विनम्रता से अपनी बात एक कहावत से शुरू करना चाहते हैं. कहावत है कि प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. आप में से बहुत से इसके पीछे की कहानी से परिचित होंगे, फिर भी हम उनके लिए लिख रहे हैं, जो इस कहावत की उत्पत्ति नहीं जानते. किसी बड़ी ग़लती पर बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया. ग़लती करने वाले शख्स ने सोचा कि प्याज़ खाना ज़्यादा आसान है, अत: उसने सौ प्याज़ खाने की सज़ा चुनी. उसने जैसे ही दस प्याज़ खाए, वैसे ही उसे लगा कि जूते खाना आसान है तो उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएं. दस जूते खाते ही उसे लगा कि प्याज़ खाना आसान है, अत: उसने फिर प्याज़ खाने की सजा चुनी. दस प्याज़ खाने के बाद फिर उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएं. फैसला न कर पाने की वजह से उसने सौ प्याज़ भी खाए और सौ जूते भी. यहीं से इस कहावत का प्रचलन प्रारंभ हुआ. आज भारतीय जनता पार्टी के लिए कह सकते हैं कि झारखंड में उसने सौ जूते भी खाए और सौ प्याज़ भी.

क्यों मुख्यमंत्री पद चाहती थी भाजपा, इसका जवाब तलाशना चाहिए. अर्जुन मुंडा के मुख्यमंत्री रहते मधु कोड़ा ने जिस तरह संपत्ति इकट्ठी की, वह भारत की राजनीति के निम्नतम उदाहरणों में से एक है. लक्ष्मी मित्तल के प्रतिनिधि के रूप में मधु कोड़ा काम कर रहे थे और उसकी क़ीमत वसूल कर रहे थे. लक्ष्मी मित्तल के लोग ही मधु कोड़ा को मिलने वाले पैसे को दक्षिण एशियाई देशों में लगा रहे थे.

