fbpx
Now Reading:
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और मोदी सरकार की जन-विरोधी कोयला नीति
Full Article 12 minutes read

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और मोदी सरकार की जन-विरोधी कोयला नीति

coal

coal1993 में पारित कोयला खान (राष्ट्रीयकरण) संशोधन अधिनियम के बाद से ही खदानों का आवंटन उत्खनन उद्योग की सबसे महत्वपूर्ण नीति बन गई. देश में कोयला उत्पादन बढ़ाने और देश की विकास दर को बनाए रखने के लिए तीव्रता से बढ़ती कोयला मांग के उद्देश्य से, सरकार ने इस नीति से नीति क्षेत्र की कंपनियों को कोयला उत्खनन क्षेत्र में प्रवेश दिया.

वैसे तो इस अधिनियम में केवल पूर्व-निर्धारित अंत-उपयोग परियोजनाओं के लिए कैप्टिव कोयला खदान आवंटित करने के ही प्रावधान थे, परन्तु इसी प्रावधान में निजी क्षेत्र की कंपनियों ने काफी दिलचस्पी दिखाई, और क्यों न हो, सरकार ने कोयला उत्खनन क्षेत्र के विकास के नाम पर सस्ते दामों पर (बल्कि यूं कहें तो लगभग मुफ्त में) कोयला खदानों का आवंटन शुरू कर दिया. ऐसे में न सिर्फ निजी क्षेत्र की औद्योगिक कंपनियों में बल्कि कई तरह के दलालों, जमाखोरों और मुनाफाखोरों में मानो एक होड़ सी लग गई. देखते-देखते 15 वर्ष के दौरान 218 नई खदानों, जिनकी कुल क्षमता 550 मिलियन टन से भी अधिक थी, का आवंटन कर दिया गया.

कोयला खदानों के आवंटन में होड़ का अंदाजा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि इन नई आवंटित खदानों की कुल क्षमता 1993 में परिचालित भारत की सारी खदानों को मिलाकर कुल क्षमता के दोगुने से अधिक थी. जबकि कोल इंडिया लिमिटेड की अपनी उत्खनन क्षमता पिछले 150 सालों के विकास के बाद चरम सीमा पर थी. हालांकि इतने बड़े पैमाने पर खदानों के आवंटन के बावजूद इनमें से केवल 42 खदानें ही सितम्बर 2014 तक उत्खनन शुरू कर पाईं, जिनसे कुल लगभग 40-50 मिलियन टन प्रतिवर्ष का ही उत्पादन हो रहा था. पूर्व ऊर्जा एवं वित्त सचिव तथा

प्लानिंग कमीशन के पूर्व सलाहकार ईएएस शर्मा के अनुसार खदानों के न खुल पाने और उनके पूर्व विकास में देरी का मुख्य कारण यह है कि बहुत सारी खदानें गैर जिम्मेदार लोगों को आवंटित हुईं, जिनके पास कोयला उत्खनन की न तो सामर्थ्य थी और न ही खदानों के विकास में कोई रुचि थी. कई कंपनियों ने कोल ब्लॉक को इसलिए भी हासिल किया कि महत्वपूर्ण खनिज संसाधन को भविष्य के उपयोग के साथ जल, जंगल और जमीन पर कब्जा किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णयः-

कोयला खदानों के बेलगाम आवंटन में कई गड़बड़ियां देखी गईं. मुख्य रूप से खदानों के आवंटन के लिए कोई मापदंड नहीं बनाए गए. ना ही आवंटी कंपनियों के चयन के तर्क के आधार को कभी कोयला मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमिटी के मिनट्‌स में लिखा गया. ऐसे में आवंटन प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े हुए और बड़े पैमाने पर घोटाले के आरोप लगे. 2012 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने इसकी विस्तृत जांच कर निष्कर्ष निकाला कि पूरी आवंटन प्रक्रिया गैर-पारदर्शी है. यह पूरा प्रकरण कोलगेट घोटाले के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इसमें आरोप लगे कि आवंटन के कारण देश को लगभग एक लाख 86 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा.

