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विकास की आस में जमीन भी गई
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विकास की आस में जमीन भी गई

भारत को चमत्कारों का देश यूं ही नहीं कहा जाता है. यहां संतराम पैकारा जैसा दिहाड़ी मजदूर भी करोड़ों रुपयों की जमीन एक झटके में खरीद सकता है. कह सकते हैं कि अगर स्थितियां सामान्य होतीं, तो यह खबर सुर्खियों में रहती, लेकिन मामला एक मशहूर उद्योगपति जिंदल से जुड़ा है. इसलिए न खबर पर कहीं चर्चा होनी थी, न हुई. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की जमीन हड़पने की कंपनियों में होड़ मची है. रायगढ़ जिले में भेनगारी गांव के निवासी अर्जुन सिंह मांझी को ही ले लीजिए. 2009 में अपने घर के छत की मरम्मत के लिए उन्हें कुछ रुपयों की जरूरत थी.

उन्होंने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए एक एकड़ जमीन महेश पटेल को बेच दी और बाकी जमीन पर खेती करने लगे. मार्च 2012 में उन्हें फिर कुछ जमीन बेचने की जरूरत पड़ी. जब उन्होंने खरीदने वाले को जमीन के कागजात दिखाए, तो उसने कहा कि यह जमीन उनके नाम पर नहीं है. हुआ यूं कि महेश पटेल ने जमीन खरीदते समय कुछ अन्य कागजों पर भी उनसे साइन करा लिए थे. बाद में उसने मांझी की साढ़े सात एकड़ जमीन टीएनएम एनर्जी को बेच दी.

टीएनएम एनर्जी नजदीक के गांव खोखरोमा में 600 मेगावाट की कोल बिजली परियोजना लगा रही है. 2012 से 2017 के दौरान अर्जुन मांझी जैसे सैकड़ों किसानों की 700 एकड़ जमीन टीएनएम एनर्जी और महावीर कोल कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों ने हड़प ली है. आदिवासियों से यह जमीन कभी जोर-जबरदस्ती से ली गई, तो कभी झांसे में लेकर, कभी फर्जी हस्ताक्षर करा लिए गए तो कभी सरपंच को मिलाकर जमीन लिखा ली गई. कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जहां कंपनियों ने अपने इम्प्लाई के नाम पर आदिवासियों की जमीन हड़प ली. रायगढ़ जिले के घरगोड़ा तहसील में भेनगारी, खोखरोमा, नवापाड़ा टेंडा और कटांगड़ी गांव के किसान अपनी जमीन वापस लेने के लिए आज इन कंपनियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

आदिवासी इलाकों में पंचायत एक्ट, 1996 के अनुसार, रायगढ़ जैसे इलाकों में, जहां 50 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी है, ग्राम सभा की सहमति के बिना उनकी जमीन किसी भी गैर आदिवासी को न तो हस्तांतरित की जा सकती है और न ही बेची जा सकती है. लेकिन रायगढ़ में आप किसी भी आदिवासी से मिलें, वह बाहरी लोगों या निजी कंपनियों द्वारा जमीन हड़प लिए जाने की एक अलग ही कहानी आपको सुनाएगा. इन क्षेत्रों में कितने ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कंपनियों के कारिंदों ने डरा-धमकाकर जमीन हथिया ली है. वहीं कुछ किसान बताते हैं कि उन्हें मार्केट रेट के हिसाब से जमीन की काफी कम कीमत दी गई.

रायगढ़, कोबरा, सरगुजा और धर्मजयगढ़ जिलों में सभी खनन और पावर एनर्जी कंपनियां इन्हीं तरीकों से आदिवासियों की जमीन छीन रही हैं. रायगढ़ के एक स्थानीय वकील बताते हैं कि छत्तीसगढ़ लैंड रिवेन्यू कोड की धारा 170 बी के तहत सैकड़ों मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं. कई मामलों में नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर आदिवासियों की जमीन उन्हें वापस सौंप दी गई है. अब चार गांवों के सैकड़ों किसान इस मामले को क्रिमिनल कोर्ट में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. खोखरोमा गांव की सरपंच पावित्री मांझी कहती हैं कि हम अब तक बहुत सहते रहे हैं. हमें कंपनियों और बाहरी लोगों ने बार-बार ठगा है. अब हम इन कंपनियों को कोर्ट में घसीटने की तैयारी कर रहे हैं. सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि अगर आदिवासियों ने कंपनियों के खिलाफ जमीन हथियाने के केस में जीत हासिल कर ली, तो आगे वे ऐसा करने से डरेंगी.

