आज जब हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर नजर घूमती है तो हमें बहुत सारे नाम याद आते हैं, जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया, उसमें नए-नए अध्याय जोड़े और उसे आज जहां हिंदी पत्रकारिता है, वहां तक पहुंचाया। हम डॉक्टर धर्मवीर भारती को कैसे भूल सकते हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदी में उपन्यास लिखे और हिंदी को साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर बना दिया। डॉक्टर धर्मवीर भारती ऐसा नाम है, जिसने हिंदी को पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी दी है और उस पीढ़ी ने आगे नए-नए पत्रकार बनाए।

दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में काम करने वाले वहां के एक कर्मचारी ने परसों ही मुझसे पूछा था कि क्या आपके पास ‘गुनाहों का देवता’ है? उसे लगा कि इसे मैंने लिखा है, क्योंकि वह ‘भारतीय’ और ‘भारती’ में फर्क भूल गया था। उसे लगा कि यह उपन्यास मैंने ही लिखा है। तब मैंने उसे बताया कि इसे डॉ. धर्मवीर भारती ने लिखा है और यह एक कालजयी उपन्यास है। आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि डॉ. धर्मवीर भारती के उपन्यासों का पाठक वर्ग कितना बड़ा है।

डॉ. धर्मवीर भारती के समय ‘दिनमान’ के संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादक मनोहर श्याम जोशी, ‘कादंबिनी’ के संपादक राजेंद्र अवस्थी, ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक विद्यानिवास मिश्र जैसे अनेक मूर्धन्य साहित्यकार-पत्रकार थे। इसके बाद रघुवीर सहाय और सुरेंद्र प्रताप सिंह की पीढ़ी आई। सुरेंद्र प्रताप सिंह तक यह माना जाता था कि वही अच्छा पत्रकार है, जो अच्छा साहित्यकार है। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने इस धारणा को बदल दिया और उन्होंने साहित्यकार और पत्रकार के बीच की रेखा स्पष्ट कर दी।

सुरेंद्र प्रताप सिंह ‘रविवार’ के संपादक बने और उन्होंने हिंदी में पहली बार खोजी पत्रकारिता की शुरुआत की। यहीं से हिंदी पत्रकारिता में खोजी पत्रकारों को काफी सम्मान मिलने लगा। उन्होंने अपने समय में उदयन शर्मा, संतोष भारतीय, स्वामी त्रिवेदी, अरुण रंजन और राजेश बादल जैसे अनगिनत पत्रकार तैयार किए। राजीव शुक्ला आज बड़े राजनेता हैं, लेकिन उनकी शुरुआत ‘रविवार’ से ही हुई थी।

‘जनसत्ता’ अखबार भी इसी समय निकला। इसके पहले संपादक प्रभाष जोशी बने। बाद में जोशी ने ‘जनसत्ता’ को एक अलग धार दी और उन्होंने हरिशंकर व्यास, राम बहादुर राय जैसे पत्रकार तैयार किए। जिस तरह ‘दिनमान’ अपने समय में अज्ञेय के संपादकत्व में भारत की पहली ‘न्यूज़ एंड व्यूज़’ शैली की, ‘न्यूज़वीक’ की तरह विश्व को देखने वाली खिड़की के रूप में जाना जाता है, उसी तरह ‘रविवार’ हिंदी पत्रकारिता में खोजी, समाचार-आधारित पत्रकारिता के रूप में जाना जाता है।

‘दिनमान’ ने त्रिलोकदीप, महेश्वर दयाल गंगवार, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मनोहर श्याम जोशी और श्रीकांत वर्मा जैसे पत्रकार दिए। ओम प्रकाश दीपक इसके मुख्य लेखक थे। आज ये सब हिंदी पत्रकारिता के आकाश पर जगमगा रहे हैं।

