देश की संसद ठप है. कौन जांच करे, पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमेटी या पब्लिक एकाउंट्‌स कमेटी, यह बहस है. दोनों ने नाक का सवाल बना लिया है, पर चिंता का विषय है कि क्यों संसद के बाहर न कोई राजनेता और न राजनैतिक दल, एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार तथा कॉमनवेल्थ खेलों में हुए सत्तर हज़ार करोड़ के ख़र्चों में हुई गड़बड़ी को मुख्य मुद्दा नहीं बना रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट सीवीसी के ऊपर सवाल उठाता है. सीवीसी अपने को स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच से अलग रहने की बात करते हैं, लेकिन कहते हैं त्यागपत्र नहीं देंगे. पहली बार लोगों के विश्वास का पद संदेह के घेरे में आ गया है. इस पर  फैसला प्रधानमंत्री नहीं ले पा रहे हैं. कौन उन्हें रोक रहा है, क्या सोनिया गांधी या फिर डीएमके.

क्या होता अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर ध्यान नहीं देता? दोनों सवाल ख़ामोशी से राजनीति के क़ब्रिस्तान में द़फन हो जाते. सुप्रीम कोर्ट ने कई चिंताए जताईं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री पद का उनके साथियों द्वारा आदर न करना. दयानिधि मारन ने संचार मंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री को खत लिखा कि वह अपने मंत्रालय में आज़ाद हैं और उन्हें दख़ल मंजूर नहीं. जब ए राजा संचार मंत्री बने तो उन्होंने कंपनियों के चुनाव और आवंटन में प्रधानमंत्री की सलाह नहीं मानी. सरकार को घाटा एक हज़ार रुपये का लगा या एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ का, यह सवाल नहीं है, सवाल है प्रधानमंत्री पद की अवमानना का. प्रधानमंत्री संविधान का पालन करने वाली मशीनरी का मुखिया होता है, उसकी राय नहीं मानी गई और प्रधानमंत्री ख़ामोश रहे. क्या मजबूरियां रही होंगी?
मनमोहन सिंह की मजबूरी शायद सरकार चलाने की रही होगी, क्योंकि अगर वह ए राजा को टोकते तो द्रमुक समर्थन वापस ले सकता था. या फिर उन्हें सोनिया गांधी ने कहा कि वह ख़ामोश रहें या फिर उनमें ही इतनी हिम्मत नहीं रही कि वह अपने पद की गरिमा बचा सकते. मैं मनमोहन सिंह जी को वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल के अंतिम दिनों की एक घटना याद दिलाना चाहता हूं. आडवाणी जी की रथ यात्रा चल रही थी. वीपी सिंह की सरकार भी भाजपा और वामपंथियों के संयुक्त समर्थन से चल रही थी. यह साफ हो गया था कि यदि आडवाणी जी गिरफ़्तार हो जाते हैं तो भाजपा समर्थन वापस ले लेगी और वीपी सिंह की सरकार गिर जाएगी. अटल बिहारी वाजपेयी यह नहीं चाहते थे.
वह वीपी सिंह के पास गए. उनसे कहा कि पांच आदमी बाबरी मस्जिद के पास जाएंगे और केवल पांच ईंटें वहां रखकर वापस चले आएंगे. सरकार का समर्थन जारी रहेगा. वीपी सिंह ने विनम्रता से अटल जी से कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है और उस आदेश का पालन करना विश्वनाथ का नहीं, इस देश के प्रधानमंत्री का फर्ज है. अगर उस आदेश का पालन मैं नहीं करा सका तो मुझे इस पद पर बने रहने का हक नहीं है. अटल जी ने आख़िरी कोशिश की कि पर यह तो सांकेतिक होगा, इस पर वीपी सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और संविधान के मामले में सांकेतिक कुछ नहीं होता. उन्होंने पांच ईंटें रखने की अनुमति नहीं दी, आडवाणी जी गिरफ़्तार हुए और अटल जी ने राष्ट्रपति को समर्थन वापसी का खत सौंप दिया. वीपी सिंह की सरकार गिर गई.
सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह को चाहिए था कि वह ए राजा या उन जैसे मंत्रियों को बाहर निकाल फेंकते, उनकी कारगुजारियों को देश के सामने रखते और जनता के पास चले जाते. कांग्रेस पूरे बहुमत से वापस आती. पर इसकी जगह उन्होंने बार-बार सोनिया गांधी को अपना त्यागपत्र सौंपा. राजा के मसले पर और कॉमनवेल्थ खेलों की गड़बड़ी पर निर्णायक कार्रवाई से बचे तथा ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा के बचाव में सुप्रीम कोर्ट को उतरना पड़ा. अगर ऐसी स्थिति इंदिरा गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के सामने आई होती तो वे इसे बर्दाश्त नहीं करते, या तो कार्रवाई करते या त्यागपत्र दे देते.
प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. ओबामा के आने पर उन्होंने जो पार्टी दी, उसमें उन्होंने किसको नहीं बुलाया, बस एक आदमी को बुलाना भूल गए. अहमद पटेल को, जो सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव हैं. मैं नहीं जानता कि यह जानबूझ कर हुआ या ग़लती से, पर हुआ. सोनिया गांधी की विकास और समाज को लेकर तथा राहुल गांधी की इन्हीं सवालों को लेकर जो भाषा है, वह मनमोहन सिंह की भाषा से अलग है. इस अलग-अलग भाषा को लेकर भी प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के बीच अब तक कोई बात नहीं हुई है. बात होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट सीवीसी के ऊपर सवाल उठाता है. सीवीसी अपने को स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच से अलग रहने की बात करते हैं, लेकिन कहते हैं त्यागपत्र नहीं देंगे. पहली बार लोगों के विश्वास का पद संदेह के घेरे में आ गया है. इस पर  फैसला प्रधानमंत्री नहीं ले पा रहे हैं. कौन उन्हें रोक रहा है, क्या सोनिया गांधी या फिर डीएमके.
प्रधानमंत्री सर्वोच्च कार्यकारी पद है. इस पद की गरिमा ही यह है कि देश में फैले संदेह के वातावरण को पहले तो पनपने ही न दे, और पनपे तो उसे दूर करे. प्रधानमंत्री की ख़ामोशी से भ्रष्टाचार देश में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. कुछ लोग कह सकते हैं कि यह मध्यम वर्ग का मुद्दा है, ग़रीब को तो रोजी और रोटी चाहिए. पर यह सच्चाई से भागना माना जाएगा. देश के प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार से लड़ता दिखना चाहिए, जबकि भ्रष्टाचार से लड़ने का संकेत सुप्रीम कोर्ट दे रहा है. सुप्रीम कोर्ट के ये संकेत देश में चिंता पैदा कर रहे हैं. मानना चाहिए कि प्रधानमंत्री जी और सोनिया जी भी इससे चिंतित होंगी. क्योंकि अगर ये दोनों और आडवाणी जी चिंतित नहीं होते तो संसद को राजनीति का क़ब्रिस्तान बनने से कोई रोक नहीं पाएगा.