लालकृष्ण आडवाणी के भाजपा का नेता रहते यह हुआ. अगर उनसे चूक हुई तो सुषमा स्वराज और अरुण जेटली क्या कर रहे थे. राजनाथ सिंह तो भाजपा के अध्यक्ष रह चुके थे और झारखंड मामलों के मुखिया थे. सुषमा स्वराज ने जगजीवन राम और जार्ज फर्नांडिस के सानिध्य में राजनीति सीखी और फिर भाजपा में गईं तथा अपनी बोलने की ताक़तवर शैली और कुशलता की वजह से आज संसद में विपक्ष की नेता हैं. अरुण जेटली छात्र आंदोलन में तो प्रखर थे ही, बड़े वकील हैं सुप्रीम कोर्ट में, अपने तर्कों से अक्सर हारी बाज़ी जीत लेते हैं, चाहे बाज़ी ग़लत ही क्यों न हो. जब झारखंड में फैसला हो गया कि समर्थन वापस लेना है तो उसे क्यों रोकने में इन्होंने साथ दिया. राजनाथ सिंह के घर, बाहर, रांची में हर जगह भाजपा नेता बैठे और कैसे उनका मुख्यमंत्री बने, इसके लिए सारी कुशलता ख़र्च कर दी.
क्यों मुख्यमंत्री पद चाहती थी भाजपा, इसका जवाब तलाशना चाहिए. अर्जुन मुंडा के मुख्यमंत्री रहते मधु कोड़ा ने जिस तरह संपत्ति इकट्ठी की, वह भारत की राजनीति के निम्नतम उदाहरणों में से एक है. लक्ष्मी मित्तल के प्रतिनिधि के रूप में मधु कोड़ा काम कर रहे थे और उसकी क़ीमत वसूल कर रहे थे. लक्ष्मी मित्तल के लोग ही मधु कोड़ा को मिलने वाले पैसे को दक्षिण एशियाई देशों में लगा रहे थे. क्या अर्जुन मुंडा भी इसी श्रेणी में हैं और मित्तल के वित्तीय हितों की देखभाल के लिए किसी भी क़ीमत पर भाजपा का, वह भी वह ख़ुद मुख्यमंत्री बनें, यह चाहते थे? सारी ताक़त इसी बात के लिए ख़र्च हुई कि किसी भी तरह भाजपा की सरकार बन जाए. इसके पीछे कोई भाजपा का या संघ का सिद्धांत नहीं था, हिंदू या राज्य की जनता का हित नहीं था, क्योंकि अगर होता तो शिबू सोरेन के खेद प्रकट करने के बाद सरकार चलने देनी चाहिए थी. लेकिन अगर उन्होंने खेद प्रकाश स्वीकार नहीं किया और सरकार गिराने का फैसला किया तो सरकार गिरानी चाहिए थी या समर्थन वापस करना चाहिए था. फैसला लेने के बाद पलटने के पीछे एक ही सिद्धांत रहा और वह था वित्तीय सिद्धांत.
यशवंत सिन्हा और रघुबर दास भी मुख्यमंत्री पद की होड़ में थे और जब यह तय हो गया कि अर्जुन मुंडा भाजपा के उम्मीदवार होंगे, तभी ये दोनों ख़ामोश हुए. कम से कम यशवंत सिन्हा को तो अपने को इस भोंडे नाटक से अलग रखना चाहिए था, पर मुख्यमंत्री पद की धूमिल आशा ने उन्हें भी हास्यास्पद बना दिया. कहां गया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनैतिक शुचिता का सिद्धांत. उन्होंने तो नितिन गडकरी को इसलिए अध्यक्ष बनवाया था कि भाजपा को उस चेहरे की पहचान फिर से मिल जाएगी, जो ग़ायब हो गई है. संघ का मानना था कि आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की लालसा ने भाजपा को उसके मूल सिद्धांतों से दूर कर दिया है. इसीलिए मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता और संघ की नीतियों के पैरोकार को बेरहमी से किनारे लगा दिया गया. कौन सा नया चेहरा सामने आया भाजपा का, उसका एक ही नाम है, जिसे कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री की धुंधली कुर्सी पाने के लिए सब कुछ करने को तैयार चेहरा. अर्जुन मुंडा तो अपने लिए शिबू सोरेन को मनाने के लिए उनके घर तक गए और वापस आकर कहा कि शिबू सोरेन स़िर्फ उनके नाम पर पद त्याग कर सकते हैं. लंदन में बैठे स्टील किंग के अरबों रुपये के दबाव और भाजपा के कुर्सी लेने के दांव को किसने विफल कर दिया? केवल और केवल शिबू सोरेन और उनके बेटे हेमंत सोरेन ने. दोनों को राजनीति के जोड़तोड़ का बहुत पता नहीं है, पर दोनों ने जिस तरह पूरी भाजपा को मूर्ख बनाया, वह समझने लायक़ है. इनके सामने आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू पानी मांग गए.
कांग्रेस ने थोड़ी समझदारी दिखाई और अपने को इस कवायद से अलग रखा. सुबोधकांत सहाय मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, पर वह शिबू सोरेन को भी जानते थे. कांग्रेस ने भाजपा को पूरी तरह सिद्धांत छोड़ कुर्सी के लिए सब कुछ करने के लिए खुला मैदान देने का फैसला कर लिया. सवाल भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का है. उनके भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद यह पहला संकट भाजपा के सामने आया और उसी में वह असफल हो गए. बीच में ही पार्टी को संकट में छोड़ वह नीदरलैंड के शहर एम्सटरडम चले गए. जिस पार्टी का सबसे बड़ा नेता संकट के समय मैदान में नेतृत्व के लिए खड़ा न हो, वह पार्टी इसी गति को प्राप्त होती है. इसे गडकरी नहीं समझते, बल्कि उनकी पार्टी के कुछ नेता ज़रूर समझते होंगे. सारे संकट में आडवाणी का चुप रहना और कोई दख़ल न डालना भी आश्चर्य पैदा करता है. पर इस सारी जंग में झारखंड कहां है. एक ऐसा प्रदेश, जिसमें खनिज पदार्थों का अकूत ख़ज़ाना है, जिसे बेच कर देसी और विदेशी खरबपति हो रहे हैं, वहां लोगों की बड़ी आबादी के पास न काम है और न दोनों व़क्त की रोटी. बुनियादी सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है. विकास के नाम पर दिनोंदिन पिछड़ापन बढ़ रहा है. सड़क, अस्पताल, स्कूल की तलाश का काम करने की ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि इनके लिए कोई प्रतिबद्ध ही नहीं है. आदिवासी बद से बदतर होते जा रहे हैं.
झारखंड के लोगों के ग़रीब तबके ने नक्सलवाद को समर्थन देना शुरू कर दिया है. एक ओर उड़ीसा, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और तीसरी ओर बिहार, बंगाल. झारखंड की यह पट्टी सुरक्षित और मुक्त क्षेत्र में बदल गई है. अब नक्सलवादियों का हमला बड़े ज़मींदारों पर नहीं हो रहा, बल्कि सरकारी संपत्ति पर हो रहा है. सरकारी संपत्ति का सबसे आसान मतलब रेलवे लाइन है. लाखों किलोमीटर फैली रेलवे लाइन की सुरक्षा के लिए हर क़दम पर सुरक्षाबल खड़े नहीं किए जा सकते, क्योंकि वे उपलब्ध ही नहीं हैं. इसका निशाना मासूम यात्री बनते हैं. लेकिन इनकी सुरक्षा ग़रीबों को अपना दुश्मन मान कर नहीं की जा सकती. उनकी समस्याओं और उनकी मांगों को समझना होगा. पश्चिमी मिदनापुर में हावड़ा से मुंबई जा रही ट्रेन की मालगाड़ी से टक्कर हुई, गृह मंत्रालय ने कहा कि फिश प्लेट उखाड़ने से हादसा हुआ, वहीं रेल मंत्रालय ने कहा कि बम का धमाका हुआ, जिससे दुर्घटना हुई. दोनों मंत्रालय ही एक नहीं हैं. वहीं टेलीविज़न चैनलों ने चिल्लाना शुरू किया कि यह नक्सलवाद नहीं, आतंकवाद है. मारो, नक्सलवादियों को मारो. ग़ैर ज़िम्मेदार टेलीविज़न चैनलों को पता ही नहीं कि अपने लोगों को दुश्मन मान किसी भी चीज़ की ह़िफाज़त नहीं हो सकती.
चिदंबरम के लिए क़ानून व्यवस्था का मसला है और वह तोप और तलवार लिए खड़े हैं, पर जिस राज्य सरकार को लड़ना है, वह कुछ करना ही नहीं चाहती. उसका सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था लागू करने वाला तंत्र जंग खा चुका है तथा विकास का काम करने वाला विभाग दम तोड़ रहा है. और इस प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए दल लड़ रहे हैं, ताकि लंदन में बैठे खरबपति स्टील किंग की दलाली कर अपने लिए विदेशी बैंकों में करोड़ों रुपये जमा करा सकें. झारखंड एक ऐसा आईना है, जिसमें सबका चेहरा जैसा है, वैसा ही दिखाई दे रहा है.

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