मॉरिशस, जिसे ‘छोटा भारत’ भी कहा जाता है, के पहले प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम से कई बार मिलने के अवसर प्राप्त हुए थे. जब भी कभी उनका दिल्ली आना होता तब मुझे मॉरिशस के तत्कालीन उच्चायुक्त रविंद्र घरभरण मेरी मुलाकात करा दिया करते थे. सबसे पहले बात करते हैं रविंद्र घरभरण और उनसे हमारी दोस्ती के बारे में. हुआ यों कि एक दिन श्रीमती शीला झुनझुनवाला का फोन आया कि कल हमें मॉरिशस के पहले उच्चायुक्त रविंद्र घरभरण की पत्नी पद्मा घरभरण का ‘अंगजा’ के लिए इंटरव्यू करने के लिए ग्यारह बजे अशोक होटल पहुंचना है. अभी उनको कोई ढंग का मकान नहीं मिला है और वह अशोक होटल में ठहरे हुए हैं. आगे बढ़ने से पहले मैं यह बता दूं कि श्रीमती शीला झुनझुनवाला अपने पति श्री ठाकुर प्रसाद झुनझुनवाला ( टीपी भाई साहब के नाम से मशहूर) के मुंबई से दिल्ली ट्रांसफर हो कर आयीं थीं. टीपी भाई साहब आयकर आयुक्त थे और शीलाजी मुंबई में ‘धर्मयुग’ पत्रिका में महिला पृष्ठ की संपादक थीं. झुनझुनवाला दम्पति कला, साहित्य, संस्कृति प्रेमी थे जिनका मुंबई की संस्कृति की दुनिया क में खासा दबदबा था. दिल्ली आने पर टीपी भाई साहब ऑफिस चले जाते लेकिन सदा व्यस्त रहने वाली शीला जी घर में खाली बैठे बैठे ऊब जाती थीं. एक दिन सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी के मालिक पुरी साहब ने उन्हें फोन करके बताया कि उन्होंने ‘अंगजा’ नामक एक मासिक महिला पत्रिका निकालने का निर्णय किया है जिसका संपादन आपको करना है. इसप्रकार शीला जी व्यस्त हो गयीं. और मैं त्रिलोक दीप! उन दिनों टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की पत्रिका ‘दिनमान’ में काम करता था. वहां हड़ताल थी और मेरे पास वक़्त ही वक़्त था जिसका इस्तेमाल मैं शीला जी की मदद के लिए करता था.
क्योंकि मैं मॉरिशस के बारे में थोड़ा बहुत जानता था और काफ़ी कुछ स्वामी कृष्णानंद सरस्वती के मुख से सुन चुका था इसलिए पद्मा जी से पूछने वाले सवालों की एक सूची टाइप कर ली. मेरे पास एक टाइपराइटर है जिसपर मैं अपना काम किया करता था. अपने प्रश्नों की सूची के साथ मैं रविंद्र नगर पहुंच गया, जो उन दिनों टीपी भाई साहब का सरकारी आवास था. प्रश्नों की उस सूची पर शीला जी और टीपी भाई साहब ने नज़र डाली और बोले, ‘परफेक्ट’. अपुन खुश. पूरे ग्यारह बजे अशोक होटल में रविंद्र घरभरण के सुएट पर पहुंच कर जब घंटी दी तो दरवाजा रविंद्र घरभरण ने खोलते हुए कहा, आइये आपका स्वागत है. शीला जी से दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और मुझ से हाथ मिलाया. शीला जी ने पहले अपना परिचय दिया और उसके बाद मेरे बारे में बताया कि यह त्रिलोक दीप हैं जो टाइम्स समूह की पत्रिका ‘ दिनमान’ से जुड़े हुए हैं, वहां आजकल हड़ताल चल रही है इसलिए ‘अंगजा’ में मेरी सहायता कर रहे हैं. इतने में एक लंबी खूबसूरत महिला आयीं. रविंद्र घरभरण ने उनसे परिचय कराते हुए बताया कि यह श्रीमती पद्मा घरभरण हैं जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मॉरिशस में सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में बहुत सक्रिय रहती हैं. रविंद्र घरभरण जिस सहजता के साथ हिंदी में बातचीत कर रहे थे उसे सुनकर आनंद आ रहा था लेकिन पद्मा जी हिंदी में नहीं बल्कि वह अंग्रेजी में अपने को सहज मान रही थीं. रविंद्र घरभरण ने बताया कि वह तो भोजपुरी भी बोलते हैं लेकिन पद्मा जी समझती सब कुछ हैं परंतु बोलने में उन्हें हिचक और झिझक दोनों होती है. उनके माता पिता दक्षिण से मॉरिशस गए थे जबकि हमारे माता पिता बिहार से. चचा के भी. प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम वहां ‘ चचा ‘ के नाम से प्रसिद्ध हैं.
