vihipकोयला खान आवंटन घोटाला संप्रग सरकार के कार्यकाल में उजागर हुआ लेकिन उस घोटाले की सबसे पहली सजा भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े
उद्योगपतियों को मिली. कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में सीबीआई की विशेष अदालत ने जिन रूंगटा ब्रदर्स को दोषी करार दिया है, उनके संघ और भाजपा से गहरे रिश्ते हैं. कोयला घोटाले में दोषी करार दिए गए झारखंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड (जेआईपीएल) के दो निदेशकों में से एक राम स्वरूप रूंगटा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आनुषांगिक संस्था विश्व हिंदू परिषद की झारखंड इकाई के अध्यक्ष रहे हैं. उनके एक भाई नंद किशोर रूंगटा भी विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष हुआ करते थे. 1997 में नंद किशोर रूंगटा का वाराणसी से सनसनीखेज अपहरण हुआ था.

उस बहुचर्चित अपहरणकांड में पूर्वांचल के माफिया मुख्तार अंसारी का नाम आया था. मुख्तार की गिरफ्तारी भी हुई थी. सीबीआई ने मामले की छानबीन भी की थी. लेकिन नंद किशोर रूंगटा के अपहरण की गुत्थियां रहस्य ही रह गईं और उनकी हत्या भी कर दी गई. करोड़ों रुपये की फिरौती वसूलने के बावजूद नंद किशोर रूंगटा की हत्या कर दी गई थी. रूंगटा परिवार से विहिप नेता अशोक सिंघल के भी अंतरंग रिश्ते थे. नंद किशोर रूंगटा के मारे जाने के बाद उनके भाई राम स्वरूप रूंगटा विहिप के झारखंड प्रदेश के अध्यक्ष बने.

रूंगटा प्रतिष्ठान के भाजपा से रिश्ते यथावत बने रहे और उस औद्योगिक घराने से भाजपा को अच्छी खासी फंडिंग भी होती रही. रूंगटा परिवार से फंडिंग की बात को भाजपा आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं करेगी, लेकिन यही तथ्य सत्य है. ओड़ीशा के कंधमाल में 23 अगस्त 2008 को स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार सहयोगियों की हुई हत्या के मामले में चर्च की भूमिका को राम स्वरूप रूंगटा ने ही दस्तावेजों से उजागर किया था.

आप जानते ही हैं कि सीबीआई के विशेष न्यायाधीश भरत पाराशर ने झारखंड इस्पात प्राइवेड लिमिटेड (जेआईपीएल) के दो निदेशकों राम स्वरूप रूंगटा और राम चंद्र रूंगटा को कोयला खान आवंटन में हुई अनियमितता के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक षडयंत्र) और 420 (धोखाधड़ी) का दोषी करार दिया है. विशेष अदालत का गठन कोयला घोटाले के मामलों की सुनवाई के लिए ही किया गया है. दोषी करार देने के बाद अदालत के आदेश पर रूंगटा भाइयों को हिरासत में ले लिया गया.

संप्रग (यूपीए) के दूसरे कार्यकाल में सुर्खियां बने कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले के पहले मामले में 28 मार्च 2016 को अदालत का फैसला आया. दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष सीबीआई अदालत जिस समय अपना फैसला सुना रही थी उस समय जेआईपीएल के दोनों निदेशक बंधु अदालत में ही मौजूद थे. दोषी करार दिए जाने के तुरंत बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया. इससे पहले वे जमानत पर बाहर थे.

कोयला घोटाले को लेकर चौथी दुनिया ने कई नायाब रहस्योद्घाटन किए हैं. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला उजागर हुआ था. कैग ने कहा था कि कोल ब्लॉक के आवंटन में एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ. औद्योगिक घरानों को कोयले की खानें बिना कोई बोली लगाए दे दी गईं थीं.

उन कोयला खानों की बाकायदा नीलामी की गई होती तो सरकार को अरबों का घाटा नहीं उठाना पड़ता. एस्सार पावर, हिंडाल्को, टाटा स्टील, टाटा पावर, जिंदल स्टील एंड पावर, जेआईपीएल सहित 25 कंपनियों को विभिन्न राज्यों में कोयले की बड़ी खानें दी गई थीं. कोल ब्लॉक आवंटन की रेबड़ियां बटोरने में छोटी-बड़ी मिला कर करीब सौ कंपनियां शामिल रही हैं. कोयला घोटाले में कुल 20 मुकदमे दर्ज हैं. विशेष सीबीआई जज भरत पाराशर को केवल कोयला घोटाले से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए ही नियुक्त किया गया है. न्यायाधीश ने जेआईपीएल को भी दोष के दायरे में लिया है.

जेआपीएल के निदेशक राम स्वरूप रूंगटा और रामचंद्र रूंगटा को आइपीसी की धारा 120-बी और 420 के तहत मुजरिम करार दिया गया लेकिन उन पर आइपीसी की धारा 467, 468 और 471 के तहत लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया गया.

इन धाराओं के मद्देनजर सबूतों का अभाव पाया गया. 132 पेज के अदालती फैसले में कहा गया है कि कंपनी ने कोयला मंत्रालय के समक्ष जमीन व कोयला ब्लॉक की क्षमता के संबंध में जानबूझकर गलत दस्तावेज पेश किए थे. इस आधार पर कोयला मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी ने उसे झारखंड के उत्तरी धांदू में कोयला ब्लॉक आवंटित कर दिया था. गलत तथ्यों के आधार पर ही तत्कालीन कोयला मंत्री ने भी स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों पर अपनी मुहर लगा दी थी.

