‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ कितनी सच है या झूठ, इस बहस में उलझने वाले लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि इस प्रयोग से एक बात तो साफ हो गई है—भारत में वर्तमान समय में जो राजनीतिक शून्यता (पोकळी) का आलम चल रहा है, उससे लोग ऊब चुके हैं। और सचमुच, कोई सार्थक पहल—जैसे 1973-74 में गुजरात से शुरू होकर बिहार तक फैलने के बाद 1977 में राजनीतिक बदलाव हुआ था, जिसमें एक कॉकक्रोच के रूप में मैंने भी हिस्सा लिया था—उसे देखकर ही मैं यह मुक्त चिंतन लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।

कुछ लोग, जो पिछले कुछ दिनों से वर्तमान परिस्थिति को लेकर कुछ कोशिशें कर रहे थे, लेकिन उन्हें इस तरह का जन-रिस्पॉन्स नहीं मिलने की वजह से कुंठित होकर इस प्रयोग की आलोचना कर रहे हैं; या जो लोग सत्ताधारियों के भांट (स्तुतिपाठक) बन चुके हैं, वे और भी ज्यादा डरने की वजह से बदतमीजी से धमकियां देते हुए, वर्तमान समय में भी सत्ताधारी भाजपा से जो भी लोग नाराज दिखाई देते हैं, उनके पीछे पड़ जाते हैं। उन सभी को अच्छी तरह से मालूम है कि हमें जनता में कोई विशेष जनाधार नहीं है; इसलिए पूरे निर्वाचन आयोग (चुनाव आयोग) की चयन प्रक्रिया में बदलाव करते हुए अपने पसंद के लोगों को उस आयोग में बैठाकर, उनके द्वारा सेना की मदद लेकर चुनाव मैनेज करते हुए सत्ताधारी बने रहने वाले सभी तानाशाहों का अंत हुआ है। और भाजपा को हर हाल में आज ना कल जाना ही है। इस बात का पता भाजपा तथा उसकी मातृसंस्था आरएसएस को भी अच्छे से है; क्योंकि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में किसी भी विशेष धर्म के नाम पर राजनीति ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकती। यही सिग्नल ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ के हलके-फुलके प्रयोग से सभी को दिखाई दे रहा है, और इसीलिए सभी उसके ऊपर टूट पड़े हैं।

हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं को, और उसके साथ सभी तरह के सामाजिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को भी लपेटते हुए ‘कॉकक्रोच’ की उपमा दी है। वैसे ही हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी—खुद बाबरी मस्जिद के खिलाफ आंदोलन से यह मुकाम हासिल करने के बावजूद—’आंदोलनजीवी’ से लेकर ‘झोलाछाप’ वगैरह जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए आंदोलनकारियों को गरियाने का काम किया है। जबकि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के लिए 2013-14 के चुनाव प्रचार में “मुझे एक बार मौका दो, मैं हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार दूंगा” जैसी घोषणाएं की थीं। शायद प्रधानमंत्री बनने के इस महीने में उनके 12 साल पूरे हो रहे हैं, और इन बारह सालों में भी उन्होंने दो करोड़ बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने का काम नहीं किया; उल्टा उन्हें पकोड़े बनाकर बेचने की सलाह देने से लेकर ‘अग्निवीर’ जैसी पांच साल के लिए कुछ युवाओं को सेना जैसी अतिसंवेदनशील जगह पर तात्कालिक रूप से नौकरी में रखने का अजीबोगरीब फैसला लिया है। यह हमारे देश की सुरक्षा के लिए भी एक गैर-जिम्मेदाराना फैसला है। और पांच साल के बाद, यही सेना से प्रशिक्षित हुए युवक जब दोबारा कोई और नौकरी नहीं मिलने से हताशा की भावनाओं में बहेंगे, तब वे किसी हिंसक कार्रवाई में शामिल नहीं होंगे, इसकी क्या गारंटी है?

गत 12 सालों से लगातार सरकारी नौकरियों में नई भर्तियां लगभग नहीं के बराबर होने से, हर साल शिक्षित बेरोजगार युवा “खाली दिमाग शैतान का घर” कहावत के अनुसार हताशा में जी रहे हैं। ऐसे में उन्हें ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ जैसा ऑनलाइन ही क्यों न हो, एक अभिव्यक्त होने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध हो जाता है। जो भारत की किसी भी राजनीतिक पार्टी के डिजिटल मार्केटिंग को पीछे छोड़ने का रिकॉर्ड बनाता है—इसे देख-कर ही सत्ताधारी पार्टी के ‘सॅफ्रॉन डिजिटल आर्मी’ के लोगों ने ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ के जन्मदाता को अपने प्रशिक्षण के अनुसार पहले तो भाजपा में जॉइन होने के लिए दबाव डाला, फिर “जान से मार दूंगा” जैसी फिल्मी धमकियां देना शुरू कर दिया है। यह देखकर ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ की संकल्पना कॉइन (प्रस्तुत) करने वाले युवक के माता-पिता को घबराकर पब्लिकली कहना पड़ रहा है कि “भाई, हम गरीब लोगों को इन सब झंझटों में नहीं पड़ना चाहिए, तुम यह सब बंद कर दो।”

