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बिलक़िस और निर्भया केस अलग-अलग कैसे?
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बिलक़िस और निर्भया केस अलग-अलग कैसे?

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nirbhayaआज समाज के विभिन्न वर्गों में न्यालयपालिका के द्वारा न्याय को लेकर सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर बिलकिस बानो और निर्भया के मामले में अंतर क्यों रखा गया? दोनों के मामले सामूहिक बलात्कार के थे. बिलकिस बानो के मामले में 5 मई को बंबई हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के द्वारा ग्यारह लोगों को सुनाई गई उम्रकैद की सज़ा को बरक़रार रखा.

जबकि निर्भया के मामले में दूसरे दिन 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की ओर से सज़ा में कमी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि दोषियों ने न केवल सामाजिक विश्वास का गला घोटा है, बल्कि बर्बरता की तमाम सीमाएं लांघ दी. न्यायालय के अनुसार ये गंभीर अपराध था, जो रेयरेस्ट ऑफ दि रेयर मामला है.

गौरतलब है कि बिलकिस बानो का मामला 3 मार्च 2002 का है, जो गुजरात दंगों के दौरान हुआ था. इसमें बिलकिस बानो की मौत नहीं हुई थी, लेकिन जिस समय उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, उस समय वो 5 माह की गर्भवती थी. उसकी तीन वर्ष की मासूम बच्ची समेत उसके परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी गई थी. बिलकिस बानो को मुर्दा जानकर निर्वस्त्र छोड़ दिया गया था. यहां ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस निर्मम घटना ने समाज को उस प्रकार क्यों नहीं झकझोरा, झिंझोड़ा, हिलाया जैसे निर्भया के मामले में देखा गया.

निर्भया वाली घटना 16 दिसंबर 2012 की है, जिसमें उसकी मौत हो गई थी. जिस प्रकार से दोषियों ने निर्भया को मौत के मुहाने पर ला दिया था, ताकि वो ज़िंदा न बच सके, उसी प्रकार बिलकिस बानो को भी मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी, लेकिन वो बच गई. निर्भया को इंसा़फ दिलाने के लिए प्रशासन, पुलिस और डॉक्टरों के साथ-साथ पूरे देश की जनता थी और सभी ने दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाने के लिए अपने-अपने स्तर पर कोशिशें कीं. लेकिन बिलकिस बानो के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. डॉक्टरों और पुलिस ने उसकी मदद नहीं की. उल्टे उसकी ग़लत रिपोर्ट बना दी गई और उसके सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी हुई. दोनों मामलों की गहराई में जाएं, तो पता चलता है कि निर्भया का मुक़दमा लड़ने में पीड़ितों को उतनी परेशानी नहीं हुई जितनी बिलकिस बानो को हुई.

जब तक मुक़दमे का निर्णय नहीं आया, उसने छिपते-छिपाते एक एनजीओ की मदद से अपना जीवन गुज़ारा. सुप्रीम कोर्ट के हस्त़क्षेप के बाद उसका मामला सीबीआई को सौंपा गया और तब मुक़दमा गुजरात से महाराष्ट्र भेजा गया. ज़ाहिर सी बात है कि जब दोनों ही मामले में अपराध और अपराधियों का मक़सद एक था, दोनों मामलों में एक ही क़ानून था, तो फिर सज़ा में अंतर खटकना स्वाभाविक है. निर्भया मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आते ही बिलकिस बानो के निर्णय पर सवाल उठने लगे और न्याय के दोहरे पैमाने की बात उठाई जाने लगी.

सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) की पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा कारत ने न्यायपालिका के दोहरे मापदंड पर सवाल उठाया. वृंदा करात ने कहा कि मैं सैद्धांतिक रूप से सजा-ए-मौत के खिला़फ हूं, लेकिन ये ऐसा गंभीर और घिनौना अपराध था, जिसमें कड़ी से कड़ी सज़ा की आवश्यकता थी. जो कुछ बिलकिस बानो के मामले में हुआ, वो हम सबके सामने है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने चौथी दुनिया से बात करते हुए कहा कि बिलकिस बानो का मुक़दमा रेयरेस्ट ऑफ दि रेयर की श्रेणी में आता है और इस मामले में भी अपराधियों को सजा-ए-मौत मिलनी चाहिए.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी और कांग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी का ट्‌वीट भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है. अपने ट्‌वीट में उन्होंने लिखा है कि आखिरकार निर्भया के मुकदमे में न्याय हो गया, लेकिन बिलकिस बानो के बारे में क्या कहा जाय? हमलोगों को उन शैतानों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाने के लिए क़ानून लड़ाई लड़नी चाहिए, जिन्होंने ये सामूहिक बलात्कार किया और उसकी बच्ची हत्या की.

