CMचुनाव गहराता जा रहा है और यह प्रश्न छाता जा रहा है कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन बनेगा. इसी सवाल में यह जिज्ञासा भी निहित है कि किस पार्टी की सरकार बनेगी या कौन-कौन पार्टियां मिल कर सरकार बनाएंगी और ऐसे में सर्व-दलीय मुख्यमंत्री का सर्व-स्वीकार्य चेहरा किसका होगा? अलग-अलग पार्टियों केनजरिए से देखें तो मुख्यमंत्री केलिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का निर्णय तय है. कांग्रेस का भी तय है कि उसका कुछ भी तय नहीं है.

सर्वाधिक संशय, अनिश्चय या मौकापरस्त-मौन की स्थिति भाजपा की है. मार्च में चुनाव परिणाम आने केबाद तो यह तय हो ही जाएगा कि किस पार्टी की सरकार बनेगी और मुख्यमंत्री कौन होगा. लेकिन परिणाम आने केपहले की जिज्ञासा अधिक रोचक और रोमांचक होती है. मुख्यमंत्रियों केनिर्धारित और संभावित चेहरों पर हम बाद में बात करेंगे. पहले भविष्य केबनने बिगड़ने वाले समीकरणों की लीक से हट कर समीक्षा करते चलें.

अगर हम यह आकलन करें कि चुनाव परिणाम केबाद सीटों की स्थिति देख कर राहुल गांधी बसपा केसाथ सरकार बनाने केलिए हामी भर दें, तो यह कोई हवा में पतंग उड़ाने जैसा आकलन नहीं है. समाजवादी पार्टी केसाथ गठबंधन करने केबाद पहली बार साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब राहुल खुले तौर पर मायावती केप्रति अपना सम्मान और समर्थन जता सकते हैं तो चुनाव बाद क्यों नहीं! यह सवाल खुद कांग्रेसी ही उठाते हैं. इधर एक लंबे अर्से से मायावती और कांग्रेस केबीच अच्छे सम्बन्ध सुगबुगाते रहे हैं.

मायावती ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड केराज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनाव जितवाकर इसका स्पष्ट संदेश भी दिया. चुनाव केपहले कांग्रेस ने गठबंधन केलिए बसपा को अधिक प्राथमिकता दी थी, लेकिन मायावती को कम सीटों पर चुनाव लड़ना मंजूर नहीं था. इस मामले में वे अखिलेश से अधिक आत्मविश्वास से भरी दिखीं. बसपा से बात नहीं बनने केबाद ही कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी का हाथ थामा. अब यह साथ किस दूरी तक पसंद आएगा, यह कहना अत्यंत मुश्किल है.

मायावती भाजपा पर जिस कदर तल्ख दिखती हैं, उतनी हमलावर वे कांग्रेस पर तो कतई नहीं दिखतीं. ऐसा ही कांग्रेस केसाथ भी है. कांग्रेस भी मायावती केखिलाफ कटु नहीं है, भले ही वह अभी सपा केसाथ खड़ी हो, लेकिन वह सपा केसाथ खड़े होकर भी मायावती केखिलाफ निंदा-रस केसियासी आस्वादन से खुद को बचा रही है. मायावती केकारण उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बची रही और मायावती की मदद से ही मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस केराज्यसभा सदस्य चुने गए.

इसमें कांग्रेस केराज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल भी मायावती से उपकृत होने वाले नेताओं में शामिल हैं. मायावती केइस एहसान को कांग्रेस भूल नहीं सकती. उसे भूलना भी नहीं चाहिए. राहुल ने अखिलेश केसमक्ष मायावती की प्रशंसा कर ऐसा ही जताया. लिहाजा, राजनीतिक समीक्षा का एक मजबूत पहलू यह है कि भले ही विधानसभा चुनाव केपहले बसपा केसाथ कांग्रेस का गठबंधन नहीं हो पाया, लेकिन चुनाव परिणाम केबाद केनए सियासी समीकरण बुनने का काम अंदर-अंदर चल रहा है.