शीला जी ने पद्मा जी के साथ काफ़ी लंबी बातचीत की. वहां की महिलाओं की स्थिति तथा समाज और देश की गतिविधियों में उनके योगदान के बारे में. मॉरिशस में भारतीय मूल के लोगों की संख्या 68 प्रतिशत से अधिक है. उनके बीच एकजुटता को लेकर, राजनीति में महिलाओं की कितनी और कैसी भागीदारी है. क्या वहां भी लिंग भेद का रोग है या महिला और पुरुष बराबर हैं. नवस्वाधीन मॉरिशस में किस तरह की चुनौतियां और समस्याएं हैं. इसका उत्तर रविंद्र घरभरण ने दिया यह कहकर कि जिस प्रकार नवस्वाधीन भारत को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ा था कामोबेश वैसी ही चुनौतियों का सामना हर किसी नवस्वाधीन देश को करना पड़ता है. लेकिन हमारे लिए खुशी और संतोष की बात यह है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम पार्षद से लार्ड मेयर, विधायक, मुख्यमंत्री से होते हुए प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे हैं लिहाज़ा वह देश की हर छोटी बड़ी समस्या से परिचित हैं. उन्होंने भारत और मॉरिशस के संबंधों का उल्लेख करते हुए बताया था कि आजादी के पहले और उसके दौरान भी भारत का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग उनके देश को मिला है. इसपर शीला जी ने हंसकर उन्हें बताया कि उनके पति श्री टी पी झुनझुनवाला और वह कला , संस्कृति के क्षेत्र में मुंबई में बहुत सक्रिय थे, अब यहां दिल्ली में भी हो रहे हैं. उन्होंने घरभरण दम्पति को बताया कि बेशक उनके पति आयकर आयुक्त हैं लेकिन उनका संस्कृति से लगाव बेमिसाल है. रविंद्र घरभरण इस पर खुश होकर बोले थे कि आशा है कि हमें भी आप अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल करेंगी.
घरभरण दम्पति से यह बातचीत बहुत ही सारगर्भित रही. शीला जी ने बड़े मनोयोग से पद्मा जी से हुई बातचीत को लिखा. उसे ‘अंगजा’ की कवर स्टोरी बनाया गया. इसका लेआउट प्लान भी शीला जी ने खुद तैयार किया. इंटरव्यू के बीच में कई छोटे छोटे बॉक्स दिए गए. उन्होंने अपने ‘धर्मयुग’ के अनुभव का भरपूर लाभ उठाया. उनकी लेखनी में गजब की रवानी है, आखिर वह ‘धर्मयुग’ में महिला पृष्ठ की संपादक जो रही हैं. जब ‘अंगजा’ की दो प्रतियां हमने घरभरण दम्पति को भेंट कीं तो रविंद्र घरभरण उसका लेआउट प्लान देखकर बहुत प्रसन्न हुए और मैटर से जुड़े बॉक्स पढ़कर खुशी से ताली बजाने लगे. उसी दिन शाम को उन्होंने शीला जी को फोनकर ‘ अंगजा’ की पांच प्रतियां और मांगीं जो उन्हें पहुंचा दी गयीं. अब तो हम लोगों का घरभरण दम्पति के साथ मेलजोल बढ़ गया और टीपी भाई साहब ने उन्हें कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आमंत्रित किया और कइयों में उन्हें मुख्य अतिथि भी बनाया गया.
कुछ दिनों के बाद ‘ दिनमान’ की हड़ताल खत्म हो गयी और मुझे मॉरिशस के बारे में रविंद्र घरभरण के माध्यम से खबरें मिलने लगीं. उन्होंने ग्रेटर कैलाश के ‘बी’ ब्लॉक में एक बड़ी खूबसूरत कोठी किराये पर ले ली थी . अब वहीं हम लोगों की मुलाकातें होने लगीं. कभी हम लोग रविंद्र घरभरण के यहां जाते तो कभी कभी घरभरण दम्पति टीपी भाई साहब के रविंद्र नगर के घर आते. घरभरण हमारे यहां भी आए थे. तब हम लोग सुदर्शन पार्क में रहते थे.एक बार रविंद्र घरभरण ने फोन करके बताया कि मारिशस के वित्तमंत्री रामास्वामी रिंगाडू दिल्ली आये हुए हैं मैंने उनसे आपका इंटरव्यू तय कर दिया है, आप शाम को मेरे घर आ जाओ. मैंने रामास्वामी रिंगाडू का इंटरव्यू किया जो ‘ दिनमान’ के लिए एक्सक्लुसिव था. यही श्री रिंगाडू आगे चलकर मॉरिशस के राष्ट्रपति बने. मैंने रविंद्र घरभरण से प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम से भेंट कराने के लिए भी निवेदन किया. वह दिन जल्दी आ गया. घरभरण का संदेश आया कि शाम को ‘चचा’ हमारे यहां आने वाले हैं. उनके सम्मान में एक पार्टी रखी गयी है जिसमें आप लोगों को भी शामिल होना है. रविंद्र घरभरण ने चचा के साथ मेरी विशेष मुलाक़ात का प्रबंध कर रखा था एक अलग कमरे में.