न्यायाधीश ने कहा कि कोयला ब्लॉक पाने के लिए की गई साजिश पूरी तरह से स्पष्ट है, लिहाजा दोषियों की भूमिका को लेकर उनके मन में कोई दो राय नहीं है. कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में जेआईपीएल अचानक तब सुर्खियों में आ गई थी जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी आरोपी बनाने के लिए कंपनी की ओर से अदालत में याचिका दाखिल की गई. हालांकि वह याचिका अदालत से खारिज हो गई, लेकिन उसने कोयला घोटाले के कई और आयाम उजागर किए.

जेआईपीएल को जिस समय कोल ब्लॉक का आवंटन हुआ था उस समय मनमोहन सिंह के पास ही कोयला मंत्रालय था. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा तत्कालीन कोयला राज्यमंत्री दासारी नारायण राव को भी अदालत में हाजिर कराने और उनका बयान लेने का अदालत से आग्रह किया गया था. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आरोपी बनाने की मांग की थी. उस समय के कोयला राज्यमंत्री दासारी नारायण राव यह कह चुके थे कि मनमोहन सिंह को आरोपी बनाने की मांग उचित है.

राव का कहना था कि कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर सभी निर्णय मनमोहन सिंह की अंतिम स्वीकृति के बाद ही लिए गए, लिहाजा उन्हें मामले में आरोपी बनाया जाना चाहिए. केंद्र सरकार के पूर्व कोयला सचिव एचसी गुप्ता ने भी अदालत के समक्ष यह बयान दिया था कि मनमोहन सिंह द्वारा अंतिम निर्णय लेने के बाद ही कोल ब्लॉक आवंटित किया जाता था. नियम-कानून को ताक पर रखकर झारखंड में कोलकाता की विनी आयरन व स्टील उद्योग लिमिटेड को राजहरा नॉर्थ कोल ब्लॉक आवंटित करने के मामले में पूर्व कोयला सचिव एचसी गुप्ता भी आरोपी हैं.

अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया था कि कोयला सचिव एचसी गुप्ता स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन थे और सिर्फ उन्हीं आवंटनों को स्वीकृत करते थे जिन्हें कोयला मंत्री द्वारा बाकायदा स्वीकृत किया जाता था. गुप्ता सिर्फ आवेदकों की फाइलें कोयला मंत्री तक पहुंचाते थे. कोयला मंत्री ही अंतिम निर्णय लेते थे कि कोल ब्लॉक किन कंपनियों को आवंटित किया जाएगा.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आरोपी बनाने के मसले पर जिंदल स्टील के मालिक कांग्रेस नेता नवीन जिंदल ने अदालत के समक्ष कहा था कि मनमोहन सिंह को आरोपी बनाने के मसले पर न वह पक्ष में हैं और न विरोध में. जिंदल स्टील और नवीन जिंदल भी कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में आरोपी हैं. झारखंड के अमरकोंडा मुर्गदंगल में नवीन जिंदल की कंपनी जिंदल स्टील को अवैध तरीके से कोल ब्लॉक देने का मामला चल रहा है.

कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला 2012 में संप्रग के दूसरे कार्यकाल में उजागर जरूर हुआ, लेकिन यह घोटाला संप्रग के पूरे 10 वर्ष के शासनकाल और उसके पहले के पांच वर्ष के भाजपा शासनकाल में किया गया. कोयला घोटाले पर भाजपा लगातार कांग्रेस पर हमलावर रही, लेकिन असलियत यही है कि इस घोटाला प्रतियोगिता में कांग्रेस ने 10 साल का फायदा उठाया तो भाजपा ने तकरीबन पांच साल का. कोयला घोटाले का कार्यकाल व्यापक तौर पर वर्ष 1999 से लेकर वर्ष 2014 के बीच का माना जा सकता है.

इस दरम्यान नवीन पटनायक (1998 से 2000), सुंदर लाल पटवा (2000 से 2001), सैयद शाहनवाज हुसैन (फरवरी 2001 से सितम्बर 2001), राम विलास पासवान (2001 से 2002), ममता बनर्जी (जनवरी 2004 से मई 2004), शीबू सोरेन (2004 से 2007), मनमोहन सिंह (2004 में चार महीने और 2007 से 2012), श्रीप्रकाश जायसवाल (2012 से 2014) देश के खान एवं कोयला मंत्री रहे. 2003 में खनन मंत्रालय और कोयला मंत्रालय को अलग-अलग कर दिया गया था. कोयला घोटाले में आधिकारिक तौर पर जिन भाजपाइयों ने फायदा उठाया उसमें एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के अजय संचेती का नाम भी अव्वल है.

भाजपा के कद्दावर नेता और मौजूदा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के करीबी अजय संचेती भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं और उन्होंने अपने प्रभाव से छत्तीसगढ़ के कोल ब्लॉक हथियाए थे. एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने अकेले ही देश को हजार करोड़ का नुकसान पहुंचाया. रूंगटा भाइयों की झारखंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड का स्थान उसके बाद ही आता है. हालांकि रूंगटा ब्रदर्स को कोल ब्लॉक का आवंटन वर्ष 2005 में हुआ था, तब मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार केंद्र में आ गई थी.

