hhhhhhhhhhhhaapविधानसभा चुनावों के पहले दिल्ली की गलियों में लगे कुछ पोस्टर आपके जेहन में अभी भी होंगे. दिल्ली को रेप कैपिटल घोषित करते और शीला दीक्षित को उसका ज़िम्मेदार ठहराते हुए आम आदमी पार्टी की ओर से जारी उन पोस्टरों में लिखा था कि इस बार भी दिया बेईमानों को वोट, तो महिलाओं का होता रहेगा बलात्कार. पोस्टर में शीला दीक्षित को बेईमान दिखाया गया था और अरविंद केजरीवाल को ईमानदार. दामिनी प्रकरण के बाद जिस तरह की जनभावनाएं ऐसे संदर्भों को लेकर उभरी थीं, उससे शीला सरकार के ख़िलाफ माहौल तो था ही, अरविंद केजरीवाल ने बलात्कार पर राजनीति करते हुए उन जनभावनाओं को भुनाने की कोशिश की. अक्टूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया कि 2012 की तुलना में 2013 में दिल्ली में बलात्कार के मामलों की संख्या दोगुनी हो गई. बहरहाल, अरविंद केजरीवाल की सरकार बनी और दिल्ली में बलात्कार की घटनाएं वैसे ही बदस्तूर जारी रहीं. आम आदमी पार्टी को लगने लगा कि सरकार अभी तक जिस भी मुद्दे पर सामने आई, मसलन बिजली, पानी, जनता दरबार आदि, हर बार उसे आलोचनाएं ही झेलनी पड़ीं. दिल्ली में बलात्कार के मामले एक बार फिर तेजी से सामने आने लगे और सरकार इस मसले पर भी घेरी जाने लगी. इसलिए एक रणनीति के तहत खिड़की एक्सटेंशन मामले को सामने लाया गया.
खिड़की एक्सटेंशन एरिया क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती के विधानसभा क्षेत्र मालवीय नगर में आता है. ग़ौरतलब है कि इस इलाके में बड़ी संख्या में अफ्रीकी मूल के नागरिक रहते हैं, जिन्हें लेकर क्षेत्र में एक पूर्वाग्रह है कि वे ड्रग्स और देह व्यापार में लिप्त हैं. यह भ्रांति केवल खिड़की एक्सटेंशन में ही नहीं, समूची दिल्ली में जहां भी विदेशी मूल के नागरिक रह रहे हैं, उन इलाकों को लेकर है. दिल्ली के भीतर विदेशी तो छोड़ दीजिए, पूर्वोत्तर के इलाकों के भी जो लोग रह रहे हैं, वे खुद को अलग-थलग ही रखते हैं और आम तौर पर कोर्ट-कचहरी, पुलिस से बचना चाहते हैं. सोमनाथ भारती के लिए ये लोग सॉफ्ट टार्गेट लगे. क़ानून मंत्री जब इस तथाकथित संदेहास्पद इलाके में रेड डालने चले, तो अपने साथ मीडिया को भी ले गए. बाकायदा फोन करके उन्हें बुलाया, कैमरे के सामने पुलिस से झड़प की. एसीपी से कहा कि हमें आपका काम करना पड़ रहा है, इसलिए आप लोग जाकर चुल्लू भर पानी में डूब मरिए.
