शायद ही कोई ऐसा चुनावी मंच हो जहां से प्रधानमंत्री मोदी ने सबका साथ सबका विकास और संविधान को ग्रन्थ मानने की बात नहीं की हो, लेकिन अफ़सोस कि मंचों से कहे जाने वाले ये नारे धरातल पर नहीं उतर सके. दलितों, आदिवासियों और वंचित तबकों पर जिस तरह से लाठियां बरसाई जा रही हैं, जिस तरह दलित अस्मिता के प्रतीकों पर हमले हो रहे हैं और जिस तरह दलितों से उनके आवाज उठाने और सवाल करने के अधिकार को छीनने की कोशिश हो रही है, इनसे मौजूदा सरकार की नीति और नियत का पता चलता है. सरकारी आंकड़ों और तथ्यों के जरिए पिछले चार सालों के दौरान देश में दलितों और आदिवासियों की स्थिति की पड़ताल करती रिपोर्ट…

dalitदेश में दलितों, आदिवासियों और वंचित तबकों की हालत पिछले 4 साल में कितनी बेहतर हुई है या कितनी बदतर हुई है, इसका जायजा लेने से पहले हाल में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश को समझना जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट ने लोकसेवकों यानी सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के दुरुपयोग पर विचार करते हुए कहा है कि इस कानून के तहत दर्ज ऐसे मामलों में फौरन गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी कानून के तहत दर्ज मामलों में किसी भी सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी से पहले डीएसपी स्तर के अधिकारी द्वारा प्राथमिक जांच जरूर कराई जानी चाहिए. इसके अलावा इन मामलों में अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है. इस खबर पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई, कोई बहस नहीं हुई, किसी राजनीतिक दल ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की.

देश में दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखकर सभ्य समाज का माथा भी शर्म से झुक जाएगा. रविदास जयंती मना रहे दलितों के साथ मध्य प्रदेश के दमोह में मारपीट की जाती है. हरियाणा के फरीदाबाद में पंचायत चुनाव में वोट न देने पर दलितों की पिटाई होती है. आगरा में एक दलित परिवार की सिर्फ इसलिए पिटाई कर दी गई, क्योंकि उनमें से एक का हाथ गलती से एक ब्राह्मण से छू गया था. कन्नौज में एक दलित महिला के साथ रेप के बाद उसे एसिड से नहला दिया गया. चित्तौड़गढ़ में बाइक चोरी के आरोप में दलित बच्चों को नंगा करके पीटा गया. गुजरात में दलितों की पिटाई के बाद तो उन्होंने बड़ा आन्दोलन भी किया. ताजा मामला कोरेगांव में फैली हिंसा है. इसके अलावा, त्रिपुरा चुनाव परिणाम आने के बाद देश भर में कट्टरवादी तत्वों ने दलित अस्मिता के प्रतीक बाबा साहब भीम राव अम्बेदकर और पेरियार की मूर्तियां तोड़ दीं.

इसके अलावा, देश में छुआछूत की समस्या भी काफी बड़ी है. इससे दलित एवं कमजोर वर्ग ही सर्वाधिक प्रभावित होता है, जो भेदभाव और तरह-तरह के उत्पीड़न को झेलने के लिए मजबूर है. यहां किसी दलित के खाना बनाने से खाने को अपवित्र मानने वाले लोग भी मौजूद हैं. यहां तक कि स्कूल के मिड-डे-मील तक में भेदभाव की खबरें आती रहती हैं. एक अनुमान के मुताबिक, देश के 27 फीसदी से ज्यादा लोग किसी न किसी रूप में छुआछूत को मानते हैं. अब हम नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की बात करते हैं. यह भारत सरकार की एक संस्था है, जो हर साल दलितों के खिलाफ अत्याचार के आंकड़े जारी करती है.