जब मैं रविंद्र घरभरण के ग्रेटर कैलाश के निवास पर पहुंचा तो वह मुझे देखकर खुश हुए और बोले कि झुनझुनवाला दम्पति कहाँ रहै गयी, मैंने कहा कि आते ही होंगे. इतने में देखा कि सर शिवसागर रामगुलाम पधार गए हैं, रविंद्र घरभरण ने उनका स्वागत करते हुए क्रिओल में कहा कि यह त्रिलोक दीप हैं, पत्रकार हैं और मॉरिशस के मित्र. आपसे अलग से बात करेंगे. इसकी व्यवस्था मैं ने कर दी है. हम दोनों को एक अलग कमरे में बिठाया गया. इससे पहले वह कुछ बोलते मैंने उनसे पूछ लिया कि क्या मैं आपको ‘चचा’ संबोधित कर सकता हूं. मैं आपसे 35 बरस छोटा हूं. वह हँसे और बोले, ‘ ठीक’. चचा बहुभाषी हैं, पेशे से फिज़िशियन हैं, भोजपुरी भाषी हैं, उनके पिता मोहित रामगुलाम भोजपुर, बिहार से मारिशस गए थे. वह भारतीय संस्कृति से पूरी तरह से परिचित हैं. वेद, रामायण, उपनिषद और भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथों का ज्ञान रखते हैं.लेकिन पड़ गए राजनीति में. क्यों? सर शिवसागर रामगुलाम ने खुद ही बताया कि ‘अपने मित्रों के समूह के बीच रहते रहते स्थानीय राजनीति और महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रास बिहारी बोस के नेतृत्व में चल रहे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर होने वाली चर्चाओं को सुना करते थे जो बाद के बरसों में उनकी राजनीतिक मान्यता का आधार थी. इसके चलते मैंने मॉरिशस की स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी. यह प्रेरणा मुझे भारतीय नेताओं को सुनते सुनते ही मिली.’
आपने लंदन में चिकित्सा की पढ़ाई जब पूरी कर ली तो प्रैक्टिस न करके राजनीति से कैसे जुड़ गए उन्होंने बताया कि ‘यहां अधिकांश आबादी, जिसमें अनुबंधित भारतीय मज़दूर और गुलाम अफ्रीकियों के वंशज शामिल थे, की दशा अत्यंत दयनीय और खराब थी. लिहाज़ा मैंने उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिए काम किया और यूनियन मॉरीशिएन पार्टी में शामिल हो गया. लेकिन वहां मुझे मन का काम करने में दिक्क़त पेश आयी तो 1946 में मैं लेबर पार्टी में शामिल हो गया जिसके प्रमुख नेता गाय रोज़ेमोंट की देश में अच्छी साख थी और लोगों में खासे लोकप्रिय भी थे. लेबर पार्टी का एक समाचार पत्र था ‘एडवांस’. उसमें मैं अपने उपनाम ‘ थंब मार्क’ के नाम से रूढ़िवादी चीनी उद्योगपतियों को चुनौती देते हुए सार्वभौमिक मतधिकार,आर्थिक सुधार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर लिखा करता था. इसका समाज पर माकूल प्रभाव पड़ा. इसके चलते मैं 1940 से 1953 तक राजधानी पोर्ट लई से निर्वाचित नगर पार्षद रहा. 1956 में पुन: निर्वाचित हो जाने से उपमहापौर और 1958 में लार्ड मेयर बना. 1958 में मुझे औपनिवेशिक सरकार ने कोषागार मंत्री का सचिव बना दिया. इस बीच 1956 में गाय रोज़ेमोंट की मृत्यु के बाद 1959 में मुझे मॉरिशस लेबर पार्टी का प्रमुख बना दिया गया. 1982 तक मैं इस पद पर रहा.’
सर शिवसागर रामगुलाम अपने अतीत के कार्यों के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ‘अब देश में मेरा महत्त्व बढ़ गया था.लेबर पार्टी तब बहुत मज़बूत पार्टी थी. 1961 में लंदन में संवैधानिक सम्मेलन में ‘मॉरीशस पार्टी’ स्वतंत्रता की बजाय राष्ट्रमंडल के भीतर ब्रिटेन के साथ एकीकारण के पक्ष में थी लेकिन 1959 में ब्रितानी प्रधानमंत्री हेरल्ड मैकमिलन यह तय कर चुके थे कि ‘अफ्रीका पर बदलाव की हवा चल रही है’ के तहत केवल हांगकांग, जिब्रालटर और फॉकलैंड को छोड़कर अपने सभी उपनिवेशों को आज़ाद कर देगा.इसी प्रकार ब्रिटेन के प्रमुख राजनेता और लेबर पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 1947 से एशियाई देशों को उपनिवेशों से मुक्ति देते हुए भारत के साथ साथ बर्मा, श्रीलंका और जॉर्डन को स्वतंत्रता प्रदान की थी. एटली को ब्रिटेन में ‘ ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना’ और भारत की स्वतंत्रता देने के लिए जाना जाता है. वह द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान (1942-45), विंस्टन चर्चिल की गठबंधन सरकार में उपप्रधानमंत्री थे. 1945 के आम चुनाव में उनकी लेबर पार्टी ने भारी जीत हासिल की और क्लेमेंट एटली देश के प्रधानमंत्री बने थे.