इस मुद्दे पर न्यायिक प्रक्रिया के समापन के पश्चात भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, जिसमें 1993 के बाद आवंटित 214 कोल ब्लॉकों के आवंटन को निरस्त कर दिया. अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आवंटन के लिए कोई निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय संपदा का अनुचित वितरण हुआ. इस नतीजे में आवंंटन में हुई तमाम प्रक्रियात्मक अनियमितताओं, संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन और चंद कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए कंपनियों तथा सरकारी तंत्र की मिलीभगत का भी खास उल्लेख किया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने खदानों के आवंटन के निरस्तीकरण के साथ-साथ सभी तत्कालीन संचालित कोयला खदानों को 6 महीने के अन्दर खदान संचालन बंद करने के भी आदेश दिए और केन्द्रीय सरकार को इन 6 महीनों में अक्षय व्यवस्था खोजने का निर्देश दिया. इसके अतिरिक्त, सभी दोषी कंपनियों को अपने खनन कार्य की शुरुआत से अब तक निकाले गए कोयले पर प्रति टन 295 रुपए का जुर्माना देने का भी आदेश दिया.

यह जुर्माना जनता की अधिकृत संपत्ति पर इन कंपनियों द्वारा अनुचित लाभ उठाए जाने की क्षतिपूर्ण करने हेतु किया गया. इस महत्वपूर्ण एवं सराहनीय निर्णय से आशा जगी कि सरकार सभी गड़बड़ियों को ठीक करने और कोयला उत्खनन के जन-हित में प्रयोग के लिए एक विस्तृत नई कोयला नीति प्रस्तुत करेगी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट का कोलगेट मामला केवल आवंटन प्रक्रिया में हुए घोटाले से उठे सवालों तक ही सीमित था, यह एक अभूतपूर्व अवसर था कि कोयला मंत्रालय अपनी आवंटन नीति में पर्यावरणीय एवं सामाजिक न्याय संबंधी सवालों पर भी नजर डाल सकती थी, जिससे आवंटन प्रक्रिया जन-हित तथा देश के बहुमूल्य संसाधनों के संरक्षण के अनुकूल बनाई जा सके.

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पूर्णतया पलट देने के लिए नई कोयला आवंटन नीति

सुप्रीम कोर्ट का पूरे कोयला उत्खनन क्षेत्र की अनिमितताओं को खत्म करने के इस निर्णय ने सरकार को एक अभूतपूर्व अवसर दिया कि वह अपनी पुरानी नीतियों, प्रक्रियाओं एवं कॉर्पोरेट-केन्द्रित एजेंडे पर गंभीरता से पुनर्विचार करे. अपने निर्णय में तथा सम्पूर्ण कानूनी प्रक्रिया के दौरान अनेक अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की निंदा करते हुए भरपूर प्रयास किया कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों को समझे और ऐसी दीर्घ-दर्शी नीतियां बनाए जिनसे देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का देश के विकास में तथा जनता के हितों में उपयोग किया जा सके. केन्द्र की मोदी सरकार ने शीघ्रता दिखाते हुए, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मात्र 20 दिन बाद ही अध्यादेश के रास्ते नई आवंटन नीति लागू कर दी. इसके लिए पहले कोयला खान (विशेष उपबंध) अध्यादेश 2014 और फिर कोयला खान अधिनियम 2015 पारित किए गए.

इन जन विरोधी कोयला आवंटन नीति की प्रमुख कोशिश यही थी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पड़े प्रभाव को पूर्णतया उलट दिया जाए और पहले जैसी कॉर्पोरेट-प्रेमी नीति बहाल की जा सके. इस नीति में सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य विचारों की पूर्ण रूप से अवमानना कर मानो पूरे आदेश के मूल आधार को ही सिरे से पलट दिया. इससे सरकार ने न केवल इस ऐतिहासिक अवसर को गंवा दिया है बल्कि जनता एवं देश के हितों के विरुद्ध काम करते हुए केवल कॉर्पोरेट क्षेत्र को ही लाभ पहुंचाया है.

इस नीति को लागू करने में केन्द्र सरकार ने अलोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग कर संवैधानिक कार्य-रचना की भी अवमानना की. पहले तो लगातार 3 बार अध्यादेश का उपयोग कर इस नई आवंटन नीति पर व्यापक विचार-विमर्श और जन-संपर्क से बचने की कोशिश की, जब अंततः इसको संसद में प्रस्तुत किया तो गैर-लोकतांत्रिक तरीके से इस नीति पर चर्चा को बहुत ही कम समय-सीमा में समाप्त कर दिया. राज्य सभा में विपक्ष ने बड़ी मुश्किलों से इस महत्वपूर्ण नीति पर व्यापक बहस और चर्चा के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन पर सरकार को विवश किया लेकिन इस समिति को मात्र एक सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देने के कड़े निर्देश दिए गए. जिसके कारण यह समिति सभी पक्षों से विचार-विमर्श करने में अक्षम थी. इसके बावजूद संसद में विपक्ष के कई नेताओं ने इस नीति का विरोध कर अपनी समस्याओं को रखा, परन्तु सदन में बहुमत के बल पर सभी आपत्तियों को दरकिनार कर सरकार ने एकतरफा निर्णय लेकर अधिनियम को पारित किया.

