लोक उम्मीदवार का काम करने वाले कार्यकर्ता ऐसी हर प्राथमिक इकाई में जाएंगे और मतदाताओं की सभा करेंगे. वे कोशिश करेंगे कि इकाई के अधिक से अधिक मतदाता सभा में आएं. इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि 100 मतदाताओं में से कम से कम 20 को ज़रूर मौजूद रहना चाहिए. इससे कम रहने पर वह सभा सही नहीं मानी जाएगी और दोबारा बुलाई जाएगी. यह सभा मतदाताओं की होगी, इसलिए सबसे पहले उन्हें लोक उम्मीदवार का विचार अच्छी तरह समझाया जाएगा, ताकि किसी के मन में कोई शंका रह न जाए.  
यह ठीक है कि चुनावों में दो तरह के उम्मीदवार खड़े होते हैं, दल के और स्वतंत्र. लोक उम्मीदवार इन दोनों से भिन्न होगा. लोक उम्मीदवार अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा खड़ा किया जाएगा. दल का तो वह होगा ही नहीं, स्वतंत्र भी नहीं होगा, वह होगा मतदाताओं का अपना उम्मीदवार. क्या आप इस अंतर को समझ रहे हैं?
एक लंबे-चौड़े निर्वाचन क्षेत्र के सौ-सवा सौ गांवों में बिखरे हुए हज़ारों मतदाता अपना उम्मीदवार तय कैसे करें.
लोक उम्मीदवार की बात नई है और कठिन इसलिए मालूम हो रही है, क्योंकि हम लोग इतने वर्षों से दलों के और स्वतंत्र, दो ही तरह के उम्मीदवार देखते आ रहे हैं. जो चीज नई होती है, उसे नए ढंग से समझना पड़ता है और उसे करने के लिए कुछ काम भी नए करने पड़ते हैं. शुरू में नई बात कुछ अटपटी भी मालूम होती है, जैसे ऐसी बात है या नहीं?
मेरे विधानसभा का निर्वाचन क्षेत्र लगभग डेढ़ ब्लाकों में फैला हुआ है. गांव कुल मिलाकर सवा सौ से कम नहीं होंगे. मतदाताओं की संख्या लगभग एक लाख होगी. इतने मतदाता मिलकर अपना उम्मीदवार कैसे तय करेंगे?
एक बात तो साफ़ है कि लोक उम्मीदवार न स्वतंत्र होगा, न किसी दल के टिकट पर चुनाव लड़ेगा. उसके चयन के लिए एक निर्वाचक मंडल अलग बनाना पड़ेगा. कई लोग निर्वाचक मंडल को मतदाता परिषद भी कहते हैं. अब यह बात समझने की है कि यह निर्वाचक मंडल कैसे बनेगा. मान लीजिए, आपके विधानसभा क्षेत्र में छोटे-बड़े 150 गांव हैं. ऐसे में, पहली बात यह है कि हर गांव या टोला, जिसमें कम से कम 50 परिवार हों, प्राथमिक इकाई (बुनियादी इकाई) माना जाएगा (इससे कम परिवारों का टोला पड़ोस के टोले में मिला दिया जाएगा). इस प्रकार आपके निर्वाचन क्षेत्र में, जिसमें लगभग डेढ़ सौ गांव हैं. संभवत: लगभग एक सौ प्राथमिक इकाइयां होंगी. कुछ कम या ज़्यादा भी हो सकती हैं.

लोक उम्मीदवार की बात नई है और कठिन इसलिए मालूम हो रही है, क्योंकि हम लोग इतने वर्षों से दलों के और स्वतंत्र, दो ही तरह के उम्मीदवार देखते आ रहे हैं. जो चीज नई होती है, उसे नए ढंग से समझना पड़ता है और उसे करने के लिए कुछ काम भी नए करने पड़ते हैं.

एक सौ प्राथमिक इकाइयां बन गईं, तो उसके बाद क्या होगा?
लोक उम्मीदवार का काम करने वाले कार्यकर्ता ऐसी हर प्राथमिक इकाई में जाएंगे और मतदाताओं की सभा करेंगे. वे कोशिश करेंगे कि इकाई के अधिक से अधिक मतदाता सभा में आएं. इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि 100 मतदाताओं में से कम से कम 20 को ज़रूर मौजूद रहना चाहिए. इससे कम रहने पर वह सभा सही नहीं मानी जाएगी और दोबारा बुलाई जाएगी. यह सभा मतदाताओं की होगी, इसलिए सबसे पहले उन्हें लोक उम्मीदवार का विचार अच्छी तरह समझाया जाएगा, ताकि किसी के मन में कोई शंका रह न जाए. इसके बाद लोगों से कहा जाएगा कि क्यों इस बार पूरे विधानसभा क्षेत्र के लिए एक निर्वाचक मंडल सोचा गया है, जो उम्मीदवार तय करने का काम करेगा. चूंकि क्षेत्र के हज़ारों मतदाताओं को किसी एक जगह एकत्र करना संभव नहीं है, इसलिए यह विचार किया गया है कि हर प्राथमिक इकाई निर्वाचन मंडल के लिए अपना प्रतिनिधि चुने. इस दृष्टि से इस प्राथमिक इकाई को भी निर्वाचन मंडल के लिए अपना प्रतिनिधि चुनना है. इसी तरह सभी प्राथमिक इकाइयां अपने-अपने प्रतिनिधि चुनेंगी और सारे प्रतिनिधियों को मिलाकर क्षेत्र का निर्वाचन मंडल बनेगा.
एक प्राथमिक इकाई कितने प्रतिनिधि चुनेगी और किस पद्धति से चुनेगी?
प्रति 250 या ज़्यादा मतदाताओं पर एक प्रतिनिधि. अगर आपकी प्राथमिक इकाई में मतदाताओं की कुल संख्या 254 है, तो एक प्रतिनिधि चुना जाएगा और अगर 500 या इससे अधिक है, तो 2 प्रतिनिधि होंगे, लेकिन हर प्राथमिक इकाई से कम से कम एक प्रतिनिधि ज़रूर होगा, भले ही उसमें 250 से कम मतदाता हों. ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी इकाई का कोई प्रतिनिधि न हो.

चुनाव की पद्धति

  •  कम से कम 50 परिवारों का गांव (टोला).
  •  ऐसा हर गांव एक प्राथमिक इकाई.
  •  हर प्राथमिक इकाई के मतदाताओं का एक प्रतिनिधि.
  •  अधिक मतदाताओं की प्राथमिक इकाई में प्रति 250 मतदाताओं पर एक प्रतिनिधि.
  •  ऐसे सारे प्रतिनिधियों को मिलाकर निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचक मंडल.

 

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