भाजपा शासित राज्यों में उत्पीड़न अधिक

साल 2016 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में दलितों के खिलाफ अपराध के मामलों में बढ़ोतरी हुई. अपराध दर के मुताबिक, इस सूची में पहला स्थान मध्यप्रदेश का है. 2014 में मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराध के 3294 मामले दर्ज हुए, जो 2015 में 3546 और 2016 में 4922 तक पहुंचे. इसके बाद राजस्थान है, जहां दलितों के खिलाफ अपराध में 12.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. राजस्थान में 2014 में 6735 अपराध दर्ज हुए हैं, जो 2015 में 5911 और 2016 में 5136 तक पहुंचे. अपराध के मामले में तीसरे नंबर पर गोवा आता है और इसके बाद बिहार का नंबर है, जहां भाजपा और जदयू सत्ता में है. बिहार में 2016 में 5701 मामले दर्ज किए गए. 2016 में पूरे देश में कुल अपराधों में से 14 फीसदी अपराध बिहार में ही हुए हैं. वहीं, गुजरात में 2014 के मुकाबले अपराध की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है. 2014 में जहां गुजरात में 1094 आपराधिक केस दर्ज किए गए, वहीं 2016 में ये आंकड़ा 1322 तक पहुंचा.

एनसीआरबी के 2015 के आंकड़े भी बताते हैं कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में बाकी के राज्यों से बहुत आगे हैं. साल 2014 में भी कमोबेश यही हालत रही है. 2015 में दलितों के खिलाफ कुल 45003 अपराध की घटनाएं हुईं. 2014 में ये संख्या 47064 थी. 2015 में प्रति एक लाख दलित आबादी पर होने वाले अपराध का राष्ट्रीय दर 22.3 है. 2015 में उत्तर प्रदेश में 8358, राजस्थान में 6998, बिहार में 6438,  आंध्र प्रदेश में 4415, मध्य प्रदेश में 4188, ओड़ीशा में 2305, महाराष्ट्र में 1816, तमिलनाडु में 1782, गुजरात में 1046, छत्तीसगढ़ में 1028 और झारखंड में 752 अपराध दलितों के ऊपर हुए. दलितों के खिलाफ अपराध का राष्ट्रीय दर जहां 22.3 था, वहीं ये राजस्थान में 57.2, आंध्र प्रदेश में 52.3, गोवा में 51.1, बिहार में 38.9, मध्य प्रदेश में 36.9, ओड़ीशा में 32.1, छत्तीसगढ़ में 31.4 रहा. 2015 में दलितों की हत्या के 707 मामले सामने आए. सबसे अधिक हत्या की घटनाएं मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, ओड़ीशा, गुजरात तथा उत्तर प्रदेश में हुईं. 2015 में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के कुल 2,326 मामले सामने आए, वहीं  दलित महिलाओं के अपहरण के भी 687 मामले सामने आए.

आदिवासी और शहरी दलित भी निशाने पर

साल 2015 में आदिवासियों के खिलाफ 10914 अपराध के मामले सामने आए. इसमें राजस्थान में 3,207, मध्य प्रदेश में 1,531, छत्तीसगढ़ में 1,518, ओड़ीशा में 1,307, आंध्र प्रदेश में 719, तेलंगाना में 698, महाराष्ट्र में 483, गुजरात में 256 और झारखंड में 269 अपराध शामिल हैं. 2015 में अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध हत्या के 144 अपराध के मामले सामने आए. ये घटनाएं भी भाजपा शासित राज्यों में अधिक हुईं. इसी तरह बलात्कार के 952 मामले सामने आए. दुःखद बात ये है कि आदिवासियों के खिलाफ आईपीसी के 4203 ऐसे मामले रहे, जिनमें एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल नहीं हुआ. एनसीआरबी के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, ये सच सामने आया है कि अब शहरों में दलितों के खिलाफ अपराध की घटनाएं सामने आ रही हैं.

उत्तर प्रदेश और बिहार में दलितों के खिलाफ अधिकतम अपराध दर्ज किए गए हैं. एनसीआरबी ने 2016 में 19 महानगरीय शहरों में जाति आधारित अत्याचार के आंकड़े पहली बार जारी किए थे.  लखनऊ और पटना इस सूची में सबसे ऊपर हैं. उत्तर प्रदेश में 2016 में दलितों के खिलाफ अपराध के 10426 मामले दर्ज किए गए थे, जो पूरे देश में कुल मामलों में से 26 प्रतिशत है. बिहार 5701 ऐसी घटनाओं (14 प्रतिशत) के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि राजस्थान 5134 घटनाओं (13 प्रतिशत) के साथ तीसरे स्थान पर है. शहरों में हैदराबाद 139 मामलों (9 प्रतिशत) के साथ पांचवें स्थान पर रहा. 2016 में दलितों के खिलाफ कुल 40801 अपराध हुए.