कांग्रेस केएक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस को अगर अखिलेश यादव मुख्यमंत्री केबतौर स्वीकार्य हो सकते हैं तो मायावती क्यों नहीं? उन्होंने यह भी कहा कि गठबंधन केबाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव की चुनावी सभाओं में उपस्थित रहने केलिए कांग्रेस केसम्बद्ध क्षेत्रीय नेताओं को ‘पास’ दिया जाता है, लेकिन कांग्रेस केनेता सपा की चुनावी सभाओं में शरीक रहने से बिल्कुल परहेज कर रहे हैं.

इस पर उनकेखिलाफ पार्टी कोई रंज भी नहीं दिखा रही. आप गौर करें तो अखिलेश की सभाओं में कांग्रेस केनेता दिखाई नहीं देते, भले ही उनकेक्षेत्र की सीट गठबंधन केकारण सपा केखाते में चली गई हो. जबकि गठबंधन का करार यही है कि दोनों दल एक-दूसरे केक्षेत्र में एक-दूसरे प्रत्याशियों को जितवाएं, लेकिन ऐसी कोई साझा कवायद जमीनी स्तर पर कहीं नहीं दिख रही. लिहाजा, इस संभावना पर अधिक आश्चर्य न करें कि कांग्रेस और बसपा में चुनाव बाद का गठबंधन हो जाए और सरकार बनाने में कांग्रेस बसपा की मदद कर दे.

राजनीतिक समीक्षकों से लेकर आम नागरिक तक इस बात का अनुमान करते हैं कि बसपा भाजपा केसाथ मिल कर सरकार बना सकती है. इस अनुमान केपीछे बसपा की ऐसी पृष्ठभूमि है. मुस्लिम समुदाय केएक बुद्धिजीवी ने बेसाख्ता कहा, ‘इससे मुसलमानों पर क्या फर्क पड़ता है कि मायावती भाजपा केसाथ मिल कर फिर से सरकार बना लें!’ उनका तर्क यह था कि भाजपा का साथ लेकर सरकार बनाने केबावजूद मायावती न्यूनतम साझा कार्यक्रम की शर्त केआधार पर मुसलमानों का हित भी देखेंगी, क्योंकि उन्होंने सबसे अधिक मुसलमानों को अपना प्रत्याशी बनाया है.

लेकिन यह भी सच है कि मुसलमानों ने भाजपा की संभावनाएं रोकने केलिए ही मायावती को समर्थन देने का मन बनाया है, लिहाजा अब भाजपा केसाथ जाने में मायावती को कुछ व्यवहारिक मुश्किलें आ सकती हैं. पर एक और स्थिति केबारे में आप कल्पना करें कि चुनाव बाद क्या भाजपा अखिलेश का साथ देकर सपा नेतृत्व की सरकार बनवा सकती है? सियासत में कुछ भी संभव है, यह कहना बहुत आसान है, लेकिन बिहार में महागठबंधन से अलग होने से लेकर सपा केपारिवारिक कलह केनेपथ्य में जो शक्तियां सक्रिय दिखती रही हैं, वह अब निष्क्रिय थोड़े ही हो गई हैं.

महागठबंधन से सपा को अलग कराने वाले प्रो. रामगोपाल यादव सपा केखास अलमबरदार अब भी हैं. सपा परिवार केजो सदस्य भाजपा केनितांत विरोधी और समाजवादी-जनतावादी गठबंधन केप्रबल समर्थक थे, वे सब अब पार्टी से बाहर हैं. मुलायम को अखिलेश ने अप्रासंगिक बना ही दिया है. ऐसे में चुनाव बाद भाजपा केसाथ सपा की सत्ताई-समझदारी तो बन ही सकती है.

जब समाजवादी पार्टी का पारिवारिक कलह परवान पर था और यह स्थिति बन गई थी कि अखिलेश और रामगोपाल पार्टी से बेदखल कर दिए जाएंगे, तब अखिलेश द्वारा एक नई पार्टी बना कर भाजपा केसाथ गठबंधन में जाने की पहल और चर्चाएं दोनों शुरू हो गई थीं. रामगोपाल अर्सा पहले से चुनाव आयोग केदफ्तर जाने-आने लगे थे और भाजपा नेताओं, खास कर भाजपा केराष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से उनकी मुलाकातें कोई छुपी हुई बात नहीं रह गई थी.

