telanganaतेलांगना के मुख्यमंत्री और सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर 2019 के राष्ट्रीय सियासी परिदृश्य को काफी दिलचस्प बना दिया है. दरअसल, राज्य में 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव होने वाले थे, लेकिन पिछले कुछ समय से ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के संभावित गठबंधन से निपटने के लिए चंद्रशेखर राव समय से पहले चुनाव करवाने का दांव चल सकते हैं. बहरहाल, उन्होंने अटकलों पर पूर्ण विराम लगाते हुए 6 सितंबर को विधानसभा भंग कर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के साथ तेलंगाना में भी चुनाव कराने की सिफारिश कर डाली. यह फैसला अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाता है. सबसे पहले यह कि समय से पहले चुनाव कराने के क्या मायने हैं? 2019 में एनडीए के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकता की रूप रेखा क्या होगी? क्या पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी राजनीतिक समीकरण बदलेंगे? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या भाजपा विपक्ष को एकजुट होने से रोकने में कामयाब हो पाएगी?

हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर चंद्रशेखर राव इस वर्ष के मार्च महीने तक गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा गठजोड़ बनाने की कवायद में जुटे हुए थे. इस क्रम में उन्होंने ममता बनर्जी समेत कई विपक्षी नेताओं से मुलाक़ात भी की थी. लेकिन उन्हें मालूम था कि तेलंगाना में जिस तरह उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस के साथ है, वैसा मुकाबला बाकी के विपक्षी दलों का कांग्रेस के साथ नहीं है. अर्थात राष्ट्रीय स्तर पर टीआरएस का कांग्रेस के साथ समीकरण ठीक नहीं बैठ रहा था. इसलिए गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा की उनकी बात समझ से परे नहीं है. दरअसल, कांग्रेस के खिलाफ उन्होंने एक बड़ा इशारा उस समय दिया था जब कुमारस्वामी के नेतृत्व में कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की गठबंधन सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में वे नहीं पहुंचे थे. उन्होंने शपथ ग्रहण से एक दिन पहले कुमारस्वामी से मुलाक़ात की थी.

दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी टीआरएस से दो-दो हाथ करने का पहले से ही मन बना लिया था. चंद्रशेखर राव पर सीधा हमला बोलते हुए कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने उन्हें भाजपा की कठपुतली कह दिया था. जवाब में चंद्रशेखर राव ने भी विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने के फौरन बाद कांग्रेस पर हल्ला बोल दिया. उन्होंने राहुल गांधी को बफून (मसखरा) करार देते हुए कहा कि राहुल गांधी को दिल्ली की सल्तनत विरासत में मिली है और हम दिल्ली और कांग्रेस के गुलाम नहीं बन सकते. यहां सवाल यह उठ सकता है कि आखिर कांग्रेस चंद्रशेखर राव पर भाजपा से सांठगांठ का आरोप क्यों लगा रही थी और चंद्रशेखर की क्या मजबूरी है कि वे भाजपा के साथ लुका छुपी का खेल खेल रहे हैं?

सबसे पहली बात तो यह कि फ़िलहाल चंद्रशेखर राव अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं. दूसरी यह कि वे राज्य के तकरीबन 12-13 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को यह संदेश देना नहीं चाहते कि वे भाजपा के साथ जा रहे हैं. लेकिन कांग्रेस मुसलमानों को यह यकीन दिलाना चाहती है कि टीआरएस का भाजपा के साथ समझौत हो चुका है. कांग्रेस ने चंद्रशेखर राव द्वारा नोटबंदी, जीएसटी आदि मुद्दों पर मोदी सरकार के समर्थन को सबूत के तौर पर पेश किया. टीआरएस को मुसलमानों का अच्छा खासा समर्थन हासिल है. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ उसका गठबंधन भी है. दरअसल, मुसलमानों के वोट को खोने के डर से चंद्रशेखर राव विधानसभा का चुनाव जल्द करवा लेना चाहते थे, ताकि लोकसभा के चुनाव के समय कुछ ऐसा वातावरण न बने, जिसमें मुसलमानों का वोट उनसे दूर हो और उन्हें विधानसभा चुनावों में नुकसान उठाना पड़ जाए.

