भारत में डीएनए डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक पद्मश्री प्रो. लालजी सिंह का रविवार देर रात हार्ट अटैक से निधन हो गया. प्रो. लालजी को हार्टअटैक के बाद बीएचयू हॉस्पिटल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था, जहां रात 10 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली. बीएचयू के ऑफिशियल स्टेटमेंट में उनके निधन की जानकारी दी गई. वे बीएचयू के वीसी भी रहे हैं. प्रो. लालजी सिंह अभी सेंटर फॉर सेल्युलर मॉलिक्यूलर बायोलॉजी हैदराबाद के डायरेक्टर थे. 2011 में उन्हें बीएचयू का कुलपति बनाया गया. कुलपति रहते हुए भी उन्होंने काफी ख्याति अर्जित की. कुलपति के रूप में वे सिर्फ एक रुपए पगार लेते थे.

5 जुलाई 1947 को यूपी के जौनपुर जिले की सदर तहसील के गांव कलवारी में जन्हें लालजी सिंह का परिवार बेहद साधारण था. इसे इस बात से समझा जा सकता है कि बचपन में वे 12 किलोमीटर पैदल चलकर रोज स्कूल जाते-आते थे. इंटरमीडिएट के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे 1962 में बीएचयू गए. बीएचयू से उन्होंने बीएससी, एमएससी और पीएचडी की डिग्री हासिल की. पीएचडी के बाद 1971 में वे कोलकाता गए, जहां साइंस में 1974 तक एक फैलोशिप के तहत रिसर्च किया. फिर वे फैलोशिप पर ब्रिटेन गए. जून 1987 में उन्होंने सीसीएमबी हैदराबाद में वैज्ञानिक के रूप में काम करना शुरू किया. वे 1998 से 2009 तक वहां के डायरेक्टर रहे.

1988 में ही प्रो. लालजी ने डीएनए फिंगर प्रिंट तकनीक का अविष्कार किया. उनकी इस खोज ने भारत में क्राइम इन्वेस्टिगेशन को भी नई दिशा दी. इसके आधार पर राजीव गांधी की हत्या समेत कई बड़े मामलों जैसे नैना साहनी, स्वामी श्रद्धानंद, सीएम बेअंत सिंह, मधुमिता और मंटू मर्डर केस को सुलझाया गया.

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