कहते हैं देश की खुशहाली का रास्ता गांवों से होकर गुजरता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से सांसद आदर्श ग्राम योजना का ऐलान किया था और पुरजोर प्रचार किया था कि यह महत्वाकांक्षी योजना भारत में ग्राम विकास का नया मॉडल लेकर सामने आएगी. प्रधानमंत्री ने कहा था कि हर एक सांसद प्रतिवर्ष अपने संसदीय क्षेत्र के एक गांव को गोद ले और उसे विकसित करने का काम करे. खुद प्रधानमंत्री ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को गोद लिया था. सांसद आदर्श ग्राम के तहत अन्य सांसदों ने भी अपने-अपने संसदीय क्षेत्र के गांवों को गोद लिया था.

तब लोगों को उम्मीद जगी थी कि कुछ गांवों के तो भाग्य फिरेंगे! लेकिन उन उम्मीदों पर ही पानी फिर गया. सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ के सांसद योजना से जुड़ी विसंगतियों और व्यावहारिक रुकावटों को रेखांकित करते हैं. सांसदों का कहना है कि आदर्श ग्राम योजना को लेकर अलग से कोई धन का प्रावधान नहीं किया गया. सांसदों से ही अपेक्षा की गई कि वे अपने संसदीय क्षेत्र विकास निधि का उपयोग करें. सरकार कहती है सांसदों को निधि क्यों मिलती है! सांसदों को निधि विकास के लिए ही मिलती है, फिर अलग से और धन की आकांक्षा का क्या मतलब है! सरकार का भी कहना जायज है. सांसद निधि में भीषण कमीशनखोरी का पुराना स्वाद सांसद भूल नहीं पा रहे. इस वजह से सांसद आदर्श ग्राम योजना को सांसद ही फेल साबित करने पर लगे हैं.

पीएम का गोद लिया गांव, विकास के थोड़े-बहुत पड़े पांव
26 मई 2017 को केंद्र सरकार के तीन साल पूरे हो गए. सरकार चौथे वर्ष के कार्यकाल में प्रवेश कर चुकी है. केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद ‘चौथी दुनिया’ ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के कुछ जनपदों में ‘सांसद आदर्श गांव’ का सच जानने का प्रयास किया. विकास के कुछ काम छोड़ कर गांवों की वही रोनी सूरत, उपेक्षा और बदहाली नजर आई. आश्चर्य की बात यह है कि पूर्वांचल से केंद्र सरकार में तीन मंत्री हैं, बावजूद इसके इनके द्वारा गोद लिए हुए गांवों में दूर से ही बदहाली पसरी हुई दिखती है. सांसदों के दावे चाहे जो भी हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. सांसदों द्वारा गोद लिए हुए गांवों में ग्रामीणों की दशा जैसी कल थी वैसी ही आज है. सवाल है कि आखिर विकास किसका हुआ और सांसद आदर्श गांव का क्या औचित्य रह गया?

अन्य गांवों की तो बात ही छोड़ दें, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में उनके द्वारा गोद लिए हुए गांव जयापुर और नागेपुर का हाल भी फटेहाल है. चौथे वर्ष में सांसदों को चौथा गांव गोद लेना चाहिए था. लेकिन पहले गोद लिए हुए गांव का ही विकास नहीं हुआ, तो दूसरे गांव को गोद लेने का क्या मतलब! अंदाजा लगाया जा सकता है कि सांसद आदर्श ग्राम के तहत प्रतिवर्ष एक गांव को गोद लेकर उसका समुचित विकास करने के प्रति हमारे सांसद कितने संजीदा हैं और केंद्र सरकार कितनी सजग है.

पूर्वांचल के सांसदों द्वारा गोद लिए हुए कई आदर्श गांवों में विकास की किरण तक नहीं पहुंच पाई है. गांव के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. अधिकांश बस्तियों में पहुंचने के लिए सुलभ मार्ग का अभाव बना हुआ है. इस भीषण गर्मी में ग्रामीणों के समक्ष पेयजल का संकट कायम है. समय-समय पर अपने गोद लिए गांवों के विकास के लिए सांसदों की पहल पर अधिकारी जगते भी हैं, तो यह दिखावटी ही होता है. सारा विकास कागज पर हो जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि प्रधानमंत्री को खुद आकर गांवों का हाल देखना चाहिए, ताकि सच का पर्दाफाश हो सके.