1963 में आम चुनाव के बाद ‘मॉरीशस पार्टी’ के तत्कालीन उपनेता गैटन डुवाल ने एक बार फिर ब्रिटेन के साथ एकीकरण के लिए पैरवी की जिसे ब्रिटिश सरकार ने अस्वीकार करते हुए कहा कि वह ‘एकीकारण को मॉरिशस के लिए एक व्यवहारिक प्रस्ताव नहीं मानते, भले ही मॉरिशस की अधिकांश पार्टियां इसे चाहती हों.’ ‘चाहती हों ‘वाले शब्द में पेंच था जिस के प्रति हमें चौकस रहना था. वह पेंच यह था कि मॉरिशस में बेशक 68 प्रतिशत भारतीय मूल के लोग थे (ज़्यादातर हिंदू) फिर भी 28% क्रियोल और दो प्रतिशत फ्रेंच खेल को बिगाड़ सकते थे. चीनी भी आबादी का तीन फीसदी थे. उनकी निष्ठा डांवाडोल रहती है. मॉरिशस में 5-6 प्रतिशत भोजपुरी बोलते हैं तो 4-5 फीसदी फ्रेंच. सबसे अधिक 90 प्रतिशत क्रियोल बोलते हैं. धर्म के लिहाज़ से 48 प्रतिशत हिंदू हैं, 32 प्रतिशत ईसाई, 18 फीसद इस्लाम, शेष में चीनी या किन्ही धर्मों या संम्प्रदायों के लोग हो सकते हैं या नास्तिक भी. पेंच है क्रियोल भाषियाओं का. हम लोगों में से अधिकांश घर में क्रियोल बोलते हैं.
सवाल पूछा जाता है कि यह क्रियोल भाषा है क्या! मॉरिशस में क्रियोल का मतलब वहां यह ऐसी भाषा है जो मुख्य रूप से फ्रेंच पर आधारित है लेकिन इसमें भोजपुरी, अंग्रेज़ी, अफ़्रीकी और कुछ एशियाई भाषाओं के शब्द भी शामिल हैं. मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि यह एक मिश्रित भाषा है जो औपनिवेशक काल के दौरान विभिन्न संस्कृतियों से आए गुलामों और अनुबंधित श्रमिकों ने देश में भाषा की एक विविध विरासत छोड़ी है. मॉरिशस गणराज्य की संपर्क भाषा मॉरिशस क्रियोल है. इसके विकल्प के रूप में अंग्रेज़ी और फ्रेंच दोनों का उपयोग किया जाता है. अंग्रेज़ी प्रशासन और शिक्षा की भाषा है जबकि फ्रेंच मुख्यतया मीडिया में उपयोग में लाई जाती है. आज देश की स्थिति ऐसी हो गयी है कि मॉरिशस क्रियोल यहां की पैतृक भाषा बन गयी है जो अमूमन हर घर में बोली जाती है.
‘पूर्ण स्वाधीनता से पूर्व ब्रिटेन का एक औपनिवेशक ऑफिस होता था जिसे कुछ लोग लेजिस्लेटिव कौंसिल भी कहते थे. 1961 से 1965 तक मैंने मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री के रूप में कार्य किया, फिर 1965 से 1968 तक प्रधानमंत्री के रूप में. स्वाधीन मॉरिशस के प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने में खासी मशक्क्त करनी पड़ी.ब्रिटेन में लेबर पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री हेरल्ड विल्सन ( अक्टूबर,1964-जून, 1970) हमें पूरी आजादी देने के पक्ष में थे लेकिन सही स्वाधीनत की राह में अभी भी कई रोड़े थे जिसमें कुछ अपने लोग भी शामिल थे’… और इसके लिए आपको नैरोबी में स्वामी कृष्णनांद सरस्वती के प्रवचन सुनने के लिए जाना पड़ा!अब चचा के चौंकने की बारी थी. क्या आप स्वामी जी को जानते हैं?मैंने कहा, ‘बहुत अच्छी तरह 1963 से’.तब तो आपको सब कुछ मालूम होगा. चचा बोले. लेकिन हक़ीक़त मैं आपके मुंह से सुनना चाहता हूं.’