मशहूर वकील रेबिका जॉन ने कहा कि मैं सजा-ए-मौत का समर्थन नहीं करती हूं, लेकिन उसे एक उदाहरण के रूप में ये कहने के लिए इस्तेमाल कर रही हूं कि जब सजा-ए-मौत का समय आता है, तो न्यायपालिका के पास समान मापदंड नहीं होते हैं. एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी ने दो टूक कहा कि बिलकिस बानो मामले में देश की सामूहिक ़चेतना को इस बात पर राजी होना था कि सभी दोषियों को सजा-ए-मौत मिले.

ऐसा महसूस होता है कि क़ानून विशेषज्ञ, वकील, विद्वान, राजनीतिज्ञ या आम आदमी, समाज के सभी लोग इन दोनों मामलों में साफ तौर पर अंतर और भेदभाव देख रहे हैं और बेचैन हैं. निर्भया मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद बिलकिस बानो और उसके शौहर का ये सवाल भी प्रत्येक व्यक्ति को बेचैन कर देता है कि उसके मामले में दोषियों को फांसी की सज़ा क्यों नहीं हो सकती है? इन दोनों का ये सवाल हर न्यायप्रिय व्यक्ति के ज़मीर को झिंझोड़ देता है और वो फिर न्यायपालिका की ओर देखता है.

बहरहाल, बिलकिस बानो ने क़ानून विशेषज्ञों से बातचीत करने और अपने मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाने की बात कही है. उसका कहना है कि वो सुप्रीम कोर्ट से अपील करेगी कि उसके मामले में भी निर्भया मामले की तरह दोषियों को सज़ा दी जाय. गौरतलब है कि बंबई हाई कोर्ट द्वारा बिलकिस बानो मामले का निर्णय निर्भया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एक दिन पहले ही आया है.

लेकिन सवाल ये है कि दोनों मामलों में ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट से जो फैसले सुनाए गए, वो अलग-अलग क्यों हैं? चूंकि सुप्रीम कोर्ट में अभी केवल निर्भया मुक़दमा गया और उसी का निर्णय आया, वो हर जगह और हर मामले में उदाहरण तो बनेगा, लेकिन क्या बिलकिस बानो मुक़दमे में भी भविष्य में ऐसा ही होगा? ये देखने वाली बात होगी. जो लोग एक दिन के अंतर से बिलकिस बानो और निर्भया मामले में आए निर्णयों को बुनियाद बताकर सवाल खड़े कर रहे हैं, उनकी बातों में वज़न तो महसूस होता ही है. इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसे अपराध में सजा-ए-मौत से कम सजा नहीं होनी चाहिए.

मैं इंतक़ाम नहीं, इंसा़फ चाहती हूं: बिलक़िस बानो

बिलकिस बानो अपने शौहर याक़ूद और बेटी के साथ बंबई हाई कोर्ट के निर्णय के चार दिन और निर्भया मुक़दमे के निर्णय के तीन दिन बाद दिल्ली में थीं. इस मौके पर 8 मई को चौथी दुनिया से बातचीत करते हुए बिलकिस बानो ने जो विचार प्रकट किए, वो प्रस्तुत है:

बीते 15 वर्षों के दौरान न्याय के संघर्ष में हम दर-दर की ठोकरे खाते रहे. हमलोगों ने खौ़फ के कारण इस दौरान कम से कम 20 से 25 मकान बदले. जबकि दूसरी ओर 2008 में ट्रायल कोर्ट से दोषी क़रार दिए जाने के बाद आरोपी कई बार जेल से बाहर आए. जब-जब वे लोग (आरोपी) पेरोल पर बाहर आए, उन्होंने हमें धमकी दी. हमें पुलिस से कोई उम्मीद नहीं थी. हमें खुशी है कि हाई कोर्ट ने दोषी पुलिस अधिकारियों को भी सज़ा सुनाई है. मैं इंतक़ाम नहीं, इंसा़फ चाहती हूं. मैं चाहती हूं कि मेरी बच्चियां सुरक्षित भारत में पलें-बढ़ें.

मैं अपनी बच्चियों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा देना चाहती हूं. 15 वर्ष का मेरा और मेरे परिवार का जो अनुभव रहा है, उसके आधार पर मेरी बड़ी बेटी एक वकील बनना चाहती है. हालांकि न्याय के लिए हमारा सफर काफी लंबा रहा, लेकिन भारतीय न्यायपालिका में हमारा विश्वास फिर से बहाल हुआ है. हमलोग अब किसी हद तक संतुष्ट हैं. हमें ये भी उम्मीद है कि इसी प्रकार बलात्कार के अन्य मामलों में भी पीड़ितों को इंसाफ मिलता रहेगा.

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