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के तहत
सेवापुरी विधानसभा का जयापुर और नागेपुर गांव प्रधानमंत्री द्वारा गोद लेने के कारण सुर्खियों में आया था. इलाहाबाद-वाराणसी नेशनल हाइवे पर स्थित इस गांव में विकास के कदम तो जरूर उतरे, पर बहक गए. जयापुर गांव में विकास का कुछ काम हुआ भी, लेकिन नागेपुर की तो हालत और खराब ही हो गई. सेवापुरी विधानसभा क्षेत्र से चुने गए अपना दल (एस) के विधायक और अपना दल विधान मंडल दल के नेता नीलरतन पटेल नीलू कहते हैं कि यह उनका सौभाग्य है कि उनका विधानसभा क्षेत्र प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में आता है. साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा गोद लिए हुए दोनों गांव भी उनके विधानसभा क्षेत्र में आते हैं. इसके बावजूद इन गांवों का विकास क्यों नहीं हुआ? इस पर पटेल राजनीतिक बयान देते हैं, कहते हैं कि किसी भी भेदभाव और दलगत भावना से उठकर गांव का विकास करना होगा. जो कार्य अधूरे हैं, उन्हें सर्वप्रथम पूरा किया जाएगा. जहां कोई काम ही नहीं हुआ है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया जाएगा. केंद्र सरकार के तीन साल बाद नेता के ये बोल कितने मोल के हैं, यह समझा जा सकता है.

ददरी गांव में अनुप्रिया का दांव, मस्त का गांव पस्त
मीरजापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल केंद्रीय परिवार कल्याण राज्यमंत्री हैं. उन्होंने जिले के अति पिछड़े पहाड़ी क्षेत्र हलिया विकास खंड के ददरी गांव को गोद लिया था. उस समयगांव में गाजे-बाजे के साथ सांसद का स्वागत किया गया था. तब विकास का लम्बा चौड़ा खाका खींचा गया था. बाहर की टीम भी आकर इस गांव का निरीक्षण कर गई थी. बड़ा भौकाल खड़ा किया गया था. लोगों को लगा था कि इस गांव का तो कायाकल्प ही हो जाएगा. लेकिन ददरीगांव आज भी वैसा ही बदहाल है. गांव के लोगों को पेयजल, बिजली, नाली, सड़क के लिए अभी भी तरसना पड़ रहा है. गांव के विकास की योजनाएं फाइलों में दम तोड़ रही हैं. ददरी का विकास तो हुआ नहीं, सांसद ने दूसरे गांव बगही (चुनार विधानसभा के तहत) को भी गोद ले लिया. अब गांव के लोग सांसदों के गोद लेने की बात से ही भागते हैं.

भदोही जिले के सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त के गोद लिए गांव कौलापुर की बदहाली भी किसी से छुपी हुई नहीं है. लोग अब सांसद को कोसते नजर आ रहे हैं. जौनपुर शहर के सांसद केपी सिंह ने सुईथाकला विकास खंड के बुढ़ूपुर गांव को और जौनपुर की ही मछलीशहर सीट से सांसद रामचरित्तर निषाद ने धर्मापुर ब्लॉक के आरा गांव को जब गोद लिया था, तब इन गांवों में मिठाइयां बंटी थीं, पटाखे दागे गए थे. लेकिन कुछ नहीं हुआ. इन गांवों के लोग आज भी पुराने दिनों की ही तरह समस्याओं से जूझ रहे हैं. मछलीशहर के सांसद रामचरित्तर के दूसरे गोद लिए हुए केराकत विकास खंड के सरौनी पूरब पट्टी गांव की दशा आरा गांव से और बदतर है.