अखिलेश गठबंधन का निर्द्वंद्व चेहरा

खैर, समाजवादी पार्टी केमुख्यमंत्री-मुख को लेकर कोई भ्रम या प्रतिद्वंद्विता नहीं है. इसी तरह बहुजन समाज पार्टी में मुख्यमंत्री का चेहरा मायावती केअलावा कोई दूसरा होगा, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. यानि, अखिलेश और मायावती का चेहरा अपनी-अपनी पार्टी केदृष्टिकोण से निर्द्वंद्व है. कांग्रेस का कोई चेहरा नहीं है. एक चेहरा था, तो उसे भी मैदान छोड़ कर पीछे हटना पड़ा. अब कांग्रेस कलेजे पर अखिलेश और पीठ पर मायावती का चेहरा लिए फिर रही है.

भाजपा केमुख्यमंत्री-फेस से कई समानान्तरी व्यक्तित्व जुड़े हैं, जिन पर हम चर्चा बस थोड़ी देर में करते हैं. सपा केमुख्यमंत्री उम्मीदवार अखिलेश यादव महज 44 वर्ष की उम्र केसबसे कम उम्र केनेता हैं. 2012 से वे उत्तर प्रदेश केमुख्यमंत्री हैं, जब वे 39 साल केथे. इससे पहले वे लगातार तीन बार सांसद भी रह चुकेहैं. समाजवादी पार्टी केराष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने पुत्र अखिलेश यादव को वर्ष 2012 में प्रदेश की सत्ता पर अधिस्थापित किया, लेकिन उन्हें यह भान नहीं था कि पांच साल आते-आते अखिलेश उन्हें ही राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से विस्थापित कर देंगे. अखिलेश यादव की मां मालती देवी मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी थीं.

अखिलेश तीन बच्चों केपिता हैं. उनकी पत्नी डिम्पल यादव कन्नौज से सांसद हैं. विकास की तरफदारी करने वाले अखिलेश यादव ने मेट्रो रेल का काम, हाई-वे और गोमती नदी का लखनवी चेहरा सुंदर बनाने का काम किया लेकिन अन्य प्राथमिकताएं हाशिए पर चली गईं. गायत्री प्रजापति जैसे भ्रष्ट मंत्रियों और यादव सिंह जैसे भ्रष्ट नौकरशाहों को संरक्षण देने केकारण अखिलेश की स्वच्छ छवि केदावों पर छींटे पड़ते रहे. वर्ष 2013 केमुजफ्फरनगर दंगों में करीब 50 लोगों केमारे जाने और करीब सौ लोगों केघायल होने का दाग तमाम ‘हाई-पावर-सर्फ’ लगाने केबावजूद नहीं धुला.

मायावती हैं प्रबल दावेदार दलित-मुस्लिम का है साथ

वर्ष 2012 केविधानसभा चुनाव में बुरी तरह हारी मायावती 2017 केविधानसभा चुनाव में ताकतवर तरीकेसे उभरती हुई दिखाई दे रही हैं. मायावती का चेहरा संभावित मुख्यमंत्रियों की दौड़ में प्रबल दावेदार है. दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन बनाने में सतत सक्रिय मायावती कांग्रेस-सपा गठबंधन से हतप्रभ जरूर हुईं, लेकिन उन्होंने अपनी दावेदारी कमजोर नहीं पड़ने दी. सपा-कांग्रेस गठबंधन केपहले तो वे यह कहती रहीं कि सपा और कांग्रेस का गठबंधन भाजपा की हरी झंडी मिलने केबाद ही होगा.

