जी हां, यह हक़ीक़त है. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार (1980-84) में महाराजा राव बीरेंद्र सिंह (20 फरवरी, 1921-30 सितम्बर 2009) के पास पांच मंत्रालयों का कार्यभार था. वे थे, खाद्य, कृषि, सिंचाई, ग्रामीण विकास और नागरिक आपूर्ति तथा सहकारिता. इस कार्यकाल में उनका आवास था 5, जनपथ. महाराजा इसलिए क्योंकि उनका जन्म रेवाड़ी के यदुवंशी अहीर शाही परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम राव बलबीर सिंह था जो अपने आपको 1857 के क्रांतिकारी राजा राव तुलाराम सिंह का वंशज मानते थे. इसी 5, जनपथ में मेरा अक्सर आना जाना रहता था. केंद्रीय मंत्री राव बीरेंद्र सिंह जो वहां रहते थे. मेरी उनसे बहुत अच्छी ट्यूनिंग थी. जब वह मंत्री नहीं भी थे तब भी 5, जनपथ उनका निवासस्थान था. उसके बाद वह लोदी एस्टेट में भी रहे लेकिन 5, जनपथ से उनसे जुड़ी मेरी बहुत मधुर स्मृतियां हैं.
उनसे रूबरू मेरी मुलाक़ात तो ‘दिनमान’ के समय हुई थी लेकिन उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व से मैं बहुत पहले से परिचित था. इसी 5, जनपथ में इंदरकुमार गुजराल से भी मेरी महत्वपूर्ण भेंटवार्ताएँ हुआ करती थीं. प्रधानमंत्री होते हुए भी इंदरकुमार गुजराल 5, जनपथ में ही रहा करते थे. उनके निधन पर उनका शव भी लोगों के दर्शनार्थ यहीं रखा गया था. बताया जाता है कि न तो चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवगौड़ा और न ही इंदरकुमार गुजराल 7, रेसकोर्स रोड (वर्तमान लोक कल्याण मार्ग) में निवास की दृष्टि से रहे थे लेकिन सरकारी, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए उस स्थान का इस्तेमाल अलबत्ता किया करते थे. समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के सौजन्य से दिए जाने वाले रामकृष्ण जयदयाल सदभावना पुरस्कार प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने इसी प्रधानमंत्री आवास से दिए थे. चंद्रशेखर जी अपने साउथ एवेन्यू वाले फ्लैट में ही रहे. प्रधानमंत्री निवास में उन लोगों का न रहने का कारण साफ था. ये सभी सरकारें बैसाखियों पर चल रही थीं. चौधरी चरणसिंह की सरकार 171 दिन रही जबकि चंद्रशेखर की 224 दिन, एच डी देवगौड़ा की 325 दिन और इंदरकुमार गुजराल की 333 दिन. 5, जनपथ गुजराल साहब का सरकारी निवासस्थान था. उनका निजी घर तो महारानी बाग में था, बहुत शानदार निवास.
अब आते हैं राजा राव बीरेंद्र सिंह पर. 20 फ़रवरी, 1921को जन्मे बेशक वह शाही परिवार से संबंध रखते थे लेकिन उनका जीवन सामान्य व्यक्ति की तरह ही था. उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में पढ़ाई की. दूसरे विश्वयुद्ध के वक़्त वह प्रादेशिक सेना (टेरिटरियल आर्मी) में रहे. 1947 में उन्होंने प्रादेशिक सेना से इस्तीफ़ा दे दिया. 1949-50 बैच की अखिल भारतीय सेवाओं में उनका भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में चयन हो गया लेकिन उसे ज्वाइन न करके 1950 से 1951 तक उन्होंने प्रादेशिक सेना को तरजीह दी और वह वहां कमिश्नड ऑफिसर बन कैप्टेन रिटायर हुए. सेंट स्टीफन कॉलेज की पढ़ाई के बाद राजनीति की ओर उनका झुकाव हुआ और 1952 में अपनी जन्मभूमि अहीरवाल क्षेत्र से उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवा के तौर पर चुनाव लड़ा और वह हार गये.उसके बाद वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गये.पंडित जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजी भाषा में उनके बेहतरीन उच्चारण और प्रगतिशील विचारों से बहुत प्रभावित हुए. उनकी शाही पृष्ठभूमि और उनकी नेतृत्व की कुशलता उनके बहुत काम आयी. जो शाही और राजसी रियासतें स्वतंत्र भारत में विलय को लेकर अड़ियल और ज़िद्दी रुख अख्तियार किये हुए थीं उन्हें साधने में राजा राव बीरेंद्र सिंह ने बहुत सहायता की.