जाहिर-सी बात है कि दिल्ली पुलिस की छवि को इस तरह से जनता के सामने पेश करना था कि वह तो सरकार की सुनती ही नहीं. इसके पीछे सोच यह थी कि चूंकि दिल्ली पुलिस तो सरकार की सुनती ही नहीं, इसलिए अगर हम दिल्ली के भीतर हो रही बलात्कार की घटनाओं पर रोक नहीं लगा पा रहे हैं, तो इसके लिए सरकार नहीं, पुलिस ज़िम्मेदार है. लेकिन, क़ानून मंत्री अति-उत्साह में अपनी हदों को इस कदर पार गए कि पूरा मामला ही उल्टा पड़ गया और उसने इतना तूल पकड़ लिया कि विदेश मंत्रालय को 20 अफ्रीकी देशों के राजदूतों को बुलाकर यह सुनिश्‍चित करना पड़ा कि दिल्ली के क़ानून मंत्री एवं उनके समर्थकों ने युगांडा की महिलाओं के साथ जो दुर्व्यवहार किया, उस पर हम कड़ी और निष्पक्ष कार्यवाही करेंगे. जिन दो महिलाओं को क़ानून मंत्री ने अपराधी घोषित किया था, जब उनके ब्लड सैंपल आए और यह साबित हो गया कि उन्होंने कोई ड्रग्स नहीं लिया, तब केंद्र ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से इस पूरे मामले पर रिपोर्ट देने और दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को क़ानून मंत्री एवं उनके समर्थकों के ख़िलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा.
हिंदी में एक कहावत है, आए थे हरि-भजन को, ओटन लगे कपास. अब यह कहावत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके क़ानून मंत्री के ऊपर पूरी तरह से लागू होने लगी. चूंकि दिल्ली सरकार हर तरफ़ से घिरने लगी, इसलिए आनन-फानन में पूरी कैबिनेट इस बात को लेकर धरने पर बैठ गई कि इस प्रकरण से संबंधित दो एसएचओ और एक एसीपी को सस्पेंड किया जाए. धरने की शुरुआत तो यहां से हुई और फिर सोची-समझी रणनीति के तहत दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन लाने की बात की जाने लगी. बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार की मंशा इस पूरे प्रकरण के माध्यम से दिल्ली की जनता को बरगलाने की थी, चौतरफ़ा हो रहे हमले से लोगों का ध्यान हटाने की थी. क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती के अतीत की ओर देखें, तो जाहिर होता है कि वह इस विधा के विशेषज्ञ हैं. सोमनाथ भारती के क़रीबी मानते हैं कि वह अति हत्वाकांक्षी और भिड़ने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले शख्स हैं. सोमनाथ भारती के बिजनेस सहयोगी रहे रामकुमार अत्री बताते हैं कि सोमनाथ भारती बेहद महत्वाकांक्षी और आक्रामक रहे हैं. वह चर्चा में रहना पसंद करते हैं. शायद कई बार यही महत्वाकांक्षा और विवादों में रहने की प्रवृत्ति उन्हें मुश्किल में भी डाल देती है.
साल 2004 में भारती की दिल्ली स्थित एक टेक्नोलॉजी कंपनी मैडगेन सॉल्यूशंस पर आरोप लगा कि उसने एक क्लाइंट टॉपसाइट्स एलएलसी के नाम पर बड़ी संख्या में मेल भेजे थे. अमेरिकी एंटी-स्पैम कार्यकर्ता डेनियल बालसम ने भारती और उनकी कंपनी पर कैलिफोर्निया की अदालत में मुकदमा दायर किया था. कंप्यूटर तकनीकी विषयों पर आधारित पत्रिका पीसी क्वेस्ट के अनुसार, अदालत की सहमति से हुए समझौते के तहत भारती ने बालसम को 5000 डॉलर (करीब 3,00,000 रुपये) का भुगतान किया था. इस घटना को हुए एक वर्ष ही बीते थे कि स्पैमिंग पर नज़र रखने वाली वेबसाइट स्पैमहॉज डॉट ऑआरजी ने 2005 में स्पैम करने वालों की एक लिस्ट जारी की थी, जिसमें भारती के अलावा दो अन्य भारतीय भी शामिल थे. वर्ष 2005 में ही रोकसो (रजिस्टर ऑफ नोन स्पैमिंग ऑपरेशंस) की लिस्ट में 200 स्पैम करने वालों को शामिल किया गया था, जो दुनिया भर में भेजे जाने वाले 80 फ़ीसद स्पैम के लिए ज़िम्मेदार थे. लंदन और जिनेवा स्थित स्पैमहॉज संगठन हर साल यह लिस्ट तैयार करता है. यह संगठन स्पैम के ख़िलाफ़ जागरूकता फैलाता है. इस लिस्ट में सोमनाथ भारती को स्पैम करने वाले के तौर पर शामिल किया गया था. कहा जाता है कि उन दिनों सोमनाथ भारती दिल्ली से एक आईटी कंपनी मैडगेन सॉल्यूशंस चलाते थे. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वह कंपनी क्या काम करती थी.
