nishadजाट आरक्षण की मांग को लेकर हुए हिंसक आंदोलन के सामने सरकार के घुटने टेकने के बाद उत्तर प्रदेश में भी निषादों का आंदोलन फिर से सुगबुगाने लगा है. अभी यूपी में मुफीद माहौल भी है, 2017 में विधानसभा चुनाव भी होने वाला है, लिहाजा, इसे अपनी शर्तों पर राजनीतिक दलों को झुकाने का बेहतर मौका माना जा रहा है. इसके पहले भी निषादों का आंदोलन उत्तर प्रदेश में अपनी शिनाख्त दर्ज करा चुका है. पिछली बार निषाद आंदोलन के हिंसक होने के बाद थोड़ी चुप्पी तो सधी, लेकिन इसकी अंदर-अंदर तैयारियां चल रही थीं. इधर जाटों के अराजक आरक्षण आंदोलन के सामने हरियाणा सरकार के आत्मसमर्पण के बाद निषाद समुदाय के साथ-साथ 17 अति पिछड़ी जातियों के लोग फिर सड़क पर उतरने की तैयारी में लग गए हैं.

जाटों के आरक्षण की मांग माने जाने के आश्वासन से नाराज राष्ट्रीय निषाद संघ ने अब आरक्षण की तय सीमा बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन करने की मांग शुरू कर दी है. संघ के राष्ट्रीय सचिव चौधरी लौटन राम निषाद का कहना है कि जाट, कापू और पाटीदार जैसी प्रभु जातियों के आरक्षण आंदोलन के पीछे कांग्रेस जैसे दलों का हाथ है. निषाद ने जाट आरक्षण आंदोलन को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि आरक्षण की तय सीमा बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार को संविधान में संशोधन करना चाहिए और जाट जैसी जातियों को ओबीसी के अतिरिक्त विशेष सूची बनाकर कोटा देना चाहिए. यही न्यायसंगत रहेगा.

राष्ट्रीय निषाद संघ का कहना है कि आरक्षण की मांग कर रही जातियों को 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा के ऊपर अलग से एसबीसी के नाम से आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए न कि पिछड़े वर्ग में शामिल कर पिछड़ों का हक मारना चाहिए. संघ के राष्ट्रीय सचिव ने एलआर नायक की सिफारिश के अनुसार पिछड़ों, अति पिछड़ों व विमुक्त घूमन्तू जनजातियों को अलग-अलग आरक्षण देने की मांग करते हुए कहा कि ऐसा नहीं किया गया तो आरक्षण की मूल संवैधानिक भावना का अनादर होगा.

निषाद ने केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, की तरह एससी में भी वर्गीय विभाजन की आवश्यकता पर जोर दिया और सरकार को चेतावनी दी कि अगर हिंसात्मक आंदोलन से ही सरकार का ध्यान आकर्षित होता है तो 17 अति पिछड़ी जातियां भी हिंसात्मक आंदोलन का रास्ता अपना लेंगी. यूपी में तीखे आंदोलन के मूड में आए निषादों और 17 अति पिछड़ी जाति के नेताओं का कहना है कि जाट, कापू, पाटीदार जैसी दबंग जातियों के आरक्षण आंदोलन के पीछे कांग्रेस का हाथ है. 2014 के लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के एक दिन पहले कांग्रेस सरकार ने जाटों को केंद्रीय पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल करने की अधिसूचना जारी की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था.

कई राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण व्यवस्था लागू है. हरियाणा में एससी को 20 प्रतिशत, बीसीए को 16 प्रतिशत, बीसीबी को 11 प्रतिशत, एसबीसी को 10 प्रतिशत, आर्थिक रूप से बीसीसी को 10 प्रतिशत यानी कुल 67 प्रतिशत आरक्षण लागू है. महाराष्ट्र में एससी को 13 प्रतिशत, एसटी को सात प्रतिशत, ओबीसी को 20 प्रतिशत, डीएनटी को 12 प्रतिशत यानी कुल 52 प्रतिशत आरक्षण लागू है. तमिलनाडु में एससी को 18 प्रतिशत, एसटी को एक प्रतिशत, ओबीसी को 30 प्रतिशत, एमबीसी/डीएनटी को 20 प्रतिशत यानी कुल 69 प्रतिशत आरक्षण लागू है. इसी तरह छत्तीसगढ़ में एससी को 12 प्रतिशत, एसटी को 32 प्रतिशत, ओबीसी को 14 प्रतिशत अर्थात कुल 58 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है. गुजरात में पाटीदार अनामत आंदोलन, हरियाणा में जाट आंदोलन व आंध्रप्रदेश-तेलंगाना में कम्मा आरक्षण आंदोलनों को कांग्रेस ही हवा दे रही थी.