राव बीरेंद्र सिंह भी तो अहीरवाल के राजा थे और राव तुलाराम के वंशज. अहीरवाल के अंतर्गत गुड़गांव ( वर्तमान गुरुग्राम) के उत्तरी तथा पश्चिमी भाग, महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी के पूरे ज़िले, रोहतक के झज्जर, कोसली, भिवानी ज़िले की तहसीलों का कुछ भाग तथा राजस्थान की बहरोड़,मुंडावर और बानसूर स तहसीलें. क्योंकि यहां सबसे अधिक आबादी अहीर लोगों की थी इसलिए इस क्षेत्र का नाम अहीरवाल अर्थात’अहीरों का प्रदेश’ पड़ा. समय समय पर इनकी सीमाएं बदलती रही हैं. यह कृषि प्रधान प्रदेश है. साहबी यहां की मुख्य नदी है. वर्षा ठीक ठाक हो जाने से अन्न पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होता है. यहां के लोगों के पास पशु भी अधिक तादाद में हैं. महेंद्रगढ़ ज़िले में सभी प्रकार के खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं. अहीरवाल में अहीरों के अलावा जाट, राजपूत, ब्राह्मण, बनिए, गूजर, सैनी, मीणा, खाती, हरिजन, चमार, धानक आदि जातियां भी रहती हैं. मुसलमानों में सैयद, पठान, मेव आदि भी खूब हैं लेकिन क्या मजाल कि उनके बीच किसी प्रकार का दुराव पैदा होता हो. यहां के लोगों को वीर प्रकृति का माना जाता है. वह कड़े परिश्रम में विश्वास रखते हैं.अहीरवाल के लोगों में अलग अलग धर्म, जातियों के बावजूद आपसी भाईचारे की सुदृढ़ भावना है.
जब मैंने राव बीरेंद्र सिंह से राव तुलाराम के व्यक्तित्व और क्रांतिकारी जीवन के बारे में विस्तार से जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि 1857 में राव तुलाराम के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था.उस अवसर पर सभी जातियों ने एकजुट होकर राव तुलाराम का साथ दिया था. क्योंकि अहीरवाल कृषिप्रधान क्षेत्र था इसलिए अंग्रेज़ों ने शासन संभालते ही सबसे पहले यहां की समस्त कृषि भूमि का बंदोबस्त अपने हाथ में ले लिया. राव तुलाराम ने इसका डटकर विरोध किया. इसमें उन्हें साथ मिला मुग़ल सम्राट बहादुर शाह का, जो अंग्रेज़ों की आँख किरकिरी बने हुए थे.क्योंकि अहीरवाल दिल्ली दरबार के निकट है इसलिए बहादुर शाह ने भारत की स्वाधीनता के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों और स्वाधीनता सेनानियों को हर तरह की सहायता दी. राव तुलाराम और उनके चचेरे भाई गोपाल देव ने मुग़ल सम्राट को यह सूचना दी कि उनके चार से पांच सौ समर्थकों ने स्थानीय तहसीलदार को अपदस्थ कर रेवाड़ी पर कब्ज़ा कर लिया है तो यह खबर सुनकर वह बहुत खुश हुए और बोले थे कि मुझे उम्मीद है कि मेरे ये जांबाज़ अंग्रेज़ों के मंसूबों पर भी पानी फेर देंगे. इसकी उन्होंने जीतोड़ कोशिश की भी.
दूसरी तरफ अंग्रेज़ों ने रेवाड़ी की हार को बड़ी गंभीरता से लिया था.जहाँ उन्होंने हर मोर्चे पर अपनी पुख्ता तैयारी कर ली थी वहां राव तुलाराम ने भी अपनी तरफ से कोई कोरकसर उठा नहीं रखी थी. उनकी सैनिक शक्ति कमाल की थी. उनके पास हर क्षेत्र में प्रशिक्षित सैनिक बल, शस्त्र, तोपें , बारूद का बड़ा भंडार था. लेकिन अंग्रेज़ उनके मुकाबले कहीं अधिक शक्तिशाली थे. तुलाराम और उनके भाई गोपाल देव ने नसीबपुर (नारनौल) की लड़ाई में जमकर अंग्रेज़ों का मुकाबला किया और शुरू शुरू में ऐसा लगा कि राव तुलाराम का पलड़ा भारी है और अंग्रेज़ उनके अभेद्य किले तक पहुंचने में नाकामयाब हैं. लेकिन अंग्रेज़ बहुत शातिर थे. उन्होंने ऐसी रणनीति बनाई कि तुलाराम की सेना में बिखराव पैदा हो गया. यह समरनीति बहुत से अंग्रेज़ अफसरों के मारे जाने और गंभीर रूप से घायल हो जाने के बाद बनाई गयी थी. बेशक यह एक वीरतापूर्ण युद्ध था. भारतीय सैनिक इतने साहस और वीरता से पहले कभी नहीं लड़े थे. ब्रिटिश रिसालों को आज तक ऐसी ज़ोरदार टक्कर पहले किसी भी शत्रु ने नहीं दी होगी. बताया जाता है कि यदि भारतीय रिसाले के कमांडर राव तुलाराम के रिश्ते में भाई राव किशनसिंह वीरगति को प्राप्त न हुए होते तो इस जंग का नतीजा कुछ और होता.