भारत के आईटी एक्ट 2000 के अनुसार, स्पैमिंग एक ग़ैर-क़ानूनी और दंडनीय अपराध है, जिसमें तीन वर्ष तक कैद की सजा का प्रावधान है. जाहिर-सी बात है कि दिल्ली विश्‍वविद्यालय से क़ानून की डिग्री हासिल कर चुके सोमनाथ भारती को यह जानकारी तो रही ही होगी. मैडगेन सॉल्यूशंस कंपनी का दफ्तर दक्षिणी दिल्ली में मौजूद है. कंपनी के निदेशकों में मनोरमा रानी भारती और दिव्या स्तुति कुमारी का नाम है, जो कथित तौर पर भारती के रिश्तेदार बताए जाते हैं. पत्रिका पीसी क्वेस्ट ने अपने 2005 के अगस्त अंक में रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि भारती ने कैलिफोर्निया अदालत के मुकदमे में समझौता करने का रास्ता अख्तियार किया, क्योंकि अमेरिका में मुकदमा लड़ना ज़्यादा खर्चीला होता. हालांकि सोमनाथ भारती की ओर से इस मसले पर जो सफाई दी जाती है कि वह गले नहीं उतरती. उनकी तरफ़ से दी गई सफाई में कहा गया है कि वर्ष 2000 के शुरुआती महीनों में उन्होंने मैडगेन सॉल्यूशंस को एक सहयोगी के हवाले कर दिया था, जिसने बिना जानकारी दिए ही ग़लत इस्तेमाल किया. जब मामला सामने आया, तो भारती को पता चला कि उनके सहयोगी ने बड़े पैमाने पर मेल भेजे और उनके नाम का कई मौकों पर इस्तेमाल किया. उनके सहयोगी ही कंपनी चला रहे थे. सवाल यह है कि जब वर्ष 2000 में उन्होंने कंपनी सहयोगी को दे दी, तो क्या पांच साल तक हो रहे इस खेल का उन्हें पता ही नहीं चला? दूसरे, जब उन्हें पता चला, तो वह इस मसले को लेकर अदालत में क्यों नहीं गए? क्यों उन्होंने जुर्माना देकर मामला रफा-दफा किया? हालांकि क़ानून मंत्री कहते हैं कि अब उनका इस कंपनी से कोई लेना-देना नहीं है. बिल्कुल वैसे ही, जैसे फोर्ड फाउंडेशन से मिले पैसों का हिसाब-किताब जानने पर मुख्यमंत्री केजरीवाल कहते हैं कि उनके एनजीओ दो साल पहले ही बंद हो चुके हैं.