10 साल के दौरान उत्पीड़न

भारत में हर 15 मिनट में एक दलित का उत्पीड़न होता है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 साल (2007-2017) में दलित उत्पीड़न के मामलों में 66 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई. एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 साल में देश में रोजाना छह दलित महिलाओं से दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए. इस दौरान रोजाना देश में छह दलित महिलाओं से दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए, जो 2007 की तुलना में दोगुना है. आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर 15 मिनट में दलितों के साथ आपराधिक घटनाएं हुईं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़े देश में दलितों की समाज में स्थिति और उनकी दशा की कहानी बयां करते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले चार साल में दलित विरोधी हिंसा के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है. 2006 में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 27,070 मामले सामने आए जो 2011 में बढ़कर 33,719 हो गए. वर्ष 2014 में अनुसूचित जाति के साथ अपराध के 40,401 मामले, 2015 में 38,670 मामले और 2016 में 40,801 मामले दर्ज किए गए.

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 10 साल में दलित महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई. रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 में प्रत्येक दिन दलित महिलाओं के साथ दुष्कर्म के केवल तीन मामले दर्ज होते थे, जो 2016 में बढ़कर 6 हो गए. एनसीआरबी के आंकड़ों से चौंकाने वाली बात सामने आई है. 2014 से 2016 के दौरान जिन राज्यों में दलित उत्पीड़न के सबसे अधिक मामले दर्ज हुए, उन राज्यों में या तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार है या फिर उसके सहयोगी की. दलित उत्पीड़न में सबसे आगे रहे राज्यों की बात करें तो मध्यप्रदेश दलित उत्पीड़न में सबसे आगे रहा. 2014 में राज्य में दलित उत्पीड़न के 3,294 मामले दर्ज हुए, जिनकी संख्या 2015 में बढ़कर 3,546 और 2016 में 4,922 तक जा पहुंची. देश में दलितों पर हुए अत्याचार में मध्यप्रदेश का हिस्सा 12.1 फीसदी रहा.

जेलों में दलित

देश के कुल कैदियों में तकरीबन 68 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं जिन्हें अदालत से सजा नहीं मिली है, यानी वे केवल आरोपी हैं. इन कैदियों में देश के सबसे कमज़ोर वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदियों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से अधिक है. 2015 के आंकड़ों के मुताबिक कुल 2,82,076 विधाराधीन कैदियों में से 61,139 (21.6 प्रतिशत) का सम्बन्ध दलित समाज से था, 34,999 (12.4 प्रतिशत) का सम्बन्ध आदिवासियों से था, 88,809 (31.5 प्रतिशत) ओबीसी समाज से आते थे, जबकि मुस्लिम विचाराधीन कैदियों की संख्या 59,053 (20.9 प्रतिशत) थी. यदि इस वर्ष सजायाफ्ता कैदियों की बात करें तो कुल 1,34,168 सजायाफ्ता कैदियों में 28,033 (20.9 प्रतिशत) दलित थे, 18,403 (13.7 प्रतिशत) का सम्बन्ध अनुसूचित जन जातियों से था, 45,801 (34.1 प्रतिशत) ओबीसी से सम्बन्धित थे, जबकि 21,220 (15.8 प्रतिशत) मुस्लिम थे. वर्ष 2014 के आंकड़े भी देश के जेलों की लगभग 2015 जैसी ही तस्वीर पेश करते हैं. इस वर्ष कुल 2,82,879 विचाराधीन कैदियों में 57,045 (20.2 प्रतिशत) कैदी दलित थे, 31,648 (11.2 प्रतिशत) का सम्बन्ध अनुसूचित जन जातियों से था, 88,448 (31.3 प्रतिशत) ओबीसी और 59,550 (21.1 प्रतिशत) मुसलमान थे. यह हकीकत किसी से छुपी नहीं है कि भारत के जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या जेलों की क्षमता से कई गुना अधिक है.