राव बीरेंद्र सिंह आगे बताते हैं कि नसीबपुर (नारनौल) की इस पराजय के बाद राव तुलाराम हतोत्साहित नहीं हुए. हालांकि नवंबर, 1858 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने सब विद्रोहियों को आम माफ़ी देने का ऐलान कर दिया था लेकिन राव तुलाराम उस माफ़ी की जद में नहीं आते थे. उन्हें विद्रोहियों का नेतृत्व कर आग भड़काने वाला आदमी और अंग्रेज़ों का कट्टर विरोधी माना जाता था इसलिए उन्हें माफ़ी न देकर उन पर मुकद्दमा चलाने का फैसला हुआ.उनके सामने यह शर्त रखी गयी कि यदि वह तुरंत आत्मसमर्पण कर दें तो उनकी जान कि सलामती का वादा किया जा सकता है लेकिन राव तुलाराम को अंग्रेज़ों के झूठे वादों पर भरोसा नहीं था. उन्होंने राजस्थान का रुख किया. सबसे पहले वह जोधपुर के महाराजा तख़्त सिंह से मिले और उन्हें भारत को आज़ाद कराने की अपनी योजना से अवगत कराया. महाराजा तख़्त सिंह ने राव तुलराम की योजना से सहमति व्यक्त करते हुए रूस के सम्राट ज़ार के नाम एक पत्र दिया कि ‘ राव राजा उनका प्रतिनिधि है और सब बातें आपको तफसील से मुंहज़ुबानई बताएगा या लिखकर दे देगा.’ यह बात 26 अगस्त, 1859 की है. इसी आशय का एक पत्र बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह ने उन्हें दिया और जयपुर के महाराजा सवाई राम सिंह ने भी. उसके बाद वह कालपी पहुंचे. वहां नाना साहब और तातिया टोपे ने न केवल उनका स्वागत किया बल्कि अंग्रेज़ों की सेना के साथ लड़ने के लिए अपनी फ़ौज से मदद भी की.राव तुलाराम और तातिय टोपे की सेनाओं के बीच सीकर की लड़ाई लड़ी गयीजिसमें अंग्रेजी फ़ौज विजयी रही.
इसके बाद राव तुलाराम ने किसी तरह से हिंदुस्तान से निकल कर भारत की स्वाधीनता के लिए विदेशी शासकों की सहायता लेने का प्रयास किया. विदेशों में उन दिनों पानी के जहाज़ ही जाया जा सकता था. बेशक तुलाराम इस भागदौड़ में बहुत थक गए थे लेकिन उनके सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट था, भारत की आजादी का.जहाज की 40 दिनों की यात्रा के बाद वह ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे. वहां कई दिनों के बाद उनकी मुलाक़ात ईरान के शाह से हुई. राव राजा ने शाह को भारत की आजादी की योजना उनसे साझा की. शाह ने बड़ी सहानुभूति से उनकी योजना सुनी और उन्हें आश्वस्त किया कि ईरान उनकी ठोस मदद करेगा. शाह ने राव राजा को गोरों से चौकस और सतर्क रहते हुए बताया कि वह गोरों की नज़र से बचें.आपको हर जगह तलाशा जा रहा है.
बीस दिनों के बाद वह रूस की राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में सम्राट अलेक्ज़ेडर तृतीय से मिलकर उन्हें भारतीय आजादी की योजना के बारे में विस्तृत जानकारी लिखित में दी. इसके साथ जोधपुर, बीकानेर और जयपुर के राजाओं की ओर से ज़ार के नाम लिखे पत्र भी उन्हें सौंप दिये. ‘ज़ार’ शब्द का इस्तेमाल रूस के सम्राट के लिए माध्ययुगीनकाल से लेकर 20वीं सदी के प्रारंभ तक किया जाता रहा है.’ज़ार’ रूस के सर्वेसर्वा, निरंकुश सम्राटों के लिए किया जाता था. वे अपनी असीमित शक्ति, धार्मिक वर्चस्व, विशाल साम्राज्य विस्तार और अपार वैभवशाली जीवनशैली के लिए जाने जाते थे. यह शब्द लैटिन के ‘सीज़र’ से आया है जिसका अर्थ सम्राट होता है. लेकिन दुर्भाग्यवश पीटर्सबर्ग से ज़ार का कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ. और न ही ईरान से कोई अच्छी खबर सुनने में आयी. अब राव राजा तुलाराम ने अफ़ग़ानिस्तान जाने का निश्चय किया. वह यह सोचकर अफगानिस्तान गए थे कि हो सकता है वहां रहते हुए ईरान के शाह और रूस के ज़ार से कोई सकारात्मक संदेश प्राप्त हो जाये. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. अभी उनके मन में आशा की किरन बाकी थी. उन दिनों आवागमन के साधन बहुत ही कठिन और दुर्गम थे लेकिन राव तुलाराम के हृदय में भारत को आज़ाद कराने की लौ उन्हें साहस प्रदान कर रही थी.
तेहरान से वह अंजलि नामक जगह में आए. उन्हें सलाह दी गयी कि मशद जाएं. वहां कुछ दिन रुकें. वह ऐतिहासिक नगर है जहां की एक मस्जिद में तख्ते-तऊस रखा है जो नादिर शाह भारत से लूट कर लाया था. उसके बाद हरात में हिंदुस्तानी भाइयों से मिलें और मंदिरों के दर्शन करें. हरात पश्चिमी अफगानिस्तान का एक प्रमुख ऐतिहासिक शहर है जहां सिकंदर महान द्वारा निर्मित एक किला भी है. ‘खुरासान का मोती’ के नाम से प्रसिद्ध यह नगर ईरान की सीमा के निकट आर्थिक, सांस्कृतिक व कृषि केंद्र है. अफ़ग़ानिस्तान के एक शहर से दूसरे शहर तक जाना बड़ा कठिन और दुर्गम कार्य था. एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचने में कई दिन लग जाते थे. हरात से कंधार पहुंचने में 22 दिनों का कठिन सफर तुलाराम को तय करना पड़ा था.विभिन्न कबीलों के इस देश में एक कबीले की दूसरे कबीले से दुश्मनी की कई कहानियां हैं. बताया जाता है कि कंधार को सिकंदर महान ने बसाया था. राव तुलाराम को उम्मीद थी कि काबुल के अमीर दोस्त मोहम्मद खान से उनकी यहां मुलाक़ात हो सकती है. उनके पुत्र मोहम्मद अमीन खान ने उन्हें बताया था कि ‘अमीर बहादुर यहां जल्दी आने वाले हैं. वह हरात में किसी विद्रोह को दबाने के लिए बारह हज़ार सैनिकों के साथ आये. उनकी सेना में बहुत से हिंदुस्तानी थे. अमीर बहादुर ने राव राजा से कहा कि हरात के विद्रोह को दबाने के बाद वापसी में आपको काबुल ले चलूँगा. सब कुछ ठीक हो जाएगा. अंग्रेज़ मेरे भी दुश्मन हैं. उन्होंने मुझे भी बहुत पीड़ित किया है.
