haryana-jaatहरियाणा में भारी तबाही को अंजाम देने के बाद जाट आंदोलन अब थम चुका है. पीछे रह गए हैं, तो कुछ दिन पहले तक समृद्ध कहे जाने वाले हरियाणा की बरबादी केनिशान. हरियाणा की मेहनती जमात जल्दी ही इस दंश को मिटाते हुए विकास के पथ पर फिर से आगे बढ़ जाएगी, इसकी उम्मीद सभी को है. लेकिन हरियाणा से शुरू हुई कहानी क्या यहीं पर रुक जाएगी? इस सवाल का जवाब टेढ़ा ही नहीं है, बल्कि एक तरह से यह हुक्मरानों के सामने और आम जनता के जेहन में बड़ा सा प्रश्नवाचक चिन्ह बनाए खड़ा है.

जाट आंदोलन के पीछे सियासी कारण और कुचक्र होंगे, इसकी आशंका से किसी को इन्कार नहीं है, लेकिन हालिया आंदोलन ने राजस्थान जैसे आरक्षण को लेकर सुलगते धोरों के नीचे दबी आग को जैसे कुरेदने का ही काम किया है. यह आशंका अब प्रबल हो गई है कि जल्द ही यहां की कुछ और कौमें भी अपनी जमात को आरक्षण दिलाने की मुहिम के तहत नई मांगों के साथ सामने आ सकती हैं. दरअसल, राजस्थान में आरक्षण को लेकर चर्चा से पहले यहां आरक्षण की चाह रखने वाली जमात की स्थिति और समीकरणों के बारे में भी जानना जरूरी है.

सरसरी तौर पर देखा जाए, तो भले ही जाट समुदाय की आरक्षण की मांग और गुर्जरों की मांग के बीच कोई लिंक दिखाई न देता हो, लेकिन यह कटु और प्रमाणित तथ्य है कि राजस्थान के सर्वाधिक हिंसक आंदोलनों के इतिहास में अंकित हो चुके गुर्जर आंदोलन की वजह दरअसल जाट आंदोलन की कोख से ही निकली है. राजस्थान में गुर्जरों की आबादी करीब 11-12 फीसदी के आसपास है. कारण समझने के लिए थोड़ा फ्लैशबैक में जाना होगा और राजस्थान में हुए आरक्षण आंदोलनों के इतिहास में भी झांकना होगा. बात 1993 की है, जब नेशनल कमीशन ऑफ बैकवर्ड क्लासेस यानी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ था.

आयोग को मुख्य काम यह सौंपा गया था कि वह राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, यूपी समेत उन सभी राज्यों में पिछड़े वर्ग के आरक्षण की जरूरत को लेकर एक रिपोर्ट तैयार करे, जहां से ऐसी मांगें उठ रही हैं. तब कमीशन को कहा गया था कि वह पिछड़ा वर्ग में आरक्षण के योग्य और आरक्षण की सुविधा ले रही जातियों को लेकर एक समीक्षात्मक रिपोर्ट तैयार करे, जिसके अनुसार यह तय किया जा सके कि किन-किन नई जातियों को इस वर्ग में शामिल किया जा सकता है और किन को बाहर किया जा सकता है. सन 1997 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. सरकार वह रिपोर्ट दबाए बैठी रही.

केंद्र में 13 महीने की सरकार चलाने के बाद संख्या अभाव में इस्तीफा देकर फिर से चुनाव मैदान में उतरने वाले भाजपा के सर्वमान्य नेता अटल विहारी वाजपेयी की उन दिनों एक रैली सीकर में हुई थी. वाजपेयी ने वहां वादा किया था कि अगर उनकी सरकार सत्ता में वापसी आई तो जाटों को केंद्रीय नौकरियों में आरक्षण दिलवा कर रहेंगे. भीड़ ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. संयोग से वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए की सरकार सत्तारूढ़ हुई. सत्ता में आने के कुछ ही दिन बाद 1999 में वाजपेयी सरकार ने जाटों को ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया.

दरअसल, 1993 में गठित पिछड़ा वर्ग आयोग ने 1997 में जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, उसमें एक अहम बात यह थी कि उसने पूरे राजस्थान के जाटों को तो आरक्षण के योग्य माना था और उन्हें आरक्षण सुविधा उपलब्ध कराने की पैरवी की थी, लेकिन भरतपुर और धौलपुर के जाटों को सूची से बाहर रखा था. आयोग का कहना था कि भरतपुर और धौलपुर के शासक ही जाट समुदाय से आते हैं, लिहाजा साधन-सम्पन्न होने के कारण वहां के जाट आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते. जनवरी 2000 में राज्य सरकार ने भी राज्य में जाटों को इसी तर्ज पर (भरतपुर और धौलपुर के जाटों को छोड़ कर) आरक्षण दे दिया.