उल्लेखनीय है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के समय देश में पिछड़े वर्ग की आबादी 52 प्रतिशत, अनुसूचित जाति की आबादी 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति की आबादी 7.5 प्रतिशत, धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग की आबादी 10.5 प्रतिशत और सवर्ण जातियों की आबादी 15 प्रतिशत थी. अनुसूचित जाति व जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में 22.5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, जबकि ओबीसी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में न देकर मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण दिया, जो उनकी जनसंख्या का लगभग आधार था. मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के बाद 1999 में तमाम असवर्ण अगड़ी व दबंग जातियों जाट, कुर्बा, बोक्कालिगा, लिंगायत, कलवार, विश्नोई, मोढ़, घाची आदि को ओबीसी में शामिल कर लिया गया और इस समय कम्मा, पाटीदार, मराठा, जाट, जट सिख, रोड़, त्यागी सहित कुछ अन्य जातियां भी ओबीसी में शामिल होने की मांग कर रही हैं और आंदोलन कर रही हैं.

कुछ दिनों पहले निषादों और कुछ अन्य समान जाति-समुदाय के आरक्षण की मांग पर जुझारू आंदोलन चलाने वाले राष्ट्रीय निषाद एकता मंच के नेता संजय निषाद कहते हैं कि सरकार ने संविधान में व्यवस्था न होने के बावजूद गूर्जरों को आरक्षण दे दिया, जाटों को आरक्षण देने जा रही है, लेकिन अर्से से संघर्षरत निषाद समुदाय की उपेक्षा की जा रही है.

उत्तर प्रदेश में आरक्षण की मांग को लेकर 17 अति पिछड़ी जातियों का आंदोलन हिंसक होने की पूरी आशंका है. जाटों के आरक्षण-आंदोलन के
साथ-साथ यूपी में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, आरक्षण की सरगर्मी बढ़ती जा रही है. निषाद समुदाय पांच प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण की मांग पर अड़ा है. राजनीतिक पासा फेंकते हुए सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ने निषाद समेत 17 अन्य पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए न केवल सहमति दे रखी है बल्कि केंद्र को इसका प्रस्ताव भी भेज रखा है.

केंद्र सरकार में मामला लटका हुआ है. लेकिन निषाद समुदाय के लोग जो पांच प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण की मांग कर रहे हैं उसे सरकार अगर मान भी लेती है, तो कोर्ट उसे नहीं मानेगी, क्योंकि आरक्षण में आरक्षण दिए जाने का कोई नियम नहीं है. अति पिछड़ा वर्ग की 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने के लिए यूपी सरकार की ओर से केंद्र सरकार को तीन बार पत्र भेजा गया है. 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की पहल अक्टूबर 2005 में शुरू हुई थी.

तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने संप्रग सरकार को पत्र लिख कर इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग की थी. मुलायम सिंह के पत्र पर तत्कालीन यूपीए सरकार महीनों खामोश बैठी रही. प्रदेश सरकार ने जब फिर से पत्र व्यवहार शुरू किया, तो केंद्र ने कई ऐसी जानकारियां मांग लीं जिसे पूरा करना काफी कठिन था. बसपा नेता मायावती ने उत्तर प्रदेश की 17 अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सूचि में शामिल करने के साथ-साथ गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की थी.

मायावती ने 2007 में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में भी इसी प्रकार का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, जो रद्द हो गया था. तब कहा गया था कि ये जातियां अनुसूचित जाति के अछूतपन की शर्त को पूरा नहीं करती हैं. दलितवादियों को यह प्रस्ताव पसंद नहीं है, वे इसे दलित विरोधी बताते हैं. उनका कहना है कि अति पिछड़ी जातियों को पिछड़ी जातियों के 27 प्रतिशत कोटा में से डॉ. छेदी लाल साथी सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग आयोग की संस्तुतियों के अनुसार अलग कोटा देना चाहिए.

2012 में जब अखिलेश यादव की सरकार बनी तो केंद्र को फिर से दो बार सूची भेजी गई, लेकिन वहां से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आया. केंद्र की तरफ से कोई फैसला आए, उसके पहले ही समाजवादी पार्टी की सरकार ने विधानसभा चुनाव नजदीक देखते हुए 17 अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण जैसी सुविधाएं देने का फैसला भी कर लिया. प्रदेश सरकार ग्राम्य विकास विभाग की कई योजनाओं में 17 अति पिछड़ी जातियों को मात्रात्मक आरक्षण देगी. जिससे निर्धारित योजनाओं में इन जातियों के लाभार्थियों की 7.5 प्रतिशत हिस्सेदारी सुनिश्चित हो. कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोड़िया, मांझी और मछुआ को ग्राम्य विकास की योजनाओं में 7.5 प्रतिशत मात्रात्मक आरक्षण देने को कहा जा चुका है.

इन योजनाओं में लोहिया ग्रामीण आवास, हैंडपंप, ग्रामीण पेयजल योजना, अंबेडकर विशेष रोजगार योजना समेत कई अन्य ग्रामीण योजनाएं शामिल हैं. प्रदेश सरकार की कोशिश है कि यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ अगर इन अति पिछड़ी जातियों का 15 प्रतिशत वोट भी सपा को मिल जाए तो 2017 में भी उसकी कामयाबी की राह आसान हो जाएगी. सपा सरकार की इस कोशिश के बावजूद निषाद समुदाय के नेताओं का कहना है कि आरक्षण के मसले पर केंद्र का रुख स्पष्ट होना चाहिए. लिहाजा, अब अधर में नहीं रहते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ निर्णायक आंदोलन की शुरुआत की जाएगी. प

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