मगर कुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था. हरात में तो शांति स्थापित हो गयी मगर अमीर बहादुर का देहांत हो गया. उनके स्थान पर उनका बेटा शेर अली खान नया अमीर बहादुर बना. वह राव राजा और अपने पिता के बीच कीबातचीत से परिचित थे और करार से भी. उन्होंने राव राजा को अश्वस्त किया कि वह अपने पिता जी द्वारा आपको दिए वचन का पालन करेंगे, निश्चिन्त रहें. मुझे हरात के हालात को सामान्य करके आ जाने दीजिये. लिहाज़ा हरात से कंधार आते ही नए अमीर बहादुर ने राव राजा को मिलने के लिए बुलाया लेकिन बदकिस्मती से राव राजा पेचिश से पीड़ित थे, उनसे उठना भी मुश्किल हो रहा था. अमीर बहादुर को यह दुःखद समाचार सुनकर बहुत तकलीफ हुई. उन्होंने शाही हकीम को राव राजा का इलाज फ़ौरन करने का हुक्म दिया. जब तीन चार दिन के इलाज के बाद भी राव राजा की सेहत पूरी तरह से ठीक नहीं हुई तो अमीर बहादुर काबुल के लिए रवाना हो गये.
राव राजा को उनके साथ जाना था लिहाज़ा वह बीमारी की हालत में ही चल पड़े. कोई एक महीने का सफर था जो जैसे तैसे पूरा किया. काबुल पहुँचते ही अमीर बहादुर ने एक निहायत शानदार मकान राव राजा को रहने के लिए दिया. दो भारतीय वैद्य उनके इलाज के लिए तैनात किए गये और उन्हें कहा गया कि जब राव राजा तुम्हारे इलाज से ठीक हो जाएंगे, हमें बेहद खुशी होंगी और आपको ढेर सारा इनाम दिया जाएगा.दोनों वैद्यो ने खूब जम कर इलाज किया किन्तु राव राजा को आराम नहीं आया.आखिरकार 23 सितम्बर, 1863 (9 दिसंबर, 1825-23 सितम्बर, 1863) को सुबह 4 बजे उनका देहांत हो गया. उस समय तारासिंह, बल्ला,गणपत राम,मोहम्मद सदीक (नाना साहेब पेशवा के मंत्री )वहां मौजूद थे.उस वक़्त राव राजा की उम्र 38 बरस की थी. उनके निधन का समाचार सुनकर अमीर बहादुर बहुत दुखी हुए और उन्होंने सारे काबुल शहर में मुनादी करा दी कि राव राजा की अंत्येष्टि में नगर के सभी प्रतिष्ठित लोग शरीक हों, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान. अमीर बहादुर ने अपने शहज़ादे मोहम्मद नकी खान को राव राजा को एक तोप, दो पलटन और बैंड को साथ लेकर ‘मातमी जुलूस’ में शामिल होने का हुक्म दिया. बताया जाता है कि राव राजा की अंत्येष्टि में करीब पूरा काबुल ही शामिल था. उनके साथी तारासिंह के हाथों क्रियाकर्म की रस्म हुई तथा तीसरे दिन फूल चुने गये और भस्मी एकत्र करके खर्जी में रखी गयी. लगभग दो माह के बाद तारासिंह और बल्ला ने राव राजा की भस्मी को रेवाड़ी पहुंचा दिया. एक सप्ताह तक सारा अहीरवाल शोक में डूबा रहा. राव बीरेंद्र सिंह भी राव तुलाराम के बारे में विवरण देते देते और समाप्त होने के बाद बहुत जज्बाती हो गये थे.
राव तुलाराम के अधूरे कम को एक दूसरे शाही परिवार के राजा महेंद्र प्रताप (1 दिसंबर, 1886-29 अप्रैल, 1979) ने अंजाम दिया. हाथरस (उत्तरप्रदेश) की मुरसान रियासत के जाट शाही परिवार के राजा महेंद्र प्रताप ने भारत की स्वतंत्रता की जंग भी कुछ राव तुलाराम के अंदाज़ में लड़ी थी . वह भी भारत को आजादी दिलवाने के पक्के इरादे से विदेश चले गये. उन्होंने जर्मनी के सम्राट कैसर से भेंट की तो रूस के लेनिन से. जर्मनी ने तो भारत की आजादी में हर संभव मदद देने का भरोसा दिया लेकिन लेनिन ने इंकार कर दिया. लिहाज़ा वहां से वह तुर्की, हंगरी और बुलगारिया से होते हुए हरात पहुंचे. अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह अमानल्लाह खान से मुलाक़ात की और 1 दिसंबर, 1915 में काबुल में भारत के लिए अस्थाई सरकार की घोषणा कर दी और वहां पर ‘आज़ाद भारत’ का तिरंगा झंडा फहरा कर उसे सलामी दी. शाही परिवार का होने के बावजूद उनका जज्बा भी राव तुलाराम जैसा था. स्वतंत्रता सेनानी के साथ साथ राजा महेंद्र प्रताप क्रांतिकारी, समाज सुधारक और महान दानवीर भी थे. वह ‘आर्यन पेशवा’ के नाम से विख्यात थे.
