देवभूमि के रूप में विख्यात उत्तराखंड अपने गठन के बाद से ही क़र्ज़ के बल पर घी पी रहा है. यह एक ऐसी सच्चाई है, जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी का हालिया बयान भी यही इशारा करता है कि राज्य की माली हालत अच्छी नहीं है. खंडूरी ने निशंक सरकार की फिजूलख़र्ची की ओर इशारा करके हर किसी को सकते में डाल दिया है. उधर जनता का मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री का बयान सूबे की माली हालत की ओर देर से सही, लेकिन एक गंभीर इशारा करता है. कांग्रेस ने नारायण दत्त तिवारी को राज्य के गठन के बाद बनी पहली सरकार का मुखिया यह सोचकर बनाया था कि वह इस नवगठित राज्य का भला करेंगे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.
तिवारी ने अपने दल के नेताओं की बग़ावत रोकने के लिए खज़ाना खुले हाथों लुटाया और जमकर लालबत्ती बांटी. उनका यही क़दम आत्मघाती सिद्ध हुआ और इसी वजह से कांग्रेस सूबे की सत्ता में दोबारा वापस नहीं लौट सकी. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व मेजर जनरल खंडूरी के हाथों सत्ता की बागडोर इस सोच के साथ सौंपी कि वह तिवारी से अलग कोई राह अपना अपनाएंगे. खंडूरी भाजपा की इस कसौटी पर खरे भी उतरे, लेकिन आम चुनाव में जनता ने एक पूर्व फौजी के शासन को नकार कर राज्य की पांचों संसदीय सीटें कांग्रेस की झोली में डाल दीं. यह देखकर भाजपा हाईकमान ने राज्य की बागडोर डॉ. निशंक को सौंप दी, लेकिन पदभार ग्रहण करते ही निशंक नारायण दत्त तिवारी की राह निकल प़डे.
उन्होंने राज्य के खज़ाने की हालत और विकास कार्य जैसे बिंदुओं पर नज़र डाले बग़ैर अपने समर्थकों को जमकर लालबत्ती की रेव़डी बांटी. मुख्यमंत्री यह भूल गए कि उत्तराखंड में जन्म लेते ही हर बच्चा 17 हज़ार रुपये का क़र्ज़दार हो जाता है. आज राज्य सरकार की असल ज़रूरत खर्च घटाने की नहीं, बल्कि आय के साधनों को दुरुस्त करने की है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या कहते हैं कि केंद्र द्वारा वित्तपोषित योजनाओं के पैसों का सदुपयोग न करने से ही यह संकट पैदा हुआ.

जनता की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा राज्य सरकार अपने सुख-साधनों में ख़र्च कर रही है. निशंक सरकार वित्तीय प्रबंधन की अनदेखी कर रही है. सपा नेता विनोद बडथ्वाल का कहना है कि निशंक ने थोक के भाव में लालबत्तियां बांटकर जनता के साथ विश्वासघात किया. वह किसी अनाड़ी की तरह सरकार चला रहे हैं. प्रदेश में भ्रष्टाचार का बोलबाला है. पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी ने जिस तरह वर्तमान सरकार को आईना दिखाने का काम किया है, उसे राज्य के सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने ही गंभीरता से लिया है.

फिलहाल सूबे में ख़तरे की घंटी बज रही है. निशंक सरकार ने अगर समय रहते इसे नहीं सुना तो हालात बदतर हो सकते हैं. मुख्यमंत्री निशंक ने सरकार के सौ दिन पूरे होने पर जिस तरह जश्न मनाया और समारोह के नाम पर खज़ाने का करो़डों रुपया पानी की तरह बहाया, वह किसी को भी रास नहीं आया. यही नहीं, दो पखवारे बाद राज्य के नौवें स्थापना दिवस की आ़ड में एक बार फिर सरकारी खज़ाने से भारी-भरकम धनराशि खर्च की गई. पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी का मानना है कि नारायण दत्त तिवारी की लालबत्ती नीति के विरोधस्वरूप ही राज्य की जनता ने भाजपा में अपना विश्वास जताया था.
डॉ. निशंक ने तिवारी जी की राह चलकर अच्छा नहीं किया. भाजपा के कई अन्य दिग्गज नेताओं ने भी निशंक को निशाने पर लेते हुए खंडूरी द्वारा उठाए गए सवालों का समर्थन करके मौजूदा सरकार की नीतियों की आलोचना की. राज्य के खज़ाने के बहाने जिस तरह खंडूरी ने निशंक को निशाने पर लिया है, उससे निशंक और खंडूरी के बीच 36 का आंक़डा जगज़ाहिर हो गया है. निशंक ने जिस तरह साहित्य के बहाने अपनी पुत्री का राजनैतिक क़द उभारने के प्रयास के साथ उसके राजनीति में पदार्पण का संकेत दिया, उससे संघ के लोग यह मानने लगे हैं कि निशंक परिवारवाद का बीज बो रहे हैं. निशंक के इशारे पर ही खंडूरी के क्षेत्रीय दौरा कार्यक्रमों में पार्टी के किसी विधायक ने हिस्सा नहीं लिया. अपना और परिवार का क़द बढ़ाने के लिए जिस तरह निशंक ने पूरे सूबे में अंदर ही अंदर अभियान चला रखा है, वह पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहा है.
महाकुंभ 2010 में भी सरकार के एक मंत्री एवं कुछ अधिकारियों को खुली लूट की छूट मिली हुई है. कई जानकारों का मानना है कि निशंक भाजपा के मिशन 2012 को व्यापक तौर पर क्षति पहुंचा रहे हैं. हालांकि उनके गुट के रणनीतिकार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल कहते हैं कि आय के नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं. इसके लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में जो समिति बनी थी, उस पर भी चर्चा हुई है. सरकारी खजाने का हिसाब-किताब पूरी तरह सरकार के संज्ञान में है और उम्मीद है कि इस संकट से निजात मिल जाएगी.
उधर सरकार ने गंगाजल बेचकर राजस्व प्राप्त करने की जो मंशा बनाई थी, उस पर साधु-संतों ने पानी फेर दिया है. इसके अलावा पर्यटन को तमाम प्रयासों के बावजूद इस तरह नहीं खड़ा किया जा सका है, जिससे वह सूबे की आय का साधन बन सके. राज्य के प्रथम संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति रहे ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी का मानना है कि भाजपा अपनी कथनी और करनी में फर्क़ के कारण सूबे से समाप्त हो जाएगी, वहीं नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत कहते हैं कि यह पूरी सरकार ही झूठ और फरेब पर आधारित है.

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