मायावती का कहना था कि भाजपा केइशारे पर ही अखिलेश यादव लुप्तप्राय कांग्रेस केसाथ समझौता करने पर राजी हुए. मायावती ने ऐसा कह कर मुसलमानों की नब्ज पर हाथ रखा कि भाजपाई एजेंडे का पोषण करने केकारण ही सपा ने बिहार में महागठबंधन तोड़ा. गठबंधन हो जाने केबाद मायावती भाजपा पर अधिक हमलावर तेवर केसाथ सामने आईं. सपा-कांग्रेस गठबंधन केबाद तीन-तरफा मुकाबले में बसपा प्रमुख मायावती केलिए यूपी चुनाव वैसी ही प्रतिष्ठा-जनक लड़ाई है, जैसे नीतीश केलिए बिहार में थी.

इसीलिए मायावती बहुमत केलिए कई कोणों से अपनी संभावनाएं तलाश सकती हैं. हालांकि यह चर्चा तो सियासी फलक पर पहले से तैर रही है कि मायावती फिर से भाजपा का समर्थन लेकर कहीं सरकार न बना लें. यह चुनाव केबाद ही तय होगा कि मायावती भाजपा अथवा कांग्रेस केसाथ मिलकर सरकार बनाती हैं या कि बाहरी समर्थन से. राजनीतिक समीक्षक भी अखिलेश-राहुल गठबंधन को असरकारक तो बताते हैं, लेकिन बहुमत हासिल होने की बात पर नहीं आते. जैसा ऊपर कहा कि कांग्रेस मायावती पर तल्ख नहीं है.

उसी तरह भाजपा भी मायावती पर उतनी तल्ख नहीं है, जितना कांग्रेस या सपा पर. मायावती भी यह मानती हैं कि दलित-मुस्लिम एकता केफलीभूत होते हुए भी उन्हें सरकार बनाने केलिए किसी पार्टी का साथ लेना पड़ सकता है. मायावती यह भी जानती हैं कि अखिलेश केसपा पर कब्जा कर लेने केबावजूद शिवपाल फैक्टर दफ्न नहीं हुआ है. चुनाव केबाद अगर शिवपाल समर्थकों का संख्या-बल ठीक रहा तो उनका साथ मायावती ले सकती हैं.

शिवपाल केकई खास लोग मायावती केसाथ जा चुकेहैं और शिवपाल केलिए मायावती स्वागतीय भाषा का इस्तेमाल करती दिखी हैं. मायावती ने प्रदेश केलोगों से यह वादा भी किया है कि इस बार वे सत्ता में आईं तो पत्थर की मूर्तियां नहीं लगवाएंगी. मायावती का पूरा नाम मायावती प्रभु दास है. बहुत कम लोग जानते होंगे कि उनका एक और नाम मायावती नैना कुमारी भी है.

वर्ष 2007 में बसपा ने पूर्ण बहुमत केबल पर प्रदेश की सत्ता संभाली थी और मायावती पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बनी थीं. मायावती इससे पहले भी तीन बार छोटे-छोटे कार्यकाल केलिए 1995 और 1997 में व भारतीय जनता पार्टी केसमर्थन से 2002 से 2003 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं. भारत केकिसी राज्य की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनने का श्रेय मायावती को जाता है. समाजवादी पार्टी ने 2012 केचुनाव में मायावती को पराजित किया.

राजनीति में आने से पहले मायावती दिल्ली केएक स्कूल में शिक्षिका थीं. 1977 में कांशीराम केसम्पर्क में आने केबाद उन्होंने पूर्ण कालिक राजनीतिक करियर अपनाया. मायावती की मुस्लिम-परस्ती पर सपा केएक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मुसलमान इस बात को नहीं भूल पाएंगे कि मायावती केही मुख्यमंत्रित्वकाल में सबसे ज्यादा 43 मुस्लिम नौजवानों को आतंकवाद केझूठे आरोपों में फंसाया गया था. उनका कहना था कि मुस्लिम समुदाय ‘टेरर पॉलिटिक्स’ खेलने केलिए मायावती को माफ नहीं कर सकता है.