रूंगटा बंधुओं के आर्थिक विकास की कहानी उनके राजनीतिक विकास से जुड़ी हुई है. विहिप के कोषाध्यक्ष रहे नंद किशोर रूंगटा की हत्या की जांच करने वाली टीम के सदस्य रहे एक सीबीआई अधिकारी ने बताया कि नंद किशोर रूंगटा के अपहरण में आर्थिक और राजनीतिक दोनों वजहें शामिल थीं. अयोध्या आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा करने वाले अशोक सिंघल के अंतरंग नंद किशोर रूंगटा कई लोगों की आंखों में खटक रहे थे और कुछ माफिया तत्व उन्हें रास्ते से हटा कर बदला भी लेना चाहते थे.

यही वजह है कि नंद किशोर रूंगटा के अपहरण में करोड़ों रुपये की फिरौती भी वसूली गई और उनकी हत्या भी कर दी गई. नंद किशोर रूंगटा अपहरण मामले में माफिया सरगना मुख्तार अंसारी के शूटर अताउर रहमान उर्फ बाबू की आजतक गिरफ्तारी नहीं हो पाई. जबकि सीबीआई ने उसकी गिरफ्तारी में दुनियाभर में कथित तौर पर जाल बिछाया और रेड कॉर्नर नोटिस तक जारी की. विडंबना यह है कि फरारी के दरम्यान ही उसने भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की भी हत्या कर दी.

बहरहाल, तत्कालीन बिहार के रामगढ़ (अब झारखंड में) के कोयलांचल में रूंगटा बंधुओं की आर्थिक विकास यात्रा 80 के दशक में शुरू हुई थी. उसके पहले उनका कोयले का छोटा व्यापार था और वे एक-दो ट्रक कोयला ही बनारस भेजा करते थे.

फर्जी दस्तावेजों पर पूर्व सैनिकों के नाम पर कोयला उठान का धंधा करके रूंगटा बंधुओं ने भारी कमाई की. एक समय ऐसा भी आया कि उत्तर प्रदेश आने वाले कोयले का 90 प्रतिशत डीओ रूंगटा बंधुओं के नाम हुआ करता था. बाद में इनकी कई स्पंज आयरन फैक्ट्रियां लगीं. इनकी प्रमुख कंपनियों में झारखंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड, आलोक इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, मां छिनमस्तिका सीमेंट एंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड, श्रीदुर्गा सीमेंट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड, बीएफपीएलजेबी कंपनी ओड़ीशा, एमआर रेलकॉन प्राइवेट लिमिटेड गुड़गांव, खेलारी सीमेंट, रूंगटा सीमेंट प्राइवेट लिमिटेड, अनन्दिता सीमेंट प्राइवेट लिमिटेड, अजंता ट्रांसपोर्ट जैसी कई कंपनियां शामिल हैं, जो प्रमुख रूप से झारखंड, ओड़ीशा, छत्तीसगढ़, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हैं.

रूंगटा बंधुओं को झारखंड के उत्तरी धांदू में 32 एकड़ क्षेत्र में ही कोयला खनन की अनुमति मिली थी, लेकिन वे 79 एकड़ के बड़े क्षेत्र में कोयला खोद रहे थे. इसके लिए दस्तावेजों में भी फर्जीवाड़ा किया गया था. कोलेश्वर महतो और ललित कुमार दास के नाम से बने दो सेल-डीड भी फर्जी पाए गए थे. वाराणसी के मुगलसराय स्थित चंदासी अवैध कोयला बाजार का गढ़ है. रूंगटा बंधुओं के कोयला व्यापार का चंदासी बड़ा केंद्र रहा है. इस बाजार में कोयले की कीमत मनमर्जी से तय होती है. कोयले के धंधे से जुड़े लोग कहते हैं कि झरिया या अन्य प्रमुख खदानों से रोजाना करीब डेढ़ हजार ट्रक कोयला चंदासी की कोयला मंडी में पहुंचता है.

चंदासी कोयला मंडी का अपना अलग अर्थशास्त्र है जो रूंगटा बंधु जैसे व्यापारी या माफिया तय करते हैं. कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी द्वारा नंद किशोर रूंगटा का अपहरण किए जाने के पीछे यह अर्थशास्त्र ही मुख्य वजह थी. अब तो हालात यह हैं कि देश के विभिन्न बाजार और कल-कारखानों में चंदासी जैसी अवैध कोयला मंडियों के जरिए ही कोयला पहुंचता है. देशभर के व्यापारी अपने मुंशियों और बिचौलियों के माध्यम से चंदासी मंडी से कोयला खरीदना तय करते हैं.

सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि कोल ब्लॉक के अवैध आवंटन से ही सरकारी खजाने को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा लेकिन कोयला बाजार के विशेषज्ञ बताते हैं कि कोयले के अवैध खनन और अवैध विक्रय से सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान रोजाना पहुंचाया जा रहा है. इसमें रूंगटा बंधुओं जैसे लोगों की भरमार है. इसमें उद्योगपति, नेता, नौकरशाह, दलाल और माफिया सब शामिल हैं.

कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में फायदा उठाने वालों में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, कांग्रेस नेता विजय दरडा और राजेंद्र दरडा, कॉरपोरेट मामलों के पूर्व मंत्री और राजद नेता प्रेमचंद गुप्ता, पूर्व कांग्रेस सांसद और जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के चेयरमैन नवीन जिंदल जैसे तमाम लोग शामिल हैं. घोटाले का फायदा उठाने वाले औद्योगिक घरानों में टाटा समूह, इलेक्ट्रो स्टील, अनिल अग्रवाल समूह, भूषण पावर एंड स्टील, जायसवाल नेको, अभिजीत समूह, आदित्य बिड़ला समूह, एस्सार समूह, अदानी समूह, आर्सेलर मित्तल, लैंको समूह वगैरह शामिल हैं. इन औद्योगिक घरानों के राजनीतिक जुड़ाव कांग्रेस, भाजपा और राजद जैसे राजनीतिक दलों से रहे हैं.

सुप्रीमकोर्ट के आदेश से 1993 के बाद से आवंटित सभी कोयला खदानें गैरकानूनी साबित हो गई हैं. यानी, 1993 से लेकर 2014 तक सत्ता पर जो भी सरकारें काबिज रहीं, वे सब कोयला खदानों के आवंटन के गोरखधंधों में कमोबेश लिप्त रहीं. चाहे वह पीवी नरसिम्हा राव रहे हों या एचडी देवेगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल या अटल बिहारी वाजपेयी. इन सरकारों ने भी अवैध तरीके से कोयला खदानें आवंटित कीं. आर्थिक विशेषज्ञ बताते हैं कि अकेले कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले से जो नुकसान हुआ वह देश के प्रति व्यक्ति के सिर पर नौ हजार रुपये का घाटा थोप गया.

2004 से 2012 के बीच सौ से अधिक कंपनियों ने खदान आवंटन घोटाले का फायदा उठाया. घोटाले से हुए नुकसान की राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 12 प्रतिशत से भी अधिक है. इस घोटाले से 33 अरब टन कोयला गायब हो गया जिससे 50 साल तक देश के लिए बिजली पैदा होती. कोल ब्लॉक घोटाले से निजी क्षेत्र के उपक्रमों ने करीब 4.79 लाख करोड़ का लाभ कमाया तो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने 5.88 लाख करोड़ का लाभ कमाया और बहती गंगा में हाथ धोया.

राजनीतिक-आर्थिक मसलों के तापमान का एहसास रखने वाले विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि सार्वजनिक तौर पर सत्ता पक्ष या विपक्ष कोयला घोटाले के नाम पर फिर से आरोप-प्रत्यारोप का खेल खलेंगे और चुनाव में भुनाएंगे, लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां इस मसले को संसद में बहस के लिए नहीं ले जाएंगी. क्योंकि कोयला घोटाले से कांग्रेस की शर्ट पूरी मैली है तो भाजपा की शर्ट भी सफेदी की झनकार वाली नहीं है.

कोयला खदानों के आवंटन में करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये और टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन में 1.76 लाख करोड़ रुपये गटक लिए गए. इसमें से ज्यादा रकम पूंजीपतियों के पास गई और उसके बाद नेताओं नौकरशाहों और दलालों ने खा लिए. घोटालों का यही राम नाम सत्य है. आम लोगों के बीच यह सवाल आम बातचीत के बीच उछलता रहता है कि कोयला या किसी अन्य घोटाले की राशि सरकार बचा ही लेती तो इससे आम आदमी को क्या मिल जाता?

क्या वह पैसा आम आदमी की जिंदगी सुधारने पर खर्च होता? क्या वह इसे मजदूरों पर या किसानों को आत्महत्या की स्थिति आने से रोकने पर खर्च करती? क्या इस धन से वह सरकारी स्कूल और अस्पताल खोलती? क्या इससे वह सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बेहतर बनाती? इन सवालों का जवाब नकारात्मक शब्दों से ही सुनाई पड़ता है.

फिर दूसरे फार्मूले से लूटने की तैयारी

यूपीए सरकार के कार्यकाल में कोयला खदानें बिना नीलामी के दे दी गईं. इस तरह रेबड़ी बांट देने से सरकारी खजाने को लाखों करोड़ों का नुकसान हुआ. अब एनडीए की सरकार कोयला खदानों की बाकायदा नीलामी तो कर रही है, लेकिन पूंजीपति और औद्योगिक घरानों से साठगांठ कर उन्हें उनकी पसंदीदा खदानें दी जा रही हैं. इससे केंद्र सरकार और संबद्ध राज्य सरकारों के खजाने में भी धन जाएगा और नेताओं, नौकरशाहों और दलालों की जेब भी भरेगी.

एक तरह से देखें तो कोयले से कमाई का भौंडा (कांग्रेसी) तरीका अपनाने के बजाय चालू (भाजपाई) जुगाड़ निकाला गया है. लेकिन लुटेरे पूंजीपतियों का घेरा बदला नहीं है. यूपीए के शासनकाल में उन्होंने जिस तरह कोयले से खरबों रुपये कमाए, अब उसी तरह एनडीए सरकार को भी घेरे में लेकर अरबों रुपये कमाने की पेशबंदियां हो रही हैं.

