akhtar2014 के लोकसभा चुनाव के दो चरण समाप्त हो चुके थे, तीसरे और चौथे चरण के चुनाव के लिए पूरी राजनीतिक व प्रशासनिक मशिनरी झोंकी जा चुकी थी, तभी बिहार के किशनगंज लोकसभा क्षेत्र से खबर आई कि जद (यू) उम्मीदवार अख्तरुल ईमान ने चुनाव मैदान से हट जाने का ऐलान किया है.

आम जन तो छोड़िए धुरंधर राजनीतिक पंडित भी इस खबर से सन्न रह गए थे. अगर कोई सन्न नहीं था, तो वे थे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, क्योंकि उन्हें पता था कि किशनगंज में क्या हो रहा है. भाजपा ने अख्तरुल ईमान के मैदान से हट जाने को साम्प्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश की, क्योंकि अब किशनगंज में कांग्रेस के दमदार प्रत्याशी मौलाना इसरारुल हक कासमी (जो चुनाव में जीते भी) की जीत का रास्ता साफ हो गया था.

भाजपा ने बहुसंख्यकों को आभास दिलाना चाहा कि देखो अल्पसंख्यक एक हो रहे हैं, लिहाजा उन्हें भी गोलबंद होना चाहिए. हालांकि भाजपा का प्रचार तंत्र ज्यादा सफल नहीं हुआ. सीमांचल के पूरे बेल्ट का जो चुनाव परिणाम आया, उसमें भाजपा को उतनी सफलता नहीं मिली, जितनी बिहार के अन्य हिस्सों में मिली थी.

2015 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम के उम्मीदवार की हैसियत से अख्तरुल ईमान ने कड़ी टक्कर दी और दूसरे स्थान पर रहे थे. हारने के बावजूद अख्तरुल ईमान ने संघर्ष और राजनीतिक जागरूकता के अपने अभियान को कभी नहीं रोका. वे लगातार सीमांचल में वे सक्रिय रहे और जनाधार मजबूत करने में लगे रहे. अख्तरुल ईमान अब ऑल इंडिया मज्लिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लेमीन (एआईएमआईएम) के प्रदेश अध्यक्ष के बतौर अपने दल को सीमांचल में मजबूत बनाने में जुटे हैं. उनकी पार्टी ने उन्हें पहले ही किशनगंज लोकसभा का प्रत्याशी घोषित कर रखा है.

पिछले पांच साल की मेहनत के बूते आज वे काफी जोश में हैं. उनका दावा है कि उनकी पार्टी सीमांचल के पांच जिलों, जहां मुसलमानों की आबादी 45 से 90 फीसद तक है, में एक मजबूत ताकत बन कर उभरेगी. राजद और जदयू जैसे दलों से लगातार तीन बार विधायक रहे अख्तरुल ईमान से इर्शादुल हक़ ने खास बातचीत की है. पेश है उनसे हुई बातचीत के खास अंश-

2019 के चुनाव में बिहार में आपकी पार्टी एआईएमआईएम की क्या हैसियत होगी?

देखिए हमारे कायद (असदुद्दीन ओवैसी) ने साफ तौर पर ऐलान कर रखा है कि हमें न तो वजीर-ए-आला और न ही वजीर-ए-आजम बनना है. हमें मंत्री भी नहीं बनना है. हमें तो बस अकलियतों और दलितों का पहरेदार बनना है. हमारा पूरा संघर्ष इस बात के लिए है कि हम लोकसभा में वंचित समाज के हक की पहरेदारी करें. हमने गुजिश्ता पांच सालों में जो मेहनत की है, उससे हम पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि किशनगंज में हमारे लिए रास्ता साफ है.

जब सत्ता में भागीदारी नहीं होगी तो फिर वंचित समाज का कैसे भला होगा?

हमारे नेता (असदुद्दीन ओवैसी) ने इसी बात पर जोर दिया है. हमें राष्ट्रपति नहीं बनना. हमें चपरासी बना दो, पर हमारे समाज की हकमारी मत करो. हमें भारतीय संविधान ने जो अधिकार दिया है, उस अधिकार पर डाका मत मारो. हमारी लड़ाई इसी डाकाजनी के खिलाफ है. हम दबे समाज का पहरेदार बनकर रहना चाहते हैं. हमारे संघर्ष का बस इतना मकसद है कि हम संसद और विधानसभाओं में पहुंचकर अपने समाज के हकों की पहरेदारी कर सकें. हमारे समाज को उसके हक मिल जाएं, हमारे लिए वही जरूरी है. हमें कुर्सियों और ओहदों की दरकार नहीं है.

एआईएमआईएम तेलंगाना में एक राजनीतिक शक्ति है. बिहार में आपकी पार्टी 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में है. मुस्लिम कयादत वाली इस पार्टी का चुनावी एजेंडा क्या होगा?