भाजपा के सीएम चेहरे पर भाजपाइयों को ही भ्रम

अब आते हैं भारतीय जनता पार्टी केसंभावित चेहरों पर. इन चेहरों को लेकर भाजपा में गुत्थियां अधिक हैं, लिहाजा उसे आखिर में सुलझाने का जतन किया जाए. अगर भाजपा अपनी ताकत से सरकार बनाती है तो शीर्ष नेतृत्व मुख्यमंत्री केबतौर किसे चुनती है, इसे लेकर भाजपा नेताओं में ही भ्रम की स्थिति है, तो आम नागरिकों में भ्रम रहना लाजिमी है. कई भाजपा नेताओं को यह भी अंदेशा सताता है कि हरियाणा की तरह अचानक कोई खट्‌टर या झारखंड की तरह अचानक कोई दास न आ जाए.

इन कयासों और आशंकाओं केसमानान्तर राजनाथ सिंह का नाम संभावित मुख्यमंत्रियों में पहला नाम है. हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसे सिरे से नकारते रहे हैं, लेकिन वरिष्ठता, परिपक्वता और स्वीकार्यता केनाम पर भाजपा आलाकमान राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश की राजनीति में वापस भेज सकता है. राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय वरिष्ठ नेताओं को राजनाथ सिंह का कद चुभता भी है, लिहाजा उनकेमुख्यमंत्री केरूप में वापस आने से राष्ट्रीय राजनीति का एक बड़ा रोड़ा भी साफ हो सकता है.

राजनाथ से कुढ़ने वाले नेताओं को एक ही तीर से दो शिकार का लाभ मिल जाएगा. कुछ अर्सा पहले भी राजनाथ केनाम की चर्चा तेज हुई थी. तब यह भी संभावना बनी थी कि इलाहाबाद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राजनाथ सिंह को यूपी की कमान सौंपने की घोषणा हो. लेकिन अंदरूनी वजहों से यह मामला टल गया. तब राजनाथ ने इस बारे में पूछने पर कहा था, ‘यूपी में नेताओं की कमी नहीं है’. राजनाथ सिंह यूपी केमुख्यमंत्री रह चुकेहैं. उनकेनाम पर पार्टी में यह आम सहमति है कि राजनाथ सिंह ऐसे नेता हैं, जिनका प्रभाव पूरे राज्य पर है.

पेशे से प्रोफेसर रह चुकेराजनाथ सिंह अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी केबाद भाजपा केतीसरे ऐसे नेता हैं जिन्हें दो बार पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का मौका मिला. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से राजनाथ की निकटता जगजाहिर है, फिर भी उनकी छवि सेकुलर नेता के रूप में बनी हुई है. हालांकि यह भी सच है कि जिन्ना प्रकरण से विवाद में आए आडवाणी केबाद संघ ने राजनाथ को ही पार्टी केअध्यक्ष केरूप में उपयुक्त माना था. राजनाथ सिंह 1975 में जनसंघ केमिर्जापुर जिले केअध्यक्ष भी थे. केंद्र में वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में भी राजनाथ सिंह कृषि मंत्री थे.

भाजपा केसंभावित मुख्यमंत्रियों में दूसरा सशक्त नाम योगी आदित्यनाथ का है. फायर ब्रांड नेता केरूप में चर्चित योगी आदित्यनाथ अपनी बेबाकी, प्रखरता और कट्‌टरता केलिए मशहूर हैं. शुरुआत में जब भाजपा का ‘मुख्यमंत्री का चेहरा कौन’ केसवाल पर राजनाथ सिंह का नाम चला और फिर वृष्टि-छाया-क्षेत्र में चला गया, तब योगी आदित्यनाथ का नाम जबरदस्त तरीकेसे उछला.

यहां तक कि योगी केनाम और नेतृत्व की तमाम होर्डिंग्स प्रदेशभर में टंग गईं और गोष्ठियों से लेकर सभाओं तक मोदी-मोदी की तरह योगी-योगी होने लगा. इस पर भाजपा आलाकमान में व्यक्तित्व-संकट की ग्रंथि जाग्रत हो गई और योगी केनाम की चर्चा बंद कर दी गई. राजनीतिक समीक्षकों को यह प्रतीत हुआ कि भाजपा ने कट्‌टरवादी लाइन छोड़ कर नरमपंथी रुख अपना लिया है, लेकिन सच्चाई यही थी कि योगी केनाम से कई वरिष्ठ नेताओं का व्यक्तित्व-संकट उजागर होने लगा था.