आपको मालूम ही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सारे आवंटन रद्द कर दिए जाने के बाद अब दोबारा उन कोयला खदानों की नीलामी शुरू हो गई है. कोयला खदानों के आवंटन से लाखों करोड़ रुपये मिलने की बात सही है. कई खदानों की नीलामी सफलतापूर्वक हो भी चुकी है. सरकारी खजानों को खासा धन मिल भी रहा है. लेकिन कमाई के जुगाड़ भी काम कर रहे हैं. कई खदानों की नीलामी में ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिसमें कंपनियों और अधिकारियों की मिलीभगत से कोयला खदानों का आवंटन किया गया है.

90 हजार करोड़ के कर्ज में डूबे जेपी समूह और इन्वेस्टर्स समिट में 50 हजार करोड़ रुपये का निवेश करने की घोषणा के बावजूद निवेश नहीं करने वाले रिलायंस समूह का नायाब उदाहरण सामने है जो मध्यप्रदेश की धरती पर अब आधिकारिक रूप से कोयला खोदेंगे. इन दोनों पूंजीपति घरानों और कुछ अन्य विवादी कारोबारियों को मध्य प्रदेश के कोल ब्लॉक मिल गए हैं. रिलायंस ने हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (एचजेडएल) और ओसीएल आयरन एंड स्टील को पटखनी देकर कोल ब्लॉक हासिल किया है. रिलायंस को जो कोल ब्लॉक मिला है उसमें 2.93 करोड़ टन का भंडार है.

जेपी सीमेंट कॉरपोरेशन को भी मध्य प्रदेश में अमलिया नॉर्थ और मंडला साउथ की कोयला खदानें मिली हैं. इसी तरह देशभर की 214 कोयला खदानों की 30 वर्ष के लिए ई-नीलामी हो रही है. अभी ही जिस तरह की अनियमितताएं और विसंगतियां सामने आ रही हैं उससे लगता है कि कोल ब्लॉक आवंटन पर फिर से कानूनी आफत गिरेगी. मौजूदा सत्ता गलियारे के अधिकारी बताते हैं कि कोयला मंत्रालय के अधिकारियों से साठगांठ कर कारोबारी घरानों ने अपनी पसंद के कोल ब्लॉक आपस में बांट लिए हैं. नीलामी प्रक्रिया में भी जुगाड़ सेट कर लिए गए हैं. सामंजस्य और सुविधा से कोल ब्लॉक की नीलामी की बोलियां लग रही हैं.

केंद्र सरकार का कहना है कि नीलामी से आने वाले राजस्व का फायदा या तो राज्यों को मिलेगा या फिर सस्ती बिजली की दर के रूप में भारत की जनता को मिलेगा. 31 मई 2016 तक देश के 83 कोल ब्लॉकों के आवंटन का कोयला मंत्रालय का लक्ष्य है. इनमें से 40 ब्लॉकों की नीलामी होगी और 43 ब्लॉकों का आवंटन होगा. 83 ब्लॉकों में से 56 ब्लॉक ऊर्जा सेक्टर के लिए रखे गए हैं, जबकि शेष ब्लॉक लोहा-इस्पात और सीमेंट जैसे उद्योगों के लिए मिलेंगे.

कोयला खदानों के लिए जेपी, रिलायंस के अलावा भाजपा से जुड़ा अडानी समूह, एस्सार, जीएमआर, वेदांत, जिंदल, आदित्य बिड़ला ग्रुप समेत कई ऐसी कंपनियां लगी हुई हैं जो कांग्रेस के शासनकाल में भी कोयला लूट चुकी हैं. सूत्र बताते हैं कि भाजपा के शासनकाल में नीलामी के जरिए कोल ब्लॉक आवंटित तो हो रहे हैं, लेकिन उसमें नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) की आपत्तियों को नजरअंदाज किया जा रहा है.

छत्तीसगढ़ में जिन कोल ब्लॉकों पर एनजीटी ने आपत्ति दर्ज कर रखी है, उनकी नीलामी के लिए 10 फीसदी रकम जमा कराई जा चुकी है. कोल ब्लॉकों के आवंटन में अब राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं रह गई है. पहले कोल ब्लॉक देने की सिफारिश राज्य सरकारों की तरफ से आती थी. अब हर राज्य को उसकी जरूरत के मुताबिक ही कोयला मिलेगा. कोल रॉयल्टी मिलने से कोयला उत्पादक राज्यों को फायदा मिलने का रास्ता मोदी सरकार साफ कर चुकी है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रद्द किए गए कोल ब्लॉकों की खुली ई-नीलामी करने के फैसले के बारे में सरकार पहले ही कह चुकी है कि जो भी राशि प्राप्त होगी, वह पूरी तरह से राज्यों को जाएगी.

वो कौन थे जिनकी फाइलें गायब हो गईं!

कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी 147 फाइलों के गायब होने का मसला सीबीआई की छानबीन में भी सुलझ नहीं पाया है. सवाल है कि वो कौन प्रभावशाली लोग हैं जिनसे जुड़ी फाइलें गायब कर दी गईं! लोग यह कयास ही लगाते रह गए कि उन फाइलों से कांग्रेस के प्रभावशाली नेता या कांग्रेस से जुड़े प्रभावशाली उद्योगपति घराने का ताल्लुक होगा, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया. गायब फाइलों में से 45 फाइलें उन कंपनियों की हैं जिन्होंने कोयला खदान पाने के लिए 1993 से 2005 के बीच आवेदन किया था. इनमें कांग्रेस सांसद विजय दरडा की कंपनी की  कुछ फाइलें भी शामिल हैं.