हमारी कोशिश है कि हम सीमांचल में एक मजबूत आवाज बनें. इसके लिए हमने गहराई से सीमांचल के कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया के अलावा अररिया सुपौल जैसे जिलों में अकलियतों और दलितों की हालत पर स्टडी की है. इसके अलावा रंगनाथ मिश्रा कमिशन रिपोर्ट, सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की रौशनी में भी हमने पाया है कि यह पूरा इलाका बिहार के बाकी इलाकों से सबसे ज्यादा पिछड़ा है. यहां इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज व यूनिवर्सिटी की कमी है.

इंफ्रास्ट्रक्चर नदारद है, गुरबत है, भुखमरी है. ये हालत सिर्फ अकलियतों की नहीं दलितों की भी है. इसके लिए हमारी पार्टी लगातार मांग कर रही है कि सीमांचल के लिए अनुच्छेद- 371 के तहत स्पेशल कोटा निर्धारित किया जाए, ताकि इस क्षेत्र का विकास हो सके. हम इसके लिए आंदोलनरत तो हैं ही, साथ ही हमारे नेता (असदुद्दीन ओवैसी) ने इसे लेकर लोकसभा में प्राइवेट मेम्बर बिल भी पेश किया है. हम इसे चुनाव में मुद्दा बनाएंगे. अकलियतों की हालत के मद्देनजर हमारी मांग है कि मुसलमानों को पिछड़ा समाज मानते हुए उन्हें शिक्षा और नौकरियों में विशेष आरक्षण दिया जाए.

बिहार में आरक्षण का लाभ पहले से ही मुसलमानों की पिछड़ी जातियां प्राप्त कर रही हैं. ऐसे में फिर अब कैसा आरक्षण?

अभी तक जो आरक्षण मिला है, वो पसमांदा बिरादरी के लोगों को मिल रहा है. जबकि मुसलमानों का पूरा समाज पिछड़ा और बदहाल है. इन सबको आरक्षण मिलना चाहिए. आरक्षण के बिना मुस्लिम समाज को आगे नहीं लाया जा सकता.

तो क्या आप धर्म आधारित आरक्षण चाहते हैं?

नहीं, हम धर्म आधारित आरक्षण की मांग नहीं कर रहे हैं. हम समाज की बदहाली और गरीबी के मद्देनजर आरक्षण चाहते हैं. सरकार को मुसलमानों की स्थिति का पूरा अंदाजा है. आद्री की रिपोर्ट सामने है. सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमीशन की पूरी रिपोर्ट सामने है. उसकी सिफारिशें भी देख लीजिए, जो कहती हैं कि मुसलमानों को आगे लाने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है.

ऐसे में तो हिंदू समाज का अगड़ा तबका भी आरक्षण मांगेगा, तो क्या आप सवर्ण हिंदुओं के आरक्षण के भी पक्षधर हैं?

आप जिस वर्ग के आरक्षण की तरफ इशारा कर रहे हैं. उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति देख लें. जुडिशियरी से लेकर नौकरशाही तक में इस समाज का वर्चस्व है. रोजगार में उनका बोलबाला है. तमाम संसाधनों पर उनकी मजबूत पकड़ है. ऐसे में उन्हें क्यों आरक्षण चाहिए? इसके बरअक्स आप मुसलमानों की हालत देख लें. उनकी हालत तो अनुसूचित जातियों से भी दयनीय है.

बिहार में लगातार सेकुलर पार्टियों की सरकार रही. मुसलमान थोक भाव में लालू को सपोर्ट करते रहे. नीतीश को भी पूरा सपोर्ट किया, लेकिन मुसलमानों को क्या मिला?

बिल्कुल सही कहा आपने. लेकिन सच्चाई यह है कि आज इन्हीं पार्टियों के कारण मुसलमान बदहाल हैं. उर्दू बिहार की दूसरी सरकारी ज़ुबान है. लेकिन उर्दू की पाठ्यपुस्तकें नहीं मिलतीं. उर्दू शिक्षकों की बहालियां रोक दी जाती हैं. मदरसों को तबाह कर दिया गया है. उर्दू को खत्म करने की साजिश पर अमल किया जा रहा है. लेकिन अब यह बहुत दिनों तक नहीं चलने वाला. बिहार के अकलियतों में जागरूकता आई है. उन्हें पता चल चुका है कि उनकी हकमारी करने वाले लोग कौन हैं.

आप जिसकी बात कर रहे हैं, वही कांग्रेस और राजद का भी एजेंडा है. क्या आपकी पार्टी चुनाव में ऐसे सेकुलर दलों से प्री-पोल अलायंस करेगी?

हम चाहेंगे कि सेकुलर दलों से अलायंस करें. लेकिन हम यह कतई नहीं चाहेंगे कि सेकुलरिज्म की खाल में लिपटे स्यूडो-सेकुलर दलों के साथ अलायंस करें. ऐसे दल सेकुलरिज्म का नारा तो लगाते हैं, लेकिन उनकी फितरत कम्यूनल होती है. हमारी पार्टी ने महाराष्ट्र में रामदास अठावले साहब की पार्टी के साथ अलायंस इसी के मद्देनजर किया है.