अब इस तस्वीर का एक और पहलू देखते हैं, यदि दलित, आदिवासी और ओबीसी के आंकड़ों को मिला दिया जाए तो वर्ष 2015 में देश के कुल विचाराधीन कैदियों में 65.6 प्रतिशत का सम्बन्ध इन तीन वर्गों से था. यदि दलित, आदिवासी और मुस्लिम विचाराधीन कैदियों को एक साथ रख कर देखें तो 2014 में देश के कुल विचाराधीन क़ैदियों में 52 प्रतिशत का सम्बन्ध इन तीन वर्गों से है. ये आंकड़े यह भी ज़ाहिर करते हैं कि जेलों में दलितों और मुस्लिम कैदियों की संख्या उनकी आबादी के अनुपात से कहीं अधिक है. यह संख्या दलितों के प्रति व्याप्त दुर्भावना को भी उजागर करती है, साथ में एक बड़ी तस्वीर की ओर भी इशारा करती है और वो तस्वीर यह है कि संसाधनों के अभाव और दुर्लभ न्याय प्रणाली की वजह से समाज के हाशिए के वर्गों को जेल की काली कोठरी में अक्सर सड़ना पड़ता है.

मीडिया की उदासीनता

दलितों और पिछड़ों के प्रति मीडिया की उदासीनता भी जग ज़ाहिर है. हालिया दिनों में गुजरात के उना में चार दलित नौजवानों की सामूहिक पिटाई की गई और उन्हें एक कार के पीछे बांध कर परेड कराया गया. यह घटना तो सबको याद होगी, लेकिन मुख्यधारा की मीडिया का ध्यान तब गया, जब सोशल मीडिया और देश के दलित संगठनों ने ज़मीनी स्तर पर विरोध शुरू किया. दलितों के प्रति मीडिया की इस उदासीनता को अरुंधती राय ने अम्बेदकर की किताब एनिहिलेशन ऑ़फ कास्ट (जाति का विध्वंस) की प्रस्तावना में उजागर किया है. उन्होंने लिखा है कि यदि आपने मलाला (युसूफजई) का नाम सुना है, लेकिन सुरेखा भोतमांगे के बारे में नहीं जानते हैं, तो अम्बेदकर की यह किताब आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए. दरअसल सुरेखा महाराष्ट्र भानडारा जिले की एक पढ़ी-लिखी दलित महिला थी, जो अपने और अपने बच्चों के लिए सम्मानपूर्ण जीवन चाहती थी. यह बात उसके गांव के वर्चस्वशाली जाति के लोगों को पसंद नहीं आई.

उन्होंने सुरेखा और उसकी बेटी को नंगा कर गांव में परेड करवाया. उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया और फिर उन दोनों के साथ बेटों की भी निर्मम हत्या कर दी. मीडिया ने इस नरसंहार को नैतिकता और सम्मान से जोड़ कर इस खबर को प्रसारित किया. मीडिया ने इस घिनौने कृत्य के लिए एक तरह से पीड़ितों को ही ज़िम्मेदार ठहरा दिया था. जब इस हिंसा को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ, तब जाकर पुलिस की नींद खुली. पुलिस ने इसे जातीय हिंसा मानने से भी इंकार कर दिया था. बाद में निचली अदालत ने मुख्य आरोपी को मौत की सजा सुनाई, लेकिन जातीय हिंसा के बजाय इसे आपसी विवाद करार दिया था.

उसे घटना को दस साल से अधिक बीत चुका है. मलाला को जब गोली मारी गई, तब उसे पूरी दुनिया के मीडिया ने कवर किया. कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने उस घटना पर अपनी संवेदना व्यक्त की. बाद में मलाला को शान्ति का नोबल पुरस्कार भी मिला, लेकिन सुरेखा के मामले में न तो मीडिया ने वैसी दिलचस्पी दिखाई और न विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अपनी संवेदना ही व्यक्त की. यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अनुसूचित जाति/जनजाति कानून के सख्त प्रावधानों को नर्म करने का फैसला सुनाया है. पुलिस दलित प्रताड़ना के मामलों को अनुसूचित जाति/जनजाति कानून के तहत दर्ज करने में आना कानी करती है, तो जब ये कानून ही कमजोर हो जाएगा, तो फिर दलितों की सुनने वाला कोई नहीं होगा.

बहरहाल, जैसा ऊपर ज़िक्र किया जा चुका है कि पिछले तीन वर्षों के एनसीआरबी के आंकड़ों में दलितों पर अत्याचार के मामले में किसी तरह का परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. इन आंकड़ों के लिहाज़ से देखा जाए, तो देश में हर दूसरे घंटे किसी न किसी दलित को निशाना बनाया जाता है. हर 24 घंटे में तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. हर घंटे कोई न कोई दलित मारा जाता है या उनके घर जलाए जाते हैं, लेकिन इन घटनाओं को मीडिया में कितनी कवरेज मिलती है, यह सब को मालूम है. दलित उत्पीड़न से सम्बंधित मामले मीडिया के संज्ञान में उस वक़्त तक नहीं आते, जब तक देश के दलित संगठन सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन नहीं करते.