कांग्रेस और राजद के नेताओं ने भी खूब लूटा

जेआर पावर जेन प्राइवेट लिमिटेड ने ओड़ीशा में कोल ब्लॉक का आवंटन हासिल किया था. यह कंपनी यूपीए सरकार में सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री रहे एस जगतरक्षकन की है. इस कंपनी ने पुडुचेरी इंडस्ट्रियल प्रमोशन डेवलपमेंट एंड इन्वेस्टमेंट (पीआईपीडीआईसी) के साथ साझेदारी का करार किया और पांच ही दिन बाद पीआईपीडीआईसी को भी कोल ब्लॉक आवंटित हो गया.

कोल ब्लॉक उसी कंपनी को मिलना चाहिए था जिसे तापीय विद्युत (थर्मल पावर), लोहा एवं इस्पात या सीमेंट उद्योग में विशेषज्ञता हो, लेकिन केंद्रीय मंत्री की इस कंपनी को ऐसा कुछ भी हासिल नहीं था. मंत्री की इस कंपनी ने वर्ष 2010 में केएसके इनर्जी वेंचर्स को अपने 51 प्रतिशत शेयर बेच डाले. इस तरह धूर्तता करके जेआर पावर को मिला कोल ब्लॉक केएसके पावर को मिल गया. इसी तरह यूपीए सरकार में मंत्री रहे सुबोधकांत सहाय ने अपनी कंपनी एसकेएस इस्पात एंड पावर को कोल ब्लॉक देने के लिए पांच फरवरी 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा था.

अगले ही दिन पीएमओ से एक पत्र कोयला सचिव को चला गया जिसमें सूचित किया गया कि एसकेएस इस्पात को कोल ब्लॉक आवंटित कर दिया गया है. सुबोधकांत सहाय के भाई सुधीर सहाय कंपनी के कार्यकारी निदेशक हैं. वर्ष 2012 में अंतर-मंत्रिपरिषदीय समूह (आईएमजी) की अध्यक्ष जोहरा चटर्जी ने एसकेएस इस्पात को दिए गए कोल ब्लॉक को रद्द करने की सिफारिश की थी.

इसी तरह कांग्रेस सांसद विजय दरडा और महाराष्ट्र सरकार में शिक्षा मंत्री रहे उनके भाई राजेंद्र दरडा ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए अपनी तीन कंपनियों जेएलडी यवतमाल इनर्जी, जेएएस इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड पावर लिमिटेड और एएमआर आयरन एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड के लिए अवैध तरीके से कोल ब्लॉक का आवंटन करा लिया था. राज्यसभा सांसद विजय दरडा और उनके भाई व महाराष्ट्र के स्कूली शिक्षा मंत्री राजेंद्र दरडा पर 25,000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है. दरडा परिवार को कई कंपनियों के जरिए कोयले की कुल नौ खदानें आवंटित की गईं थीं.

ये वो कंपनियां हैं, जिनमें दरडा परिवार और जायसवाल समूह की भागीदारी थी. जायसवाल समूह के मालिक पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के रिश्तेदार हैं. आवंटन की प्रक्रिया में जालसाजी की गई और फर्जी कंपनियों का सहारा लिया गया. दरडा और जायसवाल जेएलडी यवतमाल एनर्जी, जेएएस इंफ्रास्ट्रक्चर, अभिजीत इंफ्रास्ट्रक्चर, जायसवाल नेको लिमिटेड जैसी कई कंपनियों में भागीदार हैं.

विजय दरडा उनके भाई राजेंद्र दरडा और बेटे देवेंद्र विजय दरडा जायसवाल-अभिजीत-दादरा समूह की कई कंपनियों के निदेशक और शेयरधारक भी हैं, लेकिन कोयला घोटाले के सामने आते ही दरडा ने इन कंपनियों से अपनी भागीदारी खत्म कर ली. जेएलडी कंपनी में ही अकेले दरडा और जायसवाल के पास कुल 60 फीसदी शेयर थे.

कंपनी को छत्तीसगढ़ और फतेहपुर (पूर्व) की कोयला खदानें आवंटित की गई थीं, जिसमें करीब 10,000 करोड़ कीमत का कोयला भंडार था. राष्ट्रीय जनता दल के नेता और यूपीए सरकार में मंत्री रहे प्रेमचंद गुप्ता केबेटों मयूर गुप्ता और गौरव गुप्ता की कंपनी आईएसटी स्टील एंड पावर और सीमेंट कंपनी गुजरात अम्बुजा को महाराष्ट्र के दहीगांव और मकरधोकरा में कोल ब्लॉक दे दिए गए थे. गुजरात अम्बुजा और लाफार्ज कंपनियों ने आवंटित क्षेत्र से कहीं अधिक विस्तृत क्षेत्र पर कब्जा जमा रखा है और कोयले का अंधाधुंध अवैध खनन हो रहा है.

