता को अग्नि दी. उनकी अस्थियों को एक कलश में रख कर प्रेरणा स्थल पऱ रखा गया जहां कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.

कांशी राम के निधन पऱ देश और विदेश से बड़ी संख्या में लोगों ने शोक संदेश भेजे. बसपा सुप्रीमो मायावती ने संकल्प व्यक्त किया कि वह मान्यवर कांशी राम के सभी अधूरे कामों को पूरा करेंगी. प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने उन्हें हमारे समय के महानतम समाज सुधारकों में से एक बताते हुए कहा कि उनके राजनीतिक विचारों और आंदोलनों का हमारे राजनीतिक विकास पऱ महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है. उन्हें सामाजिक परिवर्तन की व्यापक समझ थी और वह समाज के विभिन्न वंचित वर्गों को एकजुट करने और एक ऐसा राजनीतिक मंच प्रदन करने में सक्षम थे जहां उनकी आवाज़ सुनी जा सके. उनके नपेतृत्व में बसपा ने 1999 में 14 संसदीय सीटें जीती थीं. उत्तरप्रदेश में कांशी राम के नाम पऱ कई सरकारी कार्यक्रमों की योजनाएं हैं. उनके जन्मस्थान पृथीपुर
बुँगा साहब में उनकी प्रतिमा वाला एक स्मारक है. लखनऊ में स्थित मान्यवर श्री कांशी राम जी ग्रीन इको गार्डन का नाम उनकी स्मृति में रखा गया है. नोएडा में भी उनकी प्रतिमा वाला एक स्मारक है.

आजकल लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी बसपा के संस्थापक कांशी राम को सामाजिक न्याय का योद्धा बताते हुए उन्हें ‘ भारत रत्न’ देने की मांग कर रहे हैं.. लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने कांशी राम के संघर्ष की सराहना करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस ने पहले बेहतर काम किया होता तो कांशी राम को अलग से संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. उन्होंने स्वीकार किया कि कांग्रेस की पूर्व की कुछ कमियां रही थीं जिसके कारण कांशी राम को अलग से संघर्ष करना पड़ा.उन्होंने कांशी राम को अपने सिद्धांतों से समझौता न करने वाला और शोषित समाज को अधिकार देने वाला नेता बताया. आजकल राहुल गांधी लोकसभा और बाहर भी दलितों, शोषितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्गों के अधिकारों जैसे मुद्दों पऱ खूब बातें करते हैं. वह शायद यह साबित करना चाहते हैं कि कांशी राम के विचारों और सिद्धांतों को सही मायने में वही समझते हैं इसीलिए हर मंच पऱ वह इस वर्ग की बदहाली का मुद्दा उठाते रहते हैं. दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती ने कांग्रेस के इस रुख पऱ नाराज़गी जताई और कार्यकर्ताओं को कांशी राम की विरासत को हड़पने की कोशिशों के प्रति सतर्क रहने को कहा है.भाजपा ने राहुल गांधी के इस कदम को इतिहास को याद करने की सलाह देते हुए उनकी मंशा पऱ सवाल उठाए. बेशक राहुल गांधी का यह कदम 2027 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को साधने के लिए एक बड़ी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. देखें इसमें वह कितना सफल हो पाते हैं.

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