हर साज से होती नहीं एक धुन पैदा

होता है बड़े जतन से ये गुन पैदा

मीजान-ए-निशात-ओ-गम से सदियों तुलकर

होता है हयात में तवाजुन पैदा.

lacchuबड़े भाई शिव प्रसाद सिंह अपने अनुज लच्छू महाराज को‘फिराक’ की इन पंक्तियों के जरिए याद करते हैं. बताते हैं कि तबले की दुनिया में ऐसा गुणी ‘उस्ताद’ अब तक कोई पैदा नहीं हुआ. कुल 72 साल की जिन्दगी में 61 साल जिस व्यक्ति ने संगीत साधना में व्यतीत किया हो,  वही दावा कर सकता है. ‘‘होता है बड़े जतन से ये गुन पैदा’’ तबला उनकी नजर में ऐसा ‘बीर बाज’ है जो ‘बोल पढ़ंत’ को आवाज में तब्दील कर एक धुन पैदा करता है और यह धुन ही दूसरे कलाकारों के लिए नकल की चीज होती थी (जो वह कर नहीं पाते थे). उनके शागिर्द के लिए सीखने की और सुनने वालों के लिए एक ऐसी प्यास पैदा कर गई जो कभी तृप्त नहीं हुई. खासकर उन लोगों के लिए जो अस्सी के दशक में उन्हें कभी पटना के गांधी मैदान में तबला बजाते हुए स्वर्गीय सितारा देवी के साथ देखा और सुना.

वैसे तबला के चारों घराने (पंजाब, दिल्ली, लखनऊ और बनारस) का साहित्य लिखित रूप में मौजूद है. हमने कोशिश की कि उसे प्रकाशित करा दिया जाए. लच्छू महाराज भी तैयार थे (ऐसा कम ही होता था कि किसी खास मकसद के लिए वे तैयार हो जाएं). लेकिन एक दिन बातों-बातों में ही बताने लगे कि ‘‘इसे कविता की तरह केवल पढ़ लेने से नहीं होगा. इसे बजाकर कौन दिखाएगा?’’ हमारे पास कोई जवाब नहीं था. फिर हमने कोशिश नहीं की. ‘‘लेकिन इतना भरोसा है कि परिवार में भाइयों और भतीजों में इस विद्या की इतनी समझ तो पैदा कर गए हैं कि कोई चुनौती पेश करे और मुकाबला करने की हिमाकत करे, तो कहीं से ये उन्नीस साबित नहीं होंगे. छोटे भाई विजय नारायण कहते हैं कि ‘‘संगीत हमारे रगों में है. इस विरासत को आबाद रखने की जिम्मेदारी अब हमारे कंधों पर है.’’

तबले की तालीम तो वे अपने पिता वासुदेव सिंह से हासिल किए, पर महाराज खुद बताते थे कि मेरे बजाने की शैली में वीरट मिश्र और विश्‍वनाथ सहाय का अंश शामिल है. बता दें कि पं. राम सहाय ने बनारस में तबला प्रचलित किया और विश्‍वनाथ जी उसी परिवार से थे. खुद बिस्मिल्ला खां साहब ने बताया था कि ‘‘वीरट मिश्र की तरह तबला वादक और गोपाल मिश्र (पं. राजन-साजन के चाचा) की तरह सारंगी बजाने वाला (उनके समय तक) दूसरा कोई नहीं था.’’ लच्छू महाराज खुद अपने समकालीन तबला वादकों में अहमद जान थिरकवा के बाद स्व. रामजी मिश्र (पं. अनोखे लाल के पुत्र) का नाम लेते थे. कत्थक नर्तकों में दिल्ली के दुर्गालाल और सितारा देवी के वे मुरीद थे. उनके साथ पढ़ंत में स्व. दुर्गा पांडे का जोड़ नहीं था.