कांग्रेस के पूर्व सांसद नवीन जिंदल की कंपनी जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड की सत्ता शक्ति इतनी थी कि उसने 15 सौ मिलियन मीट्रिक टन कोयला के खनन का अधिकार हासिल किया, जबकि वह अधिकार सरकारी उपक्रम कोल इंडिया लिमिटेड को नहीं मिल पाया. जिंदल की कंपनी को तालचेर कोल फील्ड के अंगुल क्षेत्र में कोयला खनन का अधिकार मिला था. इसके अलावा झारखंड के अमरकोंडा मुर्गदंगल में जिंदल स्टील को अवैध तरीके से मिले कोल ब्लॉक की छानबीन निर्णायक दौर में है.

खदानों को निजी हाथों में सौंपने का कांग्रेसी-भाजपाई कुचक्र

70 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कोयला खनन को पूंजीपतियों से छीन कर सरकार के हाथ में दे दिया था. उस समय सीएमएन अधिनियम लागू किया गया था. 1972 में कोकिंग कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया गया. फिर 1973 में गैर कोकिंग कोयला खदानों का भी राष्ट्रीयकरण हुआ. कोयला खदान राष्ट्रीयकरण अधिनियम (सीएमएन) 1976 में लागू हुआ. इस अधिनियम के तहत लोहा और इस्पात का उत्पादन करने वाले पूंजीपतियों को छोड़कर अन्य सभी पूंजीपतियों के कोल लीज रद्द कर दिए गए.

पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में यानी वर्ष 1992 से कोयला खनन के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई. कोल इंडिया और सिंगरेनी के 143 कोल ब्लॉक पूंजीपतियों को सौंप दिए गए. फिर कोयला खनन में लोहा और इस्पात के अलावा बिजली उत्पादन करने वाले घरानों को भी शामिल कर अधिनियम में 1993 में संशोधन किया गया. राव के बाद प्रधानमंत्री बने एचडी देवेगौड़ा ने मार्च 1996 में इसमें सीमेंट घरानों को भी शामिल कर दिया. मनमोहन सिंह सरकार ने जुलाई 2007 में इसमें कोयला गैस उत्पादन और कोयला तरलीकरण को भी जोड़ दिया.

कांग्रेस सरकार ने फरवरी 2006 में कोयला खनन में शत-प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष पूंजीनिवेश की इजाजत दे दी. मनमोहन सिंह सरकार ने वर्ष 2010 में एमएमडीआर अधिनियम में संशोधन किया कि सभी खनिजों के खनन के लिए कोई भी बोली लगा सकेगा. इस तरह कांग्रेस सरकार ने कोयला खनन के निजीकरण का सारा आधार मजबूत कर दिया और अब भाजपा इसका फायदा उठा रही है. इस समय कोयला क्षेत्र का निजीकरण दो जुगाड़ों से हो रहा है. कोल इंडिया के शेयर बड़े पूंजीपतियों को बेचे जा रहे हैं. हालही कोल इंडिया के और शेयर बिके हैं.

दूसरी तरफ निजी क्षेत्र की कंपनियों को अपने इस्तेमाल के लिए कोयला खोदने की इजाजत दी जा रही है. 2014 में नया कानून बन जाने से निजी कंपनियों को आवंटित खदान का कोयला अपने लिए इस्तेमाल करने और किसी अन्य को बेचने की इजाजत मिल गई है. पेट्रोलियम और गैस क्षेत्र को पहले ही बड़े पूंजीपतियों के धन कमाने के लिए निर्बाध रूप से खोला जा चुका है. अब वही कृत्य कोयला क्षेत्र में किया जा रहा है. इससे आने वाले दिनों में कोयले की कीमतें बढ़ेंगी. इससे बिजली की कीमतें बढ़ेंगी. फिर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें खुद ब खुद बढ़ जाएंगी.

जिंदगी देकर अवैध खदानों से खोद रहे काला सोना

अब यह जगजाहिर है कि अवैध खनन पर अंकुश का प्रभावी उपाय नहीं होने या कारगर नीति नहीं होने के कारण भारी मात्रा में अवैध कोयला बाजार में पहुंच रहा है जिससे देश की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. देश की परित्यक्त और बंद पड़ी खदानों से हर साल 35 से 40 मिलियन टन कोयला खोदा जाता है. कई खदानें तो राष्ट्रीयकरण के पहले से बंद पड़ी हैं, लेकिन उन खदानों से भी चोरी-चोरी खुदाई जारी है. अधिकतर अवैध खनन परित्यक्त और बंद पड़ी खदानों से ही किया जाता है और इन खदानों में हर साल बड़ी संख्या में मजदूर मरते हैं.

मजदूरों की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है. अधिकांश मौतों के बारे में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती. अवैध खनन में लगे गरीब मजदूर परित्यक्त या बंद खदानों में सुरंग बनाकर कोयले की खुदाई करते हैं. जो भी कोयला निकलता है उसे स्थानीय डीलरों को बेच दिया जाता है. डीलरों के जरिए वही अवैध कोयला अवैध मंडियों तक
पहुंचता है.