राजा महेंद्र प्रताप 1957 से 1962 तक लोकसभा के सम्मानित सदस्य थे. हर पार्टी के सांसद उनकी बहादुरी का बहुत आदर करते थे. मैं उन दिनों लोकसभा सचिवालय में काम करता था. राजा महेंद्र प्रताप से मिलने और बातचीत करने के अनेक अवसर मिले. एक बार मैंने उनसे पूछा कि बहुत कम शाही घराने भारत की स्वतंत्रता के लिए इस शिद्दत के साथ लड़े थे जैसे आप और आप से पहले राव तुलाराम. वह गंभीर होकर बोले, ऐसी बात नहीं. राव तुलाराम जैसे शाही पृष्ठभूमि वाले लोग हमारे आदर्श रहे हैं. यदि वह पेचिस के रोग से मुक्त हो गये होते तो संभव है कि काबुल में भारतीय तिरंगा फहराने वाले वह पहले भारतीय होते. अफ़ग़ानिस्तान के शासक सदा स्वतंत्रता सेनानियों के समर्थक रहे हैं. यूरोपीय हमारे कभी नहीं हो सकते थे, क्योंकि हर किसी का कहीं न कहीं उपनिवेश था. इसी कारण से राव तुलाराम को उनका समर्थन नहीं मिला और न ही मुझे मिला, उनके वचन देने के बावजूद.
राव बीरेंद्र सिंह की इस समृद्ध पृष्ठभूमि के अतिरिक्त राजनीति में उनकी कुशाग्र बुद्धि को जिस प्रकार पंडित जवाहरलाल नेहरू ने चीन्हा इन्हें आधार बनाकर संपादक रघुवीर सहाय ने मुझे एक विस्तृत स्टोरी करने के लिए कहा. उस समय मुझे ऐसा लगा कि हमारे संपादक के ज़ेहन में इन राजसी राज्यों के प्रमुखो की उनकी राजनीति में आने की गाथा पर विशेष स्टोरियां कराना चाह रहे हैं. मैं गलत नहीं था. कालांतर में मैंने शाही परिवारों से जुड़े लोगों से मिलकर कई स्टोरियां कीं. बेशक मेरी लोकसभा सचिवालय की पृष्ठभूमि मेरी बहुत सहायक रही.बहरहाल, मैंने राव बरेंद्र सिंह पर अपना ध्यान केंद्रित किया. राव साहब राजनीति में सक्रिय हो गए थे. 1952 का लोकसभा चुनाव हार गए थे. उनके अंदर कहीं यह रंजिश थी कि उनके ‘अपनों’ ने ही उन्हें अहीरवाल के रेवाड़ी जैसे खास क्षेत्र से हराया है. मुझसे अपनी बातचीत में राव बीरेंद्र सिंह ने इस ओर इशारा भी किया था. फिर बोले कि मैंने तय किया है कि जब तक मैं राजनीति में पक्की तरह से अपने पैर नहीं जमा लेता, चुनावों से दूर रहूंगा. पंडित नेहरू ने भी उनकी इस सोच और फैसले का सम्मान करते हुए उन्हें पंजाब विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया. तब पंजाब में दो सदनी विधानमंडल होता था. राव 1966 तक 12 बरस तक विधान परिषद के सदस्य रहे और मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों की सरकार में मंत्री भी. उनके पास लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी), सिंचाई, बिजली, राजस्व और चकबंदी विभाग हुआ करते थे. वह 1956-66 तक अविभाजित पंजाब में मंत्री थे और अहीरवाल क्षेत्र और रेवाड़ी उसी राज्य में पड़ता था.
अक्सर कहा जाता है कि जहां ‘पंजाबी सूबा’ पाने के लिए अकाली दल के नेताओं ने आमरण अनशन किये वहां 1966 में हरियाणा वहां के लोगों को प्लेट में रखकर सौंप दिया गया. लेकिन राव बीरेंद्र सिंह इस दलील से इत्तिफाक नहीं रखते थे.वह कहते थे कि पंजाब से हिंदी भाषी क्षेत्र को अलग करने के लिए उन्होंने 1962 से आंदोलन चलाया था. उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि कई हिंदीभाषी क्षेत्र हिमाचलप्रदेश को सौंप दिए गये. पहली नवंबर, 1966 के नए हरियाणा में भगवत दयाल शर्मा पहले मुख्यमंत्री बने और राव बीरेंद्र सिंह विधानसभा के पहले अध्यक्ष (स्पीकर) चुने गये. पंजाब के विभाजन के बाद यह विधानसभा बनी थी. 1967 में हरियाणा के पहले विधानसभा का चुनाव राव बीरेंद्र सिंह पटौदी से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर जीते. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर विशाल हरियाणा पार्टी का गठन किया जिस के चलते बहुत से विधायक दलबदल कर उनकी नवगठित पार्टी में शामिल हो गये.इस प्रकार 24 मार्च, 1967 को पंडित भागवत दयाल शर्मा के स्थान पर राव बीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बन गये. अपने मुख्यमंत्री काल में वह ‘राव आए भाव आए, राव गए भाव गए’ हमेशा के लिए विख्यात हो गये
जब मैंने राव बीरेंद्र सिंह से ‘आया राम गया राम’ से उनके जुड़े होने के बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि ‘1967 में हसनपुर से गया लाल ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और बाद में वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गये. उस समय मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही था. गया राम ने पंद्रह दिन में तीन बार पार्टियां बदलीं. जब गया राम ने तीसरी बार कांग्रेस में वापसी की तब मैंने घोषणा की थी कि ‘गया राम अब आया राम है’. इससे काफ़ी उथल पुथल मच गयी जिसके परिणामस्वरूप हरियाणा विधानसभा भंग हो गयी और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया. गया राम अपने अंतिम दिनों तक लगातार दल बदलते रहे. 1972 में भारतीय आर्य सभा के तहत चुनाव लड़ा और 1974 में चौधरी चरण सिंह नेतृत्व वाले लोक दल में शामिल हो गये. लोक दल के जनता पार्टी में विलय के बाद 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर सीट जीती.राव बीरेंद्र सिंह नवंबर, 1967 तक ही मुख्यमंत्री रहे.1968 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और चौधरी बंसीलाल मुख्यमंत्री बने. तब विशाल हरियाणा पार्टी दूसरे स्थान पर रही.
