अनुराधा ने यह भी बताया कि मोहित शाह इस बात के लिए दबाव डाल रहे थे कि इस मामले में फैसला 30 दिसंबर से पहले सुनाया जाए. ऐसा इसलिए, क्योंकि तब इस फैसले को दबाया जाना आसान होगा, क्योंकि उस समय मीडिया में कोई और सनसनीखेज स्टोरी चर्चा में होगी. अनुराधा के पिता ने भी बताया कि उन्हें मुंबई में घर, जमीन और पैसे का ऑफर मिला था, लेकिन उनका बेटा किसी प्रस्ताव के सामने नहीं झुका. उन्होंने कहा कि मेरे बेटे ने कहा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा या फिर गांव जाकर खेती करूंगा.

justice loyaसोहराबुद्दीन केस में सीबीआई जज बीएच लोया की मौत के मामले में परिजनों के सवाल उठाने के बाद राजनीतिक माहौल तल्ख हो गया है. हाल में अंग्रेजी मैग्जीन ‘कारवां’ में छपी एक स्टोरी में जस्टिस लोया की बहन और उनके पिता ने जस्टिस लोया की मौत को संदेहास्पद बताया है. गौरतलब है कि 48 वर्षीय जस्टिस लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हार्ट अटैक से हुई थी. जस्टिस लोया मौत से एक दिन पहले अपने साथी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में शामिल हुए थे. स्वप्ना जोशी फिलहाल बॉम्बे हाई कोर्ट में जज हैं. नवंबर 2005 में कथित मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन मारा गया था. इस मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आरोपी थे, लेकिन बाद में वे इस मामले में बरी हो गए थे. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज एपी शाह ने भी इस मामले की जांच की मांग की है.

मिला था 100 करोड़ का ऑफर

‘कारवां’ की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस लोया की बहन अनुराधा बियानी ने बताया कि सोहराबुद्दीन मामले में अपने पक्ष में फैसला देने के लिए उनके भाई बृजगोपाल लोया को बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस मोहित शाह ने 100 करोड़ रुपए का ऑफर दिया था. अनुराधा ने यह भी बताया कि मोहित शाह इस बात के लिए दबाव डाल रहे थे कि इस मामले में फैसला 30 दिसंबर से पहले सुनाया जाए. ऐसा इसलिए, क्योंकि तब इस फैसले को दबाया जाना आसान होगा, क्योंकि उस समय मीडिया में कोई और सनसनीखेज स्टोरी चर्चा में होगी. अनुराधा के पिता ने भी बताया कि उन्हें मुंबई में घर, जमीन और पैसे का ऑफर मिला था, लेकिन उनका बेटा किसी प्रस्ताव के सामने नहीं झुका. उन्होंने कहा कि मेरे बेटे ने कहा था कि मैं इस्तीफा दे दूंगा या फिर गांव जाकर खेती करूंगा.

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की जांच सीबीआई की स्पेशल कोर्ट को सौंपी थी. इससे पहले जेटी उत्पत मामले की सुनवाई कर रहे थे. जज उत्पत ने अमित शाह को कोर्ट में उपस्थित नहीं होने को लेकर फटकार लगाई थी और उन्हें अगले आदेश पर उपस्थित होने को कहा था. लेकिन जून 2014 में अप्रत्याशित रूप से जस्टिस उत्पत का तबादला पुणे सेशन कोर्ट में हो गया. इसके बाद बृजगोपाल लोया मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिन्होंने भी अमित शाह को कोर्ट में उपस्थित होने का आदेश दिया था. हालांकि शुरू में उन्हें आरोप तय हो जाने तक कोर्ट में उपस्थित होने से छूट दी गई थी. जब अमित शाह महाराष्ट्र में उपस्थित होने के बावजूद सुनवाई में नहीं आए, तब लोया ने स्पष्ट किया था कि यह छूट केवल तभी तक है, जब अमित शाह राज्य में मौजूद नहीं हैं. पता चला कि सुनवाई के दिन अमित शाह महाराष्ट्र सरकार के शपथ ग्रहण के लिए मुंबई में ही मौजूद थे. इससे नाराज होकर लोया ने शाह के वकीलों को आदेश दिया था कि वे अगली सुनवाई पर उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करें. अगली सुनवाई की तारीख 15 दिसंबर 2014 थी, लेकिन 1 दिसंबर को ही उनकी मौत हो गई.