‘रविवार’ और ‘दिनमान’ में एक बुनियादी फर्क था। जहां ‘दिनमान’ ने उम्रदराज लोगों पर भरोसा किया, वहीं ‘रविवार’ ने 22–23 साल के युवाओं को अवसर दिया। इसका परिणाम यह निकला कि ‘रविवार’ ने यह साबित करने की कोशिश की कि आने वाला वक्त नौजवानों का है और वे संवाददाता से लेकर संपादक तक बन सकते हैं। फील्ड रिपोर्टिंग में ‘रविवार’ का बहुत बड़ा योगदान था। उसके युवा संवाददाता किसी भी परिस्थिति में कहीं भी जाने की हिम्मत रखते थे।

‘रविवार’ के बाद नई पीढ़ी में ‘चौथी दुनिया’ आई। ‘चौथी दुनिया’ के पत्रकारों ने एक अलग तरह की पत्रकारिता शुरू की। उनकी रिपोर्ट्स ने तहलका मचा दिया और एक सरकार को गिराने तथा दूसरी सरकार बनवाने तक में भूमिका निभाई।

इसी दौर में एक बड़े पत्रकार हुए श्री कन्हैयालाल नंदन। नंदन ने दोनों पक्षों की बातें कीं। पक्ष की भी और विपक्ष की भी। वे एक तरह से ‘तुम भी सही, मैं भी सही’ वाली स्थिति में रहे। उन्होंने सेफ जोन में बैटिंग की, जबकि ‘रविवार’ और ‘चौथी दुनिया’ एक अलग प्रकृति की पत्रकारिता करते थे, जिसमें अपितु, किंतु, परंतु जैसे शब्दों का कोई स्थान नहीं था। उनकी पत्रकारिता सीधी, स्पष्ट और सत्य के साथ खड़े होने वाली थी।

‘धर्मयुग’, ‘रविवार’ के बाद ‘चौथी दुनिया’ ने नए संपादकों की एक श्रृंखला हिंदी पत्रकारिता को समर्पित की। ‘चौथी दुनिया’ में जितने लोग उस समय काम कर रहे थे, चाहे वे उपसंपादक हों या संवाददाता, लगभग सभी आगे चलकर संपादक के पद तक पहुंचे। कमर वहीद नकवी ‘आजतक’ के न्यूज डायरेक्टर रहे। रामकृपाल सिंह ने ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक का दायित्व संभाला। वीरेंद्र सेंगर और हरिनारायण ‘रांची हिंदुस्तान’ के संपादक रहे। राजीव कटारा ‘कादंबिनी’ के संपादक बने। अरविंद कुमार सिंह ने भी संपादक के रूप में पहचान बनाई, जबकि आलोक पुराणिक आर्थिक विषयों और व्यंग्य के बड़े लेखक के रूप में स्थापित हुए।

विश्वनाथ सचदेव ने मुंबई में गणेश मंत्री के बाद ‘धर्मयुग’ के संपादक का पद संभाला। बाद में वे लंबे समय तक ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक भी रहे। इस समय वे ‘नवनीत’ के संपादक हैं। नारायण दत्त के बाद ‘नवनीत’ विश्वनाथ के हाथों में फल-फूल रहा है। कुमार प्रशांत भी इस समय देश के बड़े सामाजिक आंदोलनों के नेता हैं और वे भी ‘धर्मयुग’ से जुड़े रहे। आज पत्रकारिता के ये लोग, जिन्होंने पत्रकारिता की सही परिभाषा लिखी, उसकी विशेषता को बढ़ाया और उसका मान बढ़ाया, एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

पर आज की पत्रकारिता, पत्रकारिता को शीर्षासन करा रही है। जो टीवी के एंकर हैं, वही अपने को पत्रकार और संपादक समझ बैठे हैं। इन्हें यह नहीं पता कि पत्रकारिता वह नहीं है, जो ये कर रहे हैं, बल्कि यह पत्रकारिता की उल्टी परिभाषा है। इन्हें सरकार से सवाल नहीं पूछने हैं, बल्कि जो अन्याय का शिकार है, उसी से सवाल पूछने हैं। ये इतिहास में अक्षम्य अपराध कर रहे हैं। लेकिन आज भी पत्रकारिता के ऐसे ध्रुव मौजूद हैं, जो नए पत्रकारों को दिशा-निर्देशन का काम कर रहे हैं।

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