आपने कांग्रेस में फिर वापसी क्यों की जबकि 1971में महेंद्रगढ़ से विशाल हरियाणा पार्टी की टिकट पर आपने लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता था. राव साहब ने बताया कि वह इसलिए क्योंकि मैं 1977 का चुनाव जनता पार्टी के उम्मीदवार से हार गया था. इसके बाद मेरी और इंदिरा गांधी के बीच बातचीत हुई. इंदिरा जी ने कहा कि पंडित जी (नेहरू)आपकी बहुत तारीफ किया करते थे. क्यों नहीं आप फिर से कांग्रेस पार्टी में वापसी कर लेते. मुझे भी उनका सुझाव रुचा और सितम्बर, 1978 को मैंने अपनी विशाल हरियाणा पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया. 1980 का लोकसभा चुनाव महेंद्रगढ़ से कांग्रेस की टिकट पर जीता. इंदिरा गांधी ने मुझे बधाई देते हुए मेरे परिश्रम और अहीरवाल में मेरी पैठ को सराहा था. क्योंकि अहीरवाल कृषि प्रधान क्षेत्र है लिहाज़ा उन्होंने मुझे कृषिमंत्री नियुक्त किया. पूरे पांच बरस तक यह मंत्रालय मेरे अधीन रहा (14 जनवरी, 1980-31 दिसम्बर,1984). कृषि मंत्रालय के काम को अधिक सुगम बनाने के लिए मैंने इंदिरा गांधी को ग्रामीण विकास मंत्रालय (20 जनवरी, 1980-29 जनवरी, 1983), सिंचाई मंत्रालय 12 नवंबर, 1980-15 जनवरी, 1982), नागरिक आपूर्ति और सहकारिता मंत्रालय (19 मार्च, 1981-2 सितम्बर, 1982) भी मुझे सौंपने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.मेरा तर्क यह था कि कृषि मंत्रालय से जुड़े विभाग यदि एक मंत्री के अधीन होंगे तो उनके बीच अधिक प्रभावी तालमेल रहेगा. राव बीरेंद्र सिंह ने दावा किया कि इन सभी विभागों में एकजुटते के चलते गरीबों की भलाई के लिए ठोस कदम उठाए गये, हरियाणा के विकास के लिए माकूल केंद्रीय सहायता की व्यवस्था की गयी, रावी- ब्यास संपर्क नहर समझौता करने के लिए पंजाब, हरियाणा और राजस्थान को राजी किया गया ताकि किसी भी राज्य को पानी की किल्लत महसूस न हो. पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने मंत्रियों के बीच मेंत्रालयों का विभाजन करते समय विभागों में परस्पर तालमेल का ख्याल रखा करते थे जैसे अजीत प्रसाद जैन के पास खाद्य और कृषि मंत्रालय हमेशा रहे. बीच बीच में सिंचाई मंत्रालय का कार्यभार भी उन्हें सौंप दिया जाता था. सिंचाई के बिना कृषि मंत्रालय की क्या अहमियत. यदि वह अलग अलग मंत्रियों के पास होंगे तो तालमेल को लेकर उनके बीच अहम टकरा सकता है. इंदिरा गांधी के समय मुझे जितने मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी वह अपने आपमें एक मिसाल है. इतने मंत्रालयों का दायित्व न पहले किसी एक मंत्री के पास रहा है, न भविष्य में किसी मंत्री के पास होगा. राव बीरेंद्र सिंह जब यह टिप्पणी कर रहे थे तो उनके चेहरे पर आत्मविश्वास और गर्व की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं.
‘दिनमान’ के लिए राव वीरेंद्र सिंह पर मेरा यह पहला विस्तृत आलेख था जिसमें उनकी समृद्ध विरासत और पृष्ठभूमि का उल्लेख किया गया था. अहीरवाल और राव तुलाराम के बारे में भी विशेष जानकारी थी. राव बीरेंद्र सिंह की सेना में दी गयी सेवाओं के साथ साथ उनकी राजनीति में आने का भी खुला विवरण है. राव बीरेंद्र सिंह की एक्सक्लुसिव बातचीत पर आधारित इस लेख को जहां ‘दिनमान’ के पाठकों ने सराहना की वहीं राव बीरेंद्र सिंह की भी टिप्पणी थी कि आपने मुझ से बातचीत और मेरे द्वारा दिए गये तथ्यों को सही तरह से प्रस्तुत किया है. रघुवीर सहाय के 1982 में ‘दिनमान’ से विदाई होने से पहले यह आलेख प्रकाशित हुआ था.