लेकिन वर्तमान सत्ताधारी पार्टी और उसके कारिंदों से मेरा साफ-साफ कहना है कि मैं भी अपनी उम्र के 20-30 के दौरान, 1970 से 80 के दशक में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के सिपाहियों में से एक था। और एक युवा होने के नाते, अगल-बगल की असहनीय परिस्थितियों के प्रति मेरी प्रतिक्रिया बहुत ही तीव्र होती थी। अगर जयप्रकाश नारायण ने 1970 में ‘तरुण शांति सेना’ और उसके बाद ‘छात्र युवा संघर्ष वाहिनी’ का निर्माण नहीं किया होता, तो मैंने भी किसी और हिंसक रास्ते से अपने गुस्से की अभिव्यक्ति की होती। इसलिए मैं अपने खुद के अनुभवों के आधार पर ही यह लिख रहा हूँ कि वर्तमान समय में, गत 12 सालों से लगातार दिन-प्रतिदिन लोगों की अभिव्यक्ति का गला घोंटना बंद करो; अन्यथा देश में गृहयुद्ध (Civil War) हो सकता है। और किसी भी पुलिस या सैनिकों के बस की बात नहीं है कि वे अपने ही भाई-बहनों या बेटे-बेटियों की जानें लेंगे; वे भी उस प्रतिरोध में शामिल होंगे, यह मैं अपने खुद के अनुभवों से लिख रहा हूँ। जयप्रकाश नारायण ने भी पुलिस-प्रशासन के लोगों को संविधान के विरोध में दिए गए किसी भी आदेश को मानने से मना करने की सलाह दी थी, और इसीलिए उन्हें भी तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी के लोगों ने देशद्रोही तक बोलना शुरू कर दिया था।

सत्तर के दशक में मुझे आंदोलन के दौरान गिरफ्तार करने के बाद, पुलिस और प्रशासन के लोगों द्वारा हमारे साथ बहुत ही सहानुभूति और सम्मान का व्यवहार किया जाता था। वे अपने खुद के टिफिन से हमें खाना खिलाते हुए कहते थे कि “यह मामूली सभा, संमेलन और मोर्चा निकालने से कुछ नहीं होगा; सीधे बंदूक उठाओ और सरकार को उखाड़ फेंको।” उल्टा हम ही उन्हें समझाते थे कि “नहीं, हमारे आदर्श महात्मा गांधी जी हैं, इस वजह से हम उस मार्ग पर कभी नहीं चलने की कसम खा चुके हैं और सत्याग्रह के माध्यम से ही आंदोलन करेंगे।” वैसे तो हमारे प्रधानमंत्री की भाषा में महात्मा गांधी जी और उनके साथ सभी स्वतंत्रता सेनानी भी ‘आंदोलनजीवी’ ही थे। हालांकि वर्तमान भाजपा का पूर्ववर्ती रूप ‘जनसंघ’ तथा उनका मातृसंगठन ‘आरएसएस’ इस दौरान हमारे साथ ही थे और वे भी इन अनुभवों से गुजरे हैं। सुना है कि वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी भी गुजरात के ‘नवनिर्माण आंदोलन’ में शामिल थे; उसके बावजूद भी वे ‘आंदोलनजीवी’ जैसी अपमानजनक टिप्पणियों से बाज नहीं आ रहे हैं? क्या वे अपने आप को ही यह बात तो नहीं कह रहे? क्योंकि बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि के आंदोलन से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की वजह से ही वे आज यहाँ तक पहुँचे हैं।

सत्ताधारी बनने के बाद जिन बातों का विरोध करते हुए आप लोगों ने यह मुकाम हासिल किया है, क्या उसे इतनी जल्दी भूल गए? हालांकि, भूलने और भुलाने की बीमारियों के शिकार रहे सभी सत्ताधारी लोगों का इतिहास में पतन ही हुआ है। यह बात भाजपा और उसकी मातृसंस्था आरएसएस को याद दिलाने के लिए ही मैं आज यह पोस्ट लिख रहा हूँ; क्योंकि हमारे-आपके कुछ मतभेदों के बावजूद भी, हम दोनों उस दौरान कुछ समय साथ-साथ चले हैं। उन अनुभवों को देखकर मैं पुनः आगाह करने का प्रयास कर रहा हूँ कि गत 12 सालों से लगातार आप लोगों ने सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द पूरी राजनीतिक गतिविधियों को लाकर खड़ा कर दिया है। चुनाव आयोग तथा सर्वोच्च न्यायालय से लेकर सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपने दल की इकाई बनाकर सत्ता को कब्जे में ले लिया है। लेकिन 145 करोड़ आबादी के लोगों को सिर्फ कुछ रेवड़ियां बांटकर और जुमलेबाजी से ज्यादा समय तक भ्रमित नहीं किया जा सकता।

‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ तो सिर्फ एक डिजिटल प्रयास है। वह दिन भी दूर नहीं है जब साक्षात जमीन पर, दुनिया की सबसे बड़ी बेरोजगारी की मार झेल रहे युवा सड़कों पर उतर आएंगे। क्योंकि जब उनके तरक्की के सभी रास्ते बंद किए जा रहे हों, और तथाकथित स्पर्धा परीक्षाओं (Competitive Exams) के घोटालों में अपने ही लोग लिप्त देखकर हर साल लीपापोती की जा रही हो; अपने स्वयंसेवकों को बचाने के लिए देश के संविधानानुसार ‘चेक एंड बैलेंस’ के लिए बनाए गए पूरे संवैधानिक ढांचे को ही अपनी पार्टी और मातृसंस्था की सेवा में लगाने की करतूतें सामने आ रही हों—ऐसे में जब लोग देख रहे हैं कि आप कुछ चंद पूंजीपतियों को पालने-पोसने में लगे हैं और अपनी पार्टी तथा मातृसंस्था के लिए हजारों करोड़ रुपए के आलीशान महलों से लेकर दैनिक जीवन में पैसों का नग्न खेल चल रहा है, तो क्या लोग कुछ भी नहीं करेंगे? क्या लोग अंधे, बहरे और गूंगे हो गए हैं?

हर बात की एक लिमिट होती है, अब वह खत्म हो चुकी है। यही मुझे ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ के प्रयोग से दिखाई दे रहा है।

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