माना जाता है कि गुर्जर आंदोलन की नींव भी साल 2000 में ठीक उस वक्त ही पड़ गई, जब सरकार ने राज्य में जाटों को ओबीसी में शामिल कर लिया. गुर्जर समुदाय को लगा कि उनके हक में सेंध लग चुकी है. अगर जाट समुदाय को ओबीसी में आरक्षण दिया गया, तो पहले से ओबीसी कैटेगरी में आरक्षण का थोड़ा-बहुत लाभ ले पा रहे उनके समुदाय का हक मारा जाएगा, लिहाजा गुर्जर समुदाय के बीच इस बात को लेकर गहन चर्चा और मनन का दौर शुरू हो गया कि ओबीसी से निकल कर एसटी यानी अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का दबाव बनाया जाए.

इस बीच 2003 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने गुर्जरों को एसटी स्टेटस देने का वादा किया, तो गुर्जरों को लगा कि वे सही ट्रैक पर हैं और अगर उन्होंने दबाव बनाया, तो उनके समुदाय को एसटी में आरक्षण मिल सकता है. इसी दौर और जद्दोजहद में गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का नाम सामने आया. साल 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व उनके सिपहसालारों के साथ बैंसला और उनके साथियों का एक ग्रुप मंत्रणाएं करने लगा, लेकिन कोई हल नहीं निकला. राज्य सरकार ने भी तब तक गुर्जर समुदाय की मांगों को एक गंभीर आंदोलन जैसा नहीं माना था. वर्ष 2007 के अप्रैल महीने के अंतिम दिनों से गुर्जर आंदोलन की सुगबुगाहटें सामने आने लगीं.

चेतावनी और अल्टीमेटम का भी दौर चला. राज्य सरकार ने गुर्जरों को प्रस्तावित आंदोलन वापस लेने के लिए कहा, लेकिन कोई ठोस वादा नहीं किया. इस पर कर्नल बैंसला ने आंदोलन का आह्वान किया वार्ता के लिए सरकार के तैयार होने तक 23 लोगों की जानें चली गईं. इस दौरान कई जगह गुर्जर और मीणा समुदाय के बीच टकराव भी हुआ. मीणा समुदाय ने साफ तौर पर घोषणा कर दी कि वे किसी भी हाल में गुर्जरों को एसटी में शामिल नहीं होने देंगे. राजस्थान में एसटी आरक्षण की सुविधा का सर्वाधिक और प्रभावी लाभ मीणा समुदाय ही उठाता रहा है.  बहरहाल, राज्य सरकार ने रास्ता निकालते हुए, गुर्जरों को आरक्षण देने के लिए एक स्पेशल श्रेणी एसबीसी (स्पेशल बैकवर्ड क्लास) बना कर उन्हें 5 फीसदी आरक्षण दिए जाने की बात कही.

साथ ही सवर्णों और अन्य जातियों के आर्थिक रूप से पिछड़ों को भी ईबीसी (इकोनामिकल बैकवर्ड क्लास) के नाम से 14 फीसदी आरक्षण देने की बात कही गई. राज्यपाल ने इस प्रस्ताव पर सहमति देने से मना कर दिया. इसके बाद सरकार ने इसे विधानसभा से पास कराया, लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी. इसी बीच 2008 में कांग्रेस सत्ता में आ गई. गुर्जर फिर सड़क पर उतर आए. 23 मई 2008 को शुरू हुआ आंदोलन 17 जून तक चला. इस दरम्यान खूब हिंसा हुई. पीलूकापुरा में फायरिंग हुई. 14 लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोग जख्मी हुए.

बाद में सिकंदरा में भी हिंसा भड़कने से कुल 17 लोगों की मौत हो गई. सवाई माधोपुर में भी दो लोग मारे गए. कांग्रेस सरकार के मुखिया अशोक गहलोत ने गुर्जर आरक्षण के मुद्दे को लेकर पिछली भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि उसने गुर्जरों को धोखा दिया, क्योंकि ईबीसी आधार पर आरक्षण संविधान के अनुसार तो दिया ही नहीं जा सकता, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित सीमा यानी 50 फीसदी से ऊपर जा रहा है. गहलोत सरकार ने गुर्जरों के लिए दो अलग-अलग बिलों का प्रस्ताव किया. जिसमें से एसबीसी के लिए 5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था थी और ओबीसी के लिए 14 फीसदी, लेकिन यह मामला भी कोर्ट में अटक गया.