कुछ दिन पहले ही क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती पर एक ऐसा आरोप लगा, जो उनके क़ानून के अल्पज्ञान को सामने लाता है. उन पर एक मामले में सुबूतों से छेड़छाड़ और अभियोजन पक्ष के गवाह को प्रभावित करने का आरोप लगा. दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में स्टेट बैंक ऑफ मैसूर में हुए फर्जीवाड़े के एक मामले में उनके मुवक्किल पवन कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप का मुकदमा चल रहा था. अगस्त 2013 में सीबीआई की विशेष जज पूनम ए बांबा ने कहा था कि आरोपी पवन कुमार और उनके वकील सोमनाथ भारती ने गवाह बी एस दिवाकर से फोन पर बात की. कोर्ट ने कहा कि भारती और उनके मुवक्किल का यह व्यवहार बेहद आपत्तिजनक और अनैतिक है. उन्होंने यह भी कहा कि भारती एवं पवन ने सुबूतों के साथ छेड़छाड़ और गवाह को प्रभावित करने की कोशिश की है. इसी आधार पर अदालत ने पवन की जमानत निरस्त कर दी थी. बाद में इस आदेश को वरिष्ठ वकील एवं आम आदमी पार्टी के सदस्य प्रशांत भूषण और सोमनाथ भारती ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी, मगर दोनों अदालतों ने इस संदर्भ में कोई भी राहत देने से इंकार कर दिया था. हालांकि क़ानून मंत्री इस मसले में खुद को निर्दोष बताते हैं. उनके मुताबिक, अदालत में चल रहे मामले के दौरान वह सुबूत जुटाने की कोशिश कर रहे थे और उन पर ही आरोप लगा दिया गया. सोमनाथ भारती ने कहा कि अदालत की टिप्पणी गलत थी.
विवादों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमता. भारती पिछले दिनों क़ानून मंत्रालय के सचिव ए एस यादव के जरिये सभी जजों की मीटिंग बुलाने की कोशिश के मामले में भी विवाद में आए. सूत्रों के मुताबिक, क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती ने सचिव ए एस यादव से कहा कि वह दिल्ली के सभी जजों की एक बैठक बुलाएं, जिसे वह स्वयं (भारती) संबोधित करेंगे. इस पर सचिव यादव ने कहा कि दिल्ली का न्यायिक तंत्र स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और जजों की बैठक बुलाने का अधिकार उनके पास नहीं है. जजों की बैठक बुलाने का अधिकार केवल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को है. इस पर क़ानून मंत्री ने उन्हें डांट लगाते हुए उन पर पूर्ववर्ती सरकार का पक्षधर होने का आरोप लगाया और कहा कि वह इसीलिए आप सरकार द्वारा तेजी से न्याय प्रणाली लागू करने के रास्ते में दिक्कतें पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक, नाराज सचिव ने दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर अपने तबादले की मांग की, जिससे यह विवाद गहरा गया. उन्होंने चीफ जस्टिस से कहा कि उन्हें वापस न्यायिक प्रणाली में बुला लिया जाए, क्योंकि उन्हें डर है कि क़ानून मंत्री उन पर कार्रवाई कर सकते हैं. ए एस यादव दिल्ली में जिला जज के तौर पर कार्यरत थे, उन्हें प्रतिनियुक्ति पर क़ानून सचिव के पद पर नियुक्त किया गया था. इस पूरे मसले पर सफाई देते हुए क़ानून मंत्री ने कहा, हमारी सरकार त्वरित न्याय दिलाने की प्रक्रिया लागू करने के अपने वायदे पर अडिग है. मैं जजों की बैठक बुलाना चाहता हूं, ताकि लोगों को जल्दी न्याय मिले और इस मार्ग में आने वाली बाधाओं के संबंध में जजों से बात करके सुधार किया जा सके, लेकिन यह कहना गलत है कि मैंने क़ानून सचिव से कोई दुर्व्यवहार किया.