ये कंपनियां खोलती हैं यूपीए-एनडीए का असली चेहरा

  • पुष्प स्टील और माइनिंग कंपनी : 20 जुलाई 2010 को दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस कंपनी का गठन 2 जून 2004 को हुआ और इसी दिन उसने दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर कांकेर में कच्चे लोहे की खदान पाने के लिए आवेदन भी कर दिया. पुष्प स्टील को मध्य प्रदेश सरकार ने 2007 में 550 लाख टन कोयले वाला ब्रह्मपुरी ब्लॉक दे दिया. उस समय भी छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दोनों जगह भाजपा की सरकार थी. ऐसी कंपनी जिसे खनन के काम का कोई अनुभव नहीं था.
  • धारीवाल ग्रुप : गुटखा बनाने वाली कंपनी धारीवाल ग्रुप को भी कोल ब्लॉक मिल गया. धारीवाल इंफ्रा नाम की कंपनी ने स्पंज आयरन प्लांट लगाने के लिए जमीन खरीदी और इसी आधार पर उसे 22 नवंबर 2008 को गोड़खरी कोयला ब्लॉक दे दिया गया. 240 लाख टन का कोल ब्लॉक प्राप्त करने वाली धारीवाल इंफ्रा सात महीने में ही बिक गई. गोयनका ग्रुप की कंपनी सीईएससी ने इसे करीब 300 करोड़ रुपये में खरीद लिया और कोयला खदानें हथिया लीं.
  • नवभारत ग्रुप : विस्फोटक बनाने वाली कंपनी को 13 जनवरी 2006 को स्पंज आयरन प्लांट लगाने के लिए मदनपुर नॉर्थ कोयला खदान दे दी गई. खुद का प्लांट न होने की वजह से नवभारत ने सहयोगी कंपनी के प्लांट के आधार पर आवेदन किया था. बाद में उसने अपनी कंपनी बेच डाली. इस तरह तीन करोड़ 60 लाख टन कोयले का ब्लॉक भी नई कंपनी को मिल गया.
  • फील्ड माइनिंग एंड इस्पात लिमिटेड : इस कंपनी को 8 अक्टूबर 2003 को दो कोयला खदानें चिनोरा और वरोरा वेस्ट दी गईं. दोनों खदानों को मिलाकर कोयला उत्पादन की कुल क्षमता 380 लाख टन थी. कंपनी ने पांच साल यानी 2008 तक खदान का काम शुरू नहीं किया. आखिरकार 2010 में फील्ड माइनिंग एंड इस्पात लिमिटेड को केएसके इनर्जी वेंचर्स ने खरीद लिया. ओड़ीशा में कोल ब्लॉक का आवंटन हासिल करने वाले तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री एस जगतरक्षकन की कंपनी जेआर पावर जेन प्राइवेट लिमिटेड ने भी ऐसी ही हरकत की थी और वर्ष 2010 में केएसके इनर्जी वेंचर्स को अपने 51 प्रतिशत शेयर बेच डाले थे. इस तरह मंत्री ने अपने प्रभाव से हासिल किया कोल ब्लॉक केएसके के हाथों बेच डाला.
  • बीएस इस्पात : इस कंपनी को 25 अप्रैल 2001 को ही विदर्भ की मरकी मंगली कोयला खदान दी गई थी. उनके पास 60 हजार टन का स्पंज आयरन प्लांट था, लेकिन उसे 343 लाख टन कोयले वाली खदान दे दी गई. कंपनी आठ साल तक बैठी रही. 2010 में कंपनी बिक गई और कोल ब्लॉक दूसरे के हाथ चला गया.
  • गोंडवाना इस्पात : इस कंपनी को भी 2003 में माजरा कोल ब्लॉक आवंटित किया गया था. इसके प्लांट की क्षमता 1 लाख 20 हजार टन कोयले की थी लेकिन उसे 15 लाख टन कोयले वाली खदान दे दी गई. यानि 100 साल तक का काम एक झटके में हो गया. 2008 में गोंडवाना इस्पात का बीएस इस्पात में विलय हो गया और बीएस इस्पात को गरिमा बिल्डकॉर्प ने खरीद लिया और फिर 2011 में उसे उड़ीसा सीमेंट लिमिटेड ने खरीद लिया. इस तरह साजिश करके इतनी बेशकीमती खदान दूसरे के हाथ में दे दी गई.
  • वीरांगना स्टील कंपनी : 2005 में मरकी मंगली नंबर 2,3,4 खदानें इस कंपनी को दी गई थीं. इनके पास पुराना 60 हजार टन का स्टील प्लांट था, उसके लिए जो खदानें दी गईं उनकी क्षमता 190 लाख टन थी. कंपनी ने पांच साल तक खनन शुरू नहीं किया. 2010 में कंपनी का नाम बदल कर टॉपवर्थ हो गया. इसके बाद क्रेस्ट नाम की कंपनी ने उसे खरीद लिया. जाहिर है नागपुर की इस छोटी सी कंपनी की बोली इसलिए लगी क्योंकि इसके पास बड़े कोल
    ब्लॉक थे.
  • वैद्यनाथ आयुर्वेद : आयुर्वेद उत्पाद बनाने वाली कंपनी वैद्यनाथ आयुर्वेद को भी 27 नवंबर 2003 में कोल ब्लॉक दिया गया. 2010 तक यह भी खनन शुरू नहीं कर पाई. 2011 में आखिरकार स्क्रीनिंग कमेटी ने वैद्यनाथ को दिया गया कोल ब्लॉक रद्द कर दिया. उक्त आठ में से तीन मामले ऐसे हैं जब केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) की सरकार थी. इसमें से दो मामले विदर्भ के उस समय के हैं जब महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी. यानी राज्य में कांग्रेस की सरकार और केंद्र में भाजपा की सरकार. ठीक वैसे ही जैसे 2004 के बाद केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा की सरकारें.
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