अमेरिका में जब दासता खत्म हुई तो अश्वेत लोगों के साथ अमेरिका की सड़कों पर हिंसा होने लगी. उन्हें पीटा जाने लगा, उनके ऊपर तरह-तरह के अत्याचार होने लगे. ठीक वैसे ही जब आज भारत में दलित समुदाय प्रतिकार कर रहा है, सवाल कर रहा है, आवाज उठा रहा है तो उनपर हमले हो रहे हैं. भीमा कोरेगांव की हिंसा इसका ताजा उदाहरण है.

प्रतीकों पर निशाना

देश में यूं तो अनगिनत राजनेताओं की मूर्तियां लगी हैं, लेकिन जो सम्मान अम्बेदकर की मूर्तियों को मिला है, वो शायद ही किसी राजनेता की मूर्ति को मिला होगा. इसका कारण यह है कि सरकार ने अम्बेदकर की मूर्तियां तो लगाई ही हैं, वहीं देश की लगभग हर दलित बस्ती में भी अंबेदकर की मूर्तियां स्थापित हैं. अम्बेदकर को भारत के संविधान निर्माता के रूप में जाना जाता है. वे स्वतंत्रता संग्राम के कद्दावर नेता थे. दलितों की सामजिक और राजनैतिक चेतना के सबसे बड़े प्रतीक होने के कारण वे आज भी प्रासंगिक हैं. इसलिए जब दलितों पर हमले होते हैं, तो उसकी चपेट में अम्बेदकर की मूर्तियां भी आ जाती हैं. हालिया दिनों में दलितों पर हमलों की वारदातों में इजाफा हुआ है, उसी तरह अम्बेदकर की मूर्तियों को तोड़ने, उसपर स्याही मलने और उसे क्षति पहुंचाने  की वारदातें भी बढ़ी हैं. हालांकि इन वारदातों की रिपोर्टिंग मुख्यधारा की मीडिया में कभी-कभी ही होती है, लेकिन वैकल्पिक मीडिया की वजह से ये खबरें लोगों तक पहुंच रही हैं.

प्रतीकों की मूर्तियां तोड़ने की ताज़ा घटनाएं त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद शुरू हुईं. वहां भाजपा समर्थकों ने कम्युनिस्टों के प्रतीक लेनिन की मूर्ति तोड़ दी. उसके बाद तमिलनाडु में भाजपा के उपाध्यक्ष एच राजा ने एक टि्‌वट किया कि आज त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिरी है, कल जातिवादी ईवी रामास्वामी पेरियार की मूर्तियों की बारी होगी. इस टि्‌वट के कुछ ही घंटों बाद वेल्लौर में पेरियार की मूर्ति पर हमला हुआ और उसे क्षति पहुंचाई गई. गौरतलब है कि पेरियार तमिलनाडु में द्रविड़ आन्दोलन के बड़े प्रतीक हैं. बहरहाल, पेरियार के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में अम्बेदकर, गांधी और अन्य नेताओं की मूर्तियों पर हमले होने लगे. भाजपा सरकार को इन प्रतीकों के टूटने का दर्द उस समय हुआ, जब कोलकाता में उनके प्रतीक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति के साथ तोड़फोड़ की गई.

यह तो रही मूर्ति तोड़ने की बात, दरअसल अम्बेदकर की मूर्तियां स्थापित करने में भी दलितों को तरह-तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ा है. इसकी एक मिसाल आंध्र प्रदेश में देखने को मिली. पिछले वर्ष पश्चिम गोदावरी जिले के गारागपरू गांव के 450 दलित परिवारों ने अम्बेदकर की मूर्ति स्थापित करने की कोशिश की. लेकिन यह बात गांव की ऊंची जाति के लोगों को पसंद नहीं आई. इसके बाद दलितों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा. जबसे दलितों ने देश की सत्ता में अपनी हिस्सेदारी के लिए संघर्ष शुरू किया है, तभी से अम्बेदकर की मूर्तियों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं भी बढ़ी हैं. तमिलनाडु में स्थिति इतनी ख़राब हो गई है कि वहां अम्बेदकर की मूर्तियों को जालियों में बंद करना पड़ा.

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