यह संकट इतना गहराया कि योगी को उत्तर प्रदेश की चुनाव प्रबंध समिति में भी शामिल नहीं किया गया. योगी ने जिन लोगों केलिए टिकट की सिफारिश की थी, उनमें से अधिकांश का टिकट काट दिया गया. पार्टी में विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई. परिवर्तन यात्राओं केदरम्यान पार्टी नेतृत्व को इस विरोध का तामपान महसूस होता रहा. फिर योगी केसंगठन हिंदू युवा वाहिनी ने भाजपा केखिलाफ खुला विद्रोह का ऐलान किया और वाहिनी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह ने समानान्तर प्रत्याशियों को मैदान में उतारे जाने की घोषणा कर दी. भाजपा नेतृत्व भौंचक्का रह गया.

राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने योगी को फौरन लखनऊ बुलाया और बातचीत की. योगी ने हिंदू युवा वाहिनी की घोषणा का सार्वजनिक खंडन जारी किया और सुनील सिंह व कुछ अन्य पदाधिकारियों की बर्खास्तगी की घोषणा हुई. लेकिन इसकेबावजूद मामला थमा नहीं. प्रत्येक चुनावी सभाओं में योगी केलिए नारे लगने लगे और सवाल उठने लगे. तब भाजपा आलाकमान ने योगी को अपने स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शुमार किया.

बुलंदशहर की चुनावी सभा में योगी केभाषण केबाद बदले माहौल पर इंटेलिजेंस ब्यूरो ने जो केंद्र को रिपोर्ट भेजी, उसने भाजपा नेताओं की आंखें खोलीं. आईबी की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ कि योगी की सभा केबाद बुलंदशहर केसाथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश केकई अन्य जिलों में व्यापक प्रभाव पड़ा है. इसकेबाद भाजपा चेती. आनन-फानन योगी को हेलीकॉप्टर मुहैया कराया गया और उनका नाम एक बार फिर संभावित मुख्यमंत्रियों केबतौर चर्चा में आ गया.

हालांकि इस बारे में योगी कहते हैं, ‘मैं मुख्यमंत्री की दौड़ में कतई शामिल नहीं हूं. मैं योगी हूं और योगी ही रहूंगा’. इस पर एक भाजपा नेता कहते हैं कि यह सब तो कहने-सुनने की बातें हैं. मुख्यमंत्री बनने केबाद योगी कौन से गृहस्थ बन जाएंगे. सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति योगी रहे तो उससे देश और समाज को फायदा ही होगा. योगी से आलाकमान की खिसियाहट इसलिए भी रही है कि वे नेतृत्व केगलत निर्णयों पर बोलने से नहीं हिचकते.

मायावती पर विवादास्पद टिप्पणी करने केमामले में भाजपा केउपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह पर हुई बर्खास्तगी की कार्रवाई पर अकेले योगी ने ही सवाल उठाया था और कहा था कि दयाशंकर सिंह पर कार्रवाई करने वाले नेताओं को संयम रखना चाहिए था. प्रसिद्ध गोरखधाम पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ 1988 से गोरखपुर के सांसद हैं, जब वे महज 23 साल केथे. योगी केपहले उनकेगुरु व गोरखनाथ पीठ केपूर्व महंत अवैद्यनाथ भी 1991 और 1996 में गोरखपुर केसांसद थे.

विवादों के नाथ… योगी आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ हमेशा चर्चाओं और विवादों में रहे हैं. ऐसे कुछ विवादों की बानगियां पेश हैं… दादरी हत्याकांड पर योगी ने कहा था, ‘उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री आजम खान ने जिस तरह यूएन जाने की बात कही है, उन्हें तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए. आज ही मैंने पढ़ा कि अखलाक पाकिस्तान गया था और उसके बाद से उसकी गतिविधियां बदल गई थीं.