राजद और जद (यू) से आप तीन बार विधायक रहे. 2014 में जद (यू) से नॉमिनेशन फाइल करने के बाद कांग्रेस उम्मीदवार के फेवर में आपने पलटी मार दी. अब किशनगंज की जनता आपपर कैसे यकीन करेगी?

काफी महत्वपूर्ण सवाल आपने उठाया है. मैं आज कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूं, जिसे न सिर्फ किशनगंज के अवाम को बल्कि पूरे देश को जानना चाहिए. 2014 में जद (यू) भाजपा से अलग हो गया था. हमें नीतीश कुमार ने कहा कि हम किशनगंज से लोकसभा चुनाव लड़ें. लेकिन जब हम मैदान में गए तो साफ दिखने लगा था कि जद (यू) के तमाम कार्यकर्ता और नेता भाजपा के लिए काम कर रहे हैं.

जद (यू) के ऊपर से लेकर नीचे तक के तमाम नेता और कार्यकर्ता भाजपाई रंग में रंग चुके थे. मैंने जद (यू) के बड़े नेताओं से इस हकीकत को शेयर किया. यहां तक कि नीतीश कुमार को भी बताया कि जद (यू) के नेता ही ‘भाजपा जिताओं’ के एजेंडे पर काम कर रहे हैं. ऐसे में नीतीश जी कोई कदम उठाएं और उन नेताओं को समझाएं, लेकिन नीतीश कुमार ने एक लफ्ज न तो कहा और न ही कोई एक्शन लिया. मैं एकदम आहत था.

मेरे सामने एक ही रास्ता था कि मैं किशनगंज के साम्प्रदायिक सौहार्द के माहौल को खराब न होने दूं, क्योंकि मुझे मालूम है कि किशनगंज की जनता भुखमरी की शिकार जरूर है, लेकिन साम्प्रदायिक सद्भाव में वहां की नजीर पूरे देश में कहीं और नहीं मिलती. इससे पहले किशनगंज की जनता देख चुकी थी कि भाजपा जैसी फिरकापरस्त पार्टी एक बार जीती, तो यहां के माहौल को उस दल के नेताओं ने जहरीला बना दिया था.

वहां की जनता अब ऐसा कतई नहीं चाहती थी कि किशनगंज की धरती पर फिर से साम्प्रदायिकता का जहर फैले. इसी कारण हमने अपनी सीट की कुर्बानी दी और हम मैदान से हट गए. हमें अपने इस कदम पर आज भी फख्र है. हम ही नहीं, किशनगंज की जनता भी हमारे इस बलिदान पर खुश हुई और आज वहीं की जनता हमारे साथ खड़ी है. हम उसी जनता के दिए गए उत्साह के कारण आज पूरे दमखम से मैदान में हैं और यही कारण भी है कि चुनाव के पांच छह महीने पहले ही हमारी पार्टी किशनगंज से चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है.

बिहार में 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो किसी भी जातीय समूह से ज्यादा है. इसके बावजूद 71 वर्षों में मुस्लिम नेतृत्व नहीं उभर पाया क्यों? जबकि यादव, कोयरी, पासवान जैसे समाज की मजबूत लीडरशिप है.

यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. आपने जिन जातीय समूहों की बात की, उनके यहां नेतृत्व के उभार के मुख्य कारणों में शिक्षा, रोजगार और नौकरियों के अवसरों का मिलना है. एससी-एसटी को रिजर्वेशन का फायदा हुआ. इसका नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश में मायावती और बिहार में रामविलास पासवान जैसे नेताओं का राजनीतिक रसूख सामने आया.

लेकिन मुसलमानों को ऐसे अवसरों से वंचित रखा गया. मंडल कमिशन के तहत पिछड़ों को 27 प्रतिशत रिजर्वेशन मिलता है. ऐसे में इसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी कम से कम आठ प्रतिशत बनती है. लेकिन आप रिकार्ड उठाकर देख लें, तो पता चलेगा कि मुसलमानों की नुमाइंदगी सरकारी नौकरियों में तीन फीसद से ज्यादा कभी नहीं रही.

ऐसे में सियासी नेतृत्व उभरने की संभावना काफी कम हो जाती है. इसीलिए तो हम मुसलमानों की बिरादरियों को मिलने वाले रिजर्वेशन का एक अलग कम्पार्टमेंट बनाने की मांग करते हैं, ताकि मुसलमानों की हकमारी न हो. जब हमें शिक्षा और नौकरियों व रोजगार में हमारी आबादी के अनुपात के मुताबिक हक मिलेगा तो हमारी सियासी लीडरशिप भी पनपेगी.

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