इसका एक पहलू यह भी है कि दक्षिण में टीडीपी के रूप में अपना एक सहयोगी खो चुकी भाजपा को टीआरएस के रूप में यदि कोई दूसरा सहयोगी मिल जाता है, तो उसे पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व सहर्ष स्वीकार करने के लिए तैयार है. इसलिए चंद्रशेखर राव की मंशा के मुताबिक, केंद्र सरकार चार अन्य राज्यों के साथ तेलंगाना में भी चुनाव करवाने में सहयोग कर रही है. अटकलें ये लगाई जा रहीं हैं कि पिछले महीने चंद्रशेखर राव की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात का मक़सद भी यही था. उस मुलाक़ात के बाद पहली बार उन्होंने खुलकर यह माना कि भाजपा के साथ चुनाव बाद गठबंधन के लिए उनके विकल्प खुले हैं. लेकिन भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व टीएसआर को लेकर जितना उत्साहित है, पार्टी की राज्य इकाई उतनी उत्साहित नहीं है. पार्टी की राज्य इकाई ने केंद्रीय नेतृत्व को यह संदेश दिया है कि समय पूर्व चुनाव कराने से केवल टीआरएस और कांग्रेस को लाभ मिलेगा, भाजपा को इसका नुकसान होगा. भाजपा की प्रदेश इकाई का यह भी तर्क था कि चंद्रशेखर राव पर विश्वास नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे किसी समय धोका दे सकते हैं, जैसे उन्होंने 2014 में तेलांगना राज्य के गठन के बदले कांग्रेस में अपने दल के विलय का वादा किया था. बहरहाल, भाजपा की नज़र राज्य की 119 विधानसभा सीटों के बजाय 17 लोकसभा सीटों पर है. लिहाज़ा आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू का साथ छूटने के बाद उसे तेलंगाना में केसीआर का साथ गनीमत लग रहा है.

कांग्रेस-टीडीपी-सीपीआई गठबंधन का मुकाबला

यह तो स्पष्ट है कि तेलांगना में टीआरएस की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है. समय पूर्व चुनाव कराने के पीछे टीआरएस की रणनीति यह भी थी कि कांग्रेस और विपक्ष को चुनाव की तैयारी का कम से कम मौक़ा दिया जाए. गौरतलब है कि राज्य में कांग्रेस का खेमा बिखरा हुआ है, जिसे अभी तक केंद्रीय नेतृत्व द्वारा दुरुस्त नहीं किया जा सका है. जबकि टीआरएस पहले से ही चुनावी मोड में आ चुकी थी. पिछले महीने उन्होंने समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए कई घोषणाएं की. उन घोषणाओं में मस्जिदों के इमाम और मुवाज्ज़ीन, मंदिरों के पुजारी, सरकारी कर्मचारी और महिला स्वयं सेवी समूह आदि शामिल थे. इसके अलावा उन्होंने रायतु बंधू योजना के तहत 58 लाख किसानों को दो किस्तों में 8000 रुपए की आर्थिक सहयता भी दी, जिससे राज्य में हुई अच्छी मानसून के कारण पहले से ही खुश किसानों को और राहत महसूस हुई. इन सबसे उनके लिए राज्य में एक सकारात्मक वातावरण तैयार हुआ है. ज़ाहिर है कांग्रेस को टीआरएस से निपटने के लिए अब नए सिरे से अपनी बिसात बिछानी पड़ेगी.

अब यह एक घिसा-पिटा जुमला बन चुका है कि सियासत में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई स्थायी दुश्मन. इस बात को एक बार फिर सच साबित करते हुए कांग्रेस ने टीडीपी और सीपीआई के साथ मिलकर तेलंगाना में बड़ा गठबंधन बनाकर चंद्रशेखर राव को टक्कर देने की तैयारी शुरू कर दी है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि यदि गठबंधन अंतिम रूप ले लेता है, तो यह पहला मौक़ा होगा जब टीडीपी अपने 35 साल के इतिहास में कांग्रेस के साथ किसी तरह का कोई चुनावी समझौता करेगी. ख़बरों के मुताबिक, पहली राउंड की बातचीत के बाद कांग्रेस, टीडीपी और सीपीआई ने तेलंगाना में साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है. प्रदेश कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी ने यहां तक दावा किया है कि चंद्रशखर राव को अपदस्थ करने के लिए वे राज्य के हर विपक्षी दल और संगठन को एक मंच पर जमा करेंगे.

हालांकि यह पहले देखा जा चुका है कि समय पूर्व चुनाव कराने से सत्ताधारी दल फायदा भी हुआ है और नुकसान भी. अभी यह कहना मुश्किल है कि चंद्रशेखर राव का यह पैंतरा कामयाब होगा या नहीं, लेकिन यह देखना ज़रूर दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस आंध्र प्रदेश में भी टीडीपी के साथ चुनावी समझौता करेगी? यदि समझौता करेगी तो वहां बड़े दल की भूमिका में कौन होगा? वहीं दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने साफ़ कर दिया है कि अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के साथ ही तेलंगाना के विधानसभा चुनाव भी होंगे. इन चुनावों के नतीजों से एक तरफ जहां 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए देश के मिज़ाज का पता चलेगा, वहीं यह भी तय होगा कि विपक्ष और सत्ता पक्ष की रणनीति क्या होगी.

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