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1 COMMENT

  1. संतोष सर जी,आपने जो कुछ भी लिखा है उससे हम बहुत हद मुत्तफ़िक़ हैं.आप सही कहते हैं कि प्रधान मंत्री का पद वाकई में देश की गरिमा है,और देश की गरिमा को बचाने के लिए प्रधान मंत्री जी को हर हाल में हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए.लेकिन अफ़सोस की बात है कि मनमोहन सिंह जी ने इतने ज्यादा भ्रष्टाचार को पनपने का मौका दिया और किसी भी बात पर कार्यवाही तो बहुत दूर की बात है उसे रोकने की कोशिश ही नहीं की.मई 2009 के चुनाव से कांग्रेस को यह सीख लेनी चाहिए थी कि कहीं न कहीं भारत की जनता उस पर भरोसा करना चाहती है.लेकिन इस सरकार को अभी दो साल भी पुरे नहीं हुए हैं और उसने जनता पर उसका विश्वास चकनाचूर कर दिया है.अब तो भ्रष्टाचार की हद हो गयी है तो आखिरकार देश के संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट को सामने आना ही पड़ा.अब तो प्रधान मंत्री जी को कुछ करने का क़दम उठाना ही चाहिए ताकि अपने नैतिक चरित्र को दाग़दार होने से बचा सकें .

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