नई कोयला आवंटन नीति के जन-विरोधी प्रावधान

कोयला खान अधिनियम 2015 ने एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्णतया अमान्य करने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी ओर इसमें कई ऐसे नए प्रावधान दिए हैं जो जन-हित के विरुद्ध हैं और जिनका पर्यावरण, प्राकृतिक स्थिरता, स्थानीय आजीविका इत्यादि कई मामलों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा.

मोदी सरकार की कोयला आवंटन नीति का विश्लेषण

नई कोयला आवंंटन नीति में खदानों की नीलामी एकमात्र अच्छा प्रावधान है जिससे उत्खनन का फायदा निजी कंपनियों की जगह राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए मिल सकेगा. इसके अलावा यह नीति पुराने घोटाले की तर्ज पर चुनिंदा कंपनियों को आर्थिक लाभ देने के क्रम को ही अग्रसर करता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पूर्णतया विपरीत, यह हमारी स्वतन्त्र न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर आघात है. राज्य सरकारों के अधिकारों को अनदेखा कर यह नीति भारतीय संविधान के संघीय ढांचे पर भी कुठाराघात है. यह पूर्णतया जन विरोधी और राष्ट्रहित के विपरीत है और महज निजी कंपनियों के हितों से प्रेरित है. हमने आशा की थी कि सरकार इस गंभीर तथा महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगी और चंद कंपनियों के संकीर्ण हितों की रक्षा के लिए इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाएगी. परन्तु केन्द्र सरकार ने स्पष्ट रूप से इन नीति को चुनिंदा कंपनियों को लाभ देने के उद्देश्य से बनाया है ना कि व्यापक जनहित के लिए.

मोदी सरकार की कोयला आवंटन नीति का विश्लेषण

नई कोयला आवंंटन नीति में खदानों की नीलामी एकमात्र अच्छा प्रावधान है जिससे उत्खनन का फायदा निजी कंपनियों की जगह राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए मिल सकेगा. इसके अलावा यह नीति पुराने घोटाले की तर्ज पर चुनिंदा कंपनियों को आर्थिक लाभ देने के क्रम को ही अग्रसर करता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पूर्णतया विपरीत, यह हमारी स्वतन्त्र न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर आघात है. राज्य सरकारों के अधिकारों को अनदेखा कर यह नीति भारतीय संविधान के संघीय ढांचे पर भी कुठाराघात है. यह पूर्णतया जन विरोधी और राष्ट्रहित के विपरीत है और महज निजी कंपनियों के हितों से प्रेरित है. हमने आशा की थी कि सरकार इस गंभीर तथा महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगी और चंद कंपनियों के संकीर्ण हितों की रक्षा के लिए इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाएगी. परन्तु केन्द्र सरकार ने स्पष्ट रूप से इन नीति को चुनिंदा कंपनियों को लाभ देने के उद्देश्य से बनाया है ना कि व्यापक जनहित के लिए.

 

कोयला खान अधिनियम के मुख्य जन-विरोधी प्रावधान –  संभावित प्रभाव

  1. कोयला खदान के आवंंटन के पूर्व किसी भी पर्यावरणीय, वन स्वीकृति या ग्राम सभा की अनुमतियों की कोई आवश्यकता नहीं है. साथ ही खदान संचालन से होने वाले मुनाफे का 10 प्रतिशत राशि आवंंटन के समय ही आवंटी कंपनी सरकार को देगी.

इस प्रावधान के पालन से पर्यावरणीय तथा सामाजिक प्रभाव के आकलन की सभी नियमित प्रक्रियाओं का मजाक बनकर रह जाएगा. यह पूरी प्रक्रिया इस धारणा पर आधारित है कि सभी कोयला ब्लॉकों को सभी पर्यावरणीय, वन तथा सामाजिक स्वीकृतियां स्वतः ही मिल जाएंगी. अन्यथा 10 प्रतिशत पूर्व भुगतान स्वयं एक दलाली रकम की तरह देखा जा सकता है. जिससे सरकार कंपनी को स्वीकृतियां देने को मजबूर हो जाएगी. अधिनियम में जिन 204 कोयला ब्लॉकों की नीलामी का जिक्र है, उनमें अधिकांश के पास पर्यावरणीय, वन परिवर्तन सम्बन्धी तथा अन्य स्वीकृतियां नहीं हैं.