बीएचयू संगीत विभाग के पूर्व डीन और प्रसिद्ध वायलिन वादक प्रो. आरपी शास्त्री बताते हैं कि ‘‘लच्छू का तबला सचमुच ‘वैराग्य’ का तबला था.’’ अपने साथ बजाए एक संगत को याद करते हुए बताते हैं कि लच्छू नए थे. मैं उनके साथ संगत नहीं करना चाहता था. बड़े आग्रह के बाद संगत के लिए तैयार हुआ, पर आधे घंटे के बाद जो तबला बजाया वो यादगार रहा. ऐसी कौन सी खासियत थी जो लच्छू महाराज के तबले की ‘वादन शैली’ की जो आमजन और गुणीजन के लिए खास और अद्वितीय थी? और जो दूसरे तबला वादक आमतौर पर नहीं बजाते अथवा स्टेज पर बजाने से परहेज करते हैं, वह था चारों घराने का ‘उठान’ एक साथ बजाना जो पहले ‘उठान’ धा तिर किट् धेता से शुरू होकर धा कत् धा करान धा, पर खत्म होता है तो चमत्कृत करने वाला माहौल अपने-आप पैदा हो जाता है. बशर्ते पूरी सफाई के साथ बज जाए. बीएचयू में तबला वादक कुबेर नाथ मिश्र बताते हैं कि ‘‘गत-फर्द के निकास बजाने की शैली उनकी अद्भुत थी. खासकर कायदा का ‘पलटा’ और ‘उपज’ बजाने का भी कोई जोड़ नहीं था. इसके अलावा धा तिर धिड़नग धिनतक’’ बजाने में भी कई तबला वादक परहेज करता है, तो इसका विस्तार ‘धा तिर धिड़नग तिनतक, ता तिर धिड़नग धिन तक’ इसका दोगुन चौगुन तक विस्तार लच्छू महाराज बजाते थे और यह उन्हें सबसे प्रिय भी था. छोटे भाई विजय नारायण बताते हैं कि लखनऊ के उस्ताद आबिद हुसैन खलीफा से उनके घराने को यह प्राप्त हुई. आबिद हुसैन खलीफा और बीरू मिश्र ने बहुत पहले इलाहाबाद में आमने-सामने इसे बजाया था. आबिद हुसैन खलीफा से ही ‘‘दहेज की सात गतें’’ प्राप्त हुईं. इस विद्या का साहित्य तो उपलब्ध है. बजाने की शैली लच्छू महाराज को मालूम थी और किसी को नहीं. दावा चाहे जो करे. बता दें कि इनमें छह गतें पुरुष तबला वादक के लिए हैं और एक ‘गत’ महिलाओं के लिए है, जिसकी शिक्षा आबिद हुसैन खलीफा ने दहेज स्वरूप अपनी लड़की को प्रदान किया. यह नहीं मालूम है कि भारत के (पाकिस्तान समेत) कितने तबला वादकों के पास ‘‘दहेज की सात गतें’’ की जानकारी है और बजाने की शैली भी मालूम है. इसके अलावा हजार गुलदस्ता वर्षावलोकन के (चारों अंग) सिंह परन (जिसमें शेर के अपनी मांद से निकलकर शिकार के लिए तैयार होना, शिकार पर झपट्टा मारने का दृश्य शामिल है) का दृश्य तबले पर बजाते हुए जिन्होंने देखा और सुना होगा वे तो उनके मुरीद होंगे ही, पर उनकी इन विद्याओं का ज्ञान उनके किसी शिष्य के पास नहीं है.

सचमुच अजीब मानुष, जिसके चिंतन के केंद्र में स्व. लालमुनि चौबे (पूर्व सांसद) स्व. रामबचन पांडेय (पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष का.वि.वि) स्वर्गीय चंद्रशेखर जी एक तरफ और दूसरी तरफ स्व. सुशील त्रिपाठी (पत्रकार) स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह (पत्रकार) संतोष भारतीय, रामबहादुर राय, नचिकेता देसाई, सामाजिक कार्यकर्ता अफलातून देसाई और चितरंजन सिंह एक साथ समय-समय पर उपस्थित होते रहे हैं और खास बात यह कि इनमें अधिकतर का संगीत से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है. (स्व. लालमुनि चौबे को छोड़कर और कुछ खास अवसरों के लिए स्व. रामबचन पांडेय को याद करते हुए) जिस किसी में भी उन्हें कुछ खास दिखा, भले ही वह उनसे एकाध-बार ही मिला हो समय-समय पर उसकी खोज-खबर जरूर लेते रहते थे. यह भी बता दें कि इन महानुभावों की भविष्य की कठिनाइयों को भी बताते थे और उसका निश्‍चित समाधान भी. यह वक्त पर निर्भर होता था कि कौन किस वक्त (खासकर कठिनाई के समय) याद आ जाए. क्या इस अजनबी मानुष के बारे में सचमुच जो उन्हें नजदीक से जानता था, वह कह सकता है कि उनका जीवन केवल तबला बजाने तक सीमित था? इसलिए ऐसे इंसान का दुनिया से विदा होना महज एक कलाकार अथवा किसी परिवार के सदस्य का जाना भर नहीं है. एक ऐसे रहस्यमय जीवन का अंत है जो खुद दावा करता रहा ‘‘अपने लिए इतना आसान हो जाओ कि दूसरों के लिए मुश्किल हो जाओ’’ ऐसा उनके जीवन में दिखता भी था.

ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी महान कलाकार और हर दिल अजीज (जो उनके करीब रहा) इंसान की विरासत को सहेज कर विकसित करना आसान काम नहीं है. भतीजा सौरभ जरूर दावा कर रहे हैं कि ‘‘जहां विरासत को छोड़कर गए हैं उसे हम आगे बढ़ाएंगे’’ यह बात अगली गुरुपूर्णिमा को साबित होगी. जब पूरे देश के उनके शिष्य जुटेंगे और उनकी अनुपस्थिति में उन्हें याद करेंगे. फिलहाल हम इंतजार करेंगे.

चिकित्सा पद्धति के जानकार थे

लच्छू महाराज भारतीय चिकित्सा पद्धति के अद्भुत जानकार थे. योग विद्या की कुछ अनोखी पद्धति बाबा रामदेव के योगावतार के पहले से अपने शिष्य को बताते रहे हैं. ‘‘जीने रहने-खाने-पीने-सोने’’ का तौर-तरीका भी कोई आर्ट ऑफ लिविंग से नहीं सीखा था. ये सब अपने जीवन में वे खुद उतारते रहे और जो भी उनके करीब आया उसे बताते भी रहे. चितरंजन भाई फिलहाल पीठ और गर्दन में दर्द की वजह से जमशेदपुर में हैं. कुल तीन-चार बार लच्छू महाराज से भेंट हुई होगी. इस बीते गुरुपूर्णिमा के दिन कहने लगे कि चितरंजन को बुलाओ. अफीम मंगा लिया हूं. दो से तीन दिन में उसे ठीक करना है जबकि चितरंजन भाई उनसे कभी अपने इलाज के बाबत बात भी नहीं की थी. दीपक भट्ट (अंतिम समय उनके साथ रहा शिष्य) बताते हैं कि  ‘‘मैंने खाना-पीना-रहना और जीना तो उनसे सीखा ही. तपस्या क्या होती है, इसका असली अर्थ भी गुरु महाराज से सीखा’’ जबकि खुद महाराज दीपक से बार-बार कहते थे कि उनका नकल न करें.

भविष्य द्रष्टा

किसी का चेहरा देखकर तात्कालिक और भविष्य के बारे में उनकी भविष्यवाणी इतनी सटीक होती थी कि आश्‍चर्य होता है. शिष्य राजीव नयन पाठक बताते हैं कि बात 18 दिसंबर 2011 की है. रविवार का दिन था. गुरु जी ने पूछा, तुम ठीक हो पाठक. बताए कि चलो बड़ी दुर्घटना टल गई. तब राजीव का पैर दुर्घटना में फैक्चर हो गया था. भाजपा के राष्ट्रीय नेता के बारे में उनकी भविष्यवाणी सही साबित होती है. बताकरगए हैं, इसके रहते भाजपा का बड़ा नुकसान हो सकता है.

अद्भुत मित्रबाज

एक मित्र का धर्म क्या होता है इसे निभाना कोई लच्छू महाराज से सीखे. ओपी गुप्ता और उनके परिवार के लोग गवाह हैं. ओपी गुप्ता के हर सुख-दुख में हम साये की तरह सदा साथ रहते. बनारस के सुशील मेहता के परिवार के सभी सदस्य, बेगूसराय के अमित बाबू, राजकुमार जी, शिष्य रविन्द्र जी, आरा के शिव जी उपाध्याय, मदन सिंह, आरा के ही मुन्ना और उनका परिवार, जोे अपने परिवार में हुए हादसे के बावजूद महाराज की खबर सुनकर अमरीका से  बनारस पहुंचे. सभी इस सोच और श्रद्धा के साथ कि लच्छू महाराज के नहीं रहने पर हम सभी गुरु भाइयों की चिंता करने का और शरीक होने की जिम्मेदारी अब हमारे ऊपर है. हमें ताउम्र इसे निभाना है.