केराकत क्षेत्र के लोग सांसद के क्रियाकलापों से नाराज हैं. सांसद की बदजुबानी भी लोगों को नागवार गुजर रही है. सांसद का सारा ध्यान सिर्फ मछलीशहर पर रहता है, जिससे केराकत क्षेत्र के मतदाता खासे नाराज हैं. प्रतापगढ़ सांसद हरिवंश सिंह ने लालगंज तहसील क्षेत्र के शाहबरी गांव को गोद लिया था. यह गांव भी विकास के नाम पर शून्य है. यही कारण है कि पिछले दिनों सांसद को ग्रामीणों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ा. बलिया सांसद भरत सिंह के गोद लिए गांव ओझवालिया, सलेमपुर सांसद नरेंद्र कुशवाहा के गोद लिए गांव टुसौरा, इलाहाबाद सांसद श्यामाचरण गुप्त के गांव बैदावार, फूलपुर सांसद केशव प्रसाद मौर्या के गोद लिए गांव जैतवार डीह, मऊ सांसद दारा सिंह चौहान, सोनभद्र सांसद छोटेलाल खरवार, चंदौली सांसद महेंद्र पांडेय, गाजीपुर सांसद मनोज सिन्हा के गोद लिए हुए गांवों की भी दशा एक जैसी ही है. कुछ सांसद तो गांव को गोद लेने के बाद झांकना तक भूल गए तो कुछ के विकास कार्य कमीशनखोर चाट गए.

लावारिस हैं केंद्रीय मंत्री व उपमुख्यमंत्री के गोद लिए गांव
सांसदों की तो बात छोड़िए, केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री द्वारा गोद लिए गए गांव भी अगर लावारिस जैसी हालत में हैं, तो अफसोस दोगुना हो जाता है. इलाहाबाद के फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे केशव प्रसाद मौर्या, जो अभी उत्तर प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं, ने सांसद के बतौर जैतवार डीह को गोद लिया था. जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर सोरांव विकास खंड का यह गांव भगवान शंकर के मंदिर के लिए मशहूर है. मलिमास में यहां के मेले में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. इस गांव की हालत में आज तक कोई सुधार नहीं हो पाया है. मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने पर लोगों को भरोसा हुआ था कि गांव के दिन बहुरेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं देखने को मिल रहा. अब बात करें गाजीपुर के सांसद और रेल राज्य मंत्री एवं संचार मंत्री स्वतंत्र प्रभार मनोज सिन्हा और चंदौली के सांसद व मानव संसाधान विकास राज्य मंत्री की, तो इनके द्वारा गोद लिए हुए गांव भी उन्हीं बदहाल गांवों की फेहरिस्त में शुमार हैं, जिन्हें सांसदों ने गोद लिया और लावारिस बना दिया.

अनुप्रिया को प्रिय हैं ब्लैक-लिस्टेड संस्थाएं
केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद अब अगला लक्ष्य 2019 दिखलाई दे रहा है, लेकिन जनता तीन साल में नाकारा साबित हुए सांसदों के औचित्य पर सवाल उठा रही है. तीन वर्षों में काम तो हुआ नहीं, दावे खूब हुए. तीन साल के कार्यकाल के दौरान विकास कार्यों और योजनाओं के क्रियान्वयन में जमकर ‘खेल’ हुआ. मीरजापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल ने तो कायदे-कानून को ताक पर रख अपने संसदीय क्षेत्र की कार्यदायी संस्था को नकारते हुए गैर जनपद की संस्था को अपनी सांसद निधि का काम सौंप दिया. उन्होंने एक ब्लैक लिस्टेड संस्था को भी काम देने से परहेज नहीं किया. इसका खुलासा आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में हुआ है. अनुप्रिया ने ब्लैक लिस्टेड संस्था राजकीय निर्माण निगम, पैक्सफेड को सांसद निधि का काम दिया. नक्सल क्षेत्र राजगढ़ और पटेहरा विकास खंडों में बनवाई गई सड़कों और विभिन्न मार्गों के निर्माण में भी जमकर बंदरबांट किया गया. खास बात यह है कि महज एक व्यक्ति के लिए सड़क बनवाई गई और कागज पर उसे बरसात में बहा भी दिया गया.