लोया की मौत के बाद बदले हालात

जस्टिस लोया की मौत के बाद एमबी गोसवी इस केस की सुनवाई कर रहे थे. जस्टिस गोसवी ने अमित शाह से आरोप हटाने की बचाव पक्ष की दलील 3 दिन तक सुनी, जबकि सीबीआई की बहस को उन्होंने 15 मिनट में ही निपटा दिया. इसके बाद 30 दिसंबर 2014 को गोसवी ने फैसला सुनाया कि सीबीआई राजनीतिक उद्देश्यों के चलते आरोपी को फंसा रही है. इसके बाद अमित शाह को इस मामले से बरी कर दिया गया. फैसले की सुनवाई के लिए दिन भी ऐसा रखा गया, जब क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया था. अनुराधा बताती हैं कि उस दिन धोनी के संन्यास की खबर ही टेलीविजन की सुर्खियां बनी रहीं, जबकि अमित शाह की खबर दबा दी गई थी.

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस लोया की मौत की खबर को मीडिया ने खास तवज्जो नहीं दिया. यह खबर ‘द कारवां’ में छपने के बाद केवल सोशल मीडिया पर ही चर्चा में है. मीडिया की उपेक्षा से निराश होकर मुंबई में अब आमलोगों ने इस खबर को चर्चा में लाने के लिए अनूठा तरीका ढूंढ निकाला है. चर्चगेट स्टेशन के बाहर अशोक पाई पोस्टर लेकर खड़े रहते हैं और लोगों को मैग्जीन में छपी खबर के बारे में बताते हैं. पाई कहते हैं कि अगर इस देश में सीबीआई का जज भी सुरक्षित नहीं है, तो कह सकते हैं कि कोई भी सुरक्षित नहीं है. धीरे-धीरे लोग भी उनके अभियान के साथ जुड़ते जा रहे हैं. लोगों का कहना है कि अगर इस मामले में परिजनों को संदेह है, तो इस मामले की जांच कराई जानी चाहिए.

साज़िश से बेटे ने किया इनकार

जस्टिस लोया के बेटे ने बॉम्बे हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश मंजुला चेल्लूर को बताया है कि उनके पिता की मौत को लेकर परिवार को कोई संदेह नहीं है. इस मुलाकात से पूर्व जस्टिस भूषण गवई ने बयान दिया था कि एक दिसंबर, 2014 को हुए हादसे में कोई साजिश नहीं रची गई थी. जस्टिस लोया के बेटे ने कहा है कि उनका न्यायपालिका के सदस्यों पर पूरा भरोसा है, जो 30 नवंबर-1 दिसंबर की रात को मेरे पिता के साथ थे. जांच एजेंसियों की ईमानदारी पर भी हमें पूरा विश्वास है. मेरे पिता की मौत हार्ट अटैक से ही हुई थी. इस मामले में हमें कोई संदेह नहीं है. गौरतलब है कि जस्टिस लोया की मौत के समय जस्टिस गवई भी उनके साथ थे. उन्होंने कहा है कि जस्टिस लोया शादी की रात पान खाने के बाद अपने कमरे में सोने चले गए थे. देर रात उन्होंने सीने में दर्द होने की शिकायत की थी. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया. कुछ सीनियर जज भी उनके साथ थे. उनकी मौत में किसी तरह का कोई रहस्य नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि पोस्टमॉर्टम के बाद उनके शव के साथ 2 जज भी गए थे.

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