  1. पुरानी कम्पनी को मिली सभी स्वीकृतियां स्वतः ही नए आवंटी को स्थानांतरित कर दी जाएगी.

इससे पुराने आवंटी को दी गई स्वीकृतियां एवं विभिन्न प्रक्रियाओं में हुई अनियमितताओं को सुधारने का कोई अवसर नहीं मिल पाएगा. सभी अनुसूचित क्षेत्रों में यह प्रावधान पेसा कानून 1996 का भी उल्लंघन है, जिसमें किसी भी खनन कार्य से पूर्व ग्राम सभा की स्वीकृति आवश्यक है.

  1. नीलाम किए गए कोल ब्लॉकों के सम्बन्ध में कोई भी कानूनी प्रक्रिया या उपाय नए खरीददार, तथा खदान से सम्बंधित भूमि एवं खदान ढांचे पर लागू नहीं होगी.

खदान से संबंधित अनियमितताओं की भरपाई तथा नुकसान के हर्जाना वसूलने की प्रक्रिया बहुत कठिन हो गई है जैसा कि रायगढ़ में गारे पेल्मा क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीण लगातार झेल रहे हैं. इन खदानों में से कई पर गंभीर अनियमितताओं जैसे, अपर्याप्त मुआवजा एवं पुनर्वास पैकेज, गैरकानूनी खनन इत्यादि के आरोप हैं. यह उन सभी खनन कंपनियों को भी बचाने का प्रयास है, जहां पर्यावरणीय मानदंडों का कोई अनुपालन नहीं किया जा रहा है.

  1. खदानों के संबंध में कानूनी फैसलों, ट्रिब्यूनल के आदेशों तथा किसी भी अधिकारी द्वारा दिए गए प्रतिकूल निर्देशों को रद्द कर दिया गया है.

विभिन्न न्यायालयों द्वारा किए गए विभिन्न अनियमितताओं जैसे कि भूमि अधिग्रहण, विस्थापन तथा पुनर्वास, कर्मचारियों के अधिकारों, इत्यादि पर दिए गए सभी आदेशों को भी रद्द कर दिया गया है.

  1. मौजूदा खनन में नीलामी से पूर्व हुई मजदूरी, बोनस, रॉयल्टी, पेंशन, ग्रेच्युटी या किसी अन्य देय राशि के लिए सभी दावे पर प्रतिबन्ध लगा दिया है.

इससे मजदूरों या ट्रेड यूनियनों के अपने अधिकारों की प्राप्ति तथा रक्षा के सभी समाधानों को समाप्त कर दिया गया है. यह मजदूरों के अधिकारों पर भी कुठाराघात है, क्योंकि वेतन विसंगति, स्थायीकरण सहित लंबित सभी मामलों से कंपनियों को मुक्त कर दिया गया है. 6. भूमि अधिग्रहण के लिए कठोर तथा पुराने कानून कोयला धारक क्षेत्रों (अधिग्रहण एवं विकास अधिनियम 1957) का इस्तेमाल किया जाएगा.

संसद द्वारा पारित/भूमि, अर्जन, पुनर्वास पुर्नव्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का एक भद्दा मजाक है. जिससे निजी कंपनियां गरीब किसानों तथा आदिवासियों की जमीन को उनकी सहमति के बिना कौड़ी के भाव खरीद सकेंगे.

  1. किसी भी व्यक्ति पर खनन अधिग्रहण के कार्य में बाधा उत्पन्न करने के आरोप में 1-2 लाख रुपए प्रतिदिन के भारी जुर्माने तथा कारावास का भी प्रावधान है.

लोगों के विचारों व विरोधों को दबाने की कोशिश और इससे जनता तथा नागरिक समाज के खनन कार्यों से उत्पन्न वास्तविक शिकायतों को दबाने का प्रयास है.

(यह आलेख उस रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसे छत्तीसगढ बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक और प्रियांशु ने तैयार किया है. इस रिपोर्ट का नाम है, कमर्शियल कोल माइनिंग और एमडीओ: कॉरपोरेट लूट का नया रास्ता)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.