कोर्ट ने क्वान्टिफिएबल डाटा लाने की बात कही. जिसके बाद चोपड़ा आयोग की रिपोर्ट हाईकोर्ट के समक्ष लाई गई, जिसका गठन वसुंधरा सरकार के समय हुआ था. चोपड़ा आयोग ने गुर्जरों को पिछड़ा मानते हुए उन्हें उन्हें आरक्षण दिए जाने की वकालत की थी. कुल मिला कर साल 2006 से लेकर 2015 तक गुर्जरों के विभिन्न आंदोलन हुए, लेकिन एसटी में शामिल होने की जिस मूल मांग को आंदोलन की शुरुआत की थी, वह मसला पीछे छूट गया और एसबीसी में आरक्षण को लेकर भी स्थिति साफ नहीं हो पाई, जिसका नतीजा यह है कि आज भी रह-रह कर यह समुदाय आरक्षण की हुंकार भरता रहता है.

और जाट आंदोलन का क्या हुआ
इस बीच राज्य के भरतपुर और धौलपुर इलाकों के जाट समय-समय पर अपने समुदाय को आरक्षण दिए जाने की मांग उठाते रहे, लेकिन उन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया. हालांकि, इस दौरान एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि धौलपुर-भरतपुर के जाटों की मांगों के साथ हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत आठ अन्य राज्यों के जाट भी जुड़ गए. हरियाणा के जाटों के आंदोलन के साथ ही अंतिम के दो-तीन दिनों में भरतपुर और धौलपुर के जाट भी जुड़ गए.

उन्होंने खासतौर से भरतपुर-मथुरा रेलखंड और आगरा-जयपुर रोड को निशाने पर लिया. हरियाणा के आंदोलनकारियों की ही तर्ज पर उन्होंने आंदोलन को हिंसक बनाने की भी कोशिश की, नतीजे में हेलक स्टेशन के पास खड़ी एक मालगाड़ी के इंजन में आग लगा दी गई, जबकि एक अन्य स्टेशन को तो उन्होंने तहस-नहस ही कर डाला. हरियाणा में जाट आंदोलन के थमते ही राजस्थान सरकार ने भी बातचीत की पहल कर दी. जाट आंदोलनकारियों ने मांग रखी कि ओबीसी कमीशन को विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने से पहले ही भरतपुर भेजा जाए. साथ ही ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाए. सरकार ने उनकी मांगें मान लीं और फिलहाल भरतपुर-धौलपुर के जाटों ने आंदोलन वापस ले लिया.

सुगबुगाहट नए आंदोलन की
हरियाणा के जाटों को आरक्षण मिलने और राज्य में भी भरतपुर-धौलपुर को छोड़ कर बाकी जगह जाटों को आरक्षण हासिल हो जाने का असर दूसरी जातियों खासकर ब्राह्मण-राजपूतों पर भी देखा गया. खासतौर पर राजपूतों ने इस दिशा में पहल की. राजपूतों के कद्दावर कहे जाने वाले नेता देवी सिंह भाटी और लोकेंद्र सिंह कालवी ने सामाजिक न्याय मंच का गठन किया, जिसके जरिए उन्होंने राजपूतों समेत दूसरी सवर्ण जातियों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग रखी. अब यूं तो सामाजिक न्याय मंच भंग हो चुका है.

देवी सिंह भाटी भाजपा में शामिल हो चुके हैं और विधायक भी हैं, लेकिन इसके बावजूद ताजा घटनाक्रम से एक बार फिर खासतौर से राजपूत समुदाय में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग फिर से जोर पकड़ती दिखाई दे रही है. फरवरी का अंतिम सप्ताह मानों राजस्थान में आरक्षण की कशमकश को लेकर भविष्य में होने वाली खींचतान का संकेत ही दे गया, जब बाड़मेर-बीकानेर इलाके में करणी सेना और कुछ राजपूत संगठनों के माध्यम से राजस्थान के राजपूतों ने भी अपने लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करके हजारों की तादाद में रैली निकाली.

आरक्षण की  मौजूदा स्थिति

एससी- 16 फीसद
एसटी- 12 फीसद
ओबीसी-21 फीसद
एसबीसी- 05 फीसद
(एसबीसी – स्पेशल बैकवर्ड क्लास)

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