विवादों की इस कड़ी में क़ानून मंत्री ने युगांडा की महिलाओं के साथ कथित अभद्र व्यवहार का नया मसला अपने साथ जोड़ा है. एक वर्ग कह रहा है कि यहां पर क़ानून मंत्री की मंशा गलत नहीं थी, तरीका गलत था. जाहिर-सी बात है कि अगर मंशा गलत नहीं थी, तरीका गलत था, तो क़ानून मंत्री अपने इस कृत्य के लिए माफी मांग लेते और मामला रफा-दफा हो जाता. लेकिन चूंकि क़ानून मंत्री को इसे पर्दा बनाकर अपनी सरकार की असफलताएं छिपानी थीं, इसलिए उन्होंने इस प्रकरण को हवा दे दी. यहां भी क़ानून मंत्री ने चालाकी से काम लिया. चूंकि उक्त महिलाएं बार-बार कह रही थीं कि जिस आदमी ने उन्हें मारा-पीटा है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया है, उसे वे पहचान लेंगी, इसलिए जब महिला आयोग ने इस मामले में मंत्री को हाजिर होने और अपनी बात रखने का नोटिस जारी किया, तो मंत्री ने खुद न जाकर अपने वकील को भेज दिया. आयोग की प्रमुख बरखा सिंह ने वकील की बात सुनने से इंकार कर दिया. उनके मुताबिक, दिल्ली महिला आयोग में वकीलों का इस तरह आना स्वीकार्य नहीं है. इस पर क़ानून मंत्री के वकील महिला आयोग के सदस्यों के साथ ही दुर्व्यवहार पर उतर आए. आयोग के सदस्यों और क़ानून मंत्री के वकील के बीच इस मुद्दे पर हुई बहस की तस्वीरें मीडिया में भी आईं. आयोग की सदस्य सुधा टोकस के मुताबिक, युगांडा की महिलाओं ने उन्हें बताया कि इस मामले में वे स़िर्फ एक ही व्यक्ति को पहचान सकती हैं, जिन्हें उन्होंने टीवी पर देखा था. टोकस के मुताबिक़, वे उस व्यक्ति का नाम सोम-सोम बता रही थीं और उस वक्त टीवी चल रहा था, तो उन्होंने सोमनाथ भारती को पहचाना भी. यह सवाल इसलिए गंभीर है कि आम आदमी पार्टी केवल और केवल खुद को ही पाक-साफ़ कहती है, बाकी सब उसकी निगाह में अपराधी हैं. ऐसे में, जब उसके सदस्य ही अपराधों में लिप्त पाए जा रहे हैं, तो वह मौन क्यों है? दिल्ली की जनता भी अब इस खेल को समझने लगी है. हालिया धरने के प्रति उसके अनमनेपन ने आम आदमी पार्टी से उसके मोहभंग की झलक दिखा भी दी है.

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  1. केजरी एक पलायनवादी इंसान हे ये सब जानते हैं. आज जिस तरह से उसके बयानो में और काम करने के ढंग में तालमेल की जो एक कमी नज़र आती हे उससे ये सोचने को मजबूर हूँ कि ये सब केजरी किसी के इशारे पर कर रहा हे, अगर ऐसा नहीं हे तो क्यों नहीं चार दिन इंतजार किया जनलोकपाल बिल के लिए और क्यों सदन में ये कहा कि शायद आखरी शेशन हे शायद का मतलब हे किसी से आदेश लेने थे वर्ना सदन में ही त्यागपत्र की घोषणा करता पर नहीं वो एक नजूमी लगता हे जो पहले ही बता देता हे की वो ये करता वो वो करता उसे दुनिया में सब के प्लान मालूम होते हैं केजरी ने बहुत कोशिश की क़ि कांग्रेस पर सरकार गिराने का आरोप लगे पर ये नहीं हुआ तो प्लान के हिसाब से यही करना पड़ा सो कर दिया. अच्छा हुआ केजरी ने त्यागपत्र दे दिया वर्ना देश में न्यायपालिका की जो गरिमा बची हे उसे भी केजरी के द्वारा ध्वस्त कराने की कोशिश की जा सकती हे जो देश के लिए खतरनाक होगा. आगे की राजनीती में केजरी को सिर्फ एक वायदे के साथ चुनाओ में आना चाहिए वो हे जनलोकपाल क्यों क़ि बाकि वादे उसी के लिए कोई मायने नहीं रखते इस लिए उन्हें करने भी नहीं चाहिए और न ही जनता को विश्वास करना चाहिए . अफरातफरी से शासन तो नहीं चल सकता हाँ कोई गेम हो तो चल सकता हे.वो ही केजरी चला रहा हे..पर किस के इशारे पर ये जानना देश हित में बहुत जरूरी हे.

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