भारत की राजनीति यूनान की मिथकीय कहानी की खूबसूरत महिला पात्र पैंडोरा की तरह है, जिसके हाथ में शिल्प कौशल के देवता एक बॉक्स देकर हिदायत देते हैं, इसे कभी खोलना नहीं. लेकिन जिज्ञासु पैंडोरा उस बॉक्स को खोल देती है और बॉक्स में बंद सारी बुराइयां दुनिया को प्रदूषित करने के लिए आजाद हो जाती हैं. भारत में जब भी चुनाव आता है, पैंडोरा की तरह ‘राजनीति-देवी’ घोटालों-भ्रष्टाचारों का बक्सा खोल देती हैं और लोकतंत्र का पर्व हर बार बदबू से भर जाता है. इस बुराई-बक्से का इस्तेमाल सभी करते हैं, विपक्षी दल से लेकर सत्ताधारी दल तक. लेकिन चुनाव खत्म होते ही बुराई-बक्सा अगले चुनाव के लिए ताक पर रख दिया जाता है. अभी कांग्रेस बुराई-बक्से से सत्ताधारी भाजपा का राफेल-सौदा निकाल कर चमका रही है, तो भाजपा लंबे समय तक सत्ता सुख भोगती रही कांग्रेस के घोटालों की लंबी फेहरिस्त निकाल कर दिखाने में लगी है.

इसी बुराई-बक्से से उत्तर प्रदेश का पत्थर घोटाला भी सामने निकल आया है. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा के भ्रष्टाचार का बुराई-बक्सा खोल कर समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी. लेकिन सत्ता में आते ही समाजवादी पार्टी ने बसपा का भ्रष्टाचार दबा दिया. बाद में उसी भ्रष्टाचार की प्रणेता पार्टी बसपा से समाजवादी पार्टी ने गठबंधन रिश्ता भी बना लिया. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्मारक (पत्थर) घोटाले की जांच (स्टेटस) रिपोर्ट मांग कर भाजपा को बुराई-बक्सा खोलने का चुनावी-मौका दे दिया है. अब तक भाजपा सरकार भी इस घोटाले को लेकर मौन साधे थी, लेकिन चुनाव आया तो डराने, धमकाने और औकात दिखाने में पत्थर घोटाला अब उनके काम आने वाला है. जब देश-प्रदेश में लोकसभा चुनाव का माहौल गरमाया, तभी ऐन मौके पर मायावती-काल के स्मारक घोटाले की सीबीआई जांच के लिए किसी शशिकांत उर्फ भावेश पांडेय की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हो जाती है. इस याचिका पर त्वरित सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीबी भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा उत्तर प्रदेश सरकार से इस मामले में विजिलेंस जांच की प्रगति रिपोर्ट मांग लेते हैं. याचिका पर हाईकोर्ट के रुख से सनसनी फैल गई. बसपा भी सनसना गई और उससे गठबंधन करने पर उतारू सपा भी सनसनाहट से भर गई.

मायावती के मुख्यमंत्रित्व-काल में राजधानी लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में अम्बेडकर स्मारकों और पार्कों के निर्माण में 14 अरब रुपए से भी अधिक का घोटाला हुआ था. तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति एन के मेहरोत्रा की रिपोर्ट और कार्रवाई की सिफारिश पर अखिलेश यादव सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की थी. लोकायुक्त एन के मेहरोत्रा ने मई 2013 में ही अखिलेश सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी. स्मारक घोटाले में तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा समेत 199 व्यक्ति और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिकान जिम्मेदार ठहराए गए थे. आरोपियों में दो मंत्रियों, एक दर्जन विधायकों, दो वकीलों, खनन विभाग के पांच अधिकारियों, राजकीय निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह समेत 59 अधिकारियों और पांच महाप्रबंधकों, लखनऊ विकास प्राधिकरण के पांच अधिकारियों, 20 कंसॉर्टियम प्रमुखों, 60 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों (फर्म्स) के मालिक और राजकीय निर्माण निगम के 35 लेखाधिकारियों के नाम शामिल हैं. आरोपियों की लिस्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती या मुख्यमंत्री सचिवालय के उनके खास नौकरशाहों के नाम शामिल नहीं हैं.

लोकायुक्त एन के मेहरोत्रा ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबूसिंह कुशवाहा, राजकीय निर्माण निगम के तत्कालीन प्रबंधन निदेशक (एमडी) सीपी सिंह, खनन विभाग के तत्कालीन संयुक्त निदेशक सुहैल अहमद फारूकी और 15 इंजीनियरों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराकर मामले की सीबीआई से जांच कराने और घोटाले की रकम वसूलने की सिफारिश की थी. लोकायुक्त ने यह भी सिफारिश की थी कि आरोपियों की आय से अधिक पाई जाने वाली चल-अचल सम्पत्ति जब्त कर ली जाए और स्मारकों के लिए पत्थर की आपूर्ति करने वाली 60 फर्मों और 20 कंसॉर्टियम से भी वसूली की कार्रवाई की जाए. लोकायुक्त की रिपोर्ट मिलने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्रवाई की बात तो कही, लेकिन सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश करने के बजाय सतर्कता अधिष्ठान को जांच सौंप दी. मामले को घालमेल करने के इरादे से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्रवाई के लिए लोकायुक्त की रिपोर्ट के कुछ हिस्से अलग कर उसे गृह विभाग को सौंप दिए. उसी रिपोर्ट के कुछ हिस्से लोक निर्माण विभाग को सौंप दिए गए और कुछ हिस्से भूतत्व और खनन विभाग के सुपुर्द कर दिए गए. यानि, गृह विभाग छोड़ कर, पत्थर घोटाले में जो विभाग शामिल थे, उन्हें ही कार्रवाई करने की अखिलेश सरकार ने जिम्मेदारी दे दी.

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