राव बीरेंद्र सिंह से मेरे इस साक्षात्कार का असर यह हुआ कि उनके द्वार मेरे लिए हमेशा के लिए खुल गये. जब भी मैं चाहता उनके 5, जनपथ वाले बंगले में बेरोकटोक जा सकता था. धीरे धीरे हम लोगों के बीच अनौपचारिक बातचीत भी होने लगी. हफ्ते में एक बार तो हम लोग मिल ही लिया करते थे. राव साहब को चूरूट पीने का बहुत शौक था.मैं अपना स्कूटर बाहर खड़ा करके उनके कमरे की तरफ बढ़ रहा होता तो मुझे चूरूट की महक आ जाती थी.उनके पास जाकर पूछता कि ‘क्या फिदेल कास्त्रो ने नया स्टॉक भेजा’ है तो उनका उत्तर होता कि अभी अभी लैंड हुआ है. उन्हें पता था कि आप आने वाले हैं. उसका एक लंबा सा कश खींच कर हंसते और फिर बुझा देते थे. राव बीरेंद्र सिंह के चूरूट क्यूबा से आते थे, ऐसा उन्होंने एक बार मुझे बताया था.
राव बीरेंद्र सिंह से अब मेरी दोस्ती हो गयी थी. कहीं किसी तरह की औपचारिकता नहीं थी. वह मुझे कुछ खास खबरों की जानकारी यह कहकर दे जाते कि इनमें मेरा उल्लेख नहीं होगा, सूत्रों का हो सकता है. उनके यहां मैं बेसाख्ता, बेधड़क और बेरोकटोक आ-जा सकता था. एक दिन सुबह उनका फोन आया कि ऑफिस जाते हुए इधर से होकर जाना. जब मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने आवाज़ दी, ‘इंदरजीत वह गाजर का हलवा ले आओ, मेरे दोस्त को बहुत पसंद है. ‘ इंदरजीत उनका बड़ा बेटा है.वर्तमान में वह नरेंद्र मोदी की सरकार में सांख्याकि और कार्यक्रम कार्यन्वयन राज्य मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार),योजना मंत्रालय ( स्वतंत्र प्रभार )हैं तथा संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं. राव इंद्रजीत सिंह 1998 से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं और जीत रहे हैं. पहले वह कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार हुआ करते थे, अब भाजपा के हैं. 2014 में वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं. डॉ मनमोहन सिंह की सरकार में पहले वह विदेश राज्य मंत्री रहे (2004-2006), उसके बाद रक्षा उत्पादन राज्य मंत्री (2006-2009) रहे. उनकी बेटी आरती सिंह हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार में चिकित्सा मंत्री.गाजर के हलवे के दो चम्मच मुंह में डालने के बाद मैंने कहा, राव साहब यह क्या गाजर का हलवा है लाजवाब,इतना स्वादिष्ट, देसी घी और सूखे मेवों से भरपूर.उन्होंने कहा यह सब आपके लिए है. मैंने दो कटोरी खाया था. मेरे इसरार करने पर उन्होंने भी लिया. बाकी का उन्होंने सेवक से पैक करवाकर कहा कि यह बच्चों के लिए है. अब हालत यह हो गयी थी कि जब भी इंदरजीत सिंह रेवाड़ी से आता मेरे लिए गाजर का हलवा अनिवार्य था.
कभी कभी राव बीरेंद्र सिंह पूछते, शाम को कितने व्यस्त हो. जब मैं कहता कि कुछ खास नहीं तो उनका हुक्म होता कि घर फोन करके कह दो कि आज तुम डिनर शिनर मेरे साथ करोगे.इस प्रकार हम लोगों ने शाम को भी बैठना शुरू कर दिया था. राव साहब की हिफाज़त के लिए बेहतरीन उनके घर कुत्ते थे. वह बिल्लियों को गोद में बिठा कर प्यार किया करते थे. रात को इस’विशेष’ बैठक में तमाम किस्म की बातचीत होती. कांग्रेस पार्टी को लेकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और वर्तमान में राजीव गांधी और उनकी मंडली को लेकर. विपक्षी पार्टियों के नेताओं पर भी हम लोग चर्चा किया करते थे. राजनीति के अलावा सामाजिक और शिक्षा संबंधित मुद्दों पर भी राव तुला राम की स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका पर और भी समाज से जुड़े विषयों पर. बातचीत का यह दौर अगर लंबा खिंच जाता तो वह अपनी निजी कन्टेसा कार से मुझे घर भिजवाते इस ताकीद के साथ कि घर पहुँच कर मुझे फोन करना. हम लोगों के बीच अब पारिवारिक संबंध भी स्थापित हो चुके थे. 1988 में मेरे बेटे मनदीप की शादी के रिसेप्शन में कंस्टीटूशन क्लब आये थे तो 1995 में मेरी छोटी बेटी सीमा की शादी में सम्राट होटल दोनों ही कार्यक्रमों में वह बहुत देर तक ठहरे और परिवार के सभी लोगों से मिले.