सर शिवसागर रामगुलाम ने बताना शुरू किया कि उन्हें उगांडा के प्रधानमंत्री मिल्टन ओबोटे के करीबी रहे डॉ गुरुदयाल सिंह से बहुभाषाविद और बहुआयामी स्वामी कृष्णानंद सरस्वती के बारे में पता चला कि वह आम संत नहीं बल्कि महान विद्वान हैं. वह शुद्ध फकीर और फक्कड़ हैं और वह किसी मंदिर या आश्रम के लिए चंदा नहीं उगाहते.शाम को लोगों को धार्मिक प्रवचन देते हैं और सुबह चिकित्सा और आध्यात्मिक शिविर लगाकर लोगों को मानव जाति की सेवा की ओर उन्मुख करते हैं. ये शिविर केवल भारतीय मूल के लोगों के लिए ही नहीं होते बल्कि उसमें स्थानीय आबादी को भी लाभ उठाने की छूट रहती है. अफ़्रीकी देशों में गुरबत बहुत है और बीमारी भी. लिहाज़ा स्वामीजी अमीरों से दान लेकर गरीबों की मदद करते हैं. उनके शिविरों का अवलोकन करने के लिए घना के राष्ट्रपति डॉ क्वामे ऐनक्रूमा सहित कई अफ़्रीकी नेता आते थे. सभी अफ़्रीकी देशों में स्वामीजी के सेवा कार्यों की गूंज है.एक दफ़े स्वामीजी के आग्रह पर कांगो के विद्रोहियों ने अपने कब्ज़े में लिए गए सभी बंधकों को रिहा कर दिया जिसमें अमेरिकी बंधकों की संख्या अधिक थी. स्वामीजी जी के इस मानवीय कार्य के प्रति अपना आभार और कृतज्ञता प्रकट करते हुए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डवाइट डी आइज़नहॉवर ने उन्हें अमेरिका न्योता था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्वामीजी से अफ़्रीकी देशों की तर्ज़ पर अमेरिका में भी चिकित्सा और आध्यात्मिक शिविर आयोजित करने का निवेदन किया. स्वामीजी ने उनके अनुरोध को मानते हुए कैलिफोर्निया में शिविर लगाए.ये शिविर अगले राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी और उनके बाद के राष्ट्रपतियों के शासनकल में भी
चलते रहे.
सर शिवसागर रामगुलाम स्वामीजी से नैरोबी में मिले. स्वामीजी के प्रवचन समाप्त होने के बाद जब सब लोग उठकर चले गए तो ‘मैंने स्वामीजी से निवेदन किया कि मॉरिशस को आज आपकी बहुत ज़रूरत है. वहां की 68 प्रतिशत जनसंख्या भारतीयों की है जिनमें हिंदुओं की तादाद सबसे ज़्यादा है. आज हम हिंदुओं को सबसे ज़्यादा खतरा क्रियोल से है. उनका रहन सहन और जीवन शैली युवाओं को आकर्षित करती है जिसकी वजह से वह अपनी संस्कृति, संस्कारों परपरा से दूर होते जा रहे हैं.इस भटकी हुई पीढ़ी को अपनी सभ्यता, धर्म, आध्यात्म और संस्कारों के बारे में बताने की बहुत आवश्यकता है और यह काम सिवाय आपके और कोई नहीं कर सकता’. चचा ने बताया कि मेरी बात सुनकर पहले वह हंसे और बोले कि आपको मुझ पर इतना विश्वास है तो हम ज़रूर मॉरिशस आएंगे. स्वामीजी ने अपना वादा निभाया और वह 1967 में मॉरिशस पहुंच गए. स्वासेमीजी मॉरिशस के लिए अनजान नहीं थे. उनके सेवा कार्यों से लोग परिचित थे. नैरोबी में स्वामीजी से भेंट करने के बाद सर शिवसागर रामगुलाम ने देशवासियों से कहा कि स्वामीजी ने मॉरिशस आने की हमारी विनती स्वीकार कर ली है. जिस दिन वह राजधानी पोर्ट लुई हवाई अड्डे पर उतरे तो ऐसा लगा कि उनके स्वागत के लिए पूरा मॉरिशस उमड़ पड़ा है. स्वामीजी को एयरपोर्ट से खुली गाड़ी में डॉ रामगुलाम के साथ उनके गंतव्य की ओर जब ले जाया जा रहा था तो स्वामीजी ने सड़कों की दोनों ओर खड़ी भीड़ को दोनों हाथों से आशीर्वाद दिया. लोग गदगद थे. सर शिवसागर रामगुलाम की खुशी का ठिकाना नहीं था.
मॉरिशस पहुंचकर स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने पहला काम क्या किया के उत्तर में चचा ने बताया कि शाम को उन्होंने एक प्रार्थना सभा की जिसकी शुरुआत उन्होंने नरसी मेहता के उस पद से की ‘ वैष्णव जन तो तैने कहिए, ये पीड़ पराई जाणे रे’ के बाद अपने भक्तिभाव के प्रवचनों से लोगों को आनंदित करते हुए उन्होंने हनुमान चालीसा, गीता और रामायण को भी उदधृत किया. लेकिन उन्होंने कहा कि मेरे ईश्वर के दर्शन किसी मंदिर या तीर्थस्थल पर नहीं होते बल्कि दीन दुखी, दरिद्र और दवा दारू से वंचित लोगों की सेवा करके होते हैं. मैं मानव सेवा में ही प्रभु सेवा समझता हूं.’ इस प्रार्थना सभा का कितना असर पड़ा के जवाब में चचा ने बताया कि लोगों और खास तौर पर युवाओं को भी है पता लग गया कि यह संत केवल धार्मिक प्रवचन ही नहीं करता वरन ‘समाज में व्याप्त कोढ़’ के निराकरण के बारे में भी सोचता है. इस प्रार्थना सभा से भारतीय मूल के युवाओं के अतिरिक्त भारतीय मुस्लिम, क्रियोल और चीनी भी थे क्योंकि वह हिंदी के साथ अंग्रेज़ी और फ्रेंच भाषाओं का भी प्रयोग कर जाते थे और मॉरिशसवासी भी एक से अधिक भाषाओं के जानकार हैं . लिहाज़ा युवाओं के मन में स्वामी जी के प्रति आदर सम्मान के साथ उन्हें व्यवहारिक, सामाजिक और सकारात्मक सोच वाले संत की छवि बनने लगी. जनसमूह में लोग स्वामीजी को धर्म- आध्यात्म योग की एक ऐसी त्रिवेणी मानने लगे जो जनमानस को प्रभावित करती है. स्वामीजी अपने प्रवचनों में केवल हिंदू ग्रंथों को ही उदधृत नहीं करते थे बल्कि ईसाइयों की बाइबिल, मुसलमानों की कुरान और सिखों गुरु ग्रंथ साहब की वाणी को भी उदधृत करते थे.