2009 से 2015 तक कुनकुनी गांव के आदिवासियों की 300 एकड़ से अधिक जमीन बिलासपुर स्थित रियल इस्टेट फर्म सप्तर्षि इंफ्राटेक ने अपने नाम हस्तांतरित करा ली. ग्रामीणों का कहना है कि इस जमीन को सप्तर्षि इंफ्रा ने आगे खनन कंपनियों को बेच दिया. पिछले साल कुनकुनी के निवासी जयलाल रथिया ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जोर-जबरदस्ती से हथियाई गई आदिवासियों की जमीन वापस किए जाने को लेकर एक याचिका दायर की थी. मार्च 16, 2017 को असामान्य परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई. उनके बेटे आनंदराम रथिया कहते हैं कि यह स्वाभाविक मौत नहीं थी. जब छत्तीसगढ़ विधानसभा में यह मामला उठा, तब अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग ने 9 मई को निर्देश दिया कि कुनकुनी ग्राम की जमीन आदिवासियों को वापस दी जाए और फ्रॉड कर जमीन हथियाने वाली कंपनियों पर कार्रवाई की जाए. कुछ माह पूर्व अमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी घरगोड़ा गांव में आदिवासियों की जमीन हथियाने को लेकर अधिकारियों से जांच की मांग की थी.

14 जून को सैकड़ों आदिवासियों ने जमीन के कागजों के साथ रायगढ़ स्थित (अनुसूचित-जाति, जनजाति के अधिकारों की रक्षा के लिए गठित) विशेष थाने में प्रदर्शन किया. उन्होंने थाने में मौजूद पुलिस अधिकारियों को हथियाई गई जमीन के असली कागजात भी दिखाए. इसके बावजूद पुलिस अधिकारियों ने एफआईआर दर्ज करने से पूर्व प्राथमिक जांच करने का फैसला किया. 25-26 जून को कुछ पुलिस ने भेनगारी और नवापाड़ा टेंडा गांव में कैम्प कर ग्रामीणों की शिकायतें दर्ज कीं. ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस ने उनके कहे अनुसार बयान दर्ज नहीं किया और न ही कंपनियों के खिलाफ कुछ लिखा. 9 एकड़ जमीन के मालिक जयंतीलाल  ने बताया कि उन्होंने पुलिस से कहा कि हमें किस कागज पर साइन करने के लिए कहा गया, हमें नहीं पता. हां, बाद में  पता चला कि मेरी सात एकड़ जमीन टीएनएम एनर्जी कंपनी के पास चली गई.

अब बात करते हैं संतराम पैकारा की, जिनका जिक्र पूर्व में किया गया. संतराम रायगढ़ स्थित जिंदल कंपनी में दिहाड़ी मजदूरी करते थे. 2008 में उन्होंने करोड़ों रुपए की जमीन खरीदी. मार्च 2014 में रायगढ़ जिला प्रशासन को जानकारी मिली कि इस जमीन की खरीद तो दो आदिवासियों के नाम पर हैं, लेकिन वास्तविक कब्जा किसी और कंपनी का है. जिंदल पावर ने रायगढ़ जिले के तामनार क्षेत्र में सरकारी अधिकारियों से मिलीभगत कर आदिवासियों की 108 एकड़ जमीन हथिया ली है.

अगस्त 2009 में संतराम की भी अचानक असामान्य परिस्थितियों में मौत हो गई. इसके बाद जिंदल कंपनी ने उनकी पत्नी सुशीला पैकारा को नौकरी का आश्वासन देकर डेथ सर्टिफिकेट भी अपने कब्जे में ले लिया. जिंदल ने 39 एकड़ जमीन संतराम के नाम पर सरसमल, तामनार, रामपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में ली थी. ऐसे कितने ही संतराम के नाम पर कंपनियों ने आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर लिया है. विकास के उजियारे की आस में आदिवासियों की उम्मीदें अब दम तोड़ रही हैं.

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