प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में उन्हें खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय दिया गया जहां वह 31 दिसम्बर 1984 से 25 सितम्बर, 1985 तक रहे. मैंने जब राव बीरेंद्र सिंह से यह पूछा कि राजीव गांधी ने आपको ठीकठाक मंत्रालय दे दिया था, फिर उनसे आपकी नाखुशी की क्या वजह थी. बिना किसी लागलपेट के वह बोले कि इंदिरा गांधी के वक़्त मुझे खुलकर अपनी बात कहने की जितनी आजादी थी, उसमें कुछ कमी आयी थी. दिलखोल कर प्रधानमंत्री राजीव गांधी से अपनी बात न कह सकने के कारण मुझे घुटन महसूस होने लगी थी. इंदिरा गांधी मेरी पृष्ठभूमि और स्वभाव से भलीभांति परिचित थीं. वह सोचती थीं कि मैं जो भी मशविरा दूंगा वह देशहित में होगा लेकिन यहां ऐसी सोच में मैंने कमी अनुभव की. उन्होंने बताया कि एक तो राजीव राजनीति में नवसिखुआ थे, दूसरे उनके कॉर्पोरेट संस्कृति में काम करने वाले युवा सलाहकार हैं और तीसरे हमारे बंसीलाल और भजनलाल कैबिनेट मंत्री हैं.बंसी लाल रेलवे मंत्री और भजनलाल पहले पर्यावरण और वन मंत्री और बाद में कृषि मंत्री बनाए गये.इन सब का प्रभाव राजीव गांधी पर इतना गहरा था कि वह सच्चाई और चापलूसी में फर्क नहीं कर पा रहे थे.इंदिरा गांधी ने रावी- ब्यास समझौते पर मेरी दिल खोलकर तारीफ की थी लेकिन राजीव गांधी को जब मैंने इसी स्तर का कोई सुझाव दिया तो वह इनके सिर के ऊपर से निकल गया.राजीव को राजनीति के पेंच अभी सीखने होंगे, राव बीरेंद्र सिंह ऐसा मानते थे.राव बीरेंद्र सिंह ने मुझे विश्वास में लेते हुए बताया था कि उनकी सरकार में मैंने घुटन महसूस की तथा मंत्री पद से ही नहीं कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह दिया. बेशक राजीव गांधी सरकार के लिए यह पहला बड़ा झटका था.
क्योंकि अपने पद से त्यागपत्र देने का निर्णय उन्होंने अचानक लिया था इसलिए मीडिया में इस पर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे. हक़ीक़त जानने के लिए उनके 5, जनपथ निवास पर मीडिया और उनके समर्थकों की भीड़ लग गयी थी लेकिन राव बीरेंद्र सिंह किसी से नहीं मिल रहे थे. जब मुझे उनके इस्तीफे की खबर मिली तो मैं भी राव बीरेंद्र सिंह के घर पहुँच गया. भीड़ को पीछे हटाते हुए जब मैं राव साहब के कमरे में पहुंचा तो उन्होंने अचानक इस्तीफे की वे सभी वजहें बताई जिनका मैं ऊपर उल्लेख कर चुका हूं. इन कारणों को और विस्तार देते हुए मैंने ‘दिनमान’ के लिए एक एक्सक्लुसिव कवर स्टोरी तैयार की जो कवर पेज पर उनके चित्र के साथ प्रकाशित हुई. इस अंक का महत्त्व इसलिए और बढ़ गया क्योंकि जिस दिन मैंने राव साहब का उनके इस्तीफे से जुड़ा इंटरव्यू किया था उसके अगले दिन’दिनमान’ मार्केट मेंआ गया था. राव बीरेंद्र सिंह के त्यागपत्र से जुड़ी मेरी यह विस्तृत स्टोरी दैनिक समाचारपत्रों में छपे संवादों से इक्कीस थी. जब’दिनमान’ की प्रति लेकर मैं राव साहब के घर पहुंचा तो मुझे यह देखकर हैरत हुई कि राव साहब के कमरे के सेंट्रल टेबल पर ‘दिनमान’ पहले से रखा था. राव बीरेंद्र सिंह ने मुझे गले लगाते हुए कहा ‘ तुमने मेरे साथ पूरा इंसाफ किया है, बहुत बहुत शुक्रिया’. उन्होंने यह जानकारी भी दी कि उनके कार्यकर्ताओं को जहां से भी ‘दिनमान’ की प्रतियां मिलीं, खरीद लीं.
कांग्रेस छोड़ने के बाद राव बीरेंद्र सिंह जनता दल में शामिल हो गये. 1989 में लोकसभा का चुनाव जीता और चंद्रशेखर की सरकार में मंत्री रहे. लेकिन 1991 में उन्होंने महेन्द्रगढ़ से चुनाव लड़ा और हार गये. वह फिर कांग्रेस में शामिल हो गय और 1996 का भी लोकसभा का चुनाव हार गये. इसके बाद उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया और अपना समय सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में देने लगे. उन्होंने अहीरवाल के पिछड़े हुए क्षेत्र में विकास कार्यों की दिशा में बहुत काम किया. रेवाड़ी में अहीर कॉलेज की स्थापना, आरबीएस स्कूल, राव तुलाराम कॉलेज, दिल्ली में राव तुलाराम टेक्निकल कॉलेज उन्हीं की देन हैं. रामपुर-रेवाड़ी के
आरबीएस (राव बीरेंद्र सिंह ) कॉलेज ऑफ एजुकेशन के संस्थापक भी राव बीरेंद्र सिंह हैं. 30 सितम्बर, 2009 को 88 वर्ष की आयु में गुरुग्राम में उनका निधन हो गया. बेशक यह मेरी निजी क्षति थी. राव बीरेंद्र सिंह की मधुर स्मृति में सादर नमन.