गुरु जी की विरासत को सहेजेंगे और आगे बढ़ाएंगे : शमशेर मेहंदी

मैं पटना साहिब का रहने वाला हूं. मैंने बनारस में गुरु जी से 13 से 14 साल की उम्र में सीखना शुरू किया. 1975 की शुरुआत में उनके पास सीखने के लिए गया था और करीब छह महीने मुझे प्रतिदिन जाना पड़ता था. मैं उनको खुश करने के लिए गजलें गाया करता था. इसे सुनकर उनके छोटे भाई विजय ने सिफारिश की तो उन्होंने मुझे अपना शिष्य मान लिया. उसके बाद मैं लगातर पटना से आकर या बनारस रहकर 1979 तक सीखता रहा. गुरु जी का आदेश था कि जब तक मैं न कहूं तुम बजाओ कहीं भी, लेकिन मेरा नाम नहीं लोगे. मैंने उनकी शर्तें मानीं.

सरकार ने 1972 में उन्हें कई देशों की यात्राओं पर भेजा था. गुरु जी के साथ तीन लोग गए थे. करीब 28 देशों में इन्होंने भारत का नाम रोशन किया और भारतीय कला को बढ़ाया. वहां से आने के बाद इनको पद्मश्री के लिए नामित किया गया. समय के बहुत पाबंद थे. उस समय पद्मश्री के लिए जो डेलीगेट्स गया था, वो ढाई घंटे लेट था. तो, उन्होंने कहा कि जिस सरकार के पास समय का महत्व नहीं है, मेरे ढाई घंटे जीवन के खराब किए, इसलिए इसे मैं अस्वीकार करता हूं और इसके साथ कहा कि पद्मश्री के साथ-साथ कलाकारों को काम दो, जिससे उनका काम लगातार चलता रहे.

1975 की बात है. सितारा देवी के साथ लतीफ अहमद खान को तबला बजाना था किसी वजह से वो नहीं आए, लेट हो गए. महाराज जी वहां से बजा कर उठे थे. तब तक अनाउंस हो गया कि लच्छू महाराज जी हैं यहां, इनसे बजवा लो. उन्होंने यह कहा कि लतीफ अच्छा बजाते हैं. पटना की जनता ने कहा कि क्या लच्छू महाराज जी आप नहीं बजा सकेंगे. उसके बाद लच्छू महाराज को गुस्सा आ गया और वह पलथी मारकर बैठ गए और कहे कि जब तक आप नाचोगी तब तक मैं तबला बजाऊंगा. रात से सुबह के दस बज गए, हाथों से खून आ गया और सितारा देवी के पैर फट गए. उसके बाद खुद सितारा देवी ने आकर कहा कि मैं इनमें साक्षात भगवान शिव को देख रही हूं. ये तो तबलावादक हैं ही नहीं, कुछ और हैं.

गुरु जी कहते थे कि सरकार से हमने कभी मांगा नहीं. लेकिन, बनारस से कलाकार उभर रहे हैं, भटक जाते हैं, काम नहीं मिलता है, उनको काम दो, सरकारी संस्था में दो, बाहर फंक्शन कराओ, उन्हें बाहर भेजो, उसमें हमें पद्मश्री और पद्म विभूषण सब कुछ मिल जाएगा. आगे चलकर उनके नाम से हम लोग, एक ट्रस्ट या मेमोरियल ऐसा बनाएंगे जिससे ये प्रथा चलती रहे. जो विद्या हमें बताई गई है वो आगे चलती रहे. उनके बोल हैं, उठाने हैं, पांच से छह हजार बोल उन्हें याद थे, उस सब को एक जगह करने की कोशिश करेंगे. उनके पूरी दुनिया में करीब ढाई हजार शिष्य हैं. उन सबसे संपर्क करके और उनके चाहने वालों से संपर्क करके हम चाहेंगे कि उनके नाम से वहां कुछ बनवाएं. एक किताब लिखेंगे बोलों की, एक किताब होगी जीवनी की और जो बोल हैं उसको लिखने से नहीं होगा उसके स्थान को लिखना होगा, क्योंकि वह एक भाषा है. कुछ ऐसी चीजें हैं जो उनके पास बैठकर ही कोई सीख सकता है. लेकिन फिर भी एक किताब बोलों की बनाई जाए जिसे लोग पढ़ेंगे और कुछ सीख सकेंगे. गुरु जी ने कई संस्थान खुलवाए हैं. अब हम जो उनके नाम से करेंगे तो उससे कुछ न कुछ फायदा होगा. अभी उनकी पत्नी बच्चे हैं. उनका एक घर है जिसे हम म्यूजिम बनवाना चाहते हैं.

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