आदर्श ग्राम योजना में आदर्शहीन सियासत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद प्रत्येक सांसद को एक गांव गोद लेने तथा 2016 तक उस गांव को आदर्श गांव में विकसित करने का लक्ष्य बनाया था. प्रधानमंत्री मोदी की यह योजना उनकी कई अन्य महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक है, लेकिन इस योजना के मार्गदर्शक मंडल को मार्गदर्शन की आवश्यकता है. यह तीन साल पूरा होने के बाद भी सरकार को समझ में नहीं आया. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सांसद आदर्श ग्राम योजना देश के गांवों के विकास और उनमें मूलभूत सुविधाओं को विकसित करने की एक महत्वपूर्ण योजना थी.

इस योजना के तहत सभी सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र से प्रत्येक वर्ष पांच गांवों का चयन कर, उन्हें आदर्श गांवों में विकसित करने का लक्ष्य था. इस योजना के लिए वही गांव चुना जाना था, जहां मूलभूत सुविधाओं की कमी हो और उसकी आबादी तीन से पांच हजार हो. इसके अलावा ऐसे गांव में न्याय पंचायत का होना अनिवार्य हो. लेकिन हुआ यह कि कुछ सांसदों को छोड़ कर अन्य किसी ने भी गांवों के विकास में कोई रुचि नहीं दिखाई. ग्रामीण विकास मंत्रालय का एक दस्तावेज ऐसा भी सामने आया जिसके मुताबिक देश के 112 सांसदों ने कोई गांव चुना ही नहीं और जिन सांसदों ने चुना भी, वहां कुछ नहीं हुआ.

विडंबना यह है कि उत्तर प्रदेश से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा मुलायम सिंह यादव, मायावती (राज्यसभा सांसद), सोनिया गांधी, मुरली मनोहर जोशी जैसे कद्दावर लोग यूपी से सांसद हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए जयापुर गांव (वाराणसी) में थोड़ा बहुत जो काम हुआ, उसे छोड़कर कहीं पर किसी भी सांसद द्वारा आदर्श ग्राम में कोई काम नहीं कराया गया. मुरली मनोहर जोशी के आदर्श ग्राम सिंहपुर की हालत तो काफी खराब है. गांव में जगह-जगह जलभराव की समस्या है. गांव में गंदगी और सड़ांध भी अत्यधिक है.

राजनाथ सिंह के आदर्श गांव बैंती में सिर्फ ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स की एक शाखा खुलने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं हुआ. सपा अभिभावक मुलायम सिंह यादव के गोद लिए गांव तमौली में भी विकास कार्यों की कोई शिनाख्त नहीं मिल रही. समाजवादी सरकार के अभिभावक द्वारा गोद लिए हुए गांव की हकीकत उनके विकास के नारे का खंडन करती है. इस मामले में बसपा नेता मायावती अधिक बुद्धिमान साबित हुईं. उन्होंने मलिहाबाद के उस माल गांव को गोद लिया, जो राजधानी लखनऊ के करीब होने और आम-पट्टी होने के कारण पहले से ही ठीक-ठाक स्थिति में है.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के गांव उद्वा में विकास का हाल दूसरे बदहाल गांवों जैसा ही है. लब्बोलुबाव यह है कि सांसद आदर्श ग्राम योजना भले ही प्रधानमंत्री मोदी की दूरगामी योजनाओं में से एक हैं, लेकिन उसे क्रियान्वित करने में केंद्र सरकार नाकाम रही है. आदर्श ग्रामों की हालत यह बता रही है कि जनता से सांसदों (जन प्रतिनिधियों) का कोई जुड़ाव नहीं है. कई सांसदों ने काम न होने का कारण सांसद निधि का कम होना बताया तो कोई सांसद एक खास गांव चुनकर अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहता. आदर्श ग्राम के नाम पर भी सस्ती सियासत पीछा नहीं छोड़ रही.

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