1968 में मारिशस में स्वतंत्रता संभावित थी लेकिन अंग्रेज़ों की कुटिल नीति से वह सर शिवसागर रामगुलाम को आगाह करते रहते थे. जाते जाते अंग्रेज़ भारत को दोफाड़ कर गए थे, आप लोग भी चौकस और सतर्क रहना. मॉरिशस आगमन के दूसरे दिन स्वामीजी ने चचा से पोर्ट लुई और उसके आसपास के गांव दिखाने के लिए कहा. उन्हें बताया गया कि पोर्ट लुई महज 18 किलोमीटर में फैला हुआ है. स्वामीजी ने अपनी इस यात्रा में गाड़ी से उतर कर आम लोगों से बातचीत की, दुकानदारों से मिले और उनके साथ हिंदी में बातचीत की. स्वामीजी जी को यह जानकर अच्छा लगा कि भारतीय मूल का आम आदमी हिंदी और भोजपुरी बोलने में सहज है. मॉरिशस के गाँवों को देखकर बोले कि ये तो छोटे शहरों की तरह हैं बहुत साफ सुधरे और आधुनिक
सुविधाओं से परिपूर्ण. उन्होंने पाया कि यहां की महिलाएं भी बहुत जागरूक हैं और पुरुषों से किसी तरह से कमतर नहीं हैं.की सेवाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहते थे.अपने आगमन के दूसरे दिन स्वामीजीने कहा कि मॉरिशस के गांवों में जाकर वहां के ग्रामीण जीवन का भी आकलन कर सकें. वह सुबह सुबह निकले. उन्हें बताया गया कि पोर्ट लुई केवल 18 किलोमीटर में फैला हुआ है वह एक दिन में देख लेंगे. स्वामीजी ने दो दिन निश्चित किए. रास्ते में वह आम लोगों से मिलते. हिंदी में उनसे बातचीत करते. किसी दुकान में भी घुस जाते. दुकान मालिक से उनके परिवार के बारे में पूछते और उनके पूर्वजों के बारे में भी. स्वामीजी को गाड़ी के बाहर खड़ा देख भीड़ जमा हो जाती. इस भीड़ से भी वह बेसख्ता सवाल पूछे. एक व्यक्ति से पूछा कि साल में कितने त्योहार मनाते हो? उसने उत्तर दिया शिवरात्रि, दीवाली, क्रिसमस और ईद. इस पर स्वामीजी ने कहा कि क्या आप लोगों को होली,दशहरा, छठ पूजा, रामनवमी, विक्रमी संवत, नवरात्रि के बारे में नहीं पता. वहां मौजूद सभी लोग एक दूसरे की तरफ ताकने लगे. इन त्योहारों के महत्व के बारे में समझाते हुए स्वामीजी ने कहा कि मैं आप लोगों के साथ ये त्योहार मनाकर इनके बारे में विस्तार से बताऊंगा
पोर्ट लुई के साथ जुड़े कुछ गाँवों को भी स्वामीजी ने देखा. इन गाँवों की साफ सफाई देखकर वह बोले, ये गांव कहाँ हैं, ये तो बड़े शहरों का ही विस्तार हैं, हर तरह की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण. स्वामीजी को अपने बीच पा ये ग्रामीण बहुत खुश हुए और उनसे मिलने के लिए धीरे धीरे पूरा गांव ही इकट्ठा हो गया. सारा गांव पिछले दिन टीवी पर स्वामीजी के प्रवचन सुन अपने आपको बहुत उपकृत मान रहा था. स्वामीजी ने ग्रामीण महिलाओं की स्थिति, उनकी जीवनशैली, दिनचर्या आदि के बारे जब पूछा तो कुछ महिलाओं ने आगे आ कर बताया कि वे घर को संभालती हैं, बच्चों का लालन पालन करती हैं और छोटी मोटी दुकानदारी भी. कुछ महिलाएं समाज सेवा से भी जुड़ी हैं तो कुछ पोर्ट लुई में कामकाज करने के लिए भी जाती हैं. सर शिवसागर रामगुलाम मुझे स्वामी जी के बारे में बताते हुए बड़ी प्रसन्न मुद्रा में दीख रहे थे.
क्या स्वामी कृष्णानंद सरस्वती के मॉरिशस आगमन से लोगों की सोच पर कोई फर्क पड़ा ? चचा प्रसन्न होकर बोले, ‘बहुत ज़्यादा, ज़मीन आसमान का’. और तथाकथित ”बिगडैल’ युवाओं का क्या हाल है? वह काफ़ी सुधर गए हैं. एक दिन स्वामीजी ने पढ़े लिखे युवाओं से मिलाने के लिए कहा. मैंने 50 युवाओं का प्रबंध कर दिया. उन युवाओं के रहने, खाने पीने और ओढ़ने बिछाने का इंतज़ाम भी कर दिया. यह एक तरह का शिविर था जहां स्वामीजी इन युवाओं को प्रशिक्षित करना चाहते थे. उन्हें एक बड़े हॉल में ठहराया गया. स्वामीजी ने पाया कि दो दिन में दस शिविरार्थी गायब हो गए. शायद उन के चंचल और अस्थिर स्वभाव को यह बंदिश और कड़ा अनुशासन लगा. शेष चालीस के साथ स्वामीजी हॉल में ही सोने लगे. इन्हें वह अपना स्वयंसेवक कहते थे.स्वामीजी ने उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास तथा उसकी महानता के बारे में बताया. दो दिनों तक स्वामीजी ने इन स्वयंसेवकों को हर प्रकार के ज्ञान से इस कद्र परिपूर्ण कर दिया कि वह चाहते थे कि स्वामीजी सदा उन्हें नए नए आयामों के बारे में बताते रहें. लेकिन ऐसा हो न सका. एक दिन स्वामीजी ने अपने स्वयंसेवकों को गांव गांव में इन सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, योग आदि की जानकारियों को आम लोगों से बांटने के लिए कहा. ‘तुम्हें आम लोगों के साथ एकरूप और एकाकार होकर इस देश को जगाना है, स्वतंत्र कराना है, हिंदू समाज में एकता की भावना विकसित करना है. मैं हर कदम पर तुम लोगों के साथ हूं. आप लोग धार्मिक शिविरों का आयोजन कर एक अच्छे संगठन के रूप में काम करना है.’
सर शिवसागर रामगुलाम धाराप्रवाह बोले जा रहे थे. ये भाव न जाने कबसे उन्होंने अपने भीतर ज़ज़्ब कर रखे थे चचा ने बताया कि स्वामी जी हर वस्तु में धर्म देखते थे. लिहाज़ा उन्होंने स्थिति साफ करते हुए कहा भी था कि हमारा कोई कट्टरपंथी संगठन नहीं है क्योंकि सेवा अपने आप में एक धर्म है. इस संगठन की देश की स्वतंत्रता में अहम् और बेमिसाल भूमिका थी.कहीं ब्रिटेन द्वारा मॉरिशस को सत्ता सौंपते समय किसी प्रकार की गड़बड़ न हो, स्वामीजी ने चलीस स्वयंसेवकों को महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात कर रखा था. मैं बिना किसी लागलपेट के कह सकता हूं कि अगर स्वामीजी मॉरिशस न आये होते तो हम लोग इतनी जल्दी स्वतंत्र न हो पाते, न भारतवंशियों में एकता की भावना बलवती होती और न ही भारतीय संस्कृति अक्षुणण रह पाती. उस दिन देश भर में दीवाली मनाई गयी. 150 वर्ष की गुलामी के बाद मॉरिशस स्वतंत्र देश की वायु में सांस ले रहा था.
यह पूछे जाने पर कि मॉरिशस की आजादी की तारीख किसने तय की थी, डॉ रामगुलाम का जवाब था ‘स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने. उनकी दलील थी कि 12 मार्च का ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है. महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के ‘नमक एकाधिकार’ को तोड़ने के लिए साबरमती आश्रम से दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) तक की ऐतिहासिक यात्रा शुरू की थी.’ सर शिवसागर रामगुलाम का निधन गवर्नर जनरल के पद पर रहते हुए हुआ था. वह 28 दिसंबर, 1983 से 15 दिसंबर, 1985 तक रहे.(ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के 24 साल बाद, 12 मार्च, 1992 को मॉरिशस गणराज्य घोषित किया गया.)
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वामीजी के संगठन का क्या हुआ के बाबत चचा ने बताया कि स्वामीजी ने उसका विघटन कर दिया. कुछ स्वयंसेवकों को ऊँची शिक्षा के लिए भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी आदि देशों में भेज दिया. कुछ को मैंने अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया. यहां यह बताना भी अभीष्ट होगा कि दुनिया के जिन देशों में मॉरिशस के राजदूत/ उच्चायुक्त नियुक्त किए गए उनमें अधिसंख्य स्वामी जी के स्वयंसेवक थे. मॉरिशस की आजादी के बाद तो स्वामीजी का काम खत्म हो गया होगा, वह यहां से कहाँ गए? डॉ शिवसागर रामगुलाम हंसे और बोले, एक तो स्वामी जी ने हमें और हमारी सरकार को जमाया था. हमारे छोटे से द्वीप पर बड़े देशों की नज़रें थीं उस में भी स्वामीजी की सलाह हमारे लिए बहुत मुफीद साबित हुई, और दूसरे भारत से भी तो उन्होंने ही हमें विधिवत मिलवाया था. इसके अतिरिक्त स्वामीजी मॉरिशसवासियों की आदत में शुमार हो गए थे. वह मॉरिशस की आत्मा थे, रूह थे.उनके बिना हमारा जीवन कंकाल था. उनकी मुस्कान, उनके विद्वतापूर्ण प्रवचन केवल भारतीयों को ही नहीं पूरे मॉरिशस को जोड़ते थे. उनका आश्रम हरेक के लिए खुला था. फिर हंसकर बोले आज भारत सरकार से मॉरिशस को जो इज़्ज़त सम्मान मिल रहा है उसके कर्णधार स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ही हैं.
क्या कारण है कि मॉरिशस की स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात् भारतीय मीडिया स्वामी कृष्णानंद सरस्वती की भूमिका के बारे में जानता नहीं? चचा ने कहा कि इस बारे मैं क्या कह सकता हूं, अफ़्रीकी मीडिया स्वामी जी के योगदान के बारे में भलीभांति परिचित है और खूब लिखता भी रहता है. बेशक खबर के भीतर की खबर जानने के लिए खासे किस्म की खोजी नज़रों की ज़रूरत होती है. सर शिवसागर रामगुलाम ने बताना शुरू किया 12 मार्च, 1968 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मैं स्वाधीन मॉरिशस का पहला प्रधानमंत्री कैसे बना बना.
मैंने उनसे पूछा कि इस बार भारत आने की कोई खास वजह! इसका उत्तर उन्होंने कुछ यों दिया था ‘भारत हर मॉरिशसवासी के लिए एक तीर्थ स्थान है. इसकी पुण्यभूमि की माटी अपने माथे पर लगाकर हम गौरव का अनुभव करते हैं. हमारे पूर्वज बिहार से गए थे. वहां भी मैं जाना चाहता था लेकिन कुछ प्रोटोकोल की दिक्क़तें हैं. कोई बात नहीं. आप सब लोगों से मिलकर अच्छा
लगता है.
अब मैंने उनसे भारत सरकार के मंत्रियों से मिलने और बातचीत पर जब चर्चा की तो उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ बहुत ही उपयोगी और सौहार्दपूर्ण बातचीत रही. हमारे देश के विकास और समस्याओं के बारे में पूछती रहीं. वह मॉरिशस से बहुत प्यार करती हैं. 1968 में मॉरिशस की आजादी का बाद जून 1970 में जब वह पधारी थीं तो ऐसा लगा था कि
मॉरिशस की पूरी बारह लाख की आबादी उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़ी है. मॉरिशस की स्वाधीनता के बाद हमारे देश आने वाली वह पहली शासनाध्यक्ष थीं. वह 2-6 जून, 1970 तक मॉरिशस में रहीं और नवस्वाधीन देश के मसलों को समझने और उनका समाधान करने की दिशा में ठोस सुझाव दिए और हर प्रकार की सहायता भी. उन्होंने 4 जून, 1970 को महात्मा गांधी संस्थान की नींव रखी. उन्होंने तब मॉरिशस को ‘छोटा भारत’ कहा था. इसके बाद भी वह कई बार मॉरिशस आयीं.
और किन किन लोगों से बात हुई? कुछ मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों से. दरअसल श्रीमती इंदिरा गांधी ने सभी संबंधित मंत्रालयों को हमारी विशेष आवश्यकताओं के बारे में ब्रीफ कर रखा था. कुछ मंत्रियों से बाद में मॉरिशस में मिल लेंगे और कुछ से राबिन (रविंद्र घरभरण) संपर्क कर लेंगे. उसने यहां पर अपनी और देश की अच्छी छवि बना रखी है. वित्तमंत्री रिंगाडू बता रहे थे. और स्वामीजी कितने याद आते हैं, उत्तर मिला, बहुत. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी स्वामीजी के बारे में पूछ रही थीं. 1970 में उनके मॉरिशस दौरे के दौरान उनकी स्वामी जी से लंबी बातचीत हुई थी.
स्वामी कृष्णानंद सरस्वती आपके लिए कितना महत्व रखते हैं जितना जिस्म का रूह से होता है. वास्तव में वह मॉरिशस के राष्ट्रपिता हैं. वहां के लोगों और राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के भी वह आराध्य हैं. उनके बिना मॉरिशस ‘अर्थहीन’ है.1992 में स्वामीजी को मॉरिशस आए 25 वर्ष हो जाएंगे. उस दिन की सारा मॉरिशस इंतज़ार कर रहा है. इतने में कमरे पर दस्तक दे रविंद्र घरभरण भीतर आकर बोले, दीप बाहर चचा से मिलने के लिए लोग बेताब हो रहे हैं, तुम हो कि तुम्हारी बातें खत्म ही नहीं होतीं. मैंने कहा कि मुझसे नहीं चचा से पूछो. और चचा मुस्कुरा दिए.
अफ़सोस कि दोनों ही स्वामी जी के देशव्यापी रजत जयंती के समारोह नहीं देख पाए थे. 23 अगस्त,1992 को स्वामीजी के ब्राह्मलीन हो जाने से उनके सम्मान में आयोजित समारोह मातम में तब्दील हो गया. सर शिवसागर रामगुलाम का 1985 में निधन हो चुका था.