क्या सरकार ने यह जानने की कभी कोशिश की कि ये व्यक्ति पाकिस्तान क्यों गया था. आज उसे महिमामंडित किया जा रहा है?’ वर्ष 2014 में लव जेहाद को लेकर भी योगी का एक वीडियो सामने आया था. इसे लेकर काफी बावेला मचा. वीडियो में योगी आदित्यनाथ अपने समर्थकों से कहते सुनाई दे रहे थे, ‘हमने फैसला किया है कि अगर वो एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन करवाते हैं तो हम 100 मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे’.

बाद में योगी ने वीडियो के बारे में कहा, ‘मैं इस मुद्दे पर कोई सफाई नहीं देना चाहता. यह मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे वीडियो दिखाने से पहले उसकी जांच कर ले’.

इसी तरह फरवरी 2015 में योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश केसभी मस्जिदों केअंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. योगी ने कहा था, ‘आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में गैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वेटिकन सिटी में गैर ईसाई नहीं जा सकता है, लेकिन हमारे यहां हर कोई क्यों आ सकता है?’ योगी ने योग पर उठे विवाद पर भी कहा था कि जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए और जो लोग सूर्य नमस्कार को नहीं मानते उन्हें समुद्र में डूब जाना चाहिए. जनसंख्या असंतुलन पर योगी ने 2015 में कहा था कि मुस्लिमों के बीच उच्च प्रजनन दर से जनसंख्या असंतुलित हो रही है. उसी वर्ष योगी ने हरिद्वार में विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल ‘हर की पौड़ी’ पर गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.

भाजपा केसंभावित मुख्यमंत्रियों में तीसरा नाम केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा का भी है. मनोज सिन्हा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केभरोसेमंद हैं. इस भरोसे की वजह से ही उन्हें

दो-दो मंत्रालयों का दायित्व दिया गया. छात्र राजनीति का उनका पुराना अनुभव भी उनकेराजनीतिक करियर का एक बेहतर अध्याय है. रेल राज्यमंत्री केरूप में भी मनोज सिन्हा ने उत्तर प्रदेश केलिए कई रेल योजनाओं को साकार करने में सार्थक भूमिका अदा की. केशव मौर्य केप्रदेश अध्यक्ष बनने केपहले मनोज सिन्हा का ही नाम प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केलिए चल रहा था. लेकिन जातिगत समीकरणों का ध्यान रखते हुए मौर्य को मौका दिया गया.

तभी से मनोज सिन्हा का नाम भी संभावित मुख्यमंत्री केरूप में लिया जाने लगा. मनोज सिन्हा भाजपा केराष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह केभी चहेते हैं. विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से होने केकारण संघ की भी उन पर कृपा बनी रहती है. मनोज सिन्हा आईआईटी बीएचयू से बीटेक और एमटेक दोनों हैं. वर्ष 1996, 1999 और 2014 केलोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा ने लगातार अपनी जीत दर्ज की है. उच्च शिक्षित मनोज सिन्हा की साफ छवि और उनका बेहतर राजनीतिक योगदान उनकेमुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को काफी बल दे रहा है.

उत्तर प्रदेश के संभावित मुख्यमंत्रियों की भाजपाई सूची में केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा का नाम भी शुमार है. नोएडा से डॉ. महेश शर्मा केसांसद प्रतिनिधि संजय बाली को टिकट न देकर राजनाथ सिंह केपुत्र पंकज सिंह को टिकट दिए जाने से शर्मा की नाराजगी भाजपा नेतृत्व तक पहुंची. यहां तक कि शर्मा के प्रतिनिधि ने भाजपा के महामंत्री और प्रतिनिधि केपद से इस्तीफा तक दे दिया. भाजपा ने राजनाथ के बेटे को टिकट देने में नोएडा की मौजूदा विधायक विमला बाथम का भी ख्याल नहीं रखा. इस मसले पर डॉ. महेश शर्मा ने अनुशासन से काम लिया और पार्टी नेतृत्व का भरोसा हासिल किया.

सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा केराष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पिछले काफी अर्से से महेश शर्मा की जिम्मेदारियां बढ़ाने केबारे में विचार कर रहे हैं. यह जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश केमुख्यमंत्री केरूप में भी हो सकती है. महेश शर्मा केनाम पर संघ को भी कोई आपत्ति नहीं है. उत्तर प्रदेश केगौतम बुद्ध नगर से सांसद डॉ. महेश शर्मा पेशे से चिकित्सक रहे हैं. कैलाश हॉस्पीटल चेन डॉ. महेश शर्मा का ही है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर तीखे प्रहार और करारे व्यंग्य केकारण भी डॉ. महेश शर्मा भाजपा नेतृत्व से सराहे जाते रहे हैं. नोटबंदी और सपा-कांग्रेस गठबंधन पर उनकी प्रतिक्रियाएं भाजपा गलियारे में काफी चर्चा में रही थीं.

क्या अखिलेश राहुल और मायावती भी हो सकते हैं साथ!

गठबंधन के बाद से लेकर आज तक कांग्रेस-सपा की जितनी भी साझा रैलियां हुईं किसी में भी अखिलेश या राहुल ने मायावती पर हमला नहीं किया. ऐसे संदर्भों का हवाला देते हुए कई राजनीतिक समीक्षक दूर की कौड़ी भी फेंकते हैं कि क्या कभी अखिलेश राहुल और मायावती भी एक साथ आ सकते हैं! बिल्कुल ही अधर में लटके भ्रमित जनादेश केआने पर ऐसा हो सकता है. हंग-असेम्बली की स्थिति में अखिलेश की बुआ और राहुल की आदरणीय मायावती जी काम आ सकती हैं.

राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि सपा और कांग्रेस केबीच हुआ गठबंधन अभी और आगे बढ़ने वाला है और 2019 केपहले इसमें कई और दल शामिल होंगे. यह गठबंधन केवल यूपी चुनाव तक ही सीमित नहीं रहने वाला है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी और बिहार केमुख्यमंत्री व जद (यू) नेता नीतीश कुमार ने यूपी में अपने उम्मीदवार नहीं देकर भविष्य में शक्ल लेने वाले ऐसे ही सियासी समीकरण का संकेत दिया है. सब मिल कर कांग्रेस-सपा गठबंधन को मदद पहुंचा रहे हैं.

मायावती अलग चुनाव जरूर लड़ रही हैं, लेकिन भविष्य में उन्हें भी महागठबंधन में शरीक होने का विकल्प जरूरी नजर आएगा. 2019 केलोकसभा चुनाव में भाजपा केखिलाफ साझा-शक्ति केसाथ उतरने की अभी से तैयारी हो रही है. उत्तर प्रदेश केनजरिए से देखें तो यदि सपा, बसपा और कांग्रेस मिलकर भविष्य में लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा केलिए अत्यंत मुश्किल होगी. उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से जो पार्टी सबसे अधिक सीटें जीत लेती है, केंद्र में उसकी सरकार बनना तय हो जाता है.

सपा-कांग्रेस का अकेला गठबंधन भाजपा को रोक पाने में उतना सक्षम नहीं होगा, जितना मायावती को साथ लेकर. आप याद करें, कुछ अर्सा पहले मुलायम सिंह यादव ने बसपा को साथ लेने की संभावना जताई थी. हालांकि मायावती ने ऐसी किसी संभावना को उस समय सिरे से नकार दिया था. मायावती केमन में गेस्ट हाउस कांड लगातार चुभता रहता है. उनका सारा गुस्सा मुलायम केप्रति है, अखिलेश केप्रति नहीं. अब मुलायम प्रसंग इतिहास की ही बात रह गई है.

त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में मायावती अखिलेश को समर्थन देकर यूपी में सरकार बनवा सकती हैं और इस शर्त पर अपने लिए केंद्र में जगह रिजर्व करा सकती हैं. ताकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार बने तो मायावती उसमें खास रोल में रहें. राजनीतिक समीक्षक खुद कहते भी हैं कि अभी यह असंभव जैसा विचार है, लेकिन